विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
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13. सच्चे गुरु की पहचान--ऐसे करें

गुरु में दोष देखने वाले कभी पवित्र हो ही नहीं सकते हैं और उनकी मति-गति सदा दूषित होती-रहेगी जिसका दुष्परिणाम यह होगा कि उनके दिल व दिमाग में कभी भी विमल विवेक यानी पवित्र-ज्ञान उत्पन्न अथवा ग्रहण हो ही नहीं सकता है। मगर इस बात पर सदा सावधान रहना है कि यह गुरु की महत्ता वाला उद्धरण आडम्बरी-ढोंगी-पाखण्डी आध-अधूरे गुरुओं के लिये नहीं है अपितु पूर्ण-सम्पूर्ण ज्ञान वाले सच्चे गुरु-सदगुरु के लिये है । झूठे और आध-अधूरे गुरुओं के प्रति यदि इस फॉर्मूला को लागू किया जायेगा तब तो अर्थ के जगह पर घोर अनर्थ हो जायेगा । इसलिये यहाँ विशेष सावधानी की अनिवार्यत: आवश्यकता है । गुरु वही जो ‘ज्ञान’ (तत्त्वज्ञान-सम्पूर्णज्ञान) दे । ‘ज्ञान’ वही जिसमें खुदा-गॉड-भगवान मिले। भगवान वही जिसमें सम्पूर्ण की सम्पूर्णतया ज्ञान सहित मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध रूप मोक्ष मिले।

सम्पूर्ण का ज्ञान सहित मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध नहीं तो मिलने वाला खुदा-गॉड-भगवान सही नहीं और असल (वास्तविक) सही खुदा-गॉड-भगवान का मिलन नहीं, तो वह ‘ज्ञान’ (तत्त्वज्ञान) सही नहीं और जब मिलने वाला ज्ञान ही सही और सम्पूर्ण नहीं तो गुरु भी सही और पूर्ण नहीं और जब गुरु सही और पूर्ण नहीं तो वह गुरु गुरु ही नहीं, क्योंकि गुरु शब्द की महत्ता ‘ज्ञान’ से है । ‘ज्ञान’ की महत्ता मिलने वाले खुदा-गॉड-भगवान से है और भगवान की महत्ता विराट दर्शन सहित एकत्त्वबोध रूप मुक्ति-अमरता रूप मोक्ष के साक्षात बोध से है। इस कसौटी पर कसे वगैर किसी को गुरु स्वीकार करना-मानना अपने को धोखे में डालना-रखना-रहना है। ऐसे ही सच्चे गुरु के महत्ता के सम्बन्ध में यह उपर्युक्त उद्धरण है ।

विद्यार्थियों को अपने गुरु के प्रति सदा ही दोष रहित दृष्टि रखना चाहिये जिससे कि विद्यार्थी का सदा उत्तरोत्तर विकास होता रहे। विद्यार्थी को तो गुरु के बर्तन माँजकर, कौशिक मुनि की तरह से उत्तम विद्या प्राप्त कर लेना चाहिये। दासता यानी निष्कपट भाव से गुरु सेवा ही किसी भी विद्यार्थी को उत्तम कोटि में पहुँचा तथा उसमें स्थिर रख सकता है । गुरु में श्रद्धा-विश्वास हीन कभी भी उत्तम कोटि में नहीं पहुँच सकता है । यदि किसी कारण वश पहुँच भी गया हो तो वह वहाँ टिक नहीं सकता है । मगर यहाँ पर फिर याद रहे कि यह बात सच्चे गुरुजन के लिये है, झूठों के लिये नहीं । आडम्बरी-ढोंगी गुरुओं पर यह विधान उलट देना चाहिए ।

अधम-मध्यम-उत्तम तीन कोटि यहाँ हैं । अधम वह है जो गुरु या माता-पिता के आज्ञा पालन में कतराता है । मध्यम वह है जो आज्ञा होने पर सावधानी पूर्वक यथाशीघ्र उस आज्ञानुसार रहे-चले और उत्तम वह विद्यार्थी होता है जो गुरु या माता-पिता के आज्ञा के पूर्व ही उनके भावों को जान-समझ कर उसको पूरा किया रहता है ।

कोर्इ गड़बड़ी या दोष कहीं भी दिखलायी दे तो विद्यार्थी को उसका दायित्त्व सदा अपने ऊपर ले लेना तथा उसका तुरन्त अपने अन्दर सुधार कर लेना चाहिए यदि वह अपने में है तो। यदि अपने में दोष नहीं भी हो मगर भले भावना से अन्य के दोषों को भी अपने पर स्वीकार कर लिया जाता है तो इस विश्वसनीयता और भरोसा को दृढ़ता पूर्वक धारण किये रहना चाहिये कि मेरा मालिक (खुदा-गॉड-भगवान) सब कुछ का जाननहार है । वह यह सब जानता है । इसलिये इस दोष को स्वीकार कर लेने से मेरा कुछ बिगड़ने वाला नहीं है । मुझे मेरे भले भावना का फल भला ही मिलना है क्योंकि दूसरे पर झूठा दोष मढ़ना स्वत: ही एक दोष होता है । मगर एक बात बहुत ही समझदारी की है कि मेरे सत्य बोलने रहने-चलने से किसी को निन्दा-शिकायत-दोष लगे, तो ऐसे में सत्य को ही महत्व दें । सत्य को किसी भी परिस्थिति में कदापि न छोड़े ।

