विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
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14. अब महापुरुष-सत्पुरुष दोनों के अन्तर को जानें -समझें !

युवा बन्धुओं ! यह बात भी सत्य ही है कि आखिरकार समाज किसको आध्यात्मिक महापुरुष माने तथा किसको तात्तिवक सत्पुरुष या परमपुरुष या भगवदावतारी या सद्गुरु माने । फिलहाल समय पाकर सब हल होगा, क्योंकि आज जो कुछ भी हो रहा है, वह बिल्कुल ही नया नहीं है बल्कि जब-जब भी अवतार बेला या अवतार का समय घोषित होता है, ऐसा ही जाने-अनजाने भी अपने को अवतारी एवं भगवान घोषित कर-करा कर वास्तविक अवतार से पहले ही विशालकाय धन-जन के मालिक बन कर उन्हीं धन-वैभव या आश्रम-अटटालिकाओं तथा अनुयायियों का विशाल भरमार देखकर उसी गुमान में अवतारी (नकली एवं भ्रामक तथाकथित भगवान) बन-बन कर समाज को गुमराह करते रहे हैं, आज भी कर रहे हैं, परन्तु अब नकल और असल का पता चलने में विशेष देर नहीं लगना है।

सद्भावी सत्यान्वेषी युवा बन्धुओं ! यहाँ पर बात पुन: दुहरा देना चाहता हूँ कि आप अपने दिल-दिमाग से ही बिल्कुल निकाल कर बाहर और बहुत दूर फेंक दे कि आप आध्यात्मिक महापुरुष और तात्तिवक सत्पुरुष नहीं बन सकते है तथा अपने दिल व दिमाग में निश्चितता पूर्वक यह स्थापित करें कि आप आसानी से यानी सुगमतापूर्वक आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा-शिव-शक्ति-हँस के सम्पर्क से आध्यात्मिक महापुरुष और परमात्मा-परमेश्वर परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप खुदा-गॉड-भगवान के सम्बन्ध से सत्पुरुष बन या हो सकते है; मात्र श्रद्धा-विश्वास एवं निष्ठापूर्वक निष्कपटता के साथ आत्मा-र्इश्वर तथा परमात्मा-परमेश्वर के प्रति अनन्य भाव से समर्पित और शरणागत होकर ही आगे बढ़े । आप बहुत्त्व या मिथ्यात्त्व के चक्कर में न पड़े। आप को अपने जीवन यापन या विकास के लिए जितने श्रम-एवं साधन को लगाने-जुटाने की आवश्यकता पड़ती है, बिल्कुल ही उसके समक्ष श्रम एवं साधना तथा श्रद्धा-विश्वास-निष्ठा के साथ निष्कपटता पूर्वक समर्पण भाव में ही आप अपने लक्ष्य को हासिल कर-करा सकते हैं । यह सोचना और कहना सरासर गलत बात है कि आप महापुरुष तथा सत्पुरुष नहीं बन सकते हैं।

हम तो यही कहेंगे कि आज दुनियाँ में थोड़ा सा पैसा या छोटे से पद के लिए नेता-अधिकारियों की जितनी झूठी चापलूसी एवं जी हुजुरी करनी पड़ रही है, तथा नेता जी व अधिकारी जी के आदेश-निर्देशानुसार जितना चापलूसी और कुकर्म करना पड़ता है, र्इश्वर तथा उस परमात्मा या परमेश्वर या परमब्रह्रा के शरण में बिल्कुल ही उसमें से किसी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, न तो चाटुकारिता की और न तो दुष्कर्म की । दोनों में से किसी की भी नहीं । बल्कि उसके स्थान पर समाज में सर्वत्र आदर-सम्मान-प्रतिष्ठा को प्राप्त कराने वाले मात्र-सदभाव, सद्विचार, सदव्यवहार एवं सतकार्य की ही आवश्यकता होती है तथा परमात्मा के साथ नित्य-प्रति अपने प्रेम को बढ़ाते हुए एकमात्र परमात्मा-खुदा-गॉड-भगवान का ही होकर रहा-चला जाय, तो हमारा सत्य एवं दृढ कथन है कि आप को महापुरुष और सत्पुरुष ही बनने चाहिए जिससे लोक-लाभ परलोक-निबाहू दोनों ही प्राप्त होता-रहता है।

