विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
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11. जोर-जुल्म-भ्रष्टाचार में ही भगवदावतार

सदभावी सत्यान्वेषी पाठक एवं श्रोता बन्धुओं ! वास्तव में भगवदावतार तो उसी बीहड़ परिसिथतियों यानी संसार से सत्य-èार्म-न्याय-नीति के प्राय: लुप्त हो जाने और उसके स्थान पर जब असत्य-अधर्म-अन्याय-अनीति का जोर जुल्म दुराचार-अत्याचार दूषित भाव-विचार दूषित व्यवहार एवं दूषित कर्म का ही चारों तरफ बोलबाला एवं साम्राज्य हो जाता है, तब ही भगवदावतार होता है । सत्य-धर्म न्याय-नीति असहाय एवं दूषित होता हुआ समाप्ति के अन्तिम रूप में पहुँच कर दम घुटता रहता है और चारों तरफ ही शैतान तथा शैतान मण्डली अपने जोर जुल्म अत्याचार-भ्रष्टाचार के माध्यम से सत्य-धर्म-न्याय-नीति को भू-मण्डल से ही सफाया करने पर उतारू हो जाता है । ठीक उन्हीं परिस्थितियों के मध्य खुदा-गॉड-भगवान का परम आकाश रूप परमधाम से इस भू-मण्डल पर अवतरण होता है तथा किसी शरीर को ग्रहण या धारण कर उस शरीर के जीव-आत्मा को अपने आप परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप शब्द-ब्रह्रा रूप परमब्रह्रा में विलय कर-करा कर उस शरीर विशेष से स्वयं निरीक्षण-सर्वेक्षण, तत्पश्चात् परीक्षण करता-कराता हुआ, गुप्त रूप से यत्र-तत्र-सर्वत्र भ्रमण करता-रहता है । तत्पश्चात् उचित समय एवं परिस्थितियों के अनुसार अपने क्रिया-ज्ञान-बल-ऐश्वर्य आदि को प्राकट्य करता हुआ अपने वास्तविक परिचय-विधान व कार्य विधान रूप तत्त्वज्ञान या भगवदज्ञान या सत्यज्ञान के माध्यम से ही परिचय-पहचान देता हुआ अपना मुख्य कार्य सत्य-धर्म-न्याय-नीति में से पहले चरण के दो को (सत्य और धर्म को) लेकर सांसारिक जन मानस में बीजारोपण यानी सत्य-धर्म की स्थापना का कार्य आरम्भ करता-कराता है।

प्रभावकारी रूपों में सत्संग करता-कराता हुआ जन मानस में सत्य-धर्म को जगाकर प्रचार-प्रसार करता-कराता है । तत्पश्चात् दृढ़तापूर्वक सहज रूप से बोधगम्यय तरीका अपना कर शंका-समाधान के माध्यम से लोगों में भरे हुए असत्य एवं अधार्मिक भाव को प्रभावकारी, व्यावहारिक एवं शास्त्रीय प्रमाणों के द्वारा प्रभावी रूप में शंका-समाधान करता कराता हुआ जनमानस के अन्दर प्रविष्ट भ्रमों का निवारण करता कराता है । हालाँकि शैतान और शैतान मण्डली इन कार्य-क्रमों (सत्संग एवं शंका-समाधान वाले कार्यक्रमों) का मनगढ़न्त अनेकानेक बातों-विधानों से आलोचना निन्दा, विरोध, संघर्ष एवं लड़ार्इ-झगड़ा किये वगैर नहीं मानते । फिर भी भगवदावतार रूप तत्त्वज्ञानदाता सहिष्णुता का सिद्धान्त अपने व्यवहार में प्रयोग करता-कराता यानी सब कुछ झेलता सहता हुआ सर्वप्रथम सत्य-धर्म का प्रभावी तरीके से बीजारोपण कर कुछ मजबूत साधन तैयार करता या बनाता या उत्पन्न करता हैं । तत्पश्चात् उन्हीं साधनों के माध्यम से दुष्ट-दलन पहले सुधार का भरपूर अवसर देते हुए, न सुधरने पर अन्त में संहार की प्रक्रिया अपनाता है।

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11.1 भगवदावतार किसी का भी निन्दक विरोधी नहीं अपितु ‘सत्य-धर्म संस्थापक’

