विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
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अध्ययन-अध्यापन का ढंग

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! अध्ययन-अध्यापन और ज्ञान समाज सुधार और जीवोद्धार तथा सुखी-सम्पन्न समाज हेतु सर्वप्रथम सबसे महत्त्वपूर्ण एवं सभी के लिए ही एक अनिवार्यत: आवश्यक विधान है । अध्ययन-अध्यापन और ज्ञान पर ही समाज का पूरा भविष्य आधारित है। इस प्रकार सामाजिक सुधार हेतु, यदि किसी की जिम्मेदारी है तो वह सर्वप्रथम एवं सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी गुरुजन बन्धुओं पर ही है। समाज में सबसे अधिक महत्त्व एवं साधन सुविधायें, यदि किसी को दिया जाता है तो उसमें सबसे प्रमुख एवं सबसे अधिक हमारे गुरुजन बन्धुओं को ही मिलनी चाहिये ताकि उनका मसितष्क सदा ही निश्चिन्तता पूर्वक अध्यापन में ही लगा रहे।

विद्यार्थियों का समुचित विकास किस प्रकार हो, यह पूरी जिम्मेदारी गुरुजन बन्धुओं पर ही होना चाहिये । इसके साथ ही किसी भी पारिवारिक व्यक्ति को गुरुजन बन्धुओं के अनुशासन में दखल नहीं देना चाहिये । सुधारात्मक अनुशासन विद्यार्थियों पर बराबर रहना चाहिये । विद्यार्थी ही भावी समाज का कर्णधार होता है। यह यादगारी गुरुजन बन्धुओं को सदा ही अपने मस्तिष्क में रखना चाहिये। प्रत्येक समाज में अध्यापक बन्धुओं को आदर एवं सम्मान दिया जाना चाहिये । अपने पुत्र-पुत्रियों को गुरुजन बन्धुओं के निर्देशन में ही सदा रखना चाहिये । अध्ययन-अध्यापन शिष्टाचारिक और व्यावहारिक हो । विद्या को कभी भी व्यावसायिक नहीं अपितु लक्ष्यमूलक व्यावहारिक ही होना चाहिए । यह तब ही सम्भव है जब कि 'पिण्ड और ब्रह्राण्ड की यथार्थत: जानकारी के साथ ही दोनों में आपस में ताल-मेल सन्तुलन बने-बनाये रहने वाला ही हो ।

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! गुरुजन बन्धुओं को चाहिए कि सबसे पहले विद्यार्थियों को शिष्टाचार का व्यावहारिक पहलू मजबूत करें! सत्यं बद; धर्मं चर ! (सत्य बोलें और धर्म पर रहें-चलें !) अध्ययन का मूलमन्त्र होना चाहिये । इसकी व्यावहारिकता पर सबसे कड़ी दृष्टि होनी चाहिये । विद्यार्थियों में सर्वप्रथम शिष्टता एवं सदाचारिता ही कूट-कूट कर भरनी चाहिये । विद्यार्थियों के नैतिक और चारित्रिक विकास से सम्बन्धित विषय-वस्तुयें भी होनी चाहिये । वेद, उपनिषद, रामायण, गीता, पुराण, जैन-बौद्ध साहित्य, बाइबिल, कुर्आन, गुरुग्रन्थ साहेब आदि आदि का समन्वयवादी भाव और ज्ञान विद्यार्थियों में प्रविष्ट करना-कराना चाहिये जिसमें विद्यार्थियों को किसी भी वर्ग-जाति-सम्प्रदाय से ऊपर उठाकर भेद रहित भाव भरना सबसे प्रमुख उददेश्य रखना चाहिये । वेद, उपनिषद, रामायण, गीता, पुराण बाइबिल, कुर्आन को विभिन्न भाषाओं के अन्तर्गत एक ही धर्म की शिक्षा-दीक्षा है-- ऐसा ही भाव भरना सभी के लिये अनिवार्य होना चाहिए । वर्ग-जाति एवं सम्प्रदाय को कुछ तुच्छ स्वार्थियों एवं संकुचित विचार धाराओं वाले नासमझ व्यक्तियों से उत्पन्न एवं संचालित समाज विरोधी कार्यों को यह घृणित कार्य है प्रभावी रूप में ऐसी मान्यता देनी दिलानी चाहिये । विद्या का क्षेत्र सदा ही नीच-ऊँच, गरीब-अमीर, लिंग-जाति-वर्ग- सम्प्रदाय आदि भेद मूलक दूषित विधान से सर्वथा रहित और ऊपर सदभाव, सदविचार, सदव्यवहार और सतकार्यरूप विधानों से युक्त होना चाहिये । गुरुजन बन्धुओं को इस तरफ सतत् प्रयत्नशील होना-रहना चाहिये कि किसी भी विद्यार्थी के अन्दर किसी भी विषय-वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति आपस में राग-द्वेष नामक सामाजिक कैंसर और कोढ़ न उत्पन्न होने पावे । राग-द्वेष दोनों ही समाज के लिये कैंसर और कोढ़ हैं जिससे हर किसी को ही सदा ही बचना-बचाना चाहिये अन्यथा समाज कुकृत्य से ग्रसित हो भ्रष्टाचार से गुजरता हुआ तहस-नहस-विनाश को प्राप्त हो जाया करता है-करेगा ही ।

-----------सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस

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1. गुरुजन बन्धुओं से

सद्भावी गुरुजन बन्धुओं ! 'दोष रहित सत्य प्रधान' मुक्ति और अमरता से युक्त सर्वोत्तम् जीवन विधान और अमन-चैन का सुखी समृद्ध समाज स्थापित करने हेतु गुरुजन बन्धुओं को सबसे पहली तथा सबसे बड़ी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेनी और उसे सुचारु रूप से वहन करनी चाहिये । गुरुजन बन्धुओं को सर्वप्रथम तो स्वत: यह संकल्प लेना होगा कि हम सद्भाव एवं सद्व्यवहार प्रधान शिष्ट एवं संयमित जीवन को ही आधार बना, चलते-चलाते हुए, ‘सत्यं बद, धर्मं चर ! (सत्य बोलें और धर्म पर रहें-चलें !)’ जो जीवन का सर्वोत्तम् लक्ष्य है, को ही एकमात्र लक्ष्य बनाकर आगे-पढे़-पढ़ायेंगे बढ़ें-बढ़ायेंगे।

अग्रलिखित प्रार्थना को अर्थ और भाव सहित यथार्थत: व्यवहार में उतारते हुए, निष्काम भाव से अपने जीवन के हर पहलू में उसकी सार्थकता को पूर्णत: सफल बनायेंगे । यह संकल्प स्वत: गुरुजनवृन्द को लेना और विद्यार्थियों को भी दिलाना चाहिए ।
"हे प्रभो आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिये;
शीघ्र सारे दुर्गुणों को, दूर हमसे कीजिये ।
लीजिये हमको शरण में, हम सदाचारी बनें;
ब्रह्राचारी धर्म रक्षक, वीर ब्रतधारी बनें ।।"

इस प्रकार इस प्रार्थना को आँख बन्दकर, ध्यान मुद्रा में मात्र गाने से ही इसकी सार्थकता साबित (प्रमाणित) नहीं होगी बल्कि इसके अन्तर्गत क्या अर्थ-भाव है? यथार्थत: उस अर्थ-भाव को जीवन-व्यवहार में कैसे लाया जाय ? अपने जीवन में इसको किस प्रकार पूर्णत: सार्थक बनाया जाय आदि-आदि बातों को दृढ़ता एवं गम्भीरता के साथ मनन-चिन्तन करते हुये, अपने जीवन में इसको तथा अपने जीवन को इसमें पूर्णत: एकरूपता का रूप देनी होगी । तब जाकर सर्वत्र ‘दोष रहित सत्य प्रधान’ उन्मुक्तता और अमरता से युक्त सर्वोत्तम् जीवन विधान वाला अमन-चैन से युक्त समाज स्पष्टत: दिखलार्इ देगा। प्राय: सभी ही अपनाने और उसी पर ही रहने-चलने लगेंगे तो मोक्ष सहित जीवन का सच्चा आनन्द भी पाने लगेंगे । ऐसे ही उन्मुक्तता-अमरता सहित समृद्धि सम्पन्नता वाला अमन-चैन (शान्ति- आनन्द) वाला समाज स्थित-स्थापित हो जायेगा ।

