विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
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12. विद्या भेदभाव रहित सत्य प्रधान हो

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! विद्या का क्षेत्र प्रत्येक बालक के लिये समान होना चाहिए । जन्म के आधार पर कोर्इ भेद-भाव या बँटवारा कदापि नहीं होनी चाहिये । विद्या का क्षेत्र प्रत्येक बालक के लिए समान रूप से खुला होना या खुला रहना चाहिये । विद्या अध्ययन के श्रेणियों में विद्यार्थियों का योग्यता एवं क्षमता के अनुसार ही, न कि जनम (वर्ग- जाति) के अनुसार प्रवेश मिलना चाहिये। विद्या हेतु आये हुए बालकों को समान रूप में बारह साल तक सहज-सामान्य शिक्षा दिया जाय । पुन: उसके बुद्धि-विवेक की निष्पक्षता पूर्वक परीक्षा लिया जाय और परीक्षा के प्राप्त अंकों के आधार पर ही चतुर्थ श्रेणी में आने वालों को भौतिक शिक्षा विभाग में, तृतीय श्रेणी में आने वालों को स्वाध्याय विभाग में, द्वितीय श्रेणी में आने वाले को योग साधना अथवा आध्यात्मिक प्रक्रिया विभाग में और प्रथम श्रेणी में आने वाले को तत्त्वज्ञान पद्धति अथवा सत्य ज्ञान पद्धति अथवा विद्यातत्त्वम् पद्धति वाले विभाग में निष्पक्षता पूर्वक प्रवेश मिलना चाहिये ।

यहाँ पर चतुर्थ श्रेणी की भी बात की गयी है जिसपर आप सोचेंगे कि परीक्षा में चतुर्थ श्रेणी होता ही नहीं तो यहाँ पर यह बता देना जरूरी समझ रहा हूँ कि परीक्षा में वास्तव में चार श्रेणियाँ हैं, मगर घोषित रूप में मात्र तीन ही हैं । अब यहाँ चारों को क्रमश: देखें । चतुर्थ श्रेणी में 33 प्रतिशत से भी नीचे अंक पाने वाले अनुत्तीर्ण-अधम, तृतीय श्रेणी में 33 से 50 प्रतिशत तक वाले तृतीय-निम्न, द्वितीय श्रेणी में 50 से 60 प्रतिशत तक अंक वाले द्वितीय-मध्यम और 60 प्रतिशत से ऊपर 75 प्रतिशत तक वाले प्रथम-उत्तम् श्रेणी और 75 प्रतिशत से ऊपर वाले जो विशिष्ट अथवा आनर-सम्माननीय उपाधि वाले हैं, आते हैं । यह बात हर किसी को याद रहे कि ये श्रेणियाँ केवल पढ़ार्इ-लिखार्इ के आधार पर ही नहीं अपितु बुद्धि और विवेक को भी उसमें महत्त्वपूर्ण स्थान मिलना चाहिए । तब ही निर्णय सही हो पायेगा अन्यथा निर्णय आध-अधूरे और गलत कहलाने लगेगा और व्यक्ति के क्षमता-शक्ति-सामर्थ्य का सही सही आकलन हो ही नहीं पायेगा, फिर तो निर्णय का महत्त्व ही क्या रह जायेगा? अर्थात् कुछ भी नहीं ।

उपरर्युक्त जो चार श्रेणियाँ बतार्इ जा रही हैं, वास्तव में ये विद्यातत्त्वम् पद्धति की नहीं हैं अपितु विद्यातत्त्वम् पद्धति में क्रमश: नीचे से ऊपर स्थित चार श्रेणियों—शिक्षा (Education), स्वाध्याय (Self Realization), योग-साधना या अध्यात्म (Spiritualization) और ‘तत्त्वज्ञान’ रूप परम ज्ञान रूप सम्पूर्ण ज्ञान रूप सत्यज्ञान (True Supreme and Perfect KNOWLEDGE) में प्रवेश पाने हेतु पात्रता का आधार होना चाहिये।

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12.1 प्रवेश-पात्रता का आधार र्इमान-सच्चार्इ-संयम-सेवा होना चाहिये