भगवदावतार वास्तव में न तो किसी का विरोधी होता है और न ही किसी का निन्दक, बल्कि वह तो सत्य-धर्म का संस्थापक-पोषक एवं सच्चा प्रचारक-प्रसारक तो होता ही है और सामान्य तरीके से नहीं बल्कि हलचल मचाता, घोषित करता कराता हुआ सत्संग कार्यक्रमों की रचना एवं उसका प्रभावी तरीके से उस क्षेत्र में घोषित करता कराता हुआ पहले पहल तो पूरे क्षेत्र में ज्ञान-क्रान्ति का हलचल मचा-मचवा देता है तथा समस्त मिथ्या ज्ञानाभिमानियों, अभिमानियों, आडम्बरियों, पाखण्डियों तथा तान्त्रिकों-यान्त्रिकों, विद्वानों, वैज्ञानिकों, योगियों, आध्यात्मिकों, आचार्यों-पण्डितों, अधिकारियों-कर्मचारियों, नास्तिकों आदि-आदि प्राय: सभी के कानों तक किसी भी सम्बन्ध में शंका-समाधान तथा शास्त्रार्थ हेतु चुनौती पूर्ण घोषणायें भी कर-करा देता है कि भगवदवतार हो गया है जो जैसा चाहे जान-समझ कर या जिस प्रकार भी चाहे भगवत परीक्षण विधान एवं तत्त्वज्ञान का परीक्षण कर-करा सकता है । इस प्रकार से जिस क्षेत्र में भी प्रवेश करता है, भगवदज्ञान की एक क्रान्तिपूर्ण हलचल सी मच जाती है । इस प्रकार सत्य-धर्म-संस्थापन तथा उसका प्रचार-प्रसार संचालन भी करता-कराता है।

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11.2 किसी के भी पीछे-पीछे नहीं अपितु सभी के ही आगे-आगे रहने वाला ही होता है तत्त्वज्ञान विधान

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक एवं श्रोता बन्धुओं ! तत्त्वज्ञान को अपने मति-गति के अनुसार प्राप्त करने, परीक्षण करने तथा अपने जीवन में उसे उतारने या लेकर चलने का कभी भी प्रयत्न करना तो प्रयत्न करना है, सोचना व कल्पना भी नहीं करना चाहिए । भगवत प्रदत्त ठीक प्राकृतिक विधान ही है कि बड़ी विषय-वस्तु छोटी या समान गुण-व्यवहार वाले विषय-वस्तुओं को अपने में विलय या विलीन या मिलान कर-करा लेता है । इस प्रकार तत्त्वज्ञान पूरे ब्रह्राण्ड में ही अतुलनीय है । जब ब्रह्राण्ड की कोर्इ या किसी विषय वस्तु या शक्ति-सत्ता से तुलना नहीं की जा सकती है (क्योंकि सम्पूर्ण ब्रह्राण्डीय विधि-विधान ही इसी तत्त्वज्ञान से उत्पन्न तथा इसी तत्त्वज्ञान में विलय कर जाता है) फिर इसमें तत्त्वज्ञान के तुलना की बात करना-कराना तो दूर रहा, सोचना भी नहीं चाहिए ।

अब यहाँ पर थोड़ा बहुत मनन-चिन्तन की तथा सूझ-बूझ की आवश्यकता है कि ऐसा और इस क्षमता वाले तत्त्वज्ञान को कोर्इ भी अपने मति-गति के अनुसार पाना या अपने मति-गति के अनुसार परीक्षण करना चाहे तथा अपने मति-गति के अनुसार अपने पास इस तत्त्वज्ञान को रखना तथा ले चलना चाहे, तो वह मात्र मूढ़ एवं जढ़ी ही कहलाने लायक नहीं है, बल्कि विकृत मस्तिष्क तथा दिमागी भ्रष्ट एवं शैतान प्रेरित मति-गति वाला भी है जो ऐसा सोच सकता है, अन्यथा ऐसी कल्पना भी अकल्पनीय ही होनी चाहिए । इसलिये समस्त जिज्ञासु एवं ज्ञानियों को चाहिये कि तत्त्वज्ञान प.द्धति के सिद्धान्त के अनुसार ही इसे जानें-पायें और सर्वतोभावेन यानी तन-मन-धन से ही अपने को इसके प्रति समर्पित कर दें और शरणागत होते रहते हुए भक्ति-सेवा भाव में ही चलें-रहें ।