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13.1 मोह पाश काट, महापुरुषत्त्व-सत्पुरुषत्त्व साट

सद्भावी विद्यार्थी बन्धुओं ! आप विद्यार्थी बन्धुओं से तो मैं बार-बार ही यही कहना चाहूँगा कि भावी समाज के सुधार और उद्धार का समूचा भार आप विद्यार्थियों को ही दु:ख या सुख के साथ वहन भी करना पड़ता है । विद्यार्थी बन्धुओं ! यही घड़ी और यही बेला है, जो आप अपने को मोहपाश पिंजरा को तोड़-काट कर, स्वच्छ परमाकाश में उन्मुक्त विचरण करते हुए, मुक्ति-अमरता सहित परमशान्ति और परम आनन्द का साक्षात् बोध प्राप्त करते हुए सृष्टि के समस्त बन्धनों को काटते हुए, आत्मा और परमात्मा अथवा र्इश्वर और परमेश्वर अथवा ब्रह्रा और परमब्रह्रा अथवा नूरे इलाही और इलाह अल्लाहतआला अथवा सोल और गॉड अथवा आत्मशक्ति और परमसत्ता अथवा हंस और परमहंस अथवा आदि शक्ति और भगवान अथवा गुरु और सद्गुरु अथवा योगी-आध्यात्मिक महापुरुष और तात्तिवक परमपुरुष रूप सत्पुरुष रूप अवतारी से उन्मुक्त सम्बन्ध स्थापित करने का, उससे जीव एवं आत्मा और परमात्मा अथवा रूह एवं नूर और अल्लाहतआला अथवा सेल्फ एवं सोल और गॉड अथवा जीव एवं शिव और भगवान अथवा जीव एवं ब्रह्रा और परमब्रह्रा का स्वाध्याय एवं योग या अध्यात्म और तत्त्वज्ञान या सत्यज्ञान या भगवदज्ञान अथवा मोहकम एवं मुतशाबिहात और हुरुफमुकत्तआत अथवा सेल्फ रिअलाइजेशन एवं स्प्रीच्युलाइजेशन एण्ड ट्रयु सुप्रीम एण्ड परफेक्ट नालेज द्वारा अनुभूति और साक्षात् बोध प्राप्त करते हुए, आनन्द एवं चिदानन्द या दिव्यानन्द और परमशान्ति या शाश्वतशान्ति और शाश्वत आनन्द या सच्चिदानन्द या मुक्तानन्द या अमर बोध या परम अद्वैत बोध या भगवदानन्द अथवा रूहानी एवं नूरानी और मेहरबानी अथवा सेप्टलिटी एवं डिवायनिटी और मर्सी प्राप्त करने या हासिल करने या गेन करने का । पुन: इसके सहयोग और कृपा से आत्मपद या ब्रम्हपद या दिव्यपद और परमपद या मुक्तपद या अमर पद, अथवा जन्नत और बिहिस्त अथवा हिवेन और पैराडाइज या गोल तक पहुँचने का; तथा सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, पुलह, पुलस्त्य, अंगीरा, क्रतु, हरि, कवि, प्रवुद्ध, बशिष्ट-याज्ञवलक्य, बाल्मीकि, कश्यप, अगस्त्य, संदीपन, गौतम, शाण्डिल्य, भारद्वाज, ऋषभ, भृगु, निदाघ, दुर्वासा, दत्तात्रेय, पराशर, अष्टाबक्र, शौनक, व्यास, शुकदेव, पातञ्जलि, मत्स्येन्द्रनाथ, गोरखनाथ, महावीर, यीशु (मसीह) कबीर, आद्यशंकराचार्य, श्रीरामकृष्ण परमहंस, स्वामी रामतीर्थ, स्वामी विवेकानन्द, शिवानन्द, सिस्टर निवेदिता, योगानन्द, मुक्तानन्द, स्वरूपानन्द, पूर्णानन्द, सेन्ट पाल, धर्मपाल और शंकर जी, काक भुसुण्डि, नारद, गरुण, हनुमान, लक्ष्मण, भरत, केवट, सेवरी, जटायु, ध्रुव, प्रह्लाद, सत्यकाम, सुग्रीव, विभीषण, अंगद, नल, नील, जाम्बन्त, कौशल्या, तारा, मंदोदरी, राधा, गोपियाँ, उद्धव, मैत्रेय, अर्जुन, युधिष्ठर, ग्वाल बाल, चैतन्य महाप्रभु, मुहम्मद साहब, तुलसीदास, मीराबार्इ, सूरदास आदि आदि बनते हुए महापुरुष और भगवद पार्षद रूप सत्पुरुष बनने का बन्धुओं यही समय है। योग-साधना-अध्यात्म के माध्यम से महापुरुषत्त्व और ज्ञान (तत्त्वज्ञान) शरणागत-भक्ति-सेवा के माध्यम से सत्पुरुषत्त्व अपनाकर अपने जीवन को कृत-कृत्य (धन्य-धन्य) बना लेना चाहिये ।