विद्यातत्त्वम् पद्धति में प्रवेश पाने हेतु पात्रता-निर्धारण के लिये उपर्युक्त अंकीय प्रतिशत वाली चार श्रेणियाँ हैं, वे शैक्षणिक परीक्षा के आधार पर नहीं, अपितु र्इमान-सच्चार्इ-संयम-सेवा के आधार पर होनी चाहिये अर्थात् पात्र में कितने प्रतिशत र्इमानदारी, कितने प्रतिशत सच्चार्इ, कितने प्रतिशत संयम और कितने प्रतिशत सेवा भाव है-- इस आधार पर परीक्षण-प्रतिशत निकाले जाने चाहिये । इससे थोड़ा और खुलासा करके जाना-देखा जाये तो बेहतर होगा । जैसे कि---

पहला-- जो बिल्कुल ही झूठ बोलने वाला हो, बेइमान-चोर हो अर्थात् जिसमें झूठ बोलने, बेइमानी-चोरी करने वाली वृत्ति हो, जो आसक्ति-ममता-स्वार्थ से ग्रसित हो, सुधारने-सवाँरने पर भी अपने को न सुधार-सवाँर पा रहा हो-- उसको शिक्षा के अन्तर्गत प्रवेश देना चाहिये । सर्विस में भी-- नौकरियों में भी चतुर्थ श्रेणी में ही उसे स्थान देना चाहिये और उससे कठिन से भी कठिन शारीरिक श्रम से गुजारना चाहिए ताकि कठिन श्रम के भय से झूठ-चोरी-बेइमानी आदि दुष्प्रवृत्तियों को अपनाये ही नहीं और अपनाया भी हो तो डर-भयवश सहज ही छोड़ दे ।

दूसरा--जिसमें बेइमानी-झूठ-छल-कपट आसक्ति-ममता-स्वार्थ तो हो, मगर छोड़ने-सुधारने के प्रयास में लगा हो, उसे स्वाध्याय के अन्तर्गत प्रवेश और नौकरी-चाकरी में तृतीय श्रेणी में स्थान दिया जाना चाहिये । शिक्षा विभाग यानी अध्यापन-पढ़ाने में इन दो श्रेणियों (चतुर्थ एवं तृतीय) में से किसी को भी कभी भी नियुक्ति न दी जाय क्योंकि यदि ये नियुक्ति पा जायेंगे तो अपने समान ही झूठा-छली-कपटी-स्वार्थी छात्र-विधार्थी भी उत्पन्न करेंगे। शिष्ट-ब्रह्राचारी-सदाचारी विद्यार्थी ये दे ही नहीं सकते ।

तीसरा-- अगले श्रेणी (योग-साधना अथवा अध्यात्म) में उन्हें प्रवेश दिया जाय जो बेइमानी-झूठ-कपट आसक्ति-ममता-स्वार्थ को बिल्कुल ही त्यागने में लगे हैं । भूल-चूक और मजबूर परिस्थिति मात्र में ही अपने आपको नहीं रोक पा रहे हैं, फिर भी उन्हें छोड़़ने और श्रेष्ठतर श्रेणी में होने-रहने-बने रहने के लिये प्रयत्नशील हैं। तब उन्हें योग- साधना अथवा अध्यात्म में प्रवेश मिलना चाहिये और नौकरी-चाकरी में भी द्वितीय वर्ग के अधिकारी की श्रेणी उपलब्ध होनी चाहिये । कमी और परिस्थिति-अभाववश इन्हें भी विद्या विभाग यानी पढाने में नियुक्त किया जा सकता है। और

चौथा-- जो झूठ-बेइमानी-चोरी-छल-कपट आसक्ति-ममता-स्वार्थ से परे हों अथवा इन्हें हर हालत में छोड़कर र्इमान-सच्चार्इ-संयम-सेवा को धारण कर चुके हों अथवा धारण करने के सत्प्रयास के अन्तिम श्रेणी में हों, इन्हें ‘तत्त्वज्ञान’ रूप सम्पूर्ण ज्ञान रूप सत्यज्ञान रूप परमज्ञान में प्रवेश मिलना चाहिये । हर सम्भव प्रयास करके शिक्षा विभाग (विद्यातत्त्वम् विभाग) इन्हीं के जिम्मे सुपुर्द कर देना चाहिये और सारे विधि-विधानों एवं संचालन का निर्देशक और संचालक इन्हें ही नियुक्त करना चाहिये। सकल समाज में इस विधान को प्रभावी से प्रभावी रूप में सरकारों द्वारा यथाशीघ्र लागू कर-करा देना चाहिये । तब जाकर सुखी-समृद्ध, दोष रहित, सत्य प्रधान, उन्मुक्तता और अमरता से युक्त जीवन विधान वाला समाज स्थापित होगा । सर्वत्र सुख-समृद्धि खुशयाली छायी रहेगी । हर मानव निर्भयता और सम्पूर्णता का जीवन सहज ही उपलब्ध कर लेगा । यही जीवन की सार्थकता और सफलता भी होगी । जन्म के आधार पर नौकरियों और रहन-सहन में पद-स्थिति-वर्ग का बँटवारा न होकर ‘विद्यातत्त्वम् पद्धति’ के आधार पर ही बँटवारा होना चाहिये। अवतार और तत्त्वज्ञान के अनुपस्थिति में र्इमान से संयम पूर्वक भक्ति भाव से अपने कर्तव्य-पालन को आधार बनाकर पढ़ार्इ रहन-सहन-व्यवहार स्थित-स्थापित करना-कराना चाहिये ।