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11.3 एकमेव एकमात्र एक भगवदावतार का ही और के लिए—‘तत्त्वज्ञानविधान’

संसार में भी प्राय: ऐसा देखा जाता है कि सामान्य व्यक्तियों या वस्तुओं से कुछ लाभ लेना होता है, तो लाभ के अनुसार उन व्यक्तियों या वस्तुओं के अनुसार होकर ही लाभ लिया जाता है । जब सांसारिक तुच्छ सामानों हेतु ऐसा विधान है तब तो ‘तत्त्वज्ञान’ जैसी सर्व शक्ति-सत्ता-सामर्थ्य एवं समस्त ज्ञान का भण्डार होने-रहने वाला किसी के अधीन, किसी के अनुसार या किसी के पास कैसे जा-रह या हो सकता है ।

थोड़ा भी सोचा जाये कि एकमात्र भगवदावतार के सिवाय पूरे सृष्टि या ब्रह्राण्ड में भी क्या कोर्इ ऐसा है कि इस तत्त्वज्ञान को अपने मति-गति के अनुसार ही जाने, पावे, परीक्षण करे तथा जैसा मन करे चले चलावे । तो ऐसा न कभी कोर्इ था, न है और न कभी कोर्इ हो ही सकता है ! यह एकमात्र भगवत परिचय एवं पहचान तथा भगवत कार्य विधान होने के कारण भगवान से पृथक हो ही नहीं सकता । जब, जहाँ, जैसे भी भगवान या भगवदावतार रहता है, यह तत्त्वज्ञान उन्हीं के साथ ही, तब वहाँ वैसा ही रहता है ।

यह तत्त्वज्ञान तथा भगवान दोनों ही दो नहीं हैं, अपितु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । एक पहलू ‘तत्त्व’ है तो दूसरा उसका ‘ज्ञान’ या एक पहलू 'ज्ञान है तो उसका दूसरा पहलू है ‘तत्त्व’ । इस प्रकार तत्त्व और ज्ञान का एक दूसरे के साथ ऐसा अनन्य सम्बन्ध होता है जिसे दो कहना भी भ्रम ही पैदा करने जैसे लगता है । यह दो होते हुये भी एक ही होता है तथा एक ही होता हुआ भी दो प्रकार से प्रयुक्त होता है या कहा जाता है । ठीक ही है एक ही सिक्के का दो पहलू ।

इस प्रकार तत्त्वज्ञान को कभी भी अपने अनुसार नहीं सोचना-समझना चाहिए। हमसे कोर्इ ऐसा कार्य-व्यवहार तो नहीं हो रहा है जो भगवान तथा सदगुरु के विधान से रत्तीभर भी पृथक या विरोधाभाष या भ्रमवश की जा रही है और यदि है तो तुरन्त ही क्षमा माँगता हुआ क्षमा या क्षमा याचना का निष्कपटता पूर्वक अनन्य श्रद्धा-भक्ति-निष्ठा के साथ अनन्य भक्ति, अनन्य सेवा एवं अनन्य प्रेम व्यवहार में रहता हुआ, सदा ही यह प्रयत्न करते रहना चाहिए कि हम हर पहलू से भगवदावतार रूप सदगुरु या परमप्रभु के प्रसन्नता एवं प्रेम पात्र बने रहें, जिससे कि परमप्रभु सदा ही अपने प्रेम पात्रों के साथ लीला व्यवहार करते रहें।

तत्त्वज्ञान ग्रहिता को तो सदा ही अपना सौभाग्य मनाते रहना चाहिए कि परमप्रभु ने उसे अपनी विशेष कृपा दृष्टि का पात्र बना-बनवाकर ही अपना ‘तत्त्व’ रूप तत्त्वज्ञान के माध्यम से स्वयं ही जनाया, दर्शाया तथा स्वयं बात-चीत करते-कराते हुये अद्वैत्तत्त्व बोध तक करा दिये । ऐसे परमप्रभु को अपने साथ किस प्रकार रखा जाय ! कैसे भक्ति-सेवा-प्रेम दिया जाय कि परम आनन्द रूप सदानन्द रूप सच्चिदानन्द प्रभो सदा ही आनन्दमग्न रहें!