यदि आप सब सांसारिक लुभावना में फँस-फँसा जायेंगे तो बहुत अधिक से अधिक उपलब्धि उपलब्ध करेंगे तो सांसारिकता में यदि आप एस0पी, डी0एम0, जज, बैरिष्टर, नेता, मन्त्री, राज्यपाल, सेनापति प्रधानमन्त्री या राष्ट्रपति आदि हो जायँ तो क्षणिक सुख को प्राप्त हो सकते हैं; परन्तु महापुरुषत्त्व और सत्पुरुषत्त्व की प्राप्ति तथा पौराणिक महत्ता के समान किसी धर्म गाथा के पात्र नहीं बन सकते । मात्र सांसारिकता के मोह-पाश में फँस-भटक कर विनाश को ही प्राप्त हो जायेंगे जबकि मानव जीवन का उददेश्य सत्पुरुषत्त्व को प्राप्त करते हुए उन्मुक्तता पूर्वक अमरत्त्व को पाना होता है। इसे पाने का सत्प्रयास होना ही चाहिये। महापुरुष और भगवद पार्षद बनने हेतु आत्मा और परमात्मा के प्रति शरणागत सर्वतोभावेन होना-रहना ही पड़ेगा । यही घड़ी और यही बेला है आपको अपना मार्ग चुनने का कि आप कौन सा मार्ग चुनकर किधर बढ़ रहे हैं। यह अनिवार्यत: विचारणीय बात है। बार-बार ही, हजार बार भी कहूँगा कि आपका मानव जीवन देव दुर्लभ अनमोल रतन है । चेतिये, सम्भलिये ! इसे सार्थक-सफल बनाइये ! निन्दनीय नहीं, बन्दनीय बनिये-बनाइये !

सदभावी सत्यान्वेषी विधार्थी बन्धुओं ! मेरा मतलब किसी भी महापुरुष को निन्दित करने अथवा अस्तुति करने से नहीं है, बल्कि किसी भी महापुरुष एवं सत्पुरुष के महानता एवं सत्पुरुष के ‘सत्य’ से है कि वे इन उपाधियों से युक्त कैसे हुये ? क्या वैसे हमारे अन्य युवा बन्धु हो सकते हैं या नहीं ? यदि नहीं, तो क्यों नहीं ? यदि हाँ, तो कैसे ? किस उधम, साधना एवं ज्ञान के सहारे हो सकते हैं ? उसी को क्यों नहीं मूलत: समाज में प्रचारित-प्रसारित किया जाय, जिससे कि निश्चित ही वर्तमान में एक ध्रुव ही नहीं अनेकानेक ध्रुव, एक प्रहलाद ही नहीं अनेकानेक प्रहलाद, एक बुद्ध ही नहीं अनेकानेक बुद्ध, एक महावीर ही नहीं अनेकानेक महावीर, एक आद्य शंकराचार्य ही नहीं अनेकानेक आद्य शंकराचार्य, एक गोरखनाथ ही नहीं अनेकानेक गोरखनाथ, एक र्इशु ही नहीं अनेकानेक र्इशु, एक मुहम्मद ही नहीं अनेकानेक मुहम्मद साहब, एक मूसा ही नहीं अनेकानेक मूसा, एक कबीर ही नहीं अनेकानेक कबीर, एक नानक ही नहीं अनेकानेक नानक देव जी, एक तुलसी ही नहीं अनेकानेक तुलसी, एक मीरा ही नहीं अनेकानेक मीरा, एक रामकृष्ण परमहंस ही नहीं अनेकानेक रामकृष्ण परमहंस, एक विवेकानन्द ही नहीं अनेकानेक विवेकानन्द आदि-आदि बना जा सकता है ।

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13.2 महापुरुषत्त्व और सत्पुरुषत्त्व हेतु सन्त ज्ञानेश्वर का युवकों का आह्वान

सर्वप्रथम युवा बन्धुओं ! इस बात को अपने दिल-दिमाग से निकाल कर बाहर फेंक दिया जाय कि अब ध्रुव-प्रहलाद-बुद्ध-मूसा-र्इशु-मोहम्मद- कबीर-नानक-तुलसी-मीरा-गोरखनाथ-आद्यशंकराचार्य-रामकृष्ण-विवेकानन्द आदि-आदि महापुरुष बना ही नहीं जा सकता है और यह जान लेवें कि अवश्य बना जा सकता है--मुझ सन्त ज्ञानेश्वर से मिलें और बनने-होने का प्रयास करें। मुझसे हर प्रकार का सहयोग आप को मिलेगा; आगे आवें और बनें ।

युवा बन्धुओं ! यह आप की सबसे बड़ी कमजोरी है कि पहले ही यह मानकर कि ‘हम’ महापुरुष और सत्पुरुष या खुदा का प्यारा या भगवान का प्रेमी या परमेश्वर का पुत्र-प्रिय सेवक बन ही नहीं सकते हैं। बन्धुओं ! मैं किस प्रकार से आपको बताऊँ, समझाऊँ कि बना जा सकता है । बना जा सकता है!! बिल्कुल ही बना जा सकता है !! थोड़ा सा सर्वप्रथम संकल्प के साथ अपने को परमप्रभु से, एकमात्र परमप्रभु से अपने को अनन्य भाव से जोड़ लेना और उसी के अनुसार अपना रहन-सहन बना लेना है, शेष सब होता जायेगा और आप देखते ही देखते हो जायेंगे। प्रयत्न आप स्वंय करें और परिणाम खुदा-गॉड-भगवान रूप परमसत्य पर छोडें । सब हो जायेगा।