यदि आप सच्चे हिन्दू हों, तो वेद-उपनिषद-रामायण-गीता-पुराण हाथ में लें; यदि आप सच्चे जैनी हैं तो अरिहन्त एवं निर्वाण सिद्धान्त देखें; यदि आप सच्चे बौद्ध हैं, तो बुद्ध दर्शन हाथ में लें; यदि आप इसार्इ है तो बाइबिल को हाथ में लें; आप यदि सच्चे मुसलमान हैं, तो कुर्आन शरीफ को हाथ में लें; यदि आप सच्चे सिक्ख हैं तो गुरुग्रन्थ साहब को हाथ में लें और आप लोग सदानन्द का अपने-अपने सद्ग्रन्थों के साथ शान्तिमय ढंग से जानते-जनाते हुए परीक्षण करें तो असलियत का पता चलेगा कि यह सदानन्द सबका है और सबके लिए तो है ही । सभी का ही सहायक और पूरक भी है, विरोधी और शोषक किसी का भी नहीं। यही सभी का ही परम हितेच्छु भी है ।

‘सदानन्द’ किसी का भी निन्दक-आलोचक नहीं है । पूरे भूमण्डल पर किसी का भी निन्दक-आलोचक नहीं है बल्कि ‘सत्य-धर्म’ का संस्थापक और सभी धर्मोपदेशकों का भी पोषक-सहायक और संरक्षक है। इसमें कोर्इ ‘सदानन्द’ की अहंकारिक बात नहीं है, अपितु भगवत कृपा और तत्त्वज्ञान का प्रभाव ही ऐसा है कि वास्तविक सच्चार्इ को सबके समक्ष कहना-लिखना पड़ रहा है । इसमें जिस किसी को भी अहंकार महसूस हो रहा हो, हमारे यहाँ तो सद्ग्रन्थीय आधार पर किसी के लिये भी जाँच-परख की खुली छूट है, मगर मनमाना नहीं, सद्ग्रन्थीय आधार पर आवश्यकता पड़ने पर प्रायौगिक आधार पर भी मगर भगवद समर्पण-शरणागत के शर्त पर ही।

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14.1 गायत्री वालों से मुझे कहना है कि . . . .

गायत्री छन्द मात्र में उदधृत होने के नाते ॐ-देव मन्त्र (ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।) के अभीष्ट ॐ-देव को समाप्त कर उनके स्थान पर झूठी व काल्पनिक तथाकथित गायत्री देवी को स्थापित कर प्रचारित करना-कराना क्या देव विस्थापन देव द्रोहिता नहीं हैं ? क्या देव द्रोहिता ही असुरता नहीं होती है ? क्या यह मन्त्र देवी (स्त्रीलिंग) प्रधान है या देवस्य (पुलिंग) प्रधान ? जब यह मन्त्र ॐ-देव (पुलिंग) प्रधान है तब यह देवी (स्त्रीलिंग) कहाँ से आ गयी ? क्या प्यार पाने के लिये पिता जी को माता जी कहकर बुलाया जाय और उनके फोटो-चित्र को स्त्री रूपा बना दिया जाय ? यही आप सबकी मान्यता है? यही देव संस्कृति संस्थापन कहलायेगा ? जिसमें मन्त्र के अभिष्ट ॐ-देव को ही समाप्त करके उसके जगह पर झूठी व काल्पनिक तथाकथित गायत्री देवी को स्थापित कर दिया जाय ? क्या यह देव द्रोहिता नहीं है ? नि:संदेह यही देव द्रोहिता और यही असुरता भी है! क्या कोर्इ भी मेरे इन बातों को गलत प्रमाणित करेगा ?