सद्भावी गुरुजन बन्धुओं ! ‘सत्यं बद, धर्मं चर ! (सत्य बोलें और धर्म पर रहें-चलें !)’ अपने आप में इतना समर्थ होता है कि अपने को इसमें (सत्य धर्म में) लग लगाकर यानी अपने जीवन को दृढ़ता पूर्वक सत्य धर्म पर चला-चलाया जाय तो यह स्वयं ही हमारा अगला रास्ता स्पष्ट करते हुये आगे बढ़ाता जाता है। यदि दृढ़ता पूर्वक अपने आप को सत्य धर्म पर स्थित रखें तो इसमें रत्ती भर भी सन्देह नहीं कि जीवन को सफल-सार्थक न बना दे और जीवन को मुक्ति और अमरता रूप लक्ष्य तक अमन-चैन और परमशान्ति और परम आनन्द के साथ ही परमपद तक निश्चित ही न पहुँचा दे । प्रह्लाद, हरिश्चन्द्र, श्रीरामचन्द्र जी महाराज, युधिष्ठिर, विक्रमादित्य आदि के राज्य-शासन में प्रजा कितनी खुशहाल, कितना अमन-चैन का जीवन जी रही थी जिसका कोर्इ हिसाब नहीं था । यह सब ‘सत्यं बद, धर्म चर ! (सत्य बोलें और धर्म पर रहें-चलें !)’ पर रहने-चलने का ही परिणाम था ।

ये उपर्युक्त उदाहरण कोर्इ कपोल कल्पित कल्पना पर आधारित नहीं अपितु इतने प्रभावी और व्यावहारिक हैं कि आजकल भी हम सब इस ‘सत्यं बद, धर्मं चर ! (सत्य बोलें और धर्म पर रहें-चलें !)’ को जान-देखकर बोध प्राप्त कर अपने जीवन में दृढ़ता पूर्वक लागूकर करा सकते हैं कि इस पर (सत्य धर्म पर) चलते हुये कितना शांति और आनन्द मिलता है--इसकी हम आप कल्पना ही नहीं कर सकते क्योंकि यह अकल्पनीय एवं अनिर्वचनीय होता है। इसका अर्थ इसी से जान-समझ लिया जाय कि इससे युक्त व्यक्ति सम्राट का पद क्या, इन्द्र-ब्रह्रा-शंकरजी का पद भी इसके बदले नहीं चाहता।

हम तो भगवत कृपा से प्राप्त तत्त्वज्ञान और अपने व्यावहारिक अनुभव और बोध के आधार पर आदरणीय गुरुजन बन्धुओं से बार-बार साग्रह निवेदन करते हुये कहेंगे कि शिष्ट एवं संयमित गुरुजन ही शिष्ट एवं संयमित-अनुशासित अमन-चैन का विधार्थी और समाज भी स्थापित कर-करा सकते हैं ।

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1 .1 अशिष्ट से शिष्ट समाज असम्भव

जो स्वत: शिष्ट और संयमित न हो उससे शिष्ट एवं संयमित समाज की आशा की ही नहीं जा सकती है । जो स्वत: अनुशासित न हो, उससे अनुशासित समाज की कल्पना करना भी अपने आप को भ्रम में रखना तथा समय और श्रम को व्यर्थ गवाँना है। जो स्वयं सत्यवादी न हो, उससे सत्यवादी समाज की आशा ही बेकार है। जो स्वयं ही धार्मिक नहीं है, उससे धार्मिक समाज की स्थापना सोचा ही नहीं जा सकता है। जो निष्काम, शान्त एवं आनन्द से युक्त न हो, उससे निष्काम, शान्त एवं आनन्दित समाज की स्थापना का विचार करना ही अपने नासमझदारी का परिचय देना है । इस प्रकार इन बातों को मददेनजर रखते हुए सर्वप्रथम अपने जीवन को शिष्टता, संयमितता और अनुशासनिकता से युक्त करें तत्पश्चात् अध्यापन कार्य करें क्योंकि विद्यार्थी पर सबसे अधिक प्रभाव उसके विद्यादाता अध्यापक का ही पड़ता है ।

एक अशिष्ट एवं असंयमित और अनुशासनहीन अध्यापक अध्ययनशील हजारों हजार विद्यार्थियों को अशिष्ट, असंयमित और अनुशासनहीन बना देगा जिससे कि समाज तथा सामाजिक व्यवस्था पर इतना बुरा प्रभाव पड़ेगा कि बाद में उसे ठीक करना यानी सुधारना एक असाध्य नहीं तो दु:साध्य कार्य तो निश्चित ही हो जायेगा। इसलिए सुव्यवस्थित अमन-चैन के समाज हेतु सर्वप्रथम गुरुजन बन्धुओं को स्वयं ठीक (शिष्ट एवं संयमित) होना-रहना पडे़गा, अन्यथा प्रशासन का यह प्रथम कर्तव्य होना चाहिये कि ऐसे अशिष्ट, असंयमित और अनुशासनहीन गुरुजन को पद पर या तो नियुक्ति ही न करें और नियुक्ति करना जरूरी हो तो उन्हें ठीक राह पर सुधार कर ला देवे अन्यथा बिना किसी हिचकिचाहट के उन्हें उक्त कार्य से मुक्त कर दे। ऐसा करने में थोड़ी भी एहसान या मरौवत की आवश्यकता नहीं है । ऐसे में कुछ गुरुजनवृन्द पर एहसान का अर्थ उनसे सम्बन्धित समस्त विद्यार्थीजन के जीवन के साथ खिलवाड़ करना, घात करना अथवा उन्हें बर्बाद करना होगा ।

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1.2 मर्यादा और महत्ता हेतु शिष्टता अनिवार्य

सदभावी गुरुजन बन्धुओं ! आपके सम्बन्ध में अधिक क्या कहूँ या लिखूँ, क्योंकि आप लोग तो स्वत: ही विद्वान जानकार एवं समझदार हैं । फिर भी एक बात और तो कह ही देना चाहूँगा कि आपकी मर्यादा एवं महत्ता भी श्रेष्ठतर इसी में है कि शिष्ट, संयमित और अनुशासित विद्यार्थी एवं समाज की रचना करें, क्योंकि शिष्ट, संयमित और अनुशासित विद्यार्थी एवं समाज ही किसी के मर्यादा एवं महत्ता को भी जान-समझ एवं व्यवहारित कर सकता है और जब वह किसी की भी मर्यादा और महत्ता जानने-समझने देने-करने लगेगा तो फिर अपने विद्यादाता गुरु की कितनी मर्यादा और महत्ता देगा--यह स्वत: ही समझने योग्य बात है। जो अशिष्ट, असंयमित और अनुशासनहीन होगा वह किसी के मर्यादा एवं महत्ता को जानने-समझने की कोशिश ही नहीं करेगा। करना भी चाहे तो आता ही नहीं । वह तो सदा अपने ही मर्यादा एवं महत्ता के चक्कर में पड़ा रहता है । उसे तो यह कदापि समझ में नहीं आता है कि मर्यादा एवं महत्ता पाने हेतु मर्यादा एवं महत्ता देना अनिवार्य होता है क्योंकि किसी के लिये भी किसी व्यक्ति या समाज को मर्यादा दिये वगैर उस व्यक्ति या समाज से मर्यादा या महत्ता को पाना बिल्कुल ही असम्भव बात है क्योंकि जो बीज बोया जायेगा, फसल और पौध-फल भी वही होगा यानी मर्यादा स्थापित करने से ही मर्यादा मिलेगी । मर्यादा एवं महत्ता और समझ अपने आप में एक उत्तम लक्षण है और किसी उत्तम लक्षण हेतु शिष्टता एवं संयमितता और अनुशासनिकता एक अनिवार्य पहलू है