खुदा या गॉड या भगवान या यहोवा या परमेश्वर या सर्वोच्च शक्ति-सत्ता सामर्थ्य या परमसत्य को साक्षी बनाकर, एकमात्र उसी परमप्रभु को साक्षी बनाकर कह रहा हूँ । उसी परम प्रभु के विशेष कृपा के आधार पर ही कह रहा हूँ कि युवा वर्ग सत्य संकल्प के साथ समाज में उसी महानता एवं सत्यता को हासिल करने के लिए आगे बढ़ें। निश्चित ही वर्तमान में एक ध्रुव ही नहीं अनेकानेक ध्रुव, एक प्रहलाद ही नहीं अनेकानेक प्रहलाद, एक बुद्ध ही नहीं अनेकानेक बुद्ध, एक महावीर ही नहीं अनेकानेक महावीर, एक आध शंकराचार्य ही नहीं अनेकानेक आध शंकराचार्य, एक गोरखनाथ ही नहीं अनेकानेक गोरखनाथ, एक र्इशु ही नहीं अनेकानेक र्इशु, एक मुहम्मद ही नहीं अनेकानेक मुहम्मद साहब, एक मूसा ही नहीं अनेकानेक मूसा, एक कबीर ही नहीं अनेकानेक कबीर, एक नानक ही नहीं अनेकानेक नानक देव जी, एक तुलसी ही नहीं अनेकानेक तुलसी, एक मीरा ही नहीं अनेकानेक मीरा, एक रामकृष्ण परमहंस ही नहीं अनेकानेक रामकृष्ण परमहंस, एक विवेकानन्द ही नहीं अनेकानेक विवेकानन्द आदि-आदि बना जा सकता है।

आखिरकार मेरा एक ही सवाल है कि आप युवक ये महापुरुष एवं सत्पुरुष क्यों नहीं हो सकते? आप थोड़ा धीरज धारण कर, गम्भीरता पूर्वक सोच-समझ कर स्वयं एकान्त में बैठ कर निर्णय लेवें तथा स्वंय से एक बात पूछें कि आज क्या वह परमसत्ता नहीं है ? जो इन उपर्युक्त या ऐसे ही अन्य आध्यात्मिक महापुरुषों एवं तात्तिवक सत्पुरुषों जिनका नाम यहाँ छोड़ दिया गया हो या छूट गया हो, उन महापुरुषों और सत्पुरुषों जैसा भी महापुरुष और सत्पुरुष बनाने वाला वही परमसत्ता आज भी नहीं है ? आज उसमें वह शक्ति-सामथ्र्र्य नहीं है ? वह अवश्य है। वही सदा रहने वाला है । वही सर्व शकितमान है । उसके शकितसत्ता में कोर्इ अपना दखल नहीं जमा सकता है । वही एकमात्र परमप्रभु सबका है, सबके लिए है। वह जब जिसको जो चाहे बना दे। जितना चाहे, दे दे। जहाँ चाँहे वहाँ भेज दे। वह सर्व शक्तिमान है, एकमात्र वही परमप्रभु मात्र ही महापुरुषत्त्व और सत्पुरुषत्त्व प्रदाता तो है ही, मोक्षदाता भी एकमात्र वही ही है । उसके सिवाय दूसरा कोर्इ नहीं । किसी को कुछ भी बना देने को अधिकार एकमात्र परमप्रभु का है और सदा-सर्वदा परमप्रभु में ही रहेगा भी ।

युवा बन्धुओं ! घबड़ाओ नहीं, मैदान में आओ ! आगे बढ़ो। रूको नहीं। युवा तुम हो, कार्य को तेज गति से पूरा करने वाले तुम हो ! जाहिल मत बनों! प्रमादी मत बनों ! उठो !जागो !सत्यता और श्रेष्ठत्त्व को स्वीकार करो ! क्षणिक सुख रूपी भोग-व्यसन वाला कर्मचारी-अधिकारी-नेता नहीं बल्कि महापुरुष-सत्पुरुष बनने होने के लिए विवेकानन्द के तरह आगे बढों । अपने मानव जीवन का मंज़िल प्राप्त करो ।

समय की पुकार है, परमप्रभु की ललकार है ।
बनना हो तो बन ले भार्इ, पछताना बेकार है ।।
ऐसे सुअवसर को हाथ से मत जाने दो,
सेवा-श्रम-परिश्रम करो, सदानन्द की राह धरो ।।

सद्भावी सत्यान्वेषी युवा बन्धुओं ! आप लोग यह कह सकते हैं कि कभी ऐसा हो नहीं सकता है ! यह सब एक भ्रामक बात है । भ्रम में डाल कर फँसाने वाली बात है । यह सब सदानन्द का अहंकार है परन्तु ऐसा कह कर ही आप क्या हासिल कर सकते हैं ? अपने को इतना बुजदिल (कमजोर) क्यों समझते हो कि सबको सदानन्द फंसा ही लेगा ! सभी को भ्रमित ही करेगा । थोड़ा भी तो सोचो कि आखिर सदानन्द आप को फँसाता भी है, तो क्यों ? क्या अपने घर-दुआर का कार्य कराने के लिये ? आप लोग इतने कमजोर दिमाग के हो कि सदानन्द के कार्यों को जान-देख-समझ नहीं सकते हो ? इतने मूर्ख हो कि सदानन्द सबको फँसा कर खेती या व्यापार करायेगा? यदि कराता भी है तो क्या वह खेती-बारी-व्यापार अपना और अपनों मात्र के लिये अथवा आप सब और आप सब के अपना होने-रहने वाले के लिये भी ? आप को आँख नहीं है, दिल-दिमाग नहीं है ? सूझ-बूझ नहीं है कि सदानन्द आप को फँसा कर क्या कर करा रहा है ? वास्तविकता तो आप लोग पहले जानें--

