विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
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भगवान सदानन्द ब्रम्हाण्डीय ज्ञानालय का उद्देश्य--

     वर्तमान शिक्षा पद्धति अत्यन्त दूषित हो चुकी है । शिक्षा प्रणाली आज की इतनी गिरी हुई एवं ऊल-जलूल बन गई है कि आज शिक्षा क्या दी जानी चाहिए और क्या दी जा रही ही अनिर्दिष्ट है । आज समाज में विद्यार्थी को मात्र संसार से लेकर शरीर तक यानी जड़ की ही जानकारी दी जा रही है जिसके परिणाम में पूरा समाज जड़बादी धारणा यानी जड़ता से ग्रसित होकर इन्द्रिय-शरीर स्वार्थ प्रधान हो गया है जिसके कारण समाज चौतरफा आडम्बर-ढोग-पाखण्ड के साथ साथ झूठ-चोरी-बेईमानी-भ्रष्टाचार-आतंकबाद- असत्य-अधर्म-अनन्याय-अनीति के चपेट में है । अर्थात्

बेईमानी-भ्रष्टाचार के मूल में
जड़प्रधान लौकिक शिक्षा पद्धति

     किसी भी समाज का मूल स्तम्भ शिक्षा पद्धति है। जैसी शिक्षा पद्धति होगी ठीक वैसे ही समाज का निर्माण भी होगा । हमें दी जाने वाली शिक्षा पद्धति ही हमारे चरित्र-संस्कार का मूल आधार है । जैसी शिक्षा समाज को दी जाएगी ठीक वैसा ही समाज के लोगों का कर्तव्य और मंजिल भी होगा । यदि स्वार्थ प्रधान, अर्थ प्रधान लौकिक शिक्षा समाज को दी जाएगी तो अवश्य ही समाज के युवा वर्ग स्वार्थी बेईमान-भ्रष्ट होंगे । यदि समाज को परमार्थ प्रधान, धर्म प्रधान पारलौकिक ‘विद्यातत्त्वम् पद्धति’ समाज को पड़ाया जाएगा तो अवश्य ही ईमान-सच्चाई-अनुशासन से युक्त महापुरुष-सत्पुरुषों से युक्त समाज बनेगा | आज हमारे समाज में भ्रष्टाचार चरम पर है । ऐसा कोई सरकारी विभाग नहीं होगा जहाँ भ्रष्टता रहित कार्य प्रणाली हो । वास्तव में कहा जाए तो ईमानदार तो वही है जिसको बेईमानी का कोई मौका नहीं मिला है । सरकार के तीन अंग कार्यपालिका-न्यायपालिका-विधायिका इन तीनों क्षेत्र में कार्य करने वाले सभी अधिकारी कर्मचारी नेता शिक्षित हैं और यही लोग बेईमान-भ्रष्ट हैं । यहाँ तक की इन विभागों में सबसे ऊँचे पद पर रहने वाले मंत्री-न्यायपालिका के प्रमुख न्यायाधीशों की भी भ्रष्टता सामने आ रही है | कोई छोटा-बेईमान है तो कोई बड़ा बेईमान है, हैं सभी बेईमान । बड़े-बड़े भ्रष्टाचार जाँच आयोग द्वारा खुलासा होकर, समाचार पत्रों-मीडिया के माध्यम से समाज में आ रहे हैं मगर जो छोटा भ्रष्टाचार होता है वह तो दबा का दबा रह जाता है। भ्रष्टाचार तो भ्रष्टाचार है । चाहे वह लाखों-करोडों-अरबों का हो या हजार-सकड़ों का हो । क्या ये शिक्षित अधिकारी-कर्मचारी-नेता-राजनेताओं ने स्कूल-कालेजों में दी जाने वाली शिक्षा में, पढाई में यही पढाई- सीखी कि बेईमान-भ्रष्ट-चोर बनिये । अवश्य ही यही पढाई आपने पढी है और यही शिक्षा समाज को दी जा रही है । तभी न हर क्षेत्र में बेईमानी-भ्रष्टाचार चरम पर है । आज ईमानदार खोजने पर भी नहीं मिलते हैं । कोई छोटा भ्रष्ट है तो कोई बड़ा भ्रष्ट है । दोष वर्तमान शिक्षा पद्धति में है; क्योंकि आज की शिक्षा पद्धति स्वार्थ-लौकिकता प्रधान है । आपको जढी-भोगी बनाने वाली शिक्षा पद्धति है । जब आपको मात्र लौकिकता-जड़ ही दिखाया जाएगा, ये लौकिक संसार के विषय- आपके शरीर, शरीर से सम्बन्धित रिश्ते-नाते, रुपैया, पैसा, खेती- बाड़ी, गाड़ी-घोड़ा विलासिता की वस्तुयें मात्र ही दिखायी जाएँगी यानी शरीर से संसार तक जड.