विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
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2. विद्यार्थियों से

सद्भावी सत्यान्वेषी विद्यार्थीगण बन्धुओं ! विद्यार्थी बन्धुओं से मैं निवेदन पूर्वक यही कहूँगा कि यह समय आप लोगों का विद्या ग्रहण करने का है । विद्यार्थी- जीवन जीवन का सुनहरा समय होता है -- ऐसा कहा जाता है । बन्धुओं यह कहावत क्यों कही गर्इ ? इसका कारण यह है कि यही आत्मोत्कर्ष अर्थात् समाज में अपने को ऊँचा उठाने और मंज़िल को पाने का समय है । यही समय अपने जीवन के पतन या उत्थान में से किसी एक को चुनने का होता है । यही समय शिष्ट, संयमी, अनुशासित एवं सुदृढ़ समाज को बर्बाद करने या उसे आबाद करने में से किसी एक को चुनने का। अर्थात् चाहें तो आप अपने जीवन को अशिष्ट, असंयमी, दुराचारी और अनुशासन हीन बनाते हुये, सामाजिक विघटन एवं सामाजिक विनाश में सहयोग कर सकते हैं अथवा अपने जीवन को शिष्ट, संयमी, सदाचारी और अनुशासित बनाते हुये सुदृढ़ समाज के रचना करने में सहयोग दे सकते हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुये ही विद्यार्थियों (बालकों) को समाज का भावी कर्णधार कहा गया है । यही समय है आपको अपने को समाज का कर्णधार बनाने का। इसीलिये इसे जीवन का सुनहरा समय कहा गया है ।

सद्भावी विद्यार्थी बन्धुओं ! जीवन को सार्थक एवं सफल बनाने हेतु ‘विद्यातत्त्वम्’ पद्धति एक सर्वोत्तम पद्धति है, जिसके वगैर मानव मानवीय जीवन को जान-समझ ही नहीं सकता है और जीवन की जानकारी और समझदारी ही जब नहीं होगी-रहेगी तो फिर जीवन का आनन्द ही क्या अनुभूत होगा ? और जब जीवन के सच्चे आनन्द की अनुभूति और मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध ही नहीं प्राप्त होगा तो फिर जीवन की सार्थकता और सफलता क्या रही ? और जब जीवन का आनन्द, सार्थकता और सफलता ही न रही तब फिर मानवीय जीवन की उपलब्धि ही क्या रही ? अर्थात कुछ नहीं । तब तो इससे बेहतर पशु जीवन ही माना जायेगा; क्योंकि पशु तो पशु ही होता है, परन्तु मानव जब पशुवत होगा तो इसकी और ही निम्नतर स्थिति होगी क्योंकि सृष्टि के अन्त में सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वोच्च मान्यता वाली शरीर जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ होती है, जैसा कि शास्त्रों में महापुरुषों और अवतारियों द्वारा भी कहा गया है, को पाने पर भी यानी पाकर भी आहार, निद्रा, भय एवं मैथुन में ही गवाँ दिया जाय तो यह वैसा ही है कि एक कंगाल (भिखारी) को कोर्इ अमूल्य रतन पारसमणि या चिन्तामणि जैसी कोर्इ रतन मिले और वह नाजानकारी एवं नासमझदारी वश मिटटी-पत्थर समझ कर फेंक दिया हो । ठीक वैसे ही आप अपने देव दुर्लभ मानव जीवन को मोक्ष रहित रखकर बर्बाद कर दे रहे हैं। चेतिए ! सम्भलिए ! अपनाइए ! अपने मानवीय जीवन को सफल-सार्थक-धन्य-धन्य बनाइए ।

बन्धुओं ! विद्या (यहाँ पर विद्या का अर्थ अअविद्या यानी सांसारिक शिक्षा और विद्या यानी योग-अध्यात्म वाला नहीं अपितु ‘विद्यातत्त्वम्’-- तत्त्वज्ञान वाला समझना चाहिए ।) स्वर्णिम जीवन हेतु भूत, वर्तमान एवं भविष्य को जानने-समझने के लिए तथा पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व का बनने और होने के लिये स्वच्छ एवं सुस्पष्ट आँख है जिसके माध्यम से आप प्राचीन से भी प्राचीनतर व्यक्तियों-वस्तुओं, शक्ति एवं सत्ता के ‘अस्तित्त्व’ मर्यादा और महत्त्व को अच्छी प्रकार जान-समझ और देखते हुए पहचान भी करते-कराते हुए अपने जीवन को भी वैसा ही बना व उठा सकते हैं। इसमें जीव-रूह-सेल्फ एवं आत्मा (र्इश्वर) नूर-सोल-ज्योर्तिमय शिव और परमात्मा (परमेश्वर-खुदा- गॉड-भगवान) तीनों ही और साथ ही साथ वेद, उपनिषद, रामायण, पुराण, बाइबिल गीता वाला ही विराट पुरुष भी बात-चीत सहित साक्षात दिखार्इ देते हैं।