यह कहना बेकार है कि ‘सदानन्द’ का अहंकार है ।

आप बन्धुओं ! दुनियाँ के दुर्जनों को ‘ठीक’ करने के लिये और सज्जन बनाने के लिए बुलाये जा रहे हो, तो क्या सदानन्द सत्य नहीं होगा, तो आप लोग इसको ‘ठीक’ नहीं कर सकते हो ? यदि आप सत्य हो और सदानन्द असत्य होगा, तो आप लोग उसी परमप्रभु की कृपा से सदानन्द को भी ‘ठीक’ कर दीजियेगा लेकिन असलियत तो यही है कि-- सदानन्द तो कहता है कि मेरा क्या अहंकार है, भगवन की पुकार है।

आना है तो आ जाओ प्यारे, बातें अधिक बेकार है ।।

बन्धुओं ! इतना तो आप अवश्य जानते ही होंगे कि किसी को बिना जाने-समझे अपने मनगढ़न्त बातों से निन्दित नहीं किया जाना चाहिये । यदि आप करेंगे भी तो सदानन्द का क्या बिगड़ेगा ? सदानन्द सचमुच में यदि परमप्रभु वाला ही होगा और परमप्रभु की कृपा वाला ही सदानन्द रहा तो निन्दक अपने द्वारा ही अपने को ही निन्दित करेगा । परमप्रभु की विशेष कृपा रही तो अब वह दिन दूर नहीं कि सदानन्द परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम्-काल अलम-गॉड शब्दरूप खुदा-गॉड-भगवान रूप अकाल पुरुष रूप परमसत्य वाला ही सबको (जिज्ञासु भक्तों को) दिखार्इ देने लगेगा। सदानन्द का कार्य एकमात्र परमप्रभु वाले कार्यों का सम्पादन करना यानी ‘सत्य-धर्म’ की स्थापना तथा उसका प्रचार-प्रसार करना तथा उसी के माध्यम से सकल समाज को भगवन्मय बनाते हुये धर्म-धर्मात्मा-धरती की रक्षा करना-कराना अर्थात् धरती को असत्य-अधर्म-अन्याय-अनीति विहीन बनाते-करते हुये सत्य-धर्म-न्याय-नीति प्रधान बनाना-बनवाना । यही सदानन्द को परमप्रभु की कृपा विशेष से ही परमप्रभु के ही इस काम को करना-कराना है।

‘सदानन्द’ का काम नहीं, काम है भगवान का

युवकों आपको सदानन्द का कार्य करने के लिए पुकार नहीं हो रहा है, बल्कि परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान के कार्य के लिए ही आप का पुकार हो रहा है। आप लोग अच्छी प्रकार से सोच समझ-कर देख-जाँच-परखकर सकते हैं । यहाँ पर दुनियाँ में जब भी, जहाँ भी जो कोर्इ भी आध्यात्मिक महापुरुष या पैगम्बर, प्राफेटस् और तात्तिवक सत्पुरुष जो कोर्इ भी बना है, खुदा-गॉड-भगवान के कार्य को करके ही बना है । अपना-पराया या परिवार-संसार के कार्य करके नहीं। युवा बन्धुओं ! अपने पर सन्देह क्यों करते हैं ? जब आप अपने पर ही सन्देह करोगे कि हम फंस जायेगें, हम भटक जायेगें, तो कार्य क्या करेंगें? महापुरुष कैसे बनेंगें ? नहीं बन पायेंगे इसलिये अपने पर ही संदेह करना छोड़ कर महापुरुष-सत्पुरुष बनने के लिये आगे आएँ।

सद्भावी सत्यान्वेषी युवक बन्धुओं ! आप युवकों सर्वप्रथम अपने पर आस्था रखो । अपने पर विश्वास रखो । आप युवा हो। आप में कुछ भी कर-करा देने की क्षमता है । आप अपने युवा शरीर के क्षमता का सदुपयोग करो । आगे बढ़ो । महापुरुष बनो; सत्पुरुष बनो। आप ही पर समाज का कल्याण आधारित है। समाज का सुधार और समाज का उद्धार आप युवा बन्धुओं से ही है । मात्र शारीरिक सुख भोग व्यसन हेतु कर्मचारी-अधिकारी- नेता बनकर अपने सर्वोत्तम् मानव जीवन को व्यर्थ मत गवांओ--बर्बाद मत करो । आओ आगे बढ़ो महापुरुष बनो-सत्पुरुष बनो। समय का लाभ लो ।