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक एवं श्रोता बन्धुओं ! प्राय: ऐसा देखा जाता है कि सभी मनुष्य ही शान्ति और आनन्द एवम् पद और प्रतिष्ठा--इन चारों की प्राप्ति हेतु ही संसार में अनेकानेक कठिनाइयों को झेलता हुआ अथक परिश्रम करता रहता है तब भी ये चारों नहीं प्राप्त कर पाता। शान्ति और आनन्द योगी- साधक या आध्यात्मिक साधना में रहने वाले पाते हैं, तो पद और प्रतिष्ठा शारीरिक-पारिवारिक-सांसारिक जनों के पास ही जाती है । ऊँचे से ऊँचे पदों पर पद-स्थापितों को शान्ति और आनन्द नहीं मिलता । वे सर्वदा अशान्त या बेचैन तथा अनेकानेक सुख साधनों से युक्त होने-रहने के बावजूद भी आनन्द शून्य ही रहते हैं। कर्म विधान, पद और प्रतिष्ठा दिलाता है तो अध्यात्म विधान शान्ति और आनन्द। कर्म विधान वाले को तो शान्ति और आनन्द तो प्राप्त हो ही नहीं पाता, अध्यात्म विधान में लीन सिद्ध- साधक, योगी तथा आध्यात्मिक सन्त-महात्मागण माया जाल में फँसने-भटकने के डर से पद-प्रतिष्ठा से दूर ही रहते हैं ।

इस प्रकार शान्ति और आनन्द तथा पद और प्रतिष्ठा ये चार ऐसे संकेत प्रदान कर रहे हैं कि किसी भी आध्यात्मिक और सांसारिक अथवा सांसारिक और आध्यात्मिक में से किसी को ही ये चारों एक साथ कदापि नहीं उपलब्ध हो सकते। परन्तु क्या ही आश्चर्यमयी बात एवं आश्चर्यमयों में भी परम आश्चर्यमय विधान ‘तत्त्वज्ञान’ का है कि वास्तव में जो कोर्इ ही निष्कपटतापूर्वक श्रद्धा एवं विश्वास के साथ, सर्वतोभावेन अपना तन-मन-धन भगवद अर्पण करता हुआ अनन्य भक्ति, अनन्य सेवा, अनन्य प्रेम भाव से भगवदावतार के प्रति पूर्णत: शरणागत भाव में शरीर पर्यन्त रहने का संकल्प देता तथा उस संकल्प का पालन करता है, तो वह चार ही क्या, ‘तत्त्वज्ञान’ उसे कितना और क्या देता है, कहाँ और कैसे पहुँचाता है--यह बिल्कुल ही अकथनीय बात है । एक ही बात कही जा सकती है कि प्राप्तकर्ता को पूरे ब्रह्राण्ड में ही कुछ जानना और पाना शेष ही नहीं रह जाता ! यह अकाटय सत्य बोधगम्य बात है। परम शान्ति, परम आनन्द, परम पद, सच्चिदानन्द, शाश्वत शान्ति और शाश्वत आनन्दमय एवं सदानन्दमय, अद्वैत्तत्त्व बोध, परम गति, परम हंस, परम भाव, परम सत्य, परम तत्त्व, अर्थात् ‘परम’ को ही, जो किसी में हो, ‘परम’ की प्राप्ति तत्त्वज्ञान सहजतापूर्वक प्रदान करता है । इतना ही नहीं जिस मुक्ति और अमरता को प्रदान करने का अधिकार शंकरजी व आदि-शक्ति भी नहीं रखते, और की बात क्या कहा जाये । उस मुक्ति-अमरता का भी साक्षात् बोध यहाँ तत्त्वज्ञान अपने शरणागत-भक्त सेवकों को सहजता के साथ करा देता है । तत्त्वज्ञान और कुछ नहीं बल्कि एकमात्र ‘परम’ से ही युक्त करता हुआ, परम भाव का ही साक्षात् बोध अपने शरणागत रहने वाले भक्त-सेवकों को करा देता है-- हर स्तर में परम ही परम।