-वस्तुओं की मात्र ही जानकारी शिक्षा पद्धति में रहेगी तो आप ये लौकिक जड़ वस्तुओं के पीछे-पीछे अवश्य भागने-दौडने लगेंगे । यहाँ तक कि उसके नहीं मिलने पर झूठ-फरेब-चोरी-भ्रष्टाचार-बेईमानी-लूट-हत्या आदि अपराध भी करने-कराने लगेंगे । क्यों अपने और अपने परिवार के लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए । ये तो है आज की शिक्षा पद्धति का परिणाम । ये शिक्षा पद्धति पदने वाले ये अधिकारी-कर्मचारी-नेता-राजनेता तो भ्रष्ट हैं ही आजकल के समाज को उपदेश देने वाले तथाकथित धर्माधिकारी गुरु-सन्त-महात्मा भी इन कर्मचारी-अधिकारी नेताओं से कम भ्रष्ट-बेईमान नहीं हैं । हर किसी का लक्ष्य लौकिक हो चुका है । इन लोगों ने धर्म को अर्थ उपार्जन का धन्धा बना दिया है । जनमानस को दिया कुछ नहीं; कोई जानकारी नहीं दिया और दान-चन्दा-भेंट-चढावा लेकर अपने आश्रमों को अट्टालिकायें बनाया, बैंक बैलेन्स किया । धर्म को जनमानस से वसूली का धन्धा बना दिया । इन तथाकथित गुरु-सन्त-महात्माओं को धर्म की कोई जानकारी नहीं । यहाँ तक की शरीर में स्थित जीव जहाँ से पारलौकिकता शुरू होती है, उसकी भी जानकारी नहीं है इन लोगों के पास । वर्तमान जड़-लौकिक शरीर-संसार प्रधान शिक्षा पद्धति, इसी को अविद्या-भौतिक शिक्षा-अपरा विद्या-प्रेय विद्या-भौतिक विद्या-कर्म विद्या, अविद्या भी कहा जाता है । अब आप ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग’ का अभियान चाहे जितना चलाइये-अनशन शुरू करिए, धरना दीजिए कुछ भी करिये ये भ्रष्टाचार जड़ से खत्म होने वाला नहीं है । हाँ कुछ कम हो सकता है वह भी जो भ्रष्टाचार सार्वजनिक होगा । बड़े-बड़े 2 जी स्पेक्टम घोटाला, राष्ट्रमण्डल खेल घोटाला आदि बड़े-बड़े करोड़ों-अरबों का घोटाला करने वाले बड़े-बड़े अधिकारी-कर्मचारी-नेता-मंत्री के ऊपर कुछ अंकुश लगाया जा सकता है मगर जो भ्रष्टाचार का पोल जनता के सामने नहीं खुल रहा है उसके ऊपर कैसे अंकुश लगेगा ? हर विभाग में हर क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार को यदि जड़ से समाप्त करना हो, समाज को ईमान-संयम-सदाचारी-खुशहाल-अनुशासित समृद्धि से युक्त महापुरुष-सत्पुरुषों का राज्य बनाना हो तो इस लौकिक शिक्षा पद्धति में सुधार, परिवर्तन करके- ‘विद्यातत्त्वम् पद्धति’ लागू करना ही होगा । आज विश्व सरकार की समस्या चैतरफा फैला भ्रष्टाचार मात्र ही नहीं हैं बल्कि विश्व की सबसे बड़ी समस्या आतंकवाद-उग्रवाद-माओबाद है । इन सबके जड़ में देखा जाए तो वर्तमान तथाकथित गुरु-सन्त-महात्मा-आलिम-मौलवी-पादरी आदि तथाकथित धर्माधिकारियों द्वारा फैलायी गयी भेदभाव सम्प्रदायवाद हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख- ईसाई आदि धर्म के नाम पर फैले सम्प्रदाय हैं | आज विश्व के किसी भी देश में ये भेदभाव समाप्त करने की शिक्षा पद्धति नहीं है; बल्कि पूरे विश्व की शिक्षा पद्धति मात्र संसार (लौकिकता) से शरीर तक सीमित है । आज की शिक्षा पद्धति में शरीर में स्थित जीव जिससे ही सारा संसार लौकिकता का अस्तित्त्व, वास्तव में हमारा असली अस्तित्त्व ‘हम-जीव-रूह-सेल्फ’ है । ये शरीर तो मात्र हमारा वस्त्र जैसा यानी हम कौन है ? कहाँ से आए है ? किसलिए आए ? ‘हम’ का उत्पत्ति कर्ता, माता-पिता कौन हैं ? हम किसके पुत्र हैं ? ये सारी जानकारी कराने वाला विधान ही जब शिक्षा में नहीं है तब कोई क्यों न स्वार्थी, भ्रष्ट, भेदभावी न बनें फिर क्यों समाज में भ्रष्टाचार-बेईमानी और आतंकवाद पैदा न हो ? इन सभी भेदभाव-सम्प्रदाय-अपराध का समाधान है ‘विद्यातत्त्वम् पद्धति’ ।

