विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
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15 . आध्यात्मिक महात्मनों से आग्रह

बहुतायत धन-वैभव, बहु संख्यक शिष्य-अनुयायी आश्रम भवन अटालिकाएं और व्यापक प्रचार-प्रसार न तो कभी अवतारी की पहचान रहा है और न तो वर्तमान में ही हो सकता है । भगवदावतार की एकमात्र पहचान परम सत्यता-सर्वोच्चता सम्पूर्णता वाला तत्त्वज्ञान ही रहा है और आज भी है ।

आप समस्त वर्ग-सम्प्रदाय-पन्थ-ग्रन्थ के समस्त गुरुजन-सदगुरुजन व तथाकथित भगवानों और अनुयायी-शिष्यगण से मुझ सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस का स्पष्टत: आग्रह है कि आप अपने लौकिक मान-सम्मान एवं भौतिक विस्तार-फैलाव से ऊपर उठकर वैचारिक, आध्यात्मिक तात्तिवक स्तर पर अपने ऊँचाइयों और उपलब्धियों का आकलन करें । महात्मा-धर्मात्मा एवं भगवदावतारी की दृष्टि स्थूल अथवा भौतिक मात्र ही नहीं होनी चाहिए जैसे कि हमारे अनुयायी जनों की संख्या बहुत अधिक है अथवा हमारी संस्था बहुत बड़े विस्तार को प्राप्त हो चुकी है अथवा बहुत बड़े सम्मान-प्रतिष्ठा को प्राप्त हो चुकी है, इसलिये हम ‘सत्य’ हैं -- यह को ‘सत्य’ की आकलन-पद्धति नहीं है । ‘सत्य’ तो सदा-सर्वदा एक ही रहा है, एक ही है और एक ही रहेगा । हम सभी को अपने मूलभूत सिद्धान्तों को देखना चाहिए और सदग्रन्थीय प्रमाणिकता के आधार पर अपने ऊँचार्इ, महत्ता एवं उपलब्धियों का आकलन करना चाहिए, क्योंकि शरीर व संस्था का तथा इनका भैतिक विस्तार और लौकिक मान-सम्मान की उपलब्धि कभी भी कसौटी नहीं रही है । धर्म की वास्तविक कसौटी अथवा ‘सत्य’ की वास्तविक पद्धति जीव-रूह-सेल्फ एवं आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा-नूर-सोल-सिपरिट ज्योतिर्मय शिव और परमात्मा-परमेश्वर- परमब्रह्रा-खुदा-गॉड-भगवान (अहं-ॐ के पितामह और सोsहँ का पिता रूप परमतत्त्वम्)-- तीनों का ही क्रमश: स्वाध्याय (Self Realization) एवं योग-अध्यात्म (Spiritualization) और तत्त्वज्ञान (True Supreme and Prefect KNOWLEDGE) के आधार पर होना चाहिए जिसमें तीनों का ही पृथक-पृथक बात-चीत सहित स्पष्टत: दिखलार्इ दे कि ‘हम’ जीव-रूह-सेल्फ है कि ‘हम’ आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा-नूर-सोल-स्पिरिट ज्योतिर्मय शिव है या कि ‘हम’ परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्रा-खुदा-गॉड- भगवान है? यानी इन तीनों में से वास्तव में असल ‘हम’ कौन है ? ऐसे ‘ज्ञान-तत्त्वज्ञान’ वाला ही वास्तव में सत्य होगा और उपर्युक्त सम्पूर्ण की प्राप्ति ही वास्तव में ‘सत्य’ की वास्तविक आकलन पद्धति है । ‘ज्ञान’ ही गुरु-सदगुरु की पहचान पद्धति होता है ।

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सच्चे भगवदवतारी की पहचान ‘तत्त्वज्ञान’ से

आप सभी को ही एक बात कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रारम्भ में जब धर्म को स्वीकार करने चले थे या चलने लगे थे तब हम लोगों का लक्ष्य धन-जन एकत्रित करने के लिये, बढि़या से बढि़या आश्रम बनवाने के लिये अथवा खूब प्रचारित-प्रसारित होने और काफी मान-सम्मान आदि-आदि पाने के लिये हम सभी गुरुजन-सदगुरुजन, तथाकथित भगवानजी लोग और अनुयायी-शिष्यगण (धर्म-प्रेमी-धर्मात्मागण) नहीं आये थे। आप सभी ‘ज्ञान-तत्त्वज्ञान’ पाने के लिये -- आप अपने निज रूप यानी ‘हम’ जीव- रूह-सेल्फ को जानने-देखने और पहचानने तत्पश्चात् आत्मा-नूर- सोल-ज्योतिर्मय शिव को अलग-अलग जानते-देखते हुये परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान का भी बात-चीत सहित साक्षात्-दर्शन पाने के लिये, साथ ही साथ मुक्ति और अमरता का साक्षात् बोध पाने के लिये ही ‘धर्म’ को स्वीकार किये थे ! क्या यह ‘सच’ ही नहीं है? फिर आज धन-जन-आश्रम-मान- सम्मान आदि-आदि झूठे मायावी चकाचौंध के पीछे अपने ‘मूल’ उददेश्य से क्यों भटक गये ?