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12.2 प्रारम्भिक पाँच साल तक की शिक्षा-दीक्षा

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! प्रारम्भिक पाँच साल के शिक्षा-दीक्षा में सत्यवादिता, संयम, अनुशासन, शिष्टता, विनम्रता, धैर्य, त्याग, साहस आदि सदाचारिता की प्रधानता होनी चाहिये। परीक्षा प्रश्न पत्रों में दो तिहार्इ प्रश्न इन्हीं क्षेत्रों के होने चाहिये। शिक्षा-दीक्षा विशुद्ध निष्पक्षता पूर्वक अपना बालक, जानते-मानते-समझते हुए दिया जाना चाहिये । इस बात को सदा याद रखना चाहिये कि गुरु के प्रति किसी भी विद्यार्थी को अपने में ऐसा भेद व भ्रम कदापि नहीं होने देना चाहिये कि अमुक विद्यार्थी पर अधिक दृष्टि है और अमुक पर कम; और गुरुजनवृन्द में विद्यार्थियों को सदा ही प्रेरित करते हुए उत्तम यानी प्रथम श्रेणी में लाने का प्रयत्न होना चाहिये। अधम और निम्न श्रेणी में विद्यार्थियों के जाने पर सभी गुरुजन बन्धुओं को ग्लानि होना चाहिये कि अपना ही बालक अधम और निम्न (शिक्षा वाले) श्रेणी में जा रहा है। अध्यापन कार्य उत्तम और उत्तमतर यानी सम्मानित क्षेत्र वाले को ही मिलने की बात होनी चाहिये। रिक्ततावश ही मध्यम (योग-साधना अथवा अध्यात्म वाले) श्रेणी के अगुओं को लेना चाहिये जो मात्र कुछ कमी के कारण ही उत्तम (तत्त्वज्ञान रूप सम्पूर्ण ज्ञान वाले) क्षेत्र या श्रेणी में नहीं पहुँच पाये थे। सदभाव एवं सतप्रेम आपस में चारों से चारों को रहे, यह सबसे अधिक ध्यान देने की बात है। व्यवहार में अधम और उत्तम श्रेणी वाले दोनों बन्धुओं को ही एक ही परिवार के दो सदस्यों के रूप में देखना व स्वीकार करना चाहिये ।

आप विद्यार्थी बन्धुओं से मेरा बार-बार, अनेकानेक बार साग्रह निवेदन है कि बिना किसी सांसारिक चेष्टा के सम्माननीय (महापुरुष और सत्पुरुष) श्रेणी का अथवा उत्तम श्रेणी के विद्यार्थी ही बनने का प्रयत्न हो क्योंकि सम्माननीय (महापुरुष और सत्पुरुष) श्रेणी का अथवा उत्तम श्रेणी आप बन्धुओं को देवताओं का भी सिरमौर बनने-बनाने वाली है । आप अपने विद्यार्थी जीवन रूप सुनहरे समय को व्यर्थ में न गवायें अपितु सार्थक-सफल बनावें। आने वाले वंशजों के लिए अपने-अपने पीछे सद्बुद्धि उत्प्रेरक गाथाएँ आप सब को रख छोड़ना चाहिए । तब ही तो मानव जीवन सफल सार्थक होगा। आप सब थोड़ा सोचें तो सही कि क्या ऐसा ही नहीं होना चाहिये ? अवश्य होना चाहिए । होना ही चाहिए ।