अत: बार-बार, अनेकानेक बार पुन: गुरुजन बन्धुओं से साग्रह निवेदन पूर्वक कहूँगा कि शिष्ट, संयमित और अनुशासित समाज के रचना का पूरा-पूरा भार एक मात्र गुरुजन बन्धुओं को ही अपने पर ही लेना और सहर्ष उसे निभाना भी चाहिये । समाज की समुचित रचना आप ही बन्धुओं से सम्भव है । यदि आप संभल जायें तो सारा समाज संभल जाय । आज समाज जो भ्रष्टता के अंतिम रूप में पहुँच गया है, उसकी जिम्मेदारी गुरुजनवृन्द एवं शासन व्यवस्था की ही है । इसे गुरुजनवृन्द एवं सरकार स्वीकार कर सत्यता पूर्वक अपने जिम्मेदारी को समझ-बूझ कर अपने कर्तव्य पालन में समुचित रूप से लग जायें तो नि:संदेह दोष रहित सत्य प्रधान मुक्ति-अमरता सहित अमन-चैन का सुख-समृद्धि से युक्त समाज स्थित स्थापित हो जाये । चारो तरफ ही खुशियाली हो ही जायेगी । प्राय: सब ही अपने आप को कृत-कृत्य ही देखने लगेंगे ।

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1.3 स्वार्थ-सर्वथा त्याज्य

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! आज समाज में चोरी-डकैती, लूट-अपहरण, हत्या-अत्याचार-भ्रष्टाचार जोर जुल्म और आतंक का जो वातावरण चारो तरफ उग्रतम् रूप लेकर छाया हुआ है । इसके मूल में एकमात्र स्वार्थ ही है जो आज समाज को ऐसे विकृत स्तर तक पहुँचा दिया है । स्वार्थ के कारण ही आज शासन के अन्तर्गत शुरू से अन्त तक घूस रूपी घोर घृणित भ्रष्टाचार छाया हुआ है । आज प्राय: कोर्इ कर्मचारी, अधिकारी, एम .एल . ए, . एम . पी .,यहाँ तक कि मंत्रीगण भी बिना घूस या कमीशन (आंशिक प्राप्ति) के अधिकतर ऐसे होते जा रहे हैं जो कार्य करते ही नहीं। घूस तो अब इन लोगों के जुबान पर घूस न रहकर सुविधा शुल्क कहलाने लगा है । एम .एल . ए, एम . पी ., मन्त्री जी लोगों के लिये इसका सुधारात्मक नाम चन्दा पड़ गया है जो एक प्रकार का अग्रिम घूस ही होता है जिसका दुष्परिणाम वस्तुओं की महँगार्इ आदि-आदि जनमानस को झेलना पड़ता है । यही कारण है कि समाज में अनुशासन व व्यवस्था नाम की कोर्इ चीज तो सुनने को ही नहीं मिल रही है, देखना तो दूर रहा ।

इस प्रकार के स्वार्थी समाज की देन भी गुरुजन बन्धुओं की ही है । यह एक अनिवार्यत: सत्य सिद्धान्त है कि स्वार्थी व्यक्ति को कदापि गुरु नहीं बनना चाहिये अथवा प्रशासन को चाहिए कि स्वार्थ प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को अध्यापन हेतु कदापि नियुक्त न करे, क्योंकि स्वार्थी प्रवृत्ति वाले गुरु से परमार्थिक समाज कदापि स्थापित नहीं हो सकता और जब तक गुरुजन वर्ग परमार्थिक प्रवृत्ति का नहीं होगा, तब तक समाज सुधार और जीवोद्धार की आशा एक कोरी कल्पना मात्र बनकर ही रह जायेगी । 'शिष्ट, संयमित, अनुशासित और एक दूसरे के सहायक-सहयोगी रूप समाज की स्थापना हेतु नि:स्वार्थी गुरुजन तथा निष्काम सेवा और परमार्थी प्रवृत्ति वाला ही अध्यापक अनिवार्य है।

सदभावी गुरुजन बन्धुओं ! आप गुरुजन बन्धुओं को चाहिये कि विद्यार्थी के अन्तर्गत स्वार्थ और भेदभाव रहित परमार्थ की ही शिक्षा-दीक्षा दिया जाय। जैसी जानकारी होती रहती है, वैसा ही कार्य भी होता रहता है । हर कार्य का आधार ‘ज्ञान (जानकारी)’ ही होता है तथा होना भी यही चाहिये ।

गुरुजन बन्धुओं ! कम से कम थोड़ा भी तो मनन-चिन्तन करके जानते-देखते हुए समझने की कोशिश करें कि समाज को बर्बाद करने से क्या आपको शांति और आनन्द की अनुभूति अथवा सुख-सम्पत्ति की प्राप्ति हो रही है ? यदि इस पर थोड़ा भी मनन-चिन्तन करेंगे तो पायेंगे कि आपको भी सामाजिक विकृति-विघटन का शिकार होना पड़ रहा है, जिससे आप स्वयं काफी अशान्त, चिन्तित और दु:खित हैं, असन्तुष्ट हैं । अपने और अपने विद्यार्थी मण्डल के सुधार हेतु प्रयत्न करने-कराने को कभी-कभार सोचते भी हैं तो असंयमित आचरण, व्यवहार एवं स्वार्थी मनोवृत्ति के कारण उस पर चल ही नहीं पाते हैं । चलने का भी प्रयत्न करते हैं तो अपने अगल-बगल अशिष्ट-असंयमित और अनुशासनहीन व्यक्तियों के असहयोग एवं बाधा के कारण उस पर टिक (स्थिर) ठहर ही नहीं पाते हैं, क्योंकि आपके अन्दर न तो विश्वास रह गया है और न साहस ही । विश्वास और साहस तो सन्देह और स्वार्थ रूप छिद्र से आपके अन्त:करण से बह-निकल कर बाहरी वातावरण में विलीन हो गया है जिसको पुन: वापस अन्त:करण में लाना भी कुछ तो योग-साधना या आध्यात्मिक साधना अथवा साधनात्मक क्रिया से और पूर्णत: ठीक-ठीक रूप में तत्त्वज्ञान रूप सत्यज्ञान पद्धति से परमप्रभु रूप भगवत कृपा से ही सम्भव है, अन्यथा ठीक होना कदापि सम्भव नहीं है । आप सब समाज के सबसे जिम्मेदार व्यक्ति हैं। जरा सोचें तो सहीं कि क्या ये बातें सही ही नहीं हैं ? निश्चित ही जबाव मिलेगा कि सही ही है।

सदभावी गुरुजन बन्धुओं ! यथार्थता यानी वास्तविकता के साथ देखा जाय तो यह स्पष्ट (खुलासा) होते देर नहीं लगेगी कि स्वार्थ ही एक मात्र सभी बुराइयों, अत्याचारों, भ्रष्टाचारों, जोर-जुल्मों आदि में मुख्य रूप से मूलत: निहित है। स्वार्थ के कारण ही अशिष्टता, असंयम, अनुशासनहीनता, मर्यादाहीनता, अभिमान-अहंकारिता आदि विघटनकारी गड़बडि़याँ उत्पन्न होती और फैलती हैं । इसके (स्वार्थ के) समूल सफाया हेतु सर्वप्रथम, अध्ययन-अध्यापन के अन्तर्गत ही भेद-भाव रहित परमार्थपरक शिक्षा-दीक्षा को ही गुरुजन बन्धुओं द्वारा अपनाना होगा जिसके लिये पहले-पहल तो गुरुजन बन्धुगण को ही स्वार्थी मनोवृत्ति को घृणित जैसा त्याग करते हुए अपने-अपने विद्यार्थी समाज में भी स्वार्थ के प्रति घृणा भाव उत्पन्न करना। साथ-साथ निष्काम एवं परमार्थी प्रवृत्ति को स्वत: अपनाते हुये उन्हें भी अपनाने हेतु उत्प्रेरित तथा स्पष्ट और पुष्ट शास्त्रीय-प्रमाणों से जनाते-समझाते हुये उनके दिल व दिमाग में बैठा देना होगा ताकि वे भी स्वत: ही स्वार्थ से घृणा और परमार्थ से प्रेम करने लगें तथा व्यवहार में लानें और अपने जीवन में अपनाने लगें । परमार्थी समाज हेतु स्वार्थ का त्याग अनिवार्य है । स्वार्थ ही तो पतन और विनाश का बीज और परिवार ही उसका हरा-भरा वृक्ष होता है । परिवार में स्वार्थ उत्पन्न होता और पलता-फूलता-फरता है । परिवार परमार्थ का घोर विरोधी और शत्रु होता है ।