आप सबके पास कितना धन हो गया है जो अपने मूल उदेदश्य भगवत प्राप्ति व मुक्ति-अमरता के साक्षात् बोध से ही भटक गये? क्या कुबेर से भी अधिक धन हो गया है ? नहीं ! कदापि नहीं !!

कितना जन (अनुयायी शिष्यजन) आप बना लिये हैं ? क्या 33 करोड़ वाले देवराज इन्द्र से भी अधिक है ? नहीं ! कदापि नहीं !! आप कितनी क्षमता-सिद्धि हासिल कर लिये ? क्या सभी के ही मृत्यु रूप यमराज और सृष्टि के संहारक शंकरजी से भी अधिक ? नहीं ! कदापि नहीं !!

कितने आश्रमों की रचना (निर्माण) कर-करा लिये हैं ? क्या सृष्टि के रचयिता विश्वकर्मा और ब्रह्रा जी से भी अधिक ? नहीं ! कदापि नहीं !!

कुल कितने अनुयायी-शिष्य आपके पीछे-पीछे रहते-चलते हैं ? क्या दस हजार अनुगामी के साथ चलने वाले दुर्वासा से भी अधिक ? नहीं ! कदापि नहीं !!

जब तैंतीस करोड़ देवताओं का राजा इन्द्र जी भी भगवान नहीं हैं ;--जब सभी को मौत (मृत्यु) देने वाला यमराज जी भी भगवान नहीं है; --उमा-रमा-ब्रह्रानी जी भी जब भगवान नहीं है; सभी सिद्धियों के अधिष्ठाता सृष्टि संहारक शंकर जी भी भगवान नहीं है तो एक बार आप अपने को तो देखिये ! धन(कुबेर)-जन(इन्द्र)- आश्रम(ब्रह्रा) मान-सम्मान (महादेव-महेश) भी भगवान या भगवदावतारी नहीं हैं तो आप कौन और कितने में हैं ? देखिये तो सही ! झूठी मान्यता कब तक ठहर पायेगी ?

जब ये उपर्युक्त कुबेर-इन्द्र-यमराज-शंकर जी-विश्वकर्मा-ब्रह्रा जी-दुर्वासा आदि-आदि भगवान- भगवदावतार नहीं बने, अपने को ऐसा घोषित नहीं किये-कराये तो आप लोग ऐसा क्यों बनने-करने में लगे हैं ? अपने को ही क्यों घोषित करने-करवाने में लगे हैं ? क्या ये लोग ॐ वाले नहीं थे ? सोsहँ-हँसो वाले नहीं थे ? क्या ये सिद्ध-शक्ति-सत्ता-सामर्थ्य-योग- साधना-अध्यात्म वाले नहीं थे ? क्या ये तथाकथित गायत्री-क्षमता वाले नहीं थे ? क्या ये ज्योति बिन्दु रूप शिव वाले नहीं थे ? एक बार थोड़ा अहंकार-अभिमान से अलग-ऊपर-परे होकर तो अपने को देखने का प्रयास कीजिये, समझ में आने लगेगा । ¬-सोsहँ- हँसो-ज्योति विन्दु रूप शिव न कभी भगवान था, न है और न होगा। ॐ का पितामह और सोsहँ-हँसो का पिता सम्पूर्ण शक्तियों सहित आत्मा-र्इश्वर-नूर-सोल-दिव्य ज्योति-ज्योति बिन्दु रूप शिव का भी पिता व सम्पूर्ण सृष्टि का उत्पत्ति-स्थिति-संहार कर्ता रूप परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप अलम्-गॉड रूप परमेश्वर ही खुदा-गॉड-भगवान था, है और रहेगा भी । उन्हें स्वीकार कर लेने में ही सभी का कल्याण है । परम कल्याण है ।

भगवान और भगवदावतार बनने-बनाने का पद नहीं होता । भगवदावतार ब्रह्राण्ड का एक अकेला व शाश्वत पद है जिसके सम्बन्ध में सदग्रन्थों में सुनिश्चित और सुस्पष्ट विधान है। इस सर्वोच्च, सर्वोत्कृष्ठ एवं सर्वोत्तम् पद के मर्यादा को अपने-अपने क्षमता शक्ति भर स्थित रखना और उत्तरोत्तर इनको प्रचारित करना-कराना हमारी-आपकी मुख्य भूमिका होनी चाहिए। ‘आप-हम’ सभी को इस सर्वोच्च मर्यादित पद को तुच्छ निहित स्वार्थों एवं मिथ्या महत्त्वाकाँक्षा हेतु अमर्यादित नहीं करने-होने देना चाहिए । सत्य प्रधान ही होना-रहना-चलना ही परमलाभ प्रद होता है। इसी में ही सबकी भलार्इ है । एक बनें। नेक बनें ।

र्इमान-सच्चार्इ-संयम सेवा । यही है सबसे सुन्दर मेवा ।।
अपनाना हो तो अपना लो भार्इ । भगवन रहेंगे सदा सहार्इ।।
नही समझोगे, नहीं सम्भलोगे । जग में होगी तेरी हँसार्इ ।।

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----------------सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस


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