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! मानव शरीर प्राप्त करना सृष्टि में सौभाग्य की बात है, क्योंकि देवता लोग भी इस मानव शरीर को प्राप्त करने के लिये तरसते हैं क्योंकि मुक्ति और अमरता देने दिलाने वाले तत्त्वज्ञान की प्राप्ति एकमात्र मानव शरीर से ही सम्भव है, अन्यथा किसी भी शरीर से नहीं । यह बात अलग की है कि परमप्रभु किसी भी जीव को ही चाहे तो उसे मुक्त और अमर बनाने के लिये उसकी कृपा विशेष ही काफी है, लेकिन यह कृपा विशेष अपवाद स्वरूप ही किसी-किसी को मिल जाया करती है, परन्तु वैधानिक रूप में मुक्ति और अमरता का साक्षात् बोध करा देना तथा अन्तत: उसे उपलब्ध भी करा देना एकमात्र आरक्षित अधिकार तत्त्वज्ञान को ही है और एक मानव शरीर के अतिरिक्त अन्य किसी भी शरीर धारण करने वाले जीव-जीवात्मा-आत्मा को तत्त्वज्ञान की प्राप्ति और मुकित-अमरता का साक्षात् बोध हो नहीं सकता । मानव शरीर सृष्टि के अन्तर्गत सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वोत्तम् रचना है । ऐसे मानव शरीर को पाना, जिसके लिये देवतागण भी तरसते हैं, वह शरीर आप जीव-जीवात्मा को मिली ही एकमात्र अपने जीवन लक्ष्य रूप मुक्ति और अमरता का साक्षात् बोध प्राप्त करने के लिये ।

दूसरी बात यह है कि मनुष्य शरीर भी तो लोगों को मिलती और समाप्त होती रहती है । अनेकानेक मनुष्य अनेकानेक विधान के खोज के माध्यम से मुक्ति और अमरता की खोज करते रहे, लेकिन उपलब्ध नहीं हो सका । इसलिये मनुष्य शरीर पाने मात्र से ही अमरता मिल ही जायेगी-- यह तो कोर्इ गारण्टी (पक्का वचन) तो दी नहीं गर्इ है । मनुष्य उन भगवदावतारियों से यदि उस समय मिले, जब परमप्रभु का भू-मण्डल पर अवतरण होकर भ्रमण हो रहा हो, तब वह तत्त्चज्ञान द्वारा ही उस मुक्ति-अमरता को प्राप्त कर सकता है। ऐसा सुअवसर भी प्राय: युग-युग में एक-एक बार ही जानने-देखने-जानने-पाने को मिलता है यानी सत्ययुग में श्रीविष्णु जी, त्रेतायुग में श्रीराम चन्द्र जी, द्वापरयुग में श्रीकृष्ण जी तथा वर्तमान में कलियुग में स्वामी सदानन्दजी भी वही तत्त्वज्ञान दे रहे हैं, जिसे वे तीन दिये थे ।

पहले तो मनुष्य शरीर ही दुर्लभ, दूसरे भगवदावतार कालीन-समय में होना तो अत्यधिक ही दुर्लभ होता है, उसमें भी भगवदावतार की जानकारी मिलना तथा उनके सम्पर्क में आना तो उससे भी अत्यधिक दुर्लभ बात है और उससे भी दुर्लभ बात है परमप्रभु की कृपा विशेष प्राप्तकर तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर बोधित होना । तत्पश्चात् सबसे दुर्लभ यानी परम दुर्लभ बात यह है कि तत्त्वज्ञान हासिल करने के पश्चात् निष्कपटतापूर्वक सर्वतोभावेन भगवद अर्पण करता-होता हुआ अनन्य भक्ति-सेवा-प्रेम भाव में परमप्रभु की कृपा विशेष से प्रेम पात्र बनकर शरीर (जीवन) पर्यन्त अनन्य भाव से शरणागत बने रहना ।