विद्या (तत्त्वज्ञान) ही है कि जिससे मनुष्य को शरीर से पृथक एवं युक्त रहते हुए शरीर-जीव-आत्मा और परमात्मा तक चारों को ही जना-दिखा एवं अनुभव तथा पृथक-पृथक जानकारी कराते हुए मुक्ति और अमरता, परमशान्ति, परम आनन्द तथा परमपद प्राप्ति का भी, शरीर रहते ही बोध साक्षात्-अद्वैत्तत्त्व बोध और विराट पुरुष का साक्षात् दर्शन सहित उन्हीं में एकत्त्वबोध रूप मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध भी हो जाता है । जिससे सब प्रकार के उपलब्धियों को उपलब्ध करता हुआ भी भगवत कृपा से मनुष्य सुगमता पूर्वक मानवीय जीवन के उददेश्य को प्राप्त कर लेता है। यहाँ पर विद्या से अर्थ ‘विद्यातत्त्वम्’ पद्धति रूप तत्त्वज्ञान से है । जानकारी तो कोर्इ भी अच्छी ही होती है फिर तो विद्यातत्त्वम् पद्धति को ही क्यों न प्राप्त किया जाय ? जो सम्पूर्ण की सम्पूर्णतया जानकारी-दर्शन और प्राप्ति-उपलब्धि वाला होता है और वर्तमान में भी है भी ।

विद्यार्थी बन्धुओं ! विद्यातत्त्वम् पद्धति की महत्ता से तो चारो तरफ शास्त्र-सदग्रन्थ एवं किताबें भरी पड़ी हैं फिर मेरे समझ से सब मिलकर भी इस पद्धति के वास्तविक महत्त्व की व्याख्या नहीं कर सकते हैं, क्योंकि अनुभव एवं बोधगम्य प्रायौगिक बातों को वास्तव में अनुभव एवं बोध वाले प्रायौगिकता से ही जाना-समझा-बूझा देखा-परखा पहचाना-जा सकता है, न कि मात्र कह-सुनकर अथवा लिख-पढ़कर ।

विद्यातत्त्वम् ही एक ऐसा धन है जिसको जितना ही खर्च कीजिए, यह उतना ही बढ़ता जाता है । दुनिया में इसके अतिरिक्त और कोर्इ चीज (विषय-वस्तु) नहीं है जो खर्च करने से बढ़ती हो । हर विषय-वस्तु ही खर्च करने पर घटती तथा संचय करने पर बढ़ती है! जबकि विद्या जो है, ठीक इसके उल्टा यानी बचत करने पर घटती और खर्च करते-रहने पर बढ़ती रहती है । इतना ही नहीं, राजा अपने देश-राज्य का ही राजा होते हैं तथा मर्यादा पाते-देते हैं परन्तु विद्यावान विद्वान जो है, वहीं वह राजाओं का भी राजा, बादशाहों का भी बादशाह यानी सभी का ही सिरमौर (सिर का मुकुट) होता है। विद्यावान विद्वान जो है, हर देश-काल-समाज में ही आदर, प्रतिष्ठा एवं महत्त्वपूर्ण स्थान पाता है और आप उसी विद्या के अभिलाषी, उसी विद्या के इच्छुक, उसी विद्या के जिज्ञासु हैं। इन बातों से आप बन्धुओं को स्वत: ही मनन-चिन्तन द्वारा सोचते-विचारते हुए जानते-समझते हुए अपने आप निर्णय लेना होगा कि आप कितने महान वस्तु या पद्धति के अभिलाषी या जिज्ञासु हैं।