क्या है ‘विद्यातत्त्वम् पद्धति’ ?

विद्यातत्त्वम् पद्धति को ही परम विद्या, परमार्थ विद्या भी कहा जाता है जिसका शिक्षा मात्र एक उपांग है । ‘विद्यातत्त्वम् पद्धति’ के अन्तर्गत (1) शिक्षा Education (2) स्वाध्याय Self Realization (3) अध्यात्म Spiritualization (4) तत्त्वज्ञान Supreme KNOWLEDGE ये चार विधान आते हैं जिससे ही सम्पूर्ण की सम्पूर्णतया- संसार, शरीर, जीव, आत्मा, परमात्मा की अलग-अलग जानकारी-दर्शन होता हैं ।

     (1) शिक्षा:- शिक्षा के विषय में तो सब जानते ही हैं कि ये लौकिकता प्रधान संसार से लेकर शरीर तक के मध्य की जड़ विषयों की जानकारी देने वाला विधान (पद्धति) है जिससे समाज में भौतिकता से युक्त चोर-बेईमान-भ्रष्ट-स्वार्थी-भेदभावी-आतंकवादी समाज का निर्माण तो सम्भव है मगर अध्यात्मिकता,धार्मिकता से युक्त महापुरुषों-सत्पुरुषों का समाज कदापि सम्भव नहीं है ।

     (2) स्वाध्याय:- स्वाध्याय के विषय में यहाँ विस्तृत विश्लेषण तो नहीं दिया जा सकता, संक्षिप्त में जाने कि वास्तव में जिससे ये शरीर-संसार लौकिकता का अस्तित्त्व है वह ‘‘जीव-हम-रूह-सेल्फ-अहं’’ जो शरीर में स्थित रहकर हर गुण और कर्मों को भोगता है जब तक ये शरीर में है तभी तक शरीर का अस्तित्त्व है, इसके शरीर से निकलते ही शरीर मुर्दा हो जाता है जो जीव पारलौकिक है को जानने से सम्बन्धित विधान को ही स्वाध्याय कहा जाता है जिस विधान को जाने बिना कोई मानव कहलाने योग्य ही नहीं है। हम कौन है ? कहाँ से आये ? क्यों आये ? इसी ‘हम जीव-रूह-सेल्फ’ को जनाने वाले विधान को ही स्वाध्याय कहते हैं ।