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक एवं श्रोता बन्धुओं ! प्राय: ऐसा देखा जाता है कि जब बरसात का मौसम आता है और बाढ़ का पानी आ जाता है तो छोटे-छोटे गडढों में जल उफनने लगता हैं ताल-तलैया, नदी-नाला में भी चारों तरफ जल ही जल दिखार्इ देने लगता है । छोटे-बड़े नदी नालों से आकर मिलने से बड़ी-बड़ी नदियाँ सागर जैसी (जो सागर न देखा हो, उसके लिये) दिखार्इ देने लगती हैं । साथ ही साथ छोटे-छोटे गडढों के पास अनेकानेक मेंढक भी आकर प्राय: सभी यही आवाज लगाते हैं कि टर्र-टर्र, टर्र-टर्र ....... यानी सभी यही कहते हैं कि हम आ गये हैं तू सब टर्र या हट जा ! टर्र यानी हट जा ! अर्थात् सब के सब प्राय: यही कहने लगते हैं कि अब हम आ गये हैं, तू सब टर्र-हट जा, क्योंकि जो कुछ हैं सो मैं ही हूँ और कोर्इ कुछ नहीं है! इसी प्रकार सभी टर्र-टर्राने लगते हैं ।
इसी प्रकार कुछ पूर्व से ही अवतार सम्बन्धी भविष्य वाणियाँ आदि होने लगती हैं जिसे सुन-पढ़कर सामान्य से सामान्य साधक, सिद्ध, योगी, महर्षि तथा आध्यात्मिक सन्त-महात्मागण भी प्राय: सैकड़ों-हजारों की संख्या में ही अपने को भगवदावतार घोषित करने-कराने लगते हैं । इस प्रकार सभी केवल घोषणा करते तथा अपना-अपना प्रचार-प्रसार करते रहते हैं । लगता है कि उनके पास केवल मुख ही है जिससे वे बोल रहे हैं कि धरती पर एक बार केवल एक ही अवतार होता है और वह अवतार मैं ही हूँ । सोsहँ-हँसो तथा आत्म-ज्योति या दिव्य-ज्योति या ब्रह्रा-ज्योति या नूर या डिवाइन लाइट या जीवन-ज्योति आदि एकमात्र मैं ही जानता हूँ । मेरे सिवा अन्य कोर्इ नहीं जानता । आदि-आदि ऐसा प्राय: सभी ही घोषित करने लगते हैं ! प्राय: सब के सब एक ही श्वाँस-नि:श्वाँस से हँसो का वह भी उल्टा क्योंकि सीधे की उन्हें जानकारी ही नहीं । उल्टा-सीधा जाप से नुकसान-फायदा या हानि-लाभ क्या होता है, क्या नहीं-- यह भी उन्हें पता नहीं। प्राय: सभी ही उल्टा जाप सोsहँ-ज्योति को भगवान का नाम-रूप कहकर अपने अनुयायियों को जना-दर्शा रहे हैं !

कुछेक नाद बिन्दु तो कुछेक खेचरी करा रहे हैं तथा इसी सोsहँ-ज्योति को ही ‘परमतत्त्वम्’ रूप ‘आत्मतत्त्वम्’ शब्दरूप खुदा-गॉड-भगवान तथा आध्यात्मिक सोsहँ वह भी हँसो भी नहीं; के साधना को ही तत्त्वज्ञान कहकर अपने ही अवतारी बन जा रहे हैं। थोड़ा भी दूसरे की नहीं सुनते कि ऐसा ही सैकड़ों-हजारों कह रहे हैं तो इसमें सही कौन है ? सभी के सभी ही अपना-अपना राग अलाप रहे हैं, जबकि थोड़ी सी यही सोsहँ व ज्योति, खेचरी व अनहद के सिवाय उन्हें कुछ पता भी नहीं, फिर भी वे भगवान या अवतारी सदगुरु आदि बन-बनकर समाज को ठगते और गुमराह करते यानी धन-धर्म दोनों का ही दोहन-शोषण करते-कराते चले आ रहे हैं ! आज भी ऐसे ही कर-करवा रहे हैं । सत्ययुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग में भी श्रीविष्णु-राम-कृष्ण जी के समय भी ऐसा ही हुआ था। वर्तमान में भी हो रहा है ।