सदभावी विद्यार्थी बन्धुओं ! विद्यार्थी जीवन एक तरफ तो सुनहरा जीवन होता है; परन्तु वहीं दूसरे तरफ खतरनाक जीवन भी होता है; क्योंकि विद्यार्थी एक ऐसे चौराहे पर खड़ा हुआ पथिक के समान होता है जहाँ से चारो तरफ चार रास्ते (मार्ग) --- 1. भौतिक शिक्षा पद्धति रूपी मार्ग; 2. स्वाध्याय पद्धति; 3. योग-अध्यात्म पद्धति और 4. तत्त्वज्ञान पद्धति (अवतार और तत्त्वज्ञान के अनुपस्थिति में भक्ति-भाव अपनत्व प्रधान पद्धति) चारो तरफ जाते हैं, जिसमें

1. भौतिक शिक्षा मार्गमात्र शारीरिक-पारिवारिक रूप सांसारिक मार्ग है। इसमें कर्म और भोग मात्र की ही प्रधानता होती-रहती है जिससे सुख-दु:ख, हर्ष-शोक, स्वर्ग-नरक आदि के साथ ही पारिवारिक स्तर पर जीवन जीने वाले के जीव को नाश की प्राप्ति होती है । इसमें मानव जीवन का लक्ष्य रूप मोक्ष (मुकित-अमरता) बिल्कुल ही नहीं होता क्योंकि यह भोग प्रधान है । इसलिये आवागमन रूप चौरासी लाख योनियों वाला बार-बार जनम-करम-भोग-मरण जनम-करम-भोग मरण रूप दु:सह पीड़ा दायक दुख अधिकतर समाज इसी वर्ग में ही होता-रहता है कष्ट ( बी.च-बीच में कभी-कभार सुख भी) भोगते ही रहना पड़ता है ।

2. स्वाध्याय मार्ग- स्वाध्याय मार्ग देव लोक तक जाता है जहाँ पर आनन्द, दैवपद एवं ऋद्धियों-सिद्धियों सहित पुण्य रहने तक स्वर्गीय सुख की प्राप्ति होती है । मुक्ति-अमरता रूप मोक्ष इसमें भी नहीं है क्योंकि यह भी भोग प्रधान ही होता है। यह पहले वाला से थोड़ा अच्छा होता है । मात्र इसी में भरमें-भटकें-लटकें नहीं; आगे बढ़ने, ऊपर उठने हेतु सदा प्रयत्नशील रहें ।

3. योग अथवा अध्यात्म मार्ग- योग अथवा अध्यात्म मार्ग आत्मपद एवं ब्रह्रा पद तथा शिवलोक या ब्रह्रालोक तक जाता है जहाँ पर शांति एवं आनन्द, शिवत्त्व, ब्रह्रात्त्व, आत्मानन्द आदि चिदानन्द की प्राप्ति होती है । मगर मुक्ति-अमरता रूप मोक्ष से इस मार्ग वाले भी बंचित ही रह जाते हैं क्योंकि यह मार्ग भी मोक्ष रूप मंजिल को नहीं जाता । योग अथवा अध्यात्म तो बीच में ब्रह्रालोक या शिव लोक में ही भटका-लटका देता है; हालांकि इस मार्ग वाले भ्रम-भूल-मिथ्याहंकार वश यह माने बैठे रहते हैं कि हमारा मोक्ष हो जायेगा क्योंकि यह ही मोक्ष का मार्ग है, मगर वास्तविकता ऐसी है नहीं । यह तो आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा-शिव तक का ही मार्ग होता है, जो मोक्ष देने में बिल्कुल ही अक्षम-असमर्थ होता है । मोक्ष देने का एकमात्र एकमेव एक केवल परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान का ही एकाधिकार है । अन्य कोर्इ भी नहीं दे सकता । योग-अध्यात्म में रहने-चलने वाले को भी यहीं (योग-अध्यात्म में ही) ठहर नहीं जाना चाहिये बल्कि आगे बढ़ने ऊपर उठने हेतु सतत प्रयत्नशील होना-रहना चाहिये । तत्त्वज्ञान रूप भगवद ज्ञान पाने का हर सम्भव यत्न करना चाहिये क्योंकि तत्त्वज्ञान में ही सम्पूर्णत्व सहित मोक्ष की भी प्राप्ति होती है । मानव जीवन की सार्थकता और सफलता भी इसी तत्त्वज्ञान में ही स्थित होता-रहता है ।