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14.2 सोsहँ और सोsहँ वाले

सोsहँ की साधना करने वालों को बतला दूँ कि सोsहँ-परमात्मा तो है ही नहीं, विशुद्धत: आत्मा भी नहीं है । यहाँ तक कि यह कोर्इ योग की क्रिया भी नहीं है, बल्कि सोsहँ तो श्वाँस और नि:श्वाँस के मध्य सहज भाव से होते-रहने वाला आत्मा का जीवमय पतनोन्मुखी सहज स्थिति है, जो बिना कुछ किए ही होते रहता है। यह आत्मा (ज्योतिर्मय स:) का जीव (सूक्ष्म शरीर अहम् मय) बिना किए ही अनजान जीवित प्राणियों में जीवनपर्यन्त सहज ही होते रहने वाली स्थिति मात्र ही है--योग की क्रिया भी नहीं है क्योंकि क्रिया तो वह है जो करने से हो । जो बिना किए ही सहज ही होती रहती हो, उसे क्रिया कैसे कहा जा सकता है ? और सोsहँ का श्वाँस-नि:श्वाँस के मध्य होते रहने वाली आत्मा की जीवमय तत्पश्चात् इन्द्रियाँ (शरीरमय) होता हुआ परिवार संसारमय होते हुए पतनोन्मुखी यानी विनाश को जाते रहने वाली एक सहज स्थिति है । योग भी नहीं है तो उसे ही तत्त्वज्ञान कह देना-मान लेना तो अज्ञानता के अन्तर्गत घोर मिथ्याज्ञानाभिमान ही हो सकता है, ‘तत्त्वज्ञान’ की बात ही कहाँ ?

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14.3 जब सब ही भगवान के अवतार हैं तो सदगुरु कैसा ?

सोsहँ वाले बन्धुजनों से एक बात पूछनी है कि क्या ऐसा कोर्इ भी जीवित शरीर है, जो सोsहँ की न हो ? और जब सोsहँ ही खुदा-गॉड-भगवान है, तब तो सब के सब मनुष्य ही भगवान के अवतार हैं, फिर तथाकथित गुरु जी-सदगुरुजी ही क्यों ? भगवान भी अज्ञानी जिज्ञासुओं वाला और ज्ञानी गुरुजी-तथाकथित सद्गुरुजी वाला दो प्रकार का होता है क्या ? एक भगवान जी अज्ञानी और दूसरा भगवान जी ज्ञानी ? यह कितनी मूढ़ता और मिथ्याहंकारिता है ? घोर ! घोर !! घोर !!!मूढ़ता मिथ्याहंकारिता है ।

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14.4 जब पूर्व में ‘एक’ ही एक तो अब सब ही

पूरे सत्ययुग में एकमेव एकमात्र एक ही श्रीविष्णु जी ही, पूरे भू-मण्डल पर ही एकमात्र केवल एक ही भगवान के अवतार थे, ठीक वैसे ही त्रेतायुग में पूरे भू-मण्डल परही एकमात्र एक ही श्रीराम जी और पूरे द्वापर युग में पूरे भू-मण्डल पर ही एकमात्र एक श्रीकृष्ण जी ही केवल भगवान के अवतार थे और आजकल-वर्तमान में सब मनुष्य ही सोsहँ वाली शरीर होने के कारण भगवान के अवतार हो गये ? कितनी हास्यास्पद बात है ! यह तो घोर अज्ञानता और मूढ़ता बात है ।

सत्ययुग-त्रेता-द्वापरयुग में ऋर्षि-महर्षि, ब्रह्रार्षि आदि और नारद-व्यास-शंकर जी आदि देववर्ग भी जो पतनोन्मुखी सोsहँ नहीं, बल्कि उर्ध्वमुखी हँसो वाले भी थे, वे जब भगवान के अवतार मान्य व घोषित नहीं हुए। तो आज-कल पतनोन्मुखी और विनाश को जाने वाले सोsहँ वाले भगवान के अवतार हो जायेंगे ? यदि कोर्इ भी गुरु जी एवं तथाकथित सदगुरु जी गण सोsहँ मात्र के आधार पर ही भगवान के अवतार मान व घोषित कर-हो रहे हों, तो थोड़ा भी तो सोचें कि क्या यह घोर मिथ्या और हास्यास्पद नहीं है ? बिल्कुल ही मिथ्या और हास्यास्पद ही है । सोsहँ वाले चेला जी भी भगवान और सोsहँ वाले गुरु जी भी भगवान जी ! अरे मूढ़ थोड़ा चेत! थोड़ी भी तो चेत कि यह कितनी बड़ी मूर्खता है !!

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14.5 जीव और आत्मा (र्इश्वर) का अवतार नहीं होता!