अब सभी का नकली नकाब हट रहा है । अब पर्दाफास हो जा रहा है। आप सभी झूठे हो-- असल ‘तत्त्वज्ञान’ यह है कि वास्तविक रूप, असल रूप भगवदावतार के आने पर अवतरण के पूर्व से ही अवतारी बन-बनकर चारों तरफ घोषणाओं पर घोषणायें करते रहते हैं परन्तु समाज में अराजकता एवं आतंक तथा अत्याचार एवं भ्रष्टाचार का साम्राज्य छाया हुआ है। सब कैसे ठीक होगा ? क्या केवल राग अलापने से सत्य-धर्म की स्थापना हो जायेगी तथा वे भगवान बन जायेंगे ? ये मिथ्यावादी एवं मिथ्या ज्ञानाभिमानी सत्य-धर्म-न्याय-नीति का हाल क्या जानेंगे ? अथाह धन-सम्पत्ति तथा विशालकाय शिष्य एवं अनुयायी समाज बना-बनाकर उसी में फूले हुये हैं कि हमारे पास इतने काफी संख्या में अनुयायी हैं तो हमारे पास इतने आश्रम, केन्द्र व कार्यालय हैं, आदि आदि । जबकि ये सब घोषित करते हैं कि भौतिक सारी चीजें मायावी हैं जो सदगुरु की पहचान नहीं हो सकती । सदगुरु की एकमात्र पहचान उनके द्वारा देय तत्त्वज्ञान होता है । घोषित तो करते हैं मगर उसे अपने पर लागू नहीं करते हैं ।

इन मिथ्या वादियों तथा मिथ्या ज्ञानाभिमानियों को कैसे समझाया जाय कि तैतिस कोटि देवताओं के राजा इन्द्र भगवान नहीं होते ! धन का भण्डारी कुबेर भगवान नहीं होते !योग-साधना या अध्यात्म के सर्वोच्च पद पर पदासीन सबसे लम्बे समय तक समाधि लगाने वाले शंकरजी भी भगवान नहीं होते ! पुन: योग के विशेषज्ञ पातन्जलि भगवान नहीं हुये ! मायावी व चमत्कारी रावण आदि राक्षस भगवान नहीं कहलाया । अठासी हजार ऋषियों के लिये एक ‘विश्वायतन’ चलाने वाले शौनक भी भगवान नहीं हुये ! ये सभी ही मायावी (धन-जन- आश्रम-मान-प्रतिष्ठा) रूपी चकाचौंध के शिकार हो चुके हैं । अब इन्हें समझाना भी आसान नहीं रह गया है ।

हम तो इन मिथ्यावादियों एवं मिथ्या ज्ञानाभिमानियों को चुनौती के साथ सूचना भिजवा चुके हैं तथा इन लोगों को सूचित कर-करवा दिये हैं कि सोsहँ व ज्योति-साधना ‘तत्त्वज्ञान’ नहीं होता । यह सोsहँ तो अध्यात्म जीवात्मा की साधना भी नहीं है, भगवान का तत्त्वज्ञान तो कदापि नहीं । जीव ही आत्मा नहीं और आत्मा कभी भी परमात्मा नहीं¬; जीव ही र्इश्वर नहीं और र्इश्वर कभी भी परमेश्वर नहीं; जीव ही ब्रह्रा नहीं और ब्रह्रा कभी भी परमब्रह्रा नहीं; चेतन कभी भी करतार (कर्ता) नहीं; अहम् ही हँस नहीं और हँस कभी भी परमहंस नहीं; सोsहँ व ज्योति कभी भी ‘परमतत्त्वम्म’ रूप ‘आत्मतत्त्वम्’ शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् नहीं; आनन्द ही चिदानन्द नहीं और चिदानन्द कभी भी सच्चिदानन्द नहीं; स्वाध्याय ही योग अध्यात्म नहीं और अध्यात्म कभी भी तात्तिवक पद्धति-तत्त्वज्ञान नहीं; गुरु कभी भी सदगुरु नहीं। अधिक धन-जन-आश्रम, प्रसार, मान-प्रतिष्ठा-साधन भगवान की पहचान नहीं । अब से भी तो आप लोग अपने को मात्र योगी-यती-ऋषि-महर्षिगण, आध्यात्मिक सन्त-महात्मा तथा आत्मा वाला गुरु मात्र ही रहें । मिथ्यावादिता व मिथ्याभिमान छोड़़े, गुरु ही कहलायें, सदगुरु न बनें। आपका भी महत्त्व सही रहने में ही बढ़ेगा। वास्तविक अवतार प्रकट हो चुका है । आप सब लोग अब से भी तो संभल जायें, अन्यथा कहीं ठिकाना नहीं मिलेगा । बेनकाब हो जाना पड़ेगा । सत्य अपना लेने में ही सभी की ही भलार्इ है ।