4. तत्त्वज्ञान मार्ग- तत्त्वज्ञान मार्ग मुक्त, अमर एवं परम पद रूप भगवदधाम तक जाता है, जहाँ पर परम शांति, परम आनन्द, मुक्ति-अमरता, शाश्वतता आदि सच्चिदानन्द की प्राप्ति होती है। यह ही एकमेव एकमात्र मुक्ति-अमरता मोक्ष दिलाने वाला होता है। यह ही परमसत्य और सम्पूर्णत्त्व देने वाला विधान है, अन्य कोर्इ भी नहीं ।

उपर्युक्त चारों पद्धतियों का मार्ग-मंजिल-उपलब्धियों का यह सूत्रवत् विवरण है। यह यहाँ बतलाने की बात महती आवश्यकता समझते हुये बतलाया जा रहा है कि विद्यार्थियों में दूरदर्शिता आ सके तथा वे सदा ही सम्माननीय-आदरणीय नहीं तो कम से कम उत्तम् कोटि में पहुँचने हेतु श्रद्धा एवं निष्ठा के साथ अथक परिश्रम करते हुये, सम्माननीय-आदरणीय नहीं तो कम से कम उत्तम कोटि में पहुँच कर, वहाँ भी उत्तम अवस्था में बने रहें।

सद्भावी विद्यार्थी बन्धुओं ! सम्माननीय अथवा आदरणीय नहीं तो कम से कम उत्तम कोटि के अन्तर्गत अपने को लाने हेतु पाँच बातों को भी सदैव याद रखना होगा। वे पाँच बातें हैं--

पहला, आपकी चेष्टा कौवा की तरह हमेशा सावधानी में रहना चाहिये; ताकि आपके अन्दर किसी भी प्रकार का छोटा से छोटा भी दोष प्रवेश न कर सके । यदि शैतान व मायाकृत दुष्प्रभाव वश प्रवेश भी कर गया हो तो उसे तुरन्त निकाल बाहर कर या त्याग कर दें। सही और सम्माननीय अथवा आदरणीय नहीं तो कम से कम उत्तम होने-रहने के लिये झूठ-दोष को हर प्रकार से त्याग कर अपने आप को भगवद समर्पित-शरणागत करके भगवद भाव में ही बने रहना चाहिये । यही एकमात्र सबसे सुगम और सरल उपाय है, सम्पूर्णत्त्व प्राप्ति के लिये । न तो कहीं कोर्इ कमी और न तो कोर्इ अभाव-परेशानी ।

दूसरा, बगुले की तरह आपका ध्यान होना चाहिए अर्थात् यदि विद्या अध्ययन करने आये हैं तो आपको सदा एकमात्र विद्या प्राप्ति में ही ध्यान होना चाहिये। सांसारिक वृत्तियों-प्रवृत्तियों, चेष्टाओं आदि से कोर्इ मतलब नहीं होना चाहिये । यदि सांसारिक सुख उपलब्ध भी होता हो तो उसे भी त्याग करने का सदा ही प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि सुख अपने तरफ धीरे-धीरे आकर्षित करते हुये आपका विद्या के प्रति भाव कम कर देगा और जब विद्या के प्रति भाव कम होने लगेगा तो नि:संदेह आपका मानसिक और सामाजिक पतन भी होने लगेगा । विद्या तो मिल ही नहीं पायेगी, आगे चलकर सुख भी आपको छोड़ देगा क्योंकि सुख सुविधायें भी विद्या (विद्यातत्त्वम्-तत्त्वज्ञान) वालों के साथ होने-रहने-चलने के लिये मजबूर होती रहती है । अत: सुख त्याग कर भी विद्या हासिल कर लेना ही सही और उचित होगा । सही और सम्पूर्णत्त्व प्राप्ति के लिये विद्यातत्त्वम्-तत्त्वज्ञान प्राप्त करना और अपने को ज्ञानमय-ज्ञान प्रधान बनाए रखना अनिवार्य है । क्योंकि मुक्ति-अमरता से युक्त भरापूरा जीवन भी इसी में प्राप्त होता है ।