यह विद्यातत्त्वम् पद्धति आपको कितना महान बना सकती है ! आपको कितनी ऊँचार्इ तक उठा सकती है ! आपको कितने बड़े आनन्द एवं मर्यादा को उपलब्ध कर-करा सकती है ! यह आप स्वयं सोचें और जानें-समझें, देंखें-परखें तथा साथ ही साथ अनुभूति और साक्षात् बोध को प्राप्त होता हुआ जीवन के अन्तिम मंज़िल यानी मुक्ति और अमरता रूप मोक्ष को प्राप्त कर कृत-कृत्य हो जायें । सद्भावी विद्यार्थी बन्धुओं ! विद्यारूपी जिस सम्पत्ति के आप अभिलाषी या जिज्ञासु हैं, वह सम्पत्ति न तो चोर चुरा सकता है, न डकैत-लुटेरा लूट सकता है । न भार्इ-बन्धु बाँट सकता है और न राजा जप्त (हरण) कर सकता है । न आग जला सकती है और न पानी डुबा सकता है । साथ ही साथ जितने ही अधिक इसको खर्च कीजिएगा, उतने ही अधिक मात्रा में यह बढ़ती जायेगी । समाप्ति तो इसमें है ही नहीं। मनमाना नहीं बल्कि विद्यातत्त्वम् को विद्यातत्त्वम् के विधि के अनुसार अपनाया जाय और सम्पूर्ण को सम्पूर्णतया पाया जाये । यही मेरी भी भगवान के तरफ से आप के प्रति शुभ कामनाऐं हैं । यह वही विद्या पद्धति है जिसे प्रह्लाद ने अपनाया था ।

अब बताइये आप बन्धुगण ! आप लोग ऐसी बात को ग्रहण करने वाले हैं तो आप को कितनी सावधानी, कितनी गम्भीरता, कितनी सिथरता, कितना धैर्य, कितने साहस, कितने परिश्रम, कितने त्याग, कितनी शिष्टता, कितने संयम, कितने अनुशासन एवं कितनी विनम्रता तथा मधुरता और सुपात्रता की आवश्यकता इसके लिए चाहिए; यह तो आप स्वयं सोच सकते हैं। इस पर हमें कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है । फिर भी आप यदि नहीं मानेंगे तो हमें कुछ कहना ही होगा । हम तो इस पर मात्र इतना ही कहना चाहेंगे कि जितनी उच्च से उच्चतर, श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर, उत्तम से उत्तमतर बात या वस्तु की चाहना हो, उसके लिए उसी स्तर की श्रद्धा (लगन), परिश्रम, दूरदर्शिता, स्थिरता, गम्भीरता, धैर्य, साहस, शिष्टता, संयम, अनुशासन, विनम्रता, मधुरता, त्याग-ग्राहता एवं सावधानी आदि की भी आवश्यकता होगी, तभी जाकर उसकी सुपात्रता होगी और अधिकाधिक उपलब्धियाँ उपलब्ध होंगी ।

विद्यार्थियों के लिए सबसे घृणित और त्याज्य कोर्इ चीज है तो वह है असत्य और सांसारिक चेष्टायें-तृष्णा अर्थात सांसारिक भोगोपभोग की आकांक्षा और साथ ही अनिवार्यत: ग्रहणीय कोर्इ चीज है तो वह है ‘सत्यं बद, धर्मं चर ! (सत्य बोलें और धर्म पर रहें-चलें !)’। यह ही एकमेव एक ऐसा मन्त्र है जो सहज ही आसानी से पतित से भी पतित--पापी से भी पापी को पुरुष एवं महापुरुष और सत्पुरुष तक बना-बनवा देता है । केवल आवश्यकता है इसे र्इमान और सच्चार्इ से संयम पूर्वक अपनाने की ।

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2.1 विद्यार्थियों हेतु अनिवार्यत: ग्रहणीय बातें

2.1.1 सत्यं वद:--

सदभावी विद्यार्थी बन्धुओं ! वास्तव में आपको यदि विद्यार्थी शब्द को अपने जीवन में सार्थक-सफल बनाना है तो यह अनिवार्यत: आवश्यक होगा कि ‘सत्यं बद, धर्मं चर ! (सत्य बोलें और धर्म पर रहें-चलें !)’ को ग्रहण करना तथा अपने जीवन को उसमें जोड़-लगा देना होगा । अपने जीवन के व्यवहार में इस सूत्र को ग्रहण करना तत्पश्चात् अपने जीवन को हर प्रकार से उसी में जोड़-रखकर ही ले चलना होगा। शिष्ट, संयमी, अनुशासित एवं विनयशील बनना होगा। ब्रह्राचारी एवं सदाचारी की वृत्ति अपनानी होगी। सत्य को राजा हरिश्चन्द्र की तरह तथा सत्यधर्म को धर्मराज युधिष्ठिर की तरह अपने पाठ को पढ़ना-समझना और याद रखना होगा। पठित बातों को तोता रटन्त की तरह नहीं, बल्कि अपने पाठों को जानते-समझते और व्यावहारिक बनाते हुए याद करना-रखना चाहिये। ‘याद’ का अर्थ मात्र रटने से नहीं लगाना चाहिये अपितु जानने-समझने और व्यावहारिक बनाने से लगाना चाहिये ।