     (3) योग साधना अथवा अध्यात्म:- अध्यात्म वह विधान है जिससे शरीर में स्थित जीव का आत्मा-ईश्वर-शिव-शक्ति से दरश-परश और मेल-मिलाप करते हुए आत्मामय, ईश्वरमय, ज्योर्तिमय, शिवमय रूप में स्थित स्थापित करने-कराने का एक क्रियात्मक, आध्यात्मिक, साधना पद्धति ही अध्यात्म है । जिस प्रकार शिक्षा से संसार और शरीर के मध्य की जानकारी प्राप्त होती है तथा स्वाध्याय शरीर और जीव के बीच की ‘स्व’ का एक अध्ययन विधान है, ठीक उसी प्रकार योग, अध्यात्म जीव और आत्मा-ईश्वर-शिव-सोल-नूर-स्पिरिट के मध्य तथा आत्मा से सम्बन्धित क्रियात्मक या साधनात्मक जानकारी और दर्शन उपलब्धि वाला विधान है ।

     (4) तत्त्वज्ञान रूप भगवद्ज्ञान:- ‘तत्त्वज्ञान’ वह विधान है जिसमें साक्षात् भगवत् प्राप्ति होती है । तत्त्वज्ञान भगवदावतारी का परिचय-पहचान है । ‘‘तत्त्वज्ञान’’ ही वह अशेष ज्ञान-विधान है जिसे यथार्थतः जान लेने के पश्चात् कुछ भी जानना और पाना शेष नहीं रह जाता है । ‘तत्त्वज्ञान’ एकमात्र परमप्रभु हेतु आरक्षित एवं सुरक्षित विधान है जिसका एकमात्र प्रयोगकर्ता परमात्मा-खुदा-गाड-भगवान् ही है जो परमआकाश रूप परमधाम से भू-मण्डल पर अवतरित होते हैं, हुए भी हैं और वही तत्त्वज्ञान हम लोगों को भगवत् कृपा विशेष से मिला है । हाँ अब ‘तत्त्वज्ञान’ का प्रायौगिक साक्षात् दर्शन तो किसी को नहीं हो सकता क्योंकि ‘तत्त्वज्ञानदाता’ एकमेव एक भगवदवतारी ही होता है मगर ‘तत्त्वज्ञान’ के सैद्धान्तिक व्यावहारिक पक्ष को अभी भी समाज जान सकता है । वर्तमान में उसी तत्त्वज्ञान के दाता भगवदवतारी सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा हस्त लिखित सद्ग्रन्थों तथा उनसे तत्त्वज्ञान प्राप्त भक्त-सेवकों से ‘तत्त्वज्ञान’ के सैद्धान्तिक पक्ष को जाना जा सकता है ।

     जब तक समाज में ‘‘तत्त्वज्ञान’’ के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक पक्ष की जानकारी नहीं दी जाएगी तब तक वर्तमान में फैले झूठ-चोरी-भ्रष्टाचार-भेदभाव-आतंकवाद-उग्रवाद-माओबाद, धर्म के नाम पर फैले आडम्बर-ढोंग-पाखण्ड को समूल समाप्त कर सत्य-धर्म-न्याय-नीति-सदाचार-संयमी-अनुशासित-ईमान-खुशहाल वसुधैव कुटुम्बकम् समृद्धि से युक्त समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती है ।

     भगवान् सदानन्द ब्रम्हाण्डीय ज्ञानालय का एकमेव एक उद्देश्य जनमानस को जड़वादी धारणा से जड़ से ऊपर उठाकर चेतन जीवत्मा बनाते हुए तत्त्ववादी धारणा में प्रवेश कराकर संसार से लेकर परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गाड-भगवान तक की जानकारी देते हुए समाज को दोष रहित सत्य प्रधान महापुरुषत्व-सत्पुरुषत्व वाला जीवन प्रधान करना है ।

     वर्तमान भगवदवतार परमपूज्य सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा देय सम्पूर्ण संसार-शरीर-जीव-आत्मा-परमात्मा की (1) शिक्षा Education (2) स्वाध्याय Self Realization (3) अध्यात्म Spiritualization (4) तत्त्वज्ञान Supreme KNOWLEDGE ये चारों विधान के विषय में समाज को जानकारी देकर इसके व्यवहारिकता को लागू करना ही इस ब्रम्हाण्डीय ज्ञानालय का लक्ष्य है ।

शेष सब भगवत् कृपा ।
सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद्


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