तीसरा, श्वान (कुत्ता) के समान आपकी नींद होनी चाहिये अर्थात सोवें तो ऐसे सोवें कि जरा सा भी तिनका खरखराये यानी थोड़ा सा भी यानी धीमी आवाज भी हो तो नींद खुल जाय; ताकि शरीर में आलस्य एवं सुस्ती न आने पावे; क्योंकि आलस्य एवं सुस्ती तो विद्या की घोर बैरी है। इसलिए आलस्य एवं सुस्ती को अपने पास आने ही न दें । यदि आ भी गयी हो तो उसे यथाशीघ्र अपने पास से हटाने का प्रयास करें। आगे बढ़ना है, ऊपर उठना है तो आलस्य-प्रमाद को अपने से हर हालत में हटाना ही होगा ।

चौथा, विद्यार्थी को सदा सात्तिवक और अल्प आहार ही प्रयोग करना चाहिये यानी लेना चाहिये । यह बराबर ही याद रखना चाहिये कि आहार में राजसिक का भी प्रयोग न होने पावे, यदि राजसिक थोड़ा बहुत परिस्थिति वश प्रयोग हो भी जाय तो जाय मगर तामसिक आहार को तो सदा ही बर्जित (त्याज्य) रखना चाहिये, क्योंकि राजसिक से वृत्ति भी राजसिक होने लगेगी और तामसिक से तामसिक वृत्ति। तामसिक वृत्ति दानवता है तो राजसिक मानवता और सात्तिवक आहार-वृत्ति दैवत्त्व की होती है। हर किसी को दैवत्त्व वृत्ति में अपने को होने-रहने-बनाये रखने का सदा-सर्वदा प्रयास होना चाहिये। साथ ही आहार अल्प होना चाहिये जिससे कि शरीर में आलस्य न आने पावे। आहार अधिक होने पर आलस्य आयेगा ही । इसलिए सदा अल्पाहार ही लें । भूल जाइये कि अल्पाहार लेंगे तो कमजोर हो जायेंगे । अल्पाहारी शरीर रोग रहित और स्वस्थ रहती है । रोग रहित और स्वस्थ शरीर जल्दी कमजोर नहीं होती है बल्कि बलजोर होती है ।

पाँचवा, विद्यार्थी को विद्या अर्जन करने हेतु पारिवारिक सम्बन्धों से बिल्कुल ही दूर रहना चाहिये । गृह त्याग विद्यार्थी के लिए आसक्ति-ममता तथा प्रमाद एवं अहंकार और स्वार्थ से बचने के लिये अनिवार्य होता है, भले ही इसे अस्वीकार किया जाय या स्वीकार किया जाय मगर गृहत्यागी विद्यार्थी को परमार्थी होने-रहने के लिए अनिवार्य होता है । जैसी करनी वैसी भरनी ।

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12.3 अति विशिष्ट ग्रहणीय तथ्य-- उपसंहार

सद्भावी विद्यार्थियों ! अन्तत: मैं आप लोगों को ग्रहणीय, अनिवार्यत: ग्रहणीय-- सबसे प्रमुख यादगारी रखने की बात तो यह है कि चाहे परिवार का दोष हो या सरकार का, चाहे गुरुदेव का दोष हो, या समाज का, परन्तु मारे जायेंगे आप, बर्बाद तो होंगे आप, समाज में मूढ़, अज्ञानी, मूर्ख, अनपढ़, अशिक्षित बेवकूफ आदि अपमान सूचक शब्द तो सुनने पड़ेंगे आप को, समाज में दर-दर का ठोकर खाना पडे़गा आप को, समाज में सर्वत्र अपमान एवं बेइज्जत होंगे आप, विद्वत समाज में बैठने से बंचित होगे आप, जीवन भर कष्ट व परेशानी उठानी पडे़गी आपको, दिन भर भी श्रम करने पर भी भर पेट भोजन के लिये तरसेंगे आप, पौराणिक एवं ऐतिहासिक महापुरुषों के विचारों को जानने-देखने-समझने से बंचित रहेंगे आप, ऊँची एवं अच्छी सेवाओं और नौकरियों से बंचित रहेगे आप, सुख-शांति के संसाधनों से बंचित रहेगें आप, पारिवारिक बाल-बच्चे कष्ट भोगेंगे आपके तथा कोशेंगे और श्राप देंगे आप को-- आदि-आदि समस्त मानवीय सुख-सुविधाओं से बंचित होंगे आप ।