‘याद’ का अर्थ धर्मराज युधिष्ठिर की तरह ही लेना चाहिये अर्थात् ‘याद’ व्यावहारिक होना चाहिये । कहने का तात्पर्य यह है कि ‘सत्यं बद’ दो शब्द हैं। इन दोनों शब्दों को ‘याद’ करने का अर्थ मात्र इसी से नहीं है कि कोर्इ पूछे कि आपको अपना पाठ (अर्थात दोनों शब्द) ‘याद’ हैं तो झट से सुना दें कि हाँ ‘सत्यं बद!’ परन्तु वास्तव में यह ‘याद’ नहीं हुआ। ‘याद’ तो इसे तब माना जायेगा जब व्यवहार में आप सदा सत्य ही बोलें । असत्य या मिथ्या या झूठ कदापि न बोलें ! यदि असत्य बोलने की बात भीतर या बाहर से प्रेरित होकर निकलनी चाहती हो तो वाणी पर उस असत्य को आने से पूर्व ही ‘सत्यं बद’ पाठ स्मरण में आ जाय और वह असत्य बात जिह्वा पर न आने पाये, जिह्वा पर आने के पहले ही वह समाप्त हो जाय, तब समझा जाय कि हमें ‘सत्यं बद’ ‘याद’ हो गया । यदि कभी भी असत्य बात वाणी से निकली, चाहे वह जिस विषय-वस्तु या स्थिति-परिस्थिति में हो, तो वहाँ पर मानना ही पड़ेगा कि आपको अपना पाठ याद नहीं है अथवा भूल गया है । ऐसा हो सकता है कि आपके दिल व दिमाग में यह बात आवे कि यदि यहाँ पर हम सत्य बोलते हैं तो किसी विकट संकट में फँस जायेंगे, इसलिए थोड़ा सा यहाँ असत्य ही एक बार बोल दिया तो क्या हो गया । सत्य वाली बात तो याद है ही। तो बन्धुओ ! यहाँ पर एक बात गौर करने यानी ध्यान देने की है कि क्या किसी भी संकट से, चाहे वह विकट से विकट ही क्यों न हो, सत्य रक्षा नहीं करेगा तो क्या असत्य करेगा? नहीं, कदापि नहीं ! रक्षा भी होगा तो सत्य से ही होगा, असत्य से नहीं । इस प्रकार याद की सार्थकता हर परिस्थिति में ही अपने पाठ को तोता रटन्त में नहीं अपितु व्यावहारिक बनाये जाने में है ।

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2.2.2 धर्मं चर:--

सद्भावी विद्यार्थी बन्धुओं ! ‘धर्मं चर’ से तात्पर्य झोंटा-दाढ़ी लम्बा-लम्बा बढ़ाकर, तिलक-चन्दन कर-कराकर, लंगोटी या मृगछाला आदि पहनकर, कमण्डल आदि लेकर घर-घर या गाँव-गाँव घूम-घूमकर पेट-पालन अथवा किसी मठ का महन्थ बनकर देश-काल से विरक्त होने के दिखावे से नहीं है। ये सब धर्म नाम बाह्य रूप मात्र हैं, धर्म की वास्तविक स्थिति नहीं क्योंकि वास्तव में धर्म शरीर प्रधान नहीं, अपितु भाव और भगवान (मोक्ष) प्रधान होता है । शरीर प्रधान तो कर्म और भोग होता है । अपने अस्तित्व और कर्तव्य को सही-सही स्पष्टत जानते और देखते और तदनुसार करते-पाते हुए दोष रहित सत्य प्रधान भरा-पूरा रहते हुए श्रेष्ठतर जीवन विधान ही सच्चा धर्म है।