सदानन्द की पुकार है, आप की सुधार है ।
आना है तो आओ बन्दों भ्रम करना बेकार है ।।

बन्धुओं ! खुदा-गॉड-भगवान के कार्य करने में घबराते क्यों हो ? भगवान का ही कार्य करके तो सब महापुरुष बने हैं, फिर आप को भी महापुरुष एवं सत्पुरुष हेतु भगवान का ही कार्य करना पडे़गा। एक बात मैं आप बन्धुओं से पूछना चाहूँगा कि आप बिना काम किए संसार में रह सकते हैं ? नहीं ! नहीं !!कदापि नहीं !!! किसी न किसी का काम, किसी न किसी की गुलामी तो आप को करनी ही पड़ेगी तो फिर भगवान का काम (सेवा-भाव) करने से घबड़ाते क्यों हो ? क्या दुनियाँ वालों से कम सुविधायें और महत्ता भगवान ही देगा ? कदापि नहीं ! दुनिया वाले क्या दे सकते हैं? कुछ नहीं ! आँख हो तो दुनियाँ के कार्यकर्ताओं को और भगवान के भजन-भक्ति-सेवा कर्ताओं को देख लो । दिल-दिमाग हो तो समझ लो । जिस भगवान को बिना जाने-देखे भी मात्र नाम जपते हैं, मात्र भजन करते है, तो उनकी भी स्थिति और सांसारिकों की भी स्थिति का, परलोक को अभी रहने दें, पहले लोक ही वाला तो तुलना कर-करा लेवें। यदि आप का परलोक पर विश्वास नहीं है तो फिर इन असत्य-सत्य, अधर्म-धर्म, अन्याय-न्याय तथा अनीति-नीति से क्या काम ? मगर जीवन को सत्यता-सम्पूर्णता-सर्वोच्चता चाहिये तब तो आपको मेरे यहाँ आना ही पड़ेगा क्योंकि पूरे पृथ्वी अथवा सारी धरती पर ही यहाँ के सिवाय यह (सत्यता सवोंच्चता और सम्पूर्णता वाला मुक्ति-अमरता) कहीं भी अन्यत्र मिलता ही नहीं है। अगर आप अपने को ऊपर ऊठाने अथवा सत्यता-सर्वोच्चता- सम्पूर्णता पाने हेतु महापुरुष-सत्पुरुष बनने हेतु आगे नहीं बढ़ोगे तब तो आप को मुझे यही कहना पड़ेगा कि खाओ-पीओ मौज मनाओ, जीते जी तू भाड़ में जाओ ।

युवा बन्धुओं ! यही सुअवसर है महापुरुष बनने का । यही सुअवसर है सत्पुरुष बनने का । दुनियादारी तो मात्र मायावी जाल है, फँसाने वाला काल है। आँख खोल कर देख लो महापुरुषों की जीवनियाँ, सत्पुरुषों की गाथाएँ और दुनियादारी की व्यथायें । सदानन्द यदि आप को भ्रमित भी करता है तो संसार से और फँसाता है तुझे, तो खुदा-गॉड-भगवान में । अरे! नादानों अब से भी तो सम्भल ! अब से भी तो चेत !! आप सृष्टि के सर्वोच्च-सर्वोत्तम् योनिवाले हो । इसलिए सर्वोच्च-सर्वोत्तम् परमात्मा-खुदा- गॉड-भगवान वाले उपलब्धि को उपलब्ध करो और ध्रुव-प्रहलाद- गरुण-नारद-हनुमान आदि आदि के तरह भक्त-सेवक और अर्जुन-विवेकानन्द आदि के तरह महापुरुष-सत्पुरुष बनों। दुनियां में अमर गाथा स्थापित करो । इसी में जीवन की सार्थकता-सफलता है ।

सदानन्द की बात नहीं, बात है भगवान की ।

आप सत्य हो तो आप अपने-अपने मूल सदग्रन्थ को हाथ में लो और आकर सदानन्द का ठीक से परीक्षण कर लो । फिर से कह रहा हूँ कि

भगवान की पुकार है, तेरा इन्तजार है।
आना हो तो आओ प्यारे, घबड़ाना बेकार है ।।

सद्भावी सत्यान्वेषी युवा बन्धुओं ! बुजदिल न बनो। कायर न बनो। मानव शरीर का सदुपयोग करो। अपने ‘हम’ जीव को जानते देखते हुए मुझसे आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा-शिव-शक्ति-हँसो-ज्योति को भी जानते-साक्षात् देखते हुए उन से अपने को जोड़कर या स्थित-स्थापित कर आध्यात्मिक महापुरुष बनो और परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान से सम्बन्धित यानी समर्पित-शरणागत हो तत्त्वज्ञानी या तात्तिवक सत्पुरुष बनो, तो तुम्हें दोनों-- लोक लाभ भी मिलेगा और परलोक लाभ भी। आप यह भूल जाइये कि सत्पुरुष बनने में सांसारिक परेशानियाँ झेलनी होंगी और मान भी लें कि परेशानियाँ ही झेलनी पड़ेंगी तो मैं डंके की चोट पर सत्यता को समक्ष रखकर कह रहा हूँ कि उतनी परेशानियाँ नहीं हैं जितनी कि विकासशील गृहस्थी में होती है । बहुत कम, बहुत कम, वह भी आप को उसका दु:ख नहीं होगा, उसका दु:ख भी उन्हीं अज्ञानियों को ही होगा जो मात्र दूर से-- बाहरी-बाहरी रूप में देखने में लगे हैं; बशर्ते कि आप निष्कपटता पूर्वक अपने को सर्वतोभावेन भगवद समर्पण-शरणागत करते और रहते हुये आगे बढ़ें तो पायेंगे कि जो दु:ख-कष्ट-परेशानियाँ दिखार्इ दे रही थीं; वही आगे चल कर आप को यश-कीर्ति दिलाने वाली गाथाएँ हो गयी हैं ।