यहाँ पर मुख्य बात तो यह है कि अवतार --जीव (रूह-सेल्फ-स्व-अहम) और आत्मा (र्इश्वर-ब्रह्रा-नूर-सोल-सिपरिट-डिवाइन लाइट-दिव्य ज्योति-ज्योतिर्विन्दु रूप शिव) का नहीं होता है। संसार में सारे गृहस्थ शरीर स्तर के; सारे के सारे स्वाध्यायी जीव (रूह-सेल्फ-स्व-अहम्) यानी अहम ब्रह्रास्मि स्तर के; सारे के सारे योगी-साधक-आध्यात्मिक-अध्यात्मवेत्ता सन्त-महात्मागण आत्मा (र्इश्वर-ब्रह्रा-नूर-सोल-सिपरिट-डिवाइन लाइट-दिव्य-ज्योति-ज्योति विन्दु रूप शिव) यानी पतनोन्मुखी सो•हँ और ऊध्र्वमुखी ह ँसो स्तर के; और तत्त्वज्ञानदाता-तात्तिवक-तत्त्ववेत्ता परमतत्त्वमरूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्रा- खुदा-गॉड-भगवान स्तर के होते हैं । इन चारों स्तरों में क्रमश: पहले तीन (शरीर एवं जीव(अहम ब्रह्रास्मि) और आत्मा-र्इश्वर-शिव) सोsहँ और हँसो स्तर वालों का अवतार नहीं होता है । एकमात्र केवल एक चौथे स्तर (परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप अलम रूप गॉड रूप खुदा-गॉड-भगवान का ही अवतार होता है । यह अवतार ही सदगुरु भी होता है । यह ही सत्य मात्र ही नहीं अपितु परमसत्य भी है।

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14.6 सोsहँ वाले साधक भी नहीं, तो ज्ञानी कैसे

संसार में तत्त्वज्ञान एवं योग-अध्यात्म रहित जितने भी गैर साधक के शरीर हैं और जीवित हैं वे सबके सब सोsहँ की ही शरीर तो हैं। सोsहँ व शरीर वाले गैर साधक होते हैं --साधक भी नहीं । तो जो साधक ही नहीं है वह तो योगी-आध्यात्मिक भी नहीं तो तत्त्वज्ञानी होने की बात ही कहाँ ? अत: सोsहँ आत्मा का जीवमय पतनोन्मुखी जीव को विनाश को ले जाने श्वाँस-नि:श्वाँस के बीच होते रहने वाली योग (अध्यात्म) विहीन गैर साधक की यथार्थत: सहज स्थिति है। सोsहँ आत्मा भी नहीं है तो परमात्मा होने की बात ही कहाँ ? पूर्णावतार तो एकमात्र एकमेव ‘एक’ परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्द रूप भगवत्तत्त्वम् रूप अलम् रूप शब्द (बचन) रूप गॉड रूप परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान का ही होता है, अन्य किसी का भी नहीं। सोsहँ वालों ! थोड़ा भी तो अपने जीवन के मोल को समझो अन्यथा सोsहँमय बना रहकर पतन होता हुआ विनाश को प्राप्त हो जाओगे। नहीं सम्भलोगे तो विनाश ही होगा।

आप मनमाना जबर्दस्ती जिदद-हठ वश सोsहँ को ही भगवान और सोsहँ वाले झूठे और पतन-विनाश को ले जाने वाले गुरु को ही पूर्णावतार मान लोगे तो इससे आप अपने को ही धोखा दोगे । आप ही परमतत्त्वम् रूप परमसत्य से बंचित रहेंगे। हम लोग तो परम हितेच्छु भाव में आप सबको बतला दे रहे हैं-- समझना-अपनाना-जीवन को सार्थक-सफल तो आप को बनाना-न-बनाना है । आप चेतें-सम्भलें और सत्य अपना लें । यह सुझाव नि:सन्देह आप के परम कल्याण हेतु है। कहता हूँ मान लें । सत्यता को जान लें । मुकित-अमरता देने वाले परमप्रभु को पहचान लें ।।