अत: वास्तविक सत्य एकमात्र यही ‘परमतत्त्वम्’ रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप परम भाव-प्रभाव वाला परमब्रह्रा परमात्मा या खुदा-गॉड-भगवान ही है, जिसे एकमात्र तत्त्चज्ञान से ही जाना-देखा-परखा- पहचाना जा सकता है । शिक्षा और स्वाध्याय को कौन कहे, योग-साधना अथवा अध्यात्म की भी पहुँच यहाँ तक नहीं होती । आध्यात्मिक की अन्तिम पहुँच आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा-शिव-हँस तक ही होता रहता है ।

सम्पूर्ण कर्म तथा सम्पूर्ण अध्यात्म का आदि श्रोत तथा अन्तिम लय रूप एकमात्र यही तत्त्वज्ञान रूप भगवदज्ञान रूप सत्यज्ञान ही है जो खुदा-गॉड-भगवान का ही एकमात्र परिचय-पहचान और लक्ष्य विधान है । सत्ययुग में श्रीविष्णुजी, त्रेतायुग में भी श्रीराम चन्द्र जी तथा द्वापरयुग में श्रीकृष्ण जी ‘परमतत्त्वम्’ रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् वाले ही था तथा वर्तमान में एकमात्र सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस ही उसी ‘परमतत्त्वम्’ रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् और उसी ही ‘तत्त्वज्ञान’ वाले ही हैं। जाँच परीक्षण कर सकते हैं !

वर्तमान में पूरे भू-मण्डल का ही एकमात्र तत्त्वज्ञानदाता सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस ही हैं, अन्य कोर्इ भी नहीं । जिस किसी को भी कर्म-अध्यात्म और तत्त्वज्ञान-- तीनों की ही सम्पूर्ण जानकारी, जिससे जीव एवं र्इश्वर और परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान का विराट पुरुष से भी बात-चीत करते हुये साक्षात् दर्शन व मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध भी प्राप्त होता है। जो चाहे भगवद समर्पित शरणागत भाव-स्थिति में होते-रहते हुए जान-देख परख-पहचान प्राप्त कर सकता है।

जिस प्रकार विद्यातत्त्वम् में ये चार श्रेणियाँ हैं, ठीक उसी प्रकार बालक या विद्यार्थियों तथा समस्त मानव समाज भी चार श्रेणियों (स्तरों) में ही है। उसे स्पष्टत: पृथक-पृथक रूप में जानने-समझने हेतु पृथक-पृथक गुण-कर्मों में विभक्त कर देना चाहिये तथा जो जिस योग्यता एवं क्षमता को रखता हो, उसको उसी श्रेणी के कर्तव्य-कर्मों से युक्त कर-करा देना चाहिये। विद्यार्थी अथवा मानव का चार श्रेणियाँ अग्रलिखित हैं--
1. अधम; 2. निम्न; 3. मध्यम और 4.उत्तम ।

उसी योग्यता और क्षमता के अनुसार कर्तव्य कार्य के श्रेणियों का बँटवारा भी होना चाहिए । मात्र भौतिक ‘शिक्षा’ कर्म-भोग प्रधान वाले को अधम श्रेणी में, स्वाध्याय वालों को निम्न श्रेणी में, योग-साधना अथवा अध्यात्म वालों को मध्यम श्रेणी में और तत्त्वज्ञान या सत्यज्ञान पद्धति वालों को उत्तम श्रेणी में रखते हुये उसी योग्यता और क्षमता के अनुसार कर्तव्य कार्य के श्रेणियों का भी बँटवारा होना चाहिये। चतुर्थ वर्ग के कर्तव्य कार्य भौतिक वाले के लिये, तृतीय वर्ग के कर्तव्य कार्य को स्वाध्यायी वाले के लिये, द्वितीय वर्ग के कर्तव्य कर्म को योग-साधना अथवा अध्यात्म और प्रथम श्रेणी वाले कर्तव्य कर्मों को तत्त्वज्ञान या सत्यज्ञान पद्धति वाले को । यही व्यवस्था शुद्र-वैश्य-छत्रिय और ब्राह्राण प्रारम्भ में था ।

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----------------सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस


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