वास्तव में धर्म का यथार्थ रूप तो यह है कि अपने कर्तव्य कर्म का पालन करते हुये अपने कर्म एवं कर्म फल में बिल्कुल ही निष्कामता रहे अर्थात् कर्म और कर्म फल सभी प्रकार से भगवद समर्पित-शरणागत रूप में होवे-रहे । अपने सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को भगवत प्रदत्त जान-समझ कर ही करें। समस्त भोगने योग्य भोगों को भगवत प्रदत्त प्रसाद रूप में ही ग्रहण करें। बराबर संत समागम करें तथा जहाँ कहीं भी सत्संग की बातें सुनें, उसमें भाग लेवें, ताकि बुद्धि एवं वृत्ति शुद्ध बनी रहे क्योंकि सत्संग से प्रसुप्त विवेक भी जग उठता है-- विवेक जाग्रत हो जाता है । फिर तो भगवन्मय जीवन सरल-सहज हो जाता है ।

ममता-मोह-आसक्ति ही धर्म की बैरी (शत्रु) है, जिसको धर्म कभी भी देखना तो देखना है, अपने जन के साथ सुनना भी पसन्द नहीं करता है । यह सब बात आप बन्धुओं को अति कठिन और दु:साध्य जरूर भासती होगी परन्तु वास्तव में यह कठिन और दु:साध्य बात है नहीं । हाँ, तब तक जरूर कठिन एवं दु:साध्य आभासित होगी, जब तक कि आप इसे (धर्म को) निष्कपटतापूर्वक श्रद्धा एवं विश्वास के साथ ग्रहण करते हुए र्इमान और संयम से चलने नहीं लगते हैं। जैसे ही र्इमान से संयम पूर्वक श्रद्धा के साथ निष्कपटतापूर्वक आप धर्म (भगवद समर्पित-शरणागत रूप में होना-रहना-चलना) पर निष्काम भाव से चलना प्रारम्भ करेंगे तो स्पष्टत: जानने में तथा प्रत्यक्षत: देखने में आयेगा कि इस पूरी सृष्टि में ही इतना सुगम सरल न तो कोर्इ मार्ग है और न तो कोर्इ इतना उच्च और परमानन्दमय परमपद।

सारी सृष्टि में ही इस रहन-सहन के समान दूसरी कोर्इ भी उपलब्धि जानने-देखने को नहीं मिलेगी, जो उपलब्धि इसमें, धर्म में उपलब्ध होती हुर्इ दिखलार्इ देती है। इसमें निष्कपटता पूर्वक र्इमान से संयम पूर्वक श्रद्धा के साथ चलने पर कष्ट एवं परेशानी नाम की कोर्इ चीज आपको नहीं महशूस हो सकती है । हाँ हो सकता है कि देखने वालों को ऐसा लगता हो कि यह बेचारा बड़ा कष्ट में है। इसे बड़ी परेशानी है; परन्तु वास्तविकता बिल्कुल ही इसके प्रतिकूल है क्योंकि आप अपने को वास्तव में ‘सत्य लीला’ रूपी ड्रामा(नाटक) का एक पात्र ही पायेंगे। जैसे रामलीला और कृष्णलीला वैसे ही इस बार ‘सत्य लीला’ हो रहा है । ध्रुव-प्रहलाद-मीरा आदि को कष्ट कहाँ ? कष्ट तो देखने वालों को होता है । कष्ट लगने वाले-व्यवहार ही तो आगे गाथा का रूप ले लेता है ।

धर्म में ‘मेरा’ को ही विलय करते हुये ही रहना-चलना पड़ता है। सदगुरु अपने ‘तत्त्वज्ञान’ द्वारा ‘मैं’ का विलय करता-कराता है और हमको-आपको ‘मेरा’ का विलय श्रद्धा भाव से समर्पण-शरणागत के रूप में करना पड़ता है। वास्तव में देखा जाय तो यह सच्चिदानन्द अर्थात् परम आनन्द की बात है, क्योंकि दुनियां में चोरी-डकैती, लूट-अपहरण-हत्या, अत्याचार-दुराचार, जोर-जुल्म और भ्रष्टाचार आदि सारी गड़बडि़याँ ‘मैं’ और ‘मेरा’ के चलते ही हो रही हैं । सांसारिक बन्धन एवं आवागमन भी ‘मैं’ और ‘मेरा’ के चलते ही हो रही हैं । सारा सम्बन्ध-पद आदि-आदि बन्धन कारक पतन और विनाश भी इस ‘मैं’ और ‘मेरा’ के चलते ही हैं । यही कारण है कि धर्म सभी रोगों में मात्र एक ही दवा देकर सभी भव-रोगों से ही मुक्त करता है और वह दवा है—‘मैं’ और ‘मेरा’ का भगवद विधान में विलय रूप में करना-रहना-चलना और तत्त्वज्ञान के द्वारा भगवत प्राप्ति और भगवान में ही अपने आप जीवात्मा को भी देखते हुए सम्पूर्ण-भगवन्मय देखता हुआ रहना चलना। जो शरीर अपनी दिखार्इ दे रही थी वह ही अब भगवान की दिखार्इ दे रही है और उन्हीं के अनुसार रह-चल भी रही है । यही मानवीय जीव की मुक्ति और अमरता का साक्षात् बोध रूप मंजिल की प्राप्ति प्राप्त करना होता है। इसे ही धर्मं चर कहते है ।