14.7 सोsहँ तो मात्र अहंकार बढ़ाने वाला

आप सोsहँ वाले बन्धुओं से एक बात पूछूँ कि क्या सोsहँ-अहंकार को बढ़ाने और आत्मा-र्इश्वर-शिव की जीवमय तत्पश्चात् शरीरमय होता हुआ परिवारमय संसार में रहते हुए पतन और विनाशको ले जाने वाली सहज स्थिति मात्र ही नहीं है ? और है तो अपने लिये ऐसा क्यों करते हैं ? आप स्वयं देखें कि स: रूप आत्म शक्ति जब अहं रूप जीव को मिलेगी तो बढे़गा ‘अहंकार’ ही तो। यह प्रश्न आप सब अपने आप से क्यों नहीं करते? आप में यदि अहंकार और मिथ्याभिमान नहीं बढ़ा है तो आप सभी के सोsहँ और तथाकथित सोsहँ क्रिया को बार-बार ही अहंकार को बढ़ाने और पतन-विनाश को ले जाने वाला चुनौती के साथ समर्पण-शरणागत करने-होने के शर्त पर कहा जा रहा है तो मेरे इस कथन-चुनौती भरे कथन को गलत प्रमाणित करने को तैयार होते हुए मेरे समक्ष उपस्थित होकर जाँच-परख ही क्यों नहीं कर-करवा लेते ? सच्चार्इ का -- वास्तविकता का सही-सही पता चल जाता कि सोsहँ क्या है ? सोsहँ जीव है कि आत्मा है कि परमात्मा है ?

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14.8 सोsहँ जीव एवं आत्मा और परमात्मा तीनों में से कौन ?

सोsहँ वाले गुरुओं को तो यह भी पता नहीं है कि सोsहँ का ‘सो’ कहाँ से आकर श्वाँस के माध्यम से प्रवेश करता है और ‘हँ’ नि:श्वाँस के माध्यम से कहाँ को जाता है। यह भी बिल्कुल ही सच है कि उन्हें यह भी मालूम नहीं है कि सोsहँ दो का संयुक्त नाम है या एक ही का या तीन का नाम है? यदि वे दो कहते हैं तो फिर सोsहँ माने आत्मा कैसा जबकि आत्मा तो एक ही है । यदि एक ही आत्मा का नाम मानते हैं, तो जीव और परमात्मा का नाम क्या है ? सोsहँ ही परमात्मा है तो जीव और आत्मा का नाम क्या है ? धरती का कोर्इ भी आध्यात्मिक गुरु यह रहस्य नहीं जानता कि वास्वत में इसकी वास्तविकता क्या है

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14.9 अन्तत: आप की चाहत क्या है?

अन्तत: अब निर्णय आप पर है कि आप सोsहँ साधना से अपने अहंकार को बलवान बनाते हुए पतन को जाते हुए विनाश को जाना चाहते हैं, अथवा मुझ (सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस) से तत्त्वज्ञान रूप भगवदज्ञान प्राप्त करके भगवद भक्ति-सेवा में रहते-चलते हुये पूर्ति-कीर्ति-मुक्ति तीनों को अथवा सर्वोच्चता-यश-कीर्ति और पूर्ति सहित मोक्ष पाना चाहते हैं । दोनों में से जो भावे आप वही अपनावें । जैसी चाह वैसी राह । सब भगवत कृपा

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14.10 वर्तमान में पूरे भू-मण्डल पर ही असल तत्त्वज्ञानदाता कौन ?

यहाँ एक बात मैं अवश्य कह देना चाहता हूँ कि यह तत्त्वज्ञान जिससे ‘सम्पूर्ण’ ही सम्पूर्णतया उपलब्ध हो सके, वर्तमान में पूरे धरती पर ही अन्य किसी के भी पास नहीं है! यदि कोर्इ कहता है कि मेरे पास ऐसा ‘तत्त्वज्ञान’ है, तो जनमानस के परम कल्याण को देखते हुए मुझे यह कहना पडे़गा कि वह सरासर झूठ बोलता है । समाज को धोखा देता है। अब यदि कोर्इ मेरे इस बात को निन्दा करना, शिकायत करना, नीचा दिखाना या अहंकारी होना कहे, तो जनकल्याणार्थ मुझे आपसे यह पूछना पडे़गा कि आप ही बतावें कि सच्चार्इ यदि ऐसी ही हो तो मैं कहूँ क्या ? क्या समाज को धोखा में पडे़ ही रहने दूँ ? समाज को सच्चार्इ से अवगत न कराऊँ ? नहीं! ऐसा नहीं हो सकता । ऐसा कदापि नहीं हो सकता आप मिलकर तो देखें ।

पुन: कह रहा हूँ कि यह ‘तत्त्वज्ञान’ अन्य किसी के भी पास नहीं है ! यदि कोर्इ कहता है कि मेरे पास है तो उसकी इस घेाषणा को सप्रमाण प्रायौगिक (प्रैक्टिकली रूप से) भी गलत प्रमाणित करने के लिये तैयार भी तो हूँ और इस बात का बचन भी तो देता हूँ कि मैं अपने उपर्युक्त कथन को गलत प्रमाणित करने वाले के प्रति समर्पित-शरणागत हो जाऊँगा । मगर सही होने पर उसे भी समर्पित-शरणागत करना-होना होगा ।