बन्धुओं इन उपर्युक्त समस्त बातों को एकबार पढ़ें तब पाँच मिनट अपने जीवन में भुगतने में मिलने वाले कष्टों का अनुभव करें । पुन: दूसरे बार पढे़ं और फिर पाँच मिनट वैसा ही अनुभव करें। इस प्रकार आप कम से कम इसे तीन बार पढ़ें और पाँच-पाँच मिनट इसके कष्टों को अपने जीवन में सोचें और अनुभव करें । तब अपने विषय में निर्णय लेवें कि आपको विद्या अर्जन करना चाहिये या नहीं ? तब जरूर निर्णय आयेगा कि चाहे जितना कष्ट भी होवे तो क्या, सर्व प्रथम हम विद्या अर्जन करेंगे और करेंगे ही। बिल्कुल ही विद्या अर्जन करेंगे ही । यहाँ पर विद्या से मतलब विद्यातत्त्वम् रूप तत्त्वज्ञान से है ।

सद्भावी विद्यार्थी बन्धुओं ! चौथे श्रेणी यानी अधम श्रेणी वाला मात्र भौतिक शिक्षा को ही जब आप प्राप्त करते हैं तब आपको ऊँची-ऊँची नौकरियाँ, विधायक, सांसद, एस0पी0, डी0एम0, जज, सचिव, मन्त्री, राज्यपाल आदि- आदि स्थान मिलेगा । आप भौतिक शिक्षा को अधम में रखने पर सोचेंगे तो, आप सुने होंगे कि ‘तप चुक राज, राज चुक नरक।’ पुन: यदि आप तीसरे श्रेणी यानी निम्न श्रेणी वाले स्वाध्याय विधान को प्राप्त करेंगे तो सिद्धि, भूत-भविष्य की जानकारी प्राप्त होता है । तब सिद्ध ऋषि-महर्षियों वाला दैवी स्थान प्राप्त होता है । उसमें आपके इच्छानुसार सिद्धियाँ काम करती हैं जिससे कि संसार में आपको बहुत ही मर्यादा-महत्त्व मिलता है । पुन: यदि दूसरे श्रेणी या मध्यम श्रेणी वाले योग-साधना या आध्यात्मिक साधना को प्राप्त करते हैं तब ऋषि, महर्षियों योगी-यतियों यानी सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, शंकर जी, वाल्मीकि, बशिष्ट आदि सप्तर्षियों, याज्ञवल्क्य, अष्टाबक्र, व्यास, पातन्जलि आदि-आदि योगी-यतियों वाला स्थान मिलेगा । यीशु, आधशंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकान्द, स्वामी रामतीर्थ, योगानन्द, माँ आनन्द मयी आदि-आदि वाला बनेंगे और ऊपर से पहले श्रेणी या उत्तम कोटि के विधान यानी तत्त्वज्ञान या सत्यज्ञान या भगवदज्ञान को प्राप्त करके और उसी के अनुसार अपने आप को होते-रहते-चलते हैं तब तो आप को शंकर, नारद-गरुण, हनुमान, ध्रुव, प्रहलाद, हरिश्चन्द, विभीषण, सुग्रीव-केवट-सेबरी, काक-भुसुण्डी- जटायु, अर्जुन-ऊद्धव, विदुर-मैत्रेय, राधा, गोपियों आदि-आदि जैसा ही स्थान व मर्यादा मिलेगा !

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विद्यार्थी सदा गुण-ग्राही बनें

सद्भावी विद्यार्थी बन्धुओं ! मेरा विद्यार्थी बन्धुओं से साग्रह निवेदन है कि आप केवल गुण-ग्राही बनें । गुण-ग्राही से मेरा तात्पर्य यह है कि सच्चा अथवा यर्थाथत: विद्यार्थी वही होता है जिसको दूसरों के दोष-दुर्गुण से कोर्इ मतलब न होवे; परन्तु अच्छा गुण चाहे जहाँ भी और जिसमें भी हो और जैसे भी मिले, उसे अवश्य अपना लेवें। दूसरे की बुरार्इ, गड़बड़ी अथवा दोष- दुर्गुण देखना अपने दृष्टि को दूषित बनाना है । मगर यह सिद्धान्त अध्यापक और उपदेशक गुरुजनवृन्द पर लागू नहीं होगा क्योंकि उन्हें अपने विद्यार्थियों-शिष्यों के समक्ष उनके दोष- दुर्गुण को जना-दिखा कर ही उनका सुधार करना पड़ता है, मगर जहाँ स्वयं के लिये ग्रहण की बात आयेगी, वहाँ यह सिद्धान्त अध्यापक और उपदेशक-गुरुजन वृन्द पर भी लागू हो जायेगा। विद्यार्थी को सदा ही मात्र विद्यातत्त्चम् से मतलब होना चाहिये । देश-काल- परिस्थिति से कोर्इ बात यानी मतलब नहीं रखना चाहिये । यदि मतलब रखना भी हो तो मात्र उतना ही मतलब रखना चाहिये जितना से कि विद्यातत्त्वम् में सहयोग मिल सके अथवा अपने जीवन को सही, उचित और उत्तम बनाये रखने में जहाँ तक बाधक-अवरोधक न बनकर सहायक-सहयोगी बन सके । याद रहे कि आप का जीवन एक अनमोल रतन है जो व्यर्थ न जाये अपितु यह उचित मूल्य, उचित कीमत और उचित स्थान पाये और अपने को जनमानस में धन्य-धन्य बनाये ।