दूसरी सबसे बड़ी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सत्पुरुष या सर्वतोभावेन भगवत शरणागतों को नाचीज परिवार प्रधान रहने के अपेक्षा सर्वशक्तिमान भगवत प्राप्त होकर सीधे भगवद प्रधान अर्थात् भगवत शरण में रहने का परम शुभ अवसर प्राप्त होता है जो मानव जीवन का चरम और परम उददेश्य है । बशर्ते कि सत्य-धर्म के संस्थापना के बेला में धर्म-संकट को समाप्त करने और सत्य धर्म संस्थापन-संरक्षण हेतु प्रारम्भ में कुछ दिन-माह-साल तक ही त्याग-परेशानी या कठिनार्इ हो सकती है । फिर भी उसमें भी आप सचमुच यदि निष्कपटता पूर्वक हैं तो निश्चित ही आप अपने को सदा ही परमशान्ति और परम आनन्द के साथ ही साथ मुक्ति और अमरता के साक्षात् बोध से युक्त बिल्कुल ही अमन-चैन से रहेंगे । परेशानी तो मात्र देखने वालों को ही होती है और होगी भी । आप तो सदा आनन्दित रहेंगे। फिर थोड़े समय तक रहने वाले धर्म-संकट के पश्चात् तो आप ध्रुव, प्रह्लाद, सुग्रीव, विभीषण, पाण्डव आदि की तरह सांसारिक राज सुख भी भोगेंगे और शरीर छोड़ने पर परम आकाश रूप परमधाम-अमरलोक में भी भगवत पार्षद बन कर परमपद मय हुये अमरत्त्व से युक्त रहेंगे। परमधाम-अमरलोक में सदा के लिए आप का निवास सुरक्षित होगा और सदा के लिए ही हो रहेगा। दुनियाँ में मन्दिरो में मूर्ति रूप स्थापित हो-हो कर पूजे जाने लागेंगे ।

मेरे प्यारे युवकों ! दुनियाँ वालों के फेर में मत पड़ो । थोड़ा भी सूझ-बूझ से काम लो। सदानन्द के निन्दा से कुछ मिलने-जुलने को नहीं है। जब मिलेगा तो सदानन्द के बात को स्वीकार-ग्रहण कर रहने-चलने पर ही मिलेगा। शारीरिक सुखभोग व्यसन वाला कर्मचारी-अधिकारी नेता नहीं अपितु महापुरुष-सत्पुरुष बनने से आप की गाथाएँ बनेगी । भोगी-व्यसनियों की तो कहानी ही नहीं बन पाती--गाथाएँ कहाँ से बनेगी ?

सद्भावी सत्यान्वेषी युवा बन्धुओं ! यह बहुत-बहुत-बहुत ही सावधानी बरतने की है कि प्राय: सब योगी-साधक अथवा आध्यात्मिक महात्मा या महापुरुष जीव को ही आत्मा और आत्मा को ही परमात्मा; जीव को ही र्इश्वर और र्इश्वर को ही परमेश्वर; जीव को ही ब्रह्रा और ब्रह्रा को ही परमब्रह्रा; जीव को ही शिव और शिव को ही भगवान; सेल्फ को ही सोल (डिवाइन लार्इट) और सोल या डिवाइन लार्इट को ही गॉड; रूह को ही नूर और नूर को ही अल्लाहतआला; ‘हम’ जीव-सूक्ष्म शरीर को ही सहज प्रकाश और सहज प्रकाश या परम प्रकाश को ही गॉड; अहम् को ही सोsहँ-हँसो और हँसो को ही परमहंस; स्वाध्याय पद्धति को ही योग या अध्यात्म की पद्धति और योग-अध्यात्म की साधना को ही तत्त्वज्ञान या भगवदज्ञान या सत्य ज्ञान; योग पद्वति या अध्यात्म पद्धति को ही विद्यातत्त्वम् पद्धति; ब्रह्रानन्द-चिदानन्द को ही परमानन्द-सच्चिदानन्द; आनन्दानुभूति मात्र को ही शान्ति और आनन्दानुभूति-रूप चिदानन्द और शान्ति और आनन्दानुभूति रूप चिदानन्द को ही परमशान्ति और परम आनन्द से युक्त मुक्ति और अमरता का बोध; अनुभूति को ही बोध; स्वरूपानन्द को ही आत्मानन्द और आत्मानन्द को ही परमानन्द-सदानन्द (शाश्वत शान्ति और शाश्वत आनन्द); स्वाध्यायी पुरुष को ही योगी-आध्यात्मिक-महात्मा और आध्यात्मिक महात्मा को ही अवतारी (परमात्मा के अवतार); महापुरुष को ही परमपुरुष या सत्पुरुष तथा स्वाध्यायी गुरु को ही योगी या आध्यात्मिक गुरु और योगी या आध्यात्मिक गुरु को ही तात्तिवक सद्गुरु आदि घोषित करते-कराते हुए अपने और अपने अनुयायियों द्वारा इसी मिथ्या एवं अधूरा और भ्रामक जानकारी का प्रचार-प्रसार करते-कराते हुए भगवान के अवतार रूप सद्गुरु बन कर पूजा-पाठ आदि करवाने लगते हैं । यह बात मात्र आज के ही योगी-साधक आध्यात्मिकों में ही नहीं अपितु प्राचीन काल से ही ऐसी ही बात रही और चली आ रही है, जब--कि यह बिल्कुल ही भ्रामक, अधूरा एवं मिथ्या है । ऐसा होना नहीं चाहिए; कदापि ऐसा नहीं होना चाहिए। जनमानस को सदुपदेश देना चाहिए । कभी भ्रामक उपदेश-मिथ्या-झूठा उपदेश देकर भरमा-भटका कर अपने मिथ्या महत्वाकांक्षा के पूर्ति हेतु जनमानस का धन-धरम दोनों का दोहन-शोषण भी करते हैं और उन्हें भगवत प्राप्ति और मुक्ति-अमरता की प्राप्ति से बंचित भी करते कराते हैं । भोले-भाले भगवद जिज्ञासु भरम भटक कर इन्हीं झूठे गुरुओं में सट-चिपकर धर्मच्युत हो रहे हैं । इन भरमे-भटके भगवत प्रेमीजनों के रक्षा आन्दोलन में आप सच्चे बन्धुओं को मेरा साथ-सहयोग नहीं देना चाहिए ? देना चाहिए । अवश्य ही देना चाहिए फिर देर क्यों ? आइए और धर्म-धर्मात्मा-धरती रक्षा कार्य रूप परमपुनीत कार्य में जुड़कर महापुरुष-सत्पुरुष बनें-बनावें ।