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1.4 अपना 'कर्तव्य' देखें, 'अधिकार' नहीं

सदभावी मानव बन्धुओं ! आजकल यत्र-तत्र-सर्वत्र यही देखा जा रहा है कि सभी कर्मचारी, अधिकारी, सामाजिक संस्थायें, राजनीतिक नेता गण आदि आदि प्राय: सभी के सभी ही अपने अधिकारों के माँग में ही लगे हैं। कोर्इ सभा कर रहा है तो कोर्इ जुलूस निकाल रहा है। कोर्इ सांकेतिक और कलम बंद हड़ताल कर रहा है तो कोर्इ पूर्ण हड़ताल ही करने-कराने में लगा है । कोर्इ ‘जेल भरो’ अभियान में लगा है, तो कोर्इ विरोध, घेराव, एवं तोड़-फोड़ में ही लगा हुआ है। यहाँ तक कि समाज में उग्रता-आतंक एवं अराजकता (आदि) सामाजिक विघटन रूपी खतरा अब विनाश के बहुत करीबतर पहुँच गया है । इन सभी गड़बडि़यों के मूल में एक ही बात छिपी है, वह है ‘अधूरी और प्रतिकूल’ शिक्षा पद्धति। जब तक सत्य-धर्म रूप क्रमश: ऊपर से नीचे को तात्तिवकता, आध्यातिमकता, नैतिकता और सांसारिकता और नीचे से ऊपर को सांसारिकता, नैतिकता, आध्यातिमकता और तात्तिवकता(परमसत्यता) रूप चारों अंशों से युक्त ‘विद्यातत्त्वम् पद्धति’ समाज में प्रभावी रूप से लागू नहीं होगी और विधातत्त्वम (तत्त्वज्ञान) प्रधान होने-रहने वाला विधादाता गुरु द्वारा शिक्षा-दाता शिक्षक का स्थान ग्रहण कर हर स्तर की परमार्थ परक यथार्थत: शिक्षा आपसी मेल-मिलाप, नीति वैराग्य, अध्यात्म-त्याग और ज्ञान-समर्पण की नहीं दी जायेगी तथा स्वार्थी, लोभी, लालची, अहंकारी अशिष्ट, असंयमी और अनुशासनहीन शिक्षकों के स्थान पर त्यागी, दानी, निरभिमानी, शिष्ट, संयमी और अनुशासित सज्जन निष्कामी, परमार्थी गुरुओं को प्रतिस्थापित नहीं किया जायेगा, तब तक समाज-सुधार और जीवोद्धार रूप समाज कल्याण की कल्पना भी व्यर्थ ही होगी। यह बात पढ़ने-सुनने में अजीब (आश्चर्यजनक) भले ही लगे परन्तु वास्तव में यह बात ध्रुव सत्य है कि निकट भविष्य में धार्मिक राज्य विश्व में स्थापित होना ही है तथा ये सारी बातें या पद्धति ही समाज में प्रभावी रूप से लागू होनी ही है। अब जब जिसे भविष्य में लागू होना ही है तो क्यों नहीं सहजभाव से वर्तमान में ही उसे स्वीकार करके समाज में यश-कीर्ति पाने में यशभागी बनें ।

सदभावी गुरुजन बन्धुओं । सर्वप्रथम तो यह जानने-जनाने की बात है कि वास्तव में कर्तव्य क्या है ? और अधिकार क्या है ? कर्तव्य और अधिकार रूप दोनों पहलुओं को स्थिरता एवं गम्भीरता के साथ मनन-चिन्तन करते हुए जानते-देखते हुए समझने की कोशिश किया जायेगा तो अन्तत: यही मिलेगा कि कर्तव्य-कर्म ही अपना श्रेष्ठतम अधिकार है, क्योंकि कर्तव्य प्रधान बनने या होने पर देखने को मिलेगा कि अधिकार तो कर्तव्य का ही छायारूप है। जहाँ भी कर्तव्य होगा, उसके पीछे-पीछे अधिकार को छायारूप में रहना ही रहना है मगर अधिकार को देखते हुये कर्तव्य को ही छोड़ दिया जाय तो पीछे-पीछे छाया की छाया तो बनेगा नहीं, फिर तो अधिकार अपने आप ही समाप्त हो जाया करेगा। अर्थात कर्तव्य जहाँ भी रहेगा वहाँ ही अधिकार को उसका सेवक यानी दास-दासी छायारूप बनकर रहना ही रहना होगा। कर्तव्य के वगैर अधिकार का तो कोर्इ अस्तित्त्व ही नहीं दिखलायी देता हैं। थोड़ा भी तो आप बन्धुगण भी गौर फरमायें (ध्यान दीजिए) कि क्या कर्तव्य के वगैर अधिकार का कोर्इ अस्तित्त्व है ? और जब अधिकार का पृथक कोर्इ अस्तित्त्व ही नहीं है तो इस अधिकार के लिए प्रयास, सभा, जुलूस या लड़ार्इ-झगड़ा क्यों ? यह सब तो व्यर्थ ही है, फिर ऐसा क्यों किया जाय ? क्यों नहीं र्इमान और सच्चार्इ से कर्तव्य पालन में ही लगा-लगाया जाय जिससे हर क्षेत्र में ही सुचारू रूप कार्य हो और अधिकाधिक उपार्जन होने लगे फिर तो सुख-समृद्धि जायेगी कहाँ-नि:सन्देह निश्चित ही आप सब का चरन चूमने लगेगी । फिर तो ऐसा ही क्यों न किया कराया जाय ? निश्चित ही किया कराया जाय ।

पुन: दूसरे तरफ यह देखा जाय कि कर्तव्य करने पर कर्तव्य जितना किया जाता है, उतना भर का अधिकार सदा ही उसके पीछे लगा-बझा रहता ही है। इसलिये हम सभी बन्धुओं को अधिकार की मिथ्या लड़ार्इ न लड़कर बलिक अधिकार के रूप में कर्तव्य की माँग और मिलने पर अधिक से अधिक श्रमपूर्वक कर्तव्य कर्म को करता हुआ, अधिक से अधिक कर्तव्य कर्म को पाने और करने की कोशिश करना चाहिये; क्योंकि जैसे-जैसे आपका कर्तव्य-कर्म अधिक बढ़ता जायेगा, वैसे-वैसे ही आपको इसका फल (अधिकार) अपने आप ही मिलता जायेगा । इतना ही नहीं, सबसे बड़ी और सर्वोत्तम् बात तो यह होगी कि कर्तव्य-कर्म को लगन एवं परिश्रम से करने के बाद उससे मिला हुआ उसके फल के भोग-उपभोग में उत्तमतर आत्मसन्तुष्टि की भावना उत्पन्न होती है जो अनिर्वचनीय शांति और आनन्द प्रदान करती है । इन सब बातों के बावजूद भी कर्तव्य-कर्म कि ‘हमको’ और अधिक काम मिले अथवा ‘हमारे’ काम का समय और अधिक किया जाय अथवा 'हमसे’ अधिक से अधिक श्रम लिया जाय आदि आदि बातों को लेकर कोर्इ सभा, जुलूस, सांकेतिक कलम बन्द या पूर्णत: हड़ताल तथा विरोध या जेल-भरो अभियान आदि कहीं सुनने को भी नहीं मिलेगा, देखना तो दूर रहा। हाँ, कहीं-कहीं बेकारी भत्ता की माँग और प्राप्ति भी हो रही है जो सरकारी अकर्मण्यता और अव्यवस्था का दुष्परिणाम है । क्या सरकार के पास कोर्इ कार्य और व्यवस्था ही नहीं है ?