सद्भावी विद्यार्थी बन्धुओं ! ‘सत्यं बद, धर्मं चर ! (सत्य बोलें और धर्म पर रहें-चलें !)’ तो आप विद्यार्थी बन्धुओं के लिये व्यावहारिक पहलू है और निश्चित ही होना भी चाहिये । परन्तु इस व्यावहारिकता को सुगमतापूर्वक शान्ति और आनन्द के साथ पाने-अपनाने हेतु और जीवन के लक्ष्य रूप मोक्ष रूप सफलता को हासिल करने हेतु भी इन अग्रलिखित बातों को ग्रहण करना अनिवार्यत: आवश्यकता के अन्तर्गत ही आता हैं । वे बाते हैं—‘र्इमान-सच्चार्इ-संयम’ और सेवा ।

इन बातों को विद्यार्थी जितनी ही अधिक मात्रा में श्रद्धा और निष्ठापूर्वक अपने व्यवहार में लागू करेगा, उसमें उतना ही शान्ति, सुशीलता, कर्तव्यपरायणता, मर्यादा आदि महत्त्व को बढ़ाने वाले गुण-महत्ता स्वाभाविक आते रहेंगे, जो विद्यार्थी को अपने लक्ष्य तक पहुँचाने में काफी मात्रा में सहयोग प्रदान करते हैं ।

विद्यार्थी बन्धुओं ! मेरा उददेश्य आप सभी को लंगोटी पहनाकर दाढ़ी केश बढ़ाकर साधु-सन्यासी बनाना नहीं है अपितु दोष रहित सत्य प्रधान उन्मुक्तता और अमरत्व से युक्त बनाते हुए र्इमान-संयम-सच्चार्इ के साथ-साथ भरा-पूरा खुशहाल जीवन जिलाते हुए दिव्य-महान बनाते हुए ‘परम’ होने से है । मिलाने बनाने से है।

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2 .2 दोषों से बचना-बचाये रखना अनिवार्य

वास्तव में विद्यार्थी जो र्इमान-सच्चार्इ-संयम-सेवा भाव से युक्त होते हैं, वे सर्वत्र ही आदर-सम्मान पाते हैं । उन्हें सभी प्राणी ही आदर के भाव से देखते और उनका गुणगान गाने लगते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि विद्यार्थी का भाव और साहस और भी बढ़ने लगता है । इससे वह और ही श्रद्धा एवं निष्ठा के साथ परिश्रम करने लगता है। यह स्वाभाविक ही है कि दोष दोष को आकर्षित करता है एवं दोष-दोष की ओर ही बढ़ता रहता है और गुण-गुण को आकर्षित करता है एवं गुण-गुण ही की ओर ही बढ़ता रहता है। यही कारण है कि दोषी दिन-प्रतिदिन दोषी और गुणी दिन-प्रतिदिन गुणवान बनता जाता है ।

यह भी स्वाभाविक ही है कि मर्यादा प्राय: सभी को अच्छी लगती है और प्राय: सभी प्राणी ही मर्यादा पाने की इच्छा और कोशिश करते हैं । ठीक उसी प्रकार दोष और गुण भी मर्यादा हेतु ही दोषी और गुणी की ओर क्रमश: (दोष दोषी की ओर और गुण गुणवान की ओर) जाने पर ही मर्यादित होते हैं। दोष यदि गुणी के पास जाय तो वह गुणी (गुणवान) घृणा एवं त्याग के द्वारा ही उसको वापस कर-करा देता है तथा गुण यदि दोषी के पास जाता है तो वह भी दोष से युक्त होकर बदनाम होने लगता है । इसलिए गुण दोषी की ओर जाना ही नहीं चाहता है और दोष गुणवान द्वारा अस्वीकृत कर दिया जाता है। इसलिए दोष गुणवान की ओर नहीं जाना चाहता है ।