अन्तत: कह दूँ कि वास्तव में मैं किसी का भी आलोचक या निन्दक या विरोधी नहीं हूँ, अपितु सभी का ही सहायक और सहयोगी हूँ । शान्तिमय ढंग से मिल बैठ कर सप्रमाण वार्ता कर जाँच कर लें­ । मगर हाँ, सत्य बोलना मेरा सहज स्वभाव और कर्तव्य भी है, जो हमेशा करता रहूँगा । चाहे किसी को बुरा लगे या भला । जीवन को सार्थक-सफल बनावें ! भगवत कृपा रूप भगवद ज्ञान (तत्त्वज्ञान) को अपनावें ! मिथ्या-महत्त्वाकाँक्षी गुरुओं के पीछे नहीं, बल्कि भगवान को पहले अपने आप ‘हम’ जीव और आत्मा-र्इश्वर-शिव को भी पृथक-पृथक तीनों को ही जानें-देखें तत्पश्चात् भगवान को भी साक्षात् बात-चीत करते-पहचानते हुए जानें-देखें और भगवान के प्रति ही समर्पित-शरणागत होवें-रहें। इसी में जीवन का सार्थक-सफल होना है, अन्यथा नहीं । समय रहते समझें-बूझें-चेतें ! कहता हूँ मान लें, सत्यता को जान लें । मुक्ति-अमरता देने वाले परमप्रभु को पहचान लें ।। जिदद-हठ से मुक्ति नहीं, मुक्ति मिलती ‘ज्ञान’ से । मिथ्या गुरु छोड़ो भइया, सम्बन्ध जोड़ो भगवान से ।।

वास्तविकता तो यह है कि मेरे पास एक ऐसा ‘ज्ञान’ (तत्त्वज्ञान) है जो परमसत्य है और जिसमें किसी की भी निन्दा-शिकायत नहीं, अपितु सभी की ही यथार्थ स्थिति का खुलासा है। मैं यह बार-बार ही कह रहा हूँ कि पूरे भू-मण्डल पर ही मेरा किसी से भी कोर्इ विरोध है तो मात्र असत्य- अधर्म, अन्याय और अनीति से है । आश्चर्य है कि सभी का ही सहयोगी रहने पर भी कहा जा रहा हूँ विरोधी । जो खुलासा है, उसे गलत क्यों नहीं प्रमाणित किया जा रहा है ? मेरे द्वारा देय तत्त्वज्ञान को गलत प्रमाणित क्यों नहीं कर दिया जा रहा हैं ? कर दिया जाता तो मैं भी अपने को ही गलत मान लेता। किन्तु यह सत्य ही, परम सत्य ही है तो कोर्इ गलत प्रमाणित कैसे कर सकता है ? नहीं कर सकता ।

ऐसे गुरुजन-सदगुरुजन और तथाकथित भगवान जी लोगों को कैसे समझाया जाय कि हम सभी को र्इमान और सच्चार्इ से एक बार आत्म निरीक्षण की आवश्यकता है क्योंकि आप-हम कोर्इ भी माने या न माने, खुदा-गॉड-भगवान का पूर्णावतार इस धराधाम पर हो चुका है और वह पूरे भू-मण्डल से ही, चाहे जैसे भी हो--असत्य-अधर्म को मिटाकर सत्य-धर्म स्थापित करेगा ही । करने में लग गया है । आवश्यकता है-- सबके लिये ही महती आवश्यकता है । उन्हें जान-देख-परख-पहचान कर धन- जन-आश्रम मान-सम्मान के अहंकार-अभिमान को छोड़-त्याग करते हुए ऊपर उठकर कर उन्हीं, एकमात्र उन्हीं एकमात्र परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान के शरणागत हो-रह कर चलनें की । इसी में ही सभी का ही कल्याण है । जाँच परख हेतु आगे तो बढें। सब भगवत कृपा ।

सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस
श्रीहरि द्वार आश्रम, रानीपुर मोड़, रेलवे क्रासिंग से
उत्तर समीप ही, हिल बार्इ पास रोड, हरिद्वार
पिन-249401 (भारत) दूरभाष : 01334-224580

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----------------सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस


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