आज का मानव दिन पर दिन आलसी-सुस्त, बिना श्रम किये लूट-खसोट कर जीने-खाने वाले हो गये हैं । कोर्इ श्रम करना नहीं चाहता है, परन्तु सभी अधिक से अधिक सुख-भोग के आकांक्षी हैं । प्राय: सबके सब बैठ-सोकर के ही रहना व रात-दिन ऐशो-आराम करना चाहते हैं और मौका मिलते ही, चाहे जिस किसी भी प्रकार से हो ऐसे ही करते भी रहते हैं । आजकल केवल चोर, डाकू, गुण्डा, बदमाश, जुल्मी, आंतकवादी तो ही एम. एल. ए., ऊँचे-ऊँचे पदों पर भी एम. पी, और मंत्रिमण्डल के प्राय: मंत्रीगण भी पदासीन हो जाया कर रहे हैं। जिन्दगी भर चोरी, डकैती, जोर-जुल्म करते हुये वे नेता-मंत्री आदि होकर आर्इ0 ए0 एस0 व आर्इ0 पी0 एस0 और उच्चस्थ पदासीन अधिकारीगण को गाय-बैल और भैंस आदि की तरह मनमाना चरवाही कर-करा रहे हैं । जिसके दिमाग में कर्तव्य का अर्थ भी नहीं समा सकता है, वही ही आजकल आर्इ0ए0एस0 और आर्इ0पी0एस0 पर शासन करने लगा है । फिर समाज की क्या गति होगी! जहाँ इन्जीनियर और डाक्टर भी ऐसे ही राजनेताओं के दया के पात्र हैं, फिर स्वास्थ्य और सामाजिक संरचना की क्या स्थिति होगी ? अब यह स्वयं ही सोचना-समझना चाहिये । आजकल के चाटुकारिता भरे आरक्षण ने तो प्रतिभाओं को समाप्त प्राय: करते जा रहे हैं जिसका दुष्परिणाम समाज को भुगतना पड़ रहा है । प्राय: सभी ही इसे देख रहे हैं, मगर स्वार्थ और कुर्सी रूपी लोभ-लालच किसी को समझने-सम्भलने नहीं दे रही है । सभी को ही ऐसे गर्त (पतन-विनाश) की ओर बढ़ने को मजबूर करती जा रही है ।

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1.5 'अधिकार' और 'कर्तव्य' की वास्तविक स्थिति
(अधिकार अभाव और पतन का तथा कर्तव्य समृद्धि और उत्थान का एकमात्र हेतु )

भगवत कृपा विशेष से और ‘तत्त्वज्ञान’ के प्रभाव से जहाँ तक हमारी जानकारी और समझ है, वहाँ तक तो हम यही समझ पा रहे हैं कि हमें कर्तव्य-कर्म का अवसर मिले, यही हमारा सबसे बड़ा अधिकार होना चाहिए। पुन: मिले हुए कर्तव्य कर्म को र्इमान और सच्चार्इ से संयमपूर्वक लगन के साथ अपनी क्षमता से भी कुछ आगे बढ़कर श्रम करते हुए दिखलायें ताकि अगले बार हमें और ही अधिक कर्तव्य कर्म की प्राप्ति होवे, क्योंकि जस-जस कर्तव्य कर्म बढ़ायेंगे, पीछे-पीछे अधिकार को भी बढ़ना ही है। कहा भी गया है कि कर्तव्य का फल सदा ही मीठा होता है। कर्तव्य कर्म का फल सदा ही श्रेष्ठ और उत्तम हुआ करता है, जिससे कर्तव्य-कर्म के पालन करने वाले को उसका फल मिलता ही है और यह फल ही तो अधिकार है जो कर्तव्य के पीछे बिन माँगे ही मिलता ही रहता है। इसलिये हर किसी को र्इमान और सच्चार्इ से लगनपूर्वक लगन से किये हुये अपने कर्तव्य कर्म मात्र को ही देखते व करते रहना चाहिये ।

यदि कर्तव्य कर्म का फल तत्काल नहीं भी मिले तो भी उससे घबड़ाना नहीं चाहिये। पूर्णत: विश्वास एवं भरोसा के साथ अपने कर्तव्य कर्म के फल का बोझ दैवी-विधान और भगवान, जो सृष्टि का कर्ता-भर्ता-हर्ता है, पर छोड़ते़ जाना चाहिये। ऐसा करने पर वह प्रकृति और पुरुष यानी भगवान किसी न किसी रूप में उस फल को कर्तव्य कर्म करने वाले को देता ही रहता है। अत: कर्तव्य कर्म ही हमारा मूल अधिकार होना चाहिये ।

सदभावी मानव बन्धुओं ! अधिकार की तरफ देखना, अधिकार की माँग करना, अधिकाधिक अधिकार हेतु लड़ार्इ और अधिक अधिकार या फल (वेतन आदि) के लिये हड़ताल आदि करना-कराना आदि-आदि बातों व कार्यों को थोड़ा भी ध्यान देकर मनन चिन्तन किया जाय तो परिणाम यही निकलेगा कि अधिकार के तरफ देखने से हमारा कर्तव्य कर्म भी छूटता जाता है अर्थात् हम कर्तव्य कर्म से उस मात्रा तक तो बंचित हो ही जाते हैं जिस मात्रा तक अधिकार को देखने में लगे रहते हैं। जरा र्इमान से सोचिए समझिए तो सही कि कर्तव्य के बिना अथवा कर्तव्य से अधिक अधिकार की चाह और प्राप्ति क्या बेर्इमानी नहीं है ? निश्चित ही बेर्इमानी ही है जो बिल्कुल ही त्याज्य होती है ।

हम यह नहीं कहते कि आप मानव बन्धु हमारे इस बात को मानें ही क्योंकि यह बात तो आज की स्थिति-परिस्थिति के बिल्कुल ही विपरीत लग रही है फिर भी मैं इतना तो आप बन्धुओं से अवश्य आग्रह करूँगा और आग्रह ही नहीं, साग्रह निवेदन भी करूँगा कि थोड़ा सा भी तो आप भी सोचें-समझें, क्योंकि भगवान ने हम सभी लोगों को थोड़ा बहुत सोचने-समझने हेतु दिल-दिमाग तथा बुद्धि और विवेक भी तो दिया है कि हमलोग अपनी क्षमता भर समझ-बूझ के साथ ही अगला कदम रखें। इसलिये हमें-थोड़ा बहुत अवश्य सोचना-समझना चाहिये कि क्या हम कोर्इ कर्तव्य-कर्म र्इमान और सच्चार्इ से संयमपूर्वक लगन एवं परिश्रम के साथ करेंगे तो उसका फल नहीं मिलेगा ? ऐसा कदापि हो ही नहीं सकता है । यदि थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाय कि थोड़े देर या कुछ दिन व माह-वर्ष फल (पारिश्रमिक) नहीं ही मिलता है तो क्या इसका फल समाप्त हो जाता है? नहीं ! नहीं !! कदापि नहीं !!! बल्कि वह इकठ्ठा हो रहा है। इसे एक-न-एक दिन मिलना ही है। अवश्य ही मिलना है। सब जोड़-बटोर कर मिलना है। नहीं यहाँ तो वहाँ । नहीं इस जनम में तो अगले जनम में, मिलना ही है ! दैवी विधान भी उसे रोक या समाप्त नहीं कर सकता है, मानवीय विधान को कौन कहे !

हमें अपने कर्तव्य कर्म पर पूर्ण विश्वास एवं भरोसा होना-रखना चाहिये। यदि कठिन स्थिति-परिस्थिति भी सामने आती है तो उसे भगवत कृपा समझकर सहर्ष झेल लेना चाहिये, परन्तु अपने विश्वास एवं भरोसा में सन्देह और निराश नहीं होना चाहिये । इन्सान भगवान को जाने-देखे नहीं या समझे नहीं, तो कोर्इ बात नहीं, परन्तु भगवान तो हम सभी के कर्तव्य कर्मों या हमारे दिल की गोपनीय से गोपनीय बातों से भी परिचित है। उन्हें भी वही अच्छी प्रकार ही जानता-देखता व समझता भी है क्योंकि सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ जानकार, सर्वश्रेष्ठ द्रष्टा, सर्वश्रेष्ठ समझ वाला और सर्वसमर्थ भी एक मात्र वही खुदा-गॉड-भगवान ही है। इस प्रकार हमें उस खुदा-गॉड-भगवान के प्रति विश्वास एवं भरोसा में थोड़ा भी संदेह की गुंजाइश नहीं रखनी चाहिये ।