आप पाठक बन्धुओं को इन सभी बातों को अपनी यादगारी में सदा ही रखना चाहिये ताकि आप में छोटे से छोटा दोष भी एक भी न आने पावे। ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, क्योंकि जब पहले पहले आने वाले एक छोटे से दोष को आप नहीं रोक या हटा पायेंगे तो जब वह छोटे-छोटे जो एक दूसरे के आकर्षण से आते और बढ़ते जायेंगे, तब आप उसे रोक न पायेंगे। कदापि नहीं रोक पायेंगे और धीरे-धीरे दोष छोटे से बड़ा रूप लेकर आपको ही दोषी बनाकर आप पर हाबी (प्रबल) हो जायेंगे जिसके कारण आप समाज में उसी दोषी के समान अमर्यादित एवं घृणित हो जायेंगे । इसलिए काफी सावधानी पूर्वक अपने को दोष से बचाये रखने का प्रयत्न करना चाहिये तथा जानकारी या नाजानकारी वश यदि कोर्इ दोष अपने अन्दर आ ही गया हो तो क्रमश: प्रारम्भ से ही शुरु कर देना शिघ्रातिशीघ्र ही उसे जिस तरह आया है, उसी तरह उसे पुन: लौटा ही देना चाहिये-- हटा ही देना चाहिये। नहीं तो वह दूसरे दोषों को बुलायेगा ही ।

सावधानी रखना अपेक्षित है। गुण-ग्राही बनें। सदा-सदा ही गुण-ग्राही बनें और बने रहने का प्रयत्न करें । प्रारम्भ में ही दोष को अपने जीवन में किसी भी स्थिति-परिस्थिति में आने ही न दें और जाने-अनजाने आ ही गया हो तो जानकारी मिलते-होते ही तुरन्त ही उसे निकाल दें-हटा दें। इसे जीवन कल्याणकर मन्त्र समझें और अनिवार्यत: इसे अपने जीवन में अपनाएँ ही ।

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सावधान ! विधार्थियों सावधान !!

सदभावी विद्यार्थी बन्धुओं ! आप बन्धुओं को सावधान करते हुए मैं आपसे यह अवश्य बता देना चाहूँगा कि विद्यार्थी जीवन जीवन का स्वर्णिम समय तो है ही, साथ ही साथ यह भी याद रखने योग्य बात है कि जीवन का सबसे खतरनाक मोड़ भी यही है । चाहे दोष-दुर्गुण अपनाकर गलत मोड़ से गुजरते हुये दोषी-अपराधियों जैसा अपमानित, पतन और विनाश के तरफ जाया जाय अथवा सदगुण-सदव्यवहार अपनाकर सम्मानित-मर्यादित-उत्थान परक जीवन के सही मोड़ को अपनाया जाय, क्योंकि विद्यार्थी कुम्हार के चाक पर रखे हुए गीली मिटटी के समान होता है। जिस प्रकार मिटटी जितना ही मुलायम एवं साफ सुथरी (अकटी-रोड़ी रहित) होगी, बर्तन उतना ही बढि़या होगा। ठीक उसी प्रकार विद्यार्थी जितना ही शिष्ट, संयमी अनुशासित, विनम्र एवं दोष-दुर्गुण रहित होगा, उसकी पात्रता भी उतनी ही अच्छी होगी । विद्यार्थी को कभी भी सुखापेक्षी नहीं बनना चाहिये, क्योंकि सुख की चाहत विद्यार्थी को दोष-दुर्गुण के तरफ बहा ले जाती है और विद्या पीछे छूट जाती है। विद्या की वास्तविक जानकारी सुखापेक्षी के दिल-दिमाग में बैठ ही नहीं सकती है । इस प्रकार विद्यार्थी को कदापि सुख की अभिलाषा यानी सुख की अपेक्षा नहीं करनी या रखनी चाहिये। कहा भी गया है कि--
सुखार्थिन: त्यजेत विधा, विद्यार्थिन: त्यजेत सुखम् ।
सुखार्थिन: कुतो विधा, विद्यार्थिन: कुतो सुखम् ।।
अर्थ :- सुख चाहने वाले को विधा त्याग देना चाहिये, विद्या चाहने वाले को सुख त्याग देना चाहिये । सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ और विद्या चाहने वाले को सुख कहाँ ?
संसार के किसी भी प्राणी को दो जीव नहीं मिला है। प्रत्येक को एक ही जीव मिला हुआ है । तो जरा विद्यार्थी बन्धुगण ! आप भी सोचें तो कि जब जीव एक ही है, तो एक साथ उसे दो तरफ कैसे लगाया जा सकता है अर्थात् सुख की चाह और विद्या की चाह (विद्या का अर्जन) दोनों एक साथ कदापि नहीं टिक (स्थिर रह) सकता है । दोनों में से एक को छोड़ना ही होगा । अब यहाँ पर मुख्य प्रश्न यह सामने उत्पन्न हो रहा है कि तब इन दोनों में किसे अपनाया जाय और किसे छोड़ा जाय ? पाठक बन्धुओं ! यहाँ पर थोड़ा रुक कर विचार करें कि उत्तर क्या हो ? नि:संदेह उत्तर होगा-- विद्या का अर्जन और यही ग्रहणीय भी है ।