यह प्रमाणित सिद्धान्त है कि दोष- दुर्गुण देखते-देखते आदमी दोषी बनता है तथा गुण देखते-देखते गुणी । इसीलिये कहा जा रहा है कि विद्यार्थी को दूसरे किसी का दोष- दुर्गुण नहीं देखना चाहिये, गुणग्राही ही बनना चाहिए। यदि स्थिति-परिस्थितिवश दोष- दुर्गुण दिखलार्इ भी दे तो घृणा भाव से उसे त्याग देना चाहिये । इसका अर्थ दोषी- दुर्गुण का त्याग नहीं अपितु दोष- दुर्गुण का त्याग समझना चाहिये । कर्म क्षेत्र में रहने पर माता-पिता और धर्म क्षेत्र में रहने पर सदगुरु और भगवान में दोष की बात सुनना-देखना तो सुनना-देखना है, स्वप्न तक में भी कल्पना नहीं करना चाहिये। इनमें यदि कोर्इ दोष दिखलार्इ भी दे तो उसे अपना दोष (दृष्टि दोष) स्वीकार कर यथाशीघ्र उसे भी दूर करने का सत्प्रयास होना चाहिये-- होना ही चाहिये । तत्पश्चात् तुरन्त यह मानना चाहिये कि यह हमारा दृष्टि-भ्रम है। हालाँकि दृष्टि-भ्रम होने वाले को यह नहीं महशूस होता है कि हमें दृष्टि-भ्रम हुआ है। उसे तो यही महशूस होता है कि हम ही सही हैं और जो हमें दृष्टि-भ्रम की बात करता है, वही गलत है ।

थोड़े देर के लिए माना जाय कि गुरु जी में यदि कोर्इ दोष ही है तो हम उनके दोषों को ग्रहण करने तो आये-गये नहीं हैं । हम तो आये-गये हैं उनके गुणों को ग्रहण करने के लिए । उनके में निहित विद्या(ज्ञान) को ग्रहण करने के लिये; उनके उपदेशों को ग्रहण करने के लिए; न कि उनका आचरण-व्यवहार अथवा दोष देखने के लिये । उनका आचरण-व्यवहार उनके लिये है, दोष का परिणाम उनको भुगतना पडे़गा, हमको-आपको नहीं । अंशावतारी दत्तात्रेय जी ने तो वेश्या से ही यह शिक्षा (गुण) ग्रहण किया कि ‘आशा ही परमं दु:खं, नैराश्यं परमं सुखम!’ अर्थात् आशा ही सबसे बड़ा (परम) दु:ख है तथा निराशा ही सबसे बड़ा (परम) सुख है । वे तो यह कभी नहीं सोचे कि हम अंशावतारी हैं, हमें वेश्या शिक्षा क्या देगी ? वे वेश्या के अन्दर समस्त अवगुणों (दोषों) के बावजूद भी उसे अपना गुरु ही माने। उसके वेश्यापनी को कदापि नहीं देखे । मगर गुरुजी का ज्ञान अवश्य ही जाना-देखा जायेगा कि उत्थान- कल्याण मूलक है कि नहीं ? अपूर्ण है या पूर्ण ? पतनकारक या अपूर्ण हो तो त्याग कर पूर्ण को, सत्य सुधार-उद्धार रूप कल्याण को पाने का हर हालत में प्रयास होना चाहिये ।

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----------------सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस


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