इन सभी बातों पर मनन-चिन्तन करते हुये ध्यान दिया जायेगा तो निश्चित ही यह बात समझ में आ जायेगी कि हमें किसी भी स्थिति-परिस्थिति में अपने कर्तव्य कर्म से आलस्य एवं प्रमाद या किसी भी कारण से अपने को बंचित नहीं रखना चाहिए । दूसरे तरफ थोड़ा भी तो सोचें कि बिना कर्म का कोर्इ फल या अधिकार कभी भी बनता है, तो अवश्य समझ में आ जायेगा नहीं कदापि नहीं। हमारा एकमात्र अधिकार कर्तव्य कर्म को करने में ही है, अधिकार को देखने में नहीं, क्योंकि अधिकार को कर्तव्य कर्म के पीछे रहना ही रहना है। अधिकार देखने से तो पतन और अभाव ही होता जाता है जबकि कर्तव्य को देखने-करते रहने से विकास-उत्थान और समृद्धि होना ही होना है। अब आप ही निर्णय लें कि दोनों में से किसे अपनाना श्रेष्ठतर-श्रेयस्कर होगा ? वही करें । नि:सन्देह कर्मठता विकास-समृद्धि की जननी है ।

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1 .6 दोषों का दायित्त्व अपने पर लेना सर्वथा लाभप्रद ही

सदभावी मानव बन्धुओं ! प्राय: देखा जाता है कि समाज में या किसी संस्था विशेष के साथ कोर्इ अच्छा कार्य होता है अथवा कोर्इ अच्छी सुविधा उपलब्ध होती है अथवा कोर्इ अच्छा सेवा-सहयोग मिलता है तो उसका वाह-वाही लूटने वालों की कमी नहीं होती है-- ताँता लगा रहता है । यानी प्राय: सभी ही उस यश के भागी दार बनने का प्रयत्न करना प्रारम्भ कर देते हैं । परन्तु ज्योंही कहीं कोर्इ गड़बड़ी या बाधा या परेशानी अथवा दु:ख-कष्ट आदि उत्पन्न होता है या किसी पर पड़ता है तो उस गड़बड़ी या बाधा या परेशानी अथवा दु:ख-कष्ट का दायित्त्व कोर्इ भी लेने को तैयार नहीं होता है। जिसके माध्यम से दोष-गल्ती होता है, वह भी कतराने या दूसरे पर ही दोषारोपण करना शुरु कर देता है। यह तो स्थिति-परिस्थिति है आज के समाज की । हालांकि वास्तविकता बिल्कुल ही इसके विपरीत होती है। नीति का सिद्धान्त यह ही कहता है कि दोष अपने आप महत्ता दूसरों को देते रहना ही महापुरुषत्व होता है ।

सदभावी बन्धुओं ! आज की परिस्थिति इतनी बद से भी बदतर हो गयी है कि अब सत्य-धर्म-न्याय और नीति को दृढ़तापूर्वक अपनाये वगैर वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को सुधारना और सवाँरना दुसाध्य हो चुका है क्योंकि ‘सत्य-धर्म-न्याय-नीति’ एक सुदृढ़ एवं अनुशासित समाज हेतु अथवा अमन-चैन समाज हेतु ये चार मूलभूत स्तस्भ हैं, जिसके वगैर समाज रूपी छत (मंजिल) का टिकना ही असम्भव होता है। जिस समाज में आधारभूत रूप में ये चारों नहीं होंगे, वह समाज मात्र विघटन का रूप ही नहीं लेगा अपितु उस समाज का पतन और विनाश भी अवश्यम्भावी ही होता है। यह कथन ध्रुव सत्य है।

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1 .7 विश्व विनाश के कगार पर मगर भगवत कृपा विशेष

‘सत्य-धर्म-न्याय-नीति’ रूप चारों के श्रेष्ठता एवं उत्तमता को समाज में आन्तरिक रूप में तो सभी स्वीकार करते ही हैं, परन्तु जैसे ही उन्हें अपनाने तथा इसी के आधार पर रहने-चलने को कहा जाता है तो बाहय-विकृत परिस्थितियाँ उनके अन्दर हिलोरें मारकर ऐसा तरंग उत्पन्न करती हैं कि उनका हिम्मत या साहस ही टूट जाता है, क्योंकि आजकल समाज में आडम्बरियों, पाखण्डियों, मिथ्यावादियों और अन्यायियों द्वारा ‘सत्य-धर्म-न्याय-नीति’ में ही शक्ति-सामर्थ्य होता-रहता है-- ऐसे विश्वसनीयता को ही प्राय: समाप्त कर-करा दिया गया है ।

आज प्राय: किसी में भी साहस ही नहीं रह गया है कि वह अपने को सत्यवादी कह सके अथवा सत्यवादी रूप में रह-चल सके । अपने को धार्मिक कह सके अथवा शुद्धता एवं पवित्रता के साथ धार्मिकता के रूप में रह सके। अपने को न्यायी कह सके अथवा न्याय प्रियता पर ठीक-ठीक से रह-चल सके । अपने को नैतिक कह सके अथवा नैतिकता पर टिका रह-चल सके । आज का शासन और समाज तो हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यप, रावण, कंश, फिर्औन, हेरोदेश, कुरैश आदि-आदि धर्म विरोधी अथवा अधार्मिक शासन और समाज से भी यानी बद से भी बदतर स्थिति-परिस्थिति तक पहुँच गया है। बात अब यहीं तक नहीं रह गयी है कि यह कितना विकृत हो गया है बल्कि बात तो अब यहाँ तक पहुँच चुका है कि आखिरकार विनाश (प्रलय) में अब देरी ही क्यों हो रहा है ? विश्व-विनाश हेतु (सज्जनों या भगवद भक्तों या सेवकों-प्रेमियों के अतिरिक्त) अब कौन जोर-जुल्म, अत्याचार-भ्रष्टाचार अथवा घोर घृणित कार्य होना बाकी रह गया हैं जिससे कि शीघ्रातिशीघ्र मिथ्यावादियों, अधार्मिकों, अत्याचारियों, दुराचारियों आदि दुष्टों का विश्व से विनाश नहीं हो रहा है ? इस समय विचारणीय बात यही है कि अब देर क्यों ? इससे तो यही महसूस होता है कि वर्तमान समाज पर अभी भी खुदा-गॉड-भगवान की विशेष कृपा है जिससे कि वे समाप्ति-प्रलय के बजाय सुधारने-सवाँरने के प्रयास में लगे है और सभी को ही अभी और ही मौका-सुअवसर दे रहे हैं कि सुधर जाओं पाप-अधर्म छोड़कर धर्म अपना लो ।

सदभावी सत्यान्वेषी मानव बन्धुओं ! ‘सत्य-धर्म-न्याय-नीति’ प्रधान समाज ही शिष्ट-संयमी-अनुशासित और अमन-चैन-समृद्धि का समाज हो सकता है । यह समाज ऐसा विशिष्ट होता है और होगा भी कि जो बिल्कुल ही त्यागी, समर्पणी, सदभावी, सदविचारी, सदव्यवहारी, सतप्रेमी, सतकर्मी सदाचारी और परमार्थी होता है तथा निकट भविष्य में होगा भी । इस समाज के लोगों में वाह-वाही लूटने तथा दोषों को पराये माथे मढ़ने वाली बात नहीं होती है । यह समाज सदा ही यश दूसरे को देता है तथा दोषों के दायित्व को अपने पर लेता है; क्योंकि इसे ‘सत्य-धर्म-न्याय-नीति’ में अटूट श्रद्धा एवं विश्वास होता है तथा खुदा-गॉड-भगवान पर भरपूर भरोसा है कि मैं यदि निर्दोष होऊँगा तो कदापि मैं दंडित नहीं हो सकता तथा साथ ही यदि मैं दोषी हूँ तो छिपकर अथवा मिथ्या बोलकर बच नहीं सकता । वह यह समझता है कि बचने का उपाय भी सच-सच दोषों को स्वीकार करते हुए क्षमायाचना करके भविष्य में निर्दोष जीवन व्यतीत करने का संकल्प लेकर ही होता है । इसलिये वाह-वाही का कोर्इ लाभ नहीं और दोष अपने पर स्वीकार कर लेने से कोर्इ हानि भी नहीं ।