भोगी-व्यसनियों में देखो तो सही और वृद्धों से पूछ कर भी पता तो करो कि दादा के दादा का नाम कितने को पता है ? पता चलेगा कि लाखो-करोड़ो में शायद कोर्इ हो जिसे पता हो; तो क्या इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि पोता के पोता होने तक आप सभी का भी नामों निशान तक नहीं रह पायेगा; सब कुछ ही आजके अपनों द्वारा ही खारिज-दाखिल के रूप में मिटा दिया जायेगा । आप सवका सर्वनाश हो जाता है मगर भक्त सेवकों का भगवान नाश नहीं होने देता-अमरत्व देता है । गरुण नारद-ध्रुव- प्रहलाद-हनुमान-सेवरी-जटायू- काकभुसुण्डी-उद्धव-अर्जुन-कुब्जा-गोपियाँ- तुलसी-मीरा आदि आदि प्राय: समस्त भगवद भक्त-सेवकों-प्रेमियो सन्त- महात्माओं-मूसा-यीशु-मुहम्मद आदि-आदि प्राफेट-पैगम्बरों आदि-आदि को भी देख लो ।

इसलिए आप युवा बन्धुजन भी भोग-व्यसन वाला जीवन त्याग कर भोग-व्यसन वाले जीवन से बहुत-बहुत-बहुत ही ऊपर उठकर मुझसे मिलकर तत्त्वज्ञान के माध्यम से भगवद समर्पित-शरणागत होता हुआ संसार-शरीर- जीव-आत्मा (र्इश्वर-ब्रह्रा-ज्योतिर्मय शिव) चारों की ही पृथक-पृथक उत्पत्ति-स्थिति और लय-विलय प्रलय को साक्षात् दर्शन सहित सुनिश्चित और सुस्पष्ट यथार्थत: जानकारी प्राप्त करते हुए परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्रा- खुदा-गॉड-भगवान वेद-उपनिषद-रामायण-गीता वाले विराट पुरुष का भी बात-चीत सहित सदग्रन्थों द्वारा सत्प्रमाणित रूप में साक्षात् दर्शन प्राप्त करते हुए सारी धरती से ही असत्य-अधर्म-अन्याय-अनीति को समाप्त करते हुए उसके स्थान पर सत्य-धर्म-न्याय-नीति को पुन: स्थापित करना-कराना है। इसी को दूसरे रूप में धर्म-धर्मात्मा-धरती रक्षार्थ परमप्रभु के परमपुनीत कार्य में लग-लगा कर अपने को ध्रुव-प्रहलाद-गरुण-नारद-लक्ष्मण- हनुमान-सुग्रीव-विभीषण-उद्धव-अर्जुन-गोपियाँ-कुब्जा और भगवद भक्त-सेवक सन्त कबीर-तुलसी-नानक-मीरा आदि-आदि। महात्मागण- महावीर-बुद्ध-मूसा-दाऊद-इब्राहिम-यीशु-मुहम्मद साहाब आदि प्राफेट-पैगम्बर बनते-होते हुए भगवत कृपा से विवेकानन्द आदि-आदि जैसे ही महापुरुष-दिव्य-पुरुष और सत्पुरुष बन कर पूर्व की तरह वर्तमान में भी स्थिति-स्थापित होवें । मैं (सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस ‘सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद’, श्रीहरिद्वार आश्रम, रानीपुर मोड़ रेलवे क्रासिंग से उत्तर-हिल बार्इ पास रोड पर पास ही--हरिद्वार-उत्तरांचल फोन नं0 01334-224580) आप सभी को हर प्रकार के सहयोग के साथ ही साथ पूर्ति-कीर्ति-मुक्ति की भी पूरी-पूरी जिम्मेदारी जो ले रहा हूँ । फिर तो सोचना-समझना-विचार करने की बात ही कहाँ रह गर्इ । इसे अपनाने के लिए तुरन्त ही आगे बढ़ना चाहिए--आगे बढ़ना ही चाहिए-बिल्कुल ही तुरन्त ही आगे बढ़ना चाहिए ही । ऐसे परम लाभ देने वाले परमशुभ अवसर को जानें नहीं देना चाहिए; तुरन्त ही स्वीकार करना चाहिए मानव जीवन की सार्थकता-सफलता भी तो यही है--बिल्कुल ही यही ही है; अन्यथा सब व्यर्थ है।

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----------------सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस


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