अपने ऊपर दोषों के दायित्व को स्वीकार कर लेना भी सामान्य बात नहीं है, बल्कि इससे व्यक्ति के अन्दर छिपे हुये सत्यवादिता एवं साहस की महत्ता ही प्रकट होती है और वह व्यक्ति महापुरुष और सत्पुरुष कहाने लगता है । प्रत्येक व्यक्ति को ही अपना स्वभाव ही ऐसा बनाना चाहिये कि अच्छाइयों को दूसरे का माने और कहें तथा बुराइयों और दोषों को अपना माने और कहे तथा अपने को और समाज को उस बुरार्इं-दोष से मुक्त होवे और करावे। यह महापुरुष और सत्पुरुष बनने-होने का सरल एवं सहज उपाय है । प्रतिष्ठित और मर्यादित जीवन हेतु यह एक सहज पद्धति है । जिसे हर किसी को ही अपनाना चाहिए, अपनाना ही चाहिए ।

सदभावी गुरुजन बन्धुओं ! मैं तो बार-बार अशिष्ट, असंयमित, अनुशासनहीन एवं विकृत सामाजिक रूप को देखकर, इसके दायित्त्व को दूसरों पर ले भी जाना चाहता हूँ तो भी सत्य जो है, मुझको बार-बार खींचकर इसके दोषों का दायित्त्व गुरुजनवृन्द पर ही लाता है जिसके कारण समाज के बर्बादी का दायित्त्व गुरुजन बन्धुओं पर ले जाने हेतु मजबूर हूँ । वास्तविकता भी यही है। यदि गुरुजन बन्धुओं से भी इस दायित्व के सम्बन्ध में पूछा जाय तो वे भी समस्त दोषों को सत्यत: अपने पर स्वीकार करने हेतु मजबूर हो जायेंगे, क्योंकि विद्यार्थी ही भावी समाज के कर्णधारर होते हैं और विद्यार्थियों के समुचित संरचना की सारी जिम्मेदारी गुरुजनवृन्द पर ही होनी चाहिये । गुरुजनवृन्द को चाहिए कि जिम्मेदारी स्वीकारते हुए यथाशीघ्र इसे सुधारने-संवारने का यत्न करें ।

यदि विद्यार्थी मिथ्यावादी हुआ, नास्तिक (अधार्मिक) हुआ, अन्यायी हुआ तथा अनैतिक एवं दुराचारी हुआ तो आखिर क्यों हुआ ? छोटी अवस्था में ही उसे शिष्ट, संयमी एवं अनुशासित क्यों नहीं बनाया गया ? हालाँकि गुरुजन बन्धुओं के साथ-साथ पारिवारिक संरक्षक भी दोषी होता है फिर भी गुरुजन पर ही इसका पूरा दायित्त्व होना चाहिये । गुरुजन ही शिष्ट, संयमी, सत्यवादी, धार्मिक एवं अनुशासित समाज की रचना कर सकते हैं।

सामाजिक संरचना की क्षमता-शक्ति गुरुजनवृन्द में ही होती रहती है। यदि वे र्इमान और सच्चार्इ से चाहें तो सामाजिक संरचना नि:संदेह असाध्य तो असाध्य है, दु:साध्य भी नहीं रह जायेगा अपितु सहज और सरल हो जायेगा । नि: सन्देह गुरुजनवृन्द में यह क्षमता-सामर्थ्य है । सरकार को भी गुरुजनवृन्द के व्यक्तिगत और पारिवारिक समस्याओं का समाधान रूप भरपूर धन-व्यवस्था की व्यवस्था देनी चाहिए जिससे कि गुरुजन बन्धु निश्चित होकर विद्यार्थी और समाज को सुधारने-संवारने में जी-जान से लग जांय ।

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1.8 जिससे और जिसकी दुनियां, उसी की उपेक्षा:

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! दुनियां वालों को क्या हो गया है ! जिस भगवान ने दुनियां बनाया-बनवाया, जिस भगवान ने मनुष्य हेतु सारी प्राकृतिक सम्पदायें प्रदान किये हैं जिससे कि मानव के प्राय: हर आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके; जिस भगवान ने मानव को चेतनता के साथ-साथ बौद्धिकता दी है, जो भगवान आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा-शिव-शक्ति के माध्यम से, देवी-देवताओं के माध्यम से जीवों की देखभाल करता-कराता है; उस भगवान को जानने, प्राप्त करने तथा उनके प्रति अनन्य भाव से समर्पित शरणागत होने तथा उसके भक्ति-सेवा और प्रेम के सम्बन्ध में पाठयक्रम के रूप में उसी के इस दुनियां में उसी की ही प्राप्ति-र्इश्वर की प्राप्ति और अपने आप ‘जीव’ तक की जानकारी, दर्शन (तीनों की ही पृथक-पृथक) प्राप्ति से सम्बन्धित पढ़ार्इ तक भी नहीं होती है । अर्थात् जनमानस में उस परमदयालु-परमकृपालु, सब का पोषक और सबके संरक्षक की जानकारी तक विद्यार्थीजनों और जनमानस को नहीं दी जा पा रही है । यह कितनी बड़ी अनर्थकारी व्यवस्था है । धन्य है वह परमप्रभु कि ऐसे अनर्थकारी व्यवस्था के बावजूद भी वह इस दुनियां को स्थित रखा है ।

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1.8.1 आत्म-शक्ति या ब्रह्रा-शक्ति अथवा शिव-शक्ति की भी नहीं:

एक यह भी बात देखें कि कितना आश्चर्य है कि ब्रह्रा-शक्ति आत्म-शक्ति शिव शक्ति के द्वारा ही मनुष्य या सभी प्राणी मात्र को ही प्राण संचालन की यानी श्वाँस-नि:श्वाँस की प्राप्ति हो रही है। उस आत्म-शक्ति रूप ब्रह्रा-शक्ति, शिव शक्ति के विषय में भी कहीं भी किसी भी विद्यालय में पढ़ार्इ-लिखार्इ तक नहीं हो रही है कि आखिरकार यह श्वाँस-नि:श्वाँस रूप प्राण संचार क्या है तथा कैसे-कैसे और कहाँ से आता है और अन्तत: कहाँ को चला जाता है ? यह आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा, शिव क्या है ? कैसा है ? दर्शन कैसे करें ? आदि-आदि पढ़ाई से बाहर कर दिया गया -- क्यों ? आखिर ऐसा क्यों किया गया ?

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1.8.2 यहाँ तक कि जीव-रूह-सेल्फ की भी नहीं :

कितने महान आश्चर्य की बात यह भी देखा जाय कि लाखों आदमी दुनियां में रोज जनम और मर रहे हैं फिर भी इस विषय में विद्यालयों में कोर्इ जानकारी नहीं दी जा रही है कि यह जनम और मौत वास्तव में क्या है? जो मौत किसी को भी नहीं चाहिये, उस मौत से सदा-सर्वदा के लिये बचाव और सुरक्षित रखने वाला ‘अमरत्त्व’ क्या है और यह किसका होता है ? यदि इस जनम और मौत का सम्बन्ध जीव से है तो यह जीव क्या है ? कहाँ से आता है ? शरीर में कहाँ ठहरता है ? मानव शरीर में किसलिये आता है और शरीर छोड़ने के पश्चात् कहाँ को चला जाता है ? आदि-आदि विषयों पर किसी को न तो जानने की आवश्यकता ही महसूस हो रही है और न तो इस सम्बन्ध में विद्यालयों में पढ़ार्इ-लिखार्इ ही हो रही है ।

कितनी विडम्बना पूर्ण बात संसार की है कि जिस जीव के सहारे शरीर का अस्तित्त्व कायम है, जिस जीव से शरीर के सारे हित-नात-सम्बन्ध हैं, जिस जीव के सहारे से ही घर-परिवार नौकरी-चाकरी खेती-बारी है, जिस जीव के सहारे ही दु:ख-सुख की सारी अनुभूतियाँ हैं और जिस जीव के सहारे ही शरीर की सारी क्रियायें-उपलब्धियाँ और भोग-उपभोग हैं और जिस जीव के वगैर शरीर का कोर्इ और कुछ भी नहीं है, उस जीव को भी जानने-देखने-समझने की भी आवश्यकता इस दुनियां वालों को नहीं है।

हाय रे दुनिया ! तेरी यह स्थिति हो गयी कि परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान एवं आत्मा-र्इश्वर शिव-ज्योति और अपने अस्तित्त्व रूप जीव-रूह- सेल्फ-स्व-अहम-हम-मैं को भी जानने-समझने देखने-परखने और अपने-आप (जीव) ‘हम’ को भी जानने-देखने पहचानने की आवश्यकता ही नहीं !

आखिरकार ऐसा क्यों ? इस जीव-रूह-सेल्फ एवं आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा-शिव और परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्रा-खुदा-गॉड-भगवान की जानकारी-दर्शन से सम्बन्धित विषय-वस्तुओं को पढ़ार्इ से ही क्यों हटा दिया गया? विद्यार्थियों और समाज को इससे बंचित क्यों किया-रखा गया? इसे पढ़ार्इ में क्यों नहीं रखा गया ? क्या इसका जवाब कोर्इ देने का कष्ट करेगा? क्या यह वर्तमान स्कूल-कालेज वाली पढ़ार्इ हिरण्याक्ष-हिरण्यकश्यप आदि आदि वाला ही आसुरी समाज और आसुरी पढ़ार्इ जिसे प्रह्लाद ने न ही पढ़ा और न ही स्वीकार किया था, ही नहीं है? है । बिल्कुल ही प्रह्लाद वाली ही जिसे वे नहीं पढ़े थे; वही पढ़ार्इ ही यह वर्तमान वाली है ।

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1.9 अब ‘करो कम’ और ‘भोगो अधिकाधिक’ ही अपेक्षित

हाँ, आजकल मात्र सांसारिक विषय वस्तुओं की जानकारी और उसी अनुसार रहन-सहन ही प्रधान हो गया है । अधिक से अधिक सम्पत्ति कैसे अर्जन हो ? कैसे हमारी साधन सम्पन्नता हो ? यही आजकल की शिक्षा और व्यावहारिकता हो गयी है। आज की शिक्षा कर्म प्रधान व सम्पत्ति प्रधान बनकर रह गयी है । ‘करो और भोगो’ मात्र । आजकल स्थिति बिगड़ कर यहाँ तक पहुँच चुकी है कि ‘करो’ को भी महत्त्व न देकर ‘भोगो’ ही भोगो वाली हो गयी है । ‘करो कम’ और ‘भोगो अधिक’ की स्थिति को ही लोग मर्यादा और प्रतिष्ठा मानने-समझने लगे हैं। अधिकतर लोग ही ऐसे प्रवृत्ति वाले हो गये हैं कि कुछ करना न पड़े, मगर भोग सबसे अधिक और सबसे अच्छा रहे। यही प्रवृत्ति झूठ, बेइमानी, छल-कपट, चोरी-डकैती, लूट-पाट- अपहरण और सभी भ्रष्टाचारों का मूल रूप प्रशासनिक घूसखोरी को उत्प्रेरित करते हुये व्यावहारिक बनाने के लिये मजबूर करती है । राजनेताओं की भी यही स्थिति हो गयी है जो नि:संदेह अराजकता की स्थिति उत्पन्न करते हुये राजनैतिक विघटन, सामाजिक विघटन, पारिवारिक विघटन और यहाँ तक की शारीरिक होता हुआ विनाश तक पहुँचा देती है। वर्तमान में पहुँचाती जा रही है मगर लोग समझ सम्भल नहीं पा रहे हैं बल्कि और ही गिरते ही जा रहे हैं । क्या चेतना-समझना-सम्भलना नहीं चाहिए ? अवश्य ही चेतना-सम्भलना चाहिए ।

आज की शिक्षा जीव को शरीर प्रधान से भी नीचे उतार कर शरीर को भी मात्र सम्पत्ति प्रधान बनाते हुये शारीरिक अस्तित्त्व को भी समाप्त करती जा रही है । आज भोग वृत्ति अंतिम सीमा तक पहुँच गर्इ है । लड़के की शादी जल्दी हो जाय, भले ही वह न पढ़े। शादी जरूर की जायेगी, भले ही कष्ट से ही सही, भोग ही भोगते हुये संसार में वंश वृद्धि करता हुआ फँसा ही रहे। अपने जीवोद्धार की बात सोच भी न सके ।

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1.10 उपसंहार

हे भगवान ! तेरी इस दुनियां को क्या हो गया है कि जो तेरा ही नाम समाप्त करने पर लगी है । कब तक ऐसा होता रहेगा कि तेरी ही दुनियां में तेरा ही अस्तित्त्व मिटाया जाय । परमप्रभु हम क्या कर सकते हैं, सारी सामर्थ्य तो आपकी है । आप जानें और आप का काम जानें । हम तो आप के हैं आपके रहें, यही हमारी आप से बार-बार अनन्त बार प्रार्थना है कि हम सदा तेरे ही रहें । ऐसे भाव-व्यवहार से भरा-पूरा ही शिक्षा-दीक्षा पद्धति होनी चाहिये । ऐसी स्थिति में ही जीवन का पूर्णत्त्व और अमरत्त्व भी सहज ही उपलब्ध हो जाया करता है । जिज्ञासु को वर्तमान में भी मुझसे उपलब्ध हो सकता है ।

शिक्षा-दीक्षा तभी पूर्ण-सम्पूर्ण मानी जायेगी जबकि क्रमश: घर-परिवार-सम्पदा से युक्त संसार की; इनिद्रयों और उसके क्रियाओं-भोगों से युक्त शरीर की; अस्तित्त्व और क्रिया-उपलबिधयों से युक्त जीव-रूह-सेल्फ की; अस्तित्त्व और क्रिया-उपलब्धियों से युक्त आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा-नूर-सोल- ज्योतिर्बिन्दु रूप शिव की और मुक्ति-अमरता सहित सम्पूर्ण की सम्पूर्णतया उपलब्धि कराने वाला परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्रा-खुदा-गॉड-भगवान की प्राप्ति-उपलब्धि कराने की बात-चीत सहित साक्षात् दर्शन कराने वाली क्रमश: जानकारियाँ--- शिक्षा (Education), स्वाध्याय (Self Realization) योग-साधना अथवा अध्यात्म (Spiritualization) और तत्त्वज्ञान रूप भगवदज्ञान रूप सत्यज्ञान रूप सम्पूर्णज्ञान (True, Perfect and Supreme KNOWLEDGE) सम्पूर्ण की उपलब्धि कराने वाली हो-- उपर्युक्त प्रकार से ही हो । पुन: दोहरा दूँ कि शिक्षा-दीक्षा सम्पूर्ण की सम्पूर्णतया जानकारी कराने वाली होनी-रहनी चाहिये तभी ही दोष मुक्त सत्य प्रधान सुदृढ़-सम्पन्न अमन-चैन का भरा-पूरा समाज कायम हो-रह सकता है । यही सत्य है और इसी को ही पूर्णत: व्यावहारिक बनाने होने-रहने की अनिवार्यत: आवश्यकता है। इसे हर किसी को अपनाना ही चाहिये-- अपनाना ही पड़ेगा-- पड़ेगा ही । क्या ही अच्छा होता कि सहज ही इसे सोच-समझ देख-परख कर ही सही मगर सरकार द्वारा अपना लिया जाता और समाज पर इसे प्रभावी तरीके से हर किसी के लिए अनिवार्य कर-करा दिया जाता फिर तो यही दुनियां स्वर्ग से भी श्रेष्ठतर दिखायी देने लगती । देव वर्ग भी यहाँ आने के लिए तरसने लगते। ऐसा करने में सरकार को परेशानी क्यों ? जीव-रूह-सेल्फ एवं आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा-नूर-सोल-स्पिरिट-ज्योर्तिमय शिव और परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्रा-खुदा-गॉड-भगवान से सम्बन्धित विषय क्रमश स्वाध्याय एवं योग-साधना-अध्यात्म और तत्त्वज्ञान रूप भगवदज्ञान को पाठयक्रम में क्यों नही रखा जा रहा है ? विद्यार्थीयों और समाज को इन जानकारियों और दर्शन प्राप्ति से बंचित क्यों रखा जा रहा है ? आखिर में ऐसा क्यों ! क्यों !! क्यों !!! सब भगवत कृपा ।

-----------सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस

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