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2.3 सुख और विद्या के यथार्थ स्थिति को जानें-देखें-अपनावें !

सद्भावी विद्यार्थी बन्धुओं ! थोड़े देर के लिए मान लिया जाय कि सुख और शान्ति के लिए ही तो दुनियां में सब कुछ किया जाता है और यदि बिना विद्या के ही वह सुख मिल जाय तो फिर विद्या के लिए इतनी शिष्टता, संयम, अनुशासन, विनम्रता, सदाचारिता, सत्यवादिता, कठिन परिश्रम आदि-आदि नाना तरह के कष्ट और परेशानियों को सिर पर लेकर रहने-चलने की क्या जरूरत ? र्इमान-सच्चार्इ-संयम-सेवा की क्या जरूरत ? मगर एक बात गौर कर लेना है कि सुख की खोज और पूर्ति करने में नि:संदेह विद्या रुक जाती है। विद्या का रुकना ही भविष्य में कमी-अभाव आदि नाना तरह की परेशानी आदि कष्टकर जीवन का मिलना-होना स्वाभाविक ही होता रहता है । कमी-अभाव नाना तरह की परेशानियों आदि-आदि से बचने और सुव्यवस्थित-सुरक्षित रहने, मुक्ति-अमरता रूप मोक्ष रूप मंज़िल के लिये ही तो विद्या (तत्त्वज्ञान) है । कहा भी गया है कि ‘सा विधा या विमुक्तये’ विद्या वही है जिससे मुक्ति मिले । विद्या चाहने वाले को प्रारम्भ में थोड़ा परेशानी दु:ख-कष्ट अवश्य होता है, मगर यह भी तो है कि इसे पार कर लेने पर सुव्यवस्था-सुरक्षा के साथ सुखपूर्वक आसानी का जीवन और मुक्ति-अमरता भी उपलब्ध हो जाता है-- उपलब्ध हो ही जाता है अर्थात् प्रारम्भिक सुख में भविष्य का घोर दु:ख-कष्ट और नारकीय आवागमन होता-रहता है और विद्या अर्जन-ज्ञान अर्जन (तत्त्वज्ञान प्राप्ति) में होने वाले दु:ख-कष्ट में भविष्य का सुख-समृद्धि, सम्मान-मर्यादा, विकास-उत्थान, ‘मुक्ति-अमरता रूप मोक्ष’ आदि-आदि सभी समाहित रहता है ।

अत: विद्या अर्जन के अन्तर्गत बाधक रूप में आने वाले प्रारमिभक सुख-साधन को त्याग देना चाहिये । त्याग ही देना चाहिये क्योंकि ऐसा त्याग ही ग्रहण अथवा प्राप्ति का पूर्व रूप होता है अर्थात् सुखी-समृद्ध खुशहाल जीवन और ‘मुक्ति-अमरता रूप मोक्ष’ हेतु विद्यातत्त्वम् पद्धति यानी तत्त्वज्ञान एक अनिवार्य विधान है जिसके वगैर मुक्ति-अमरता बिल्कुल ही दुर्लभ है ।

बन्धुओं ! यहाँ पर आप सभी बन्धुओं को दूरदर्शितापूर्वक देखना होगा कि क्या किसी व्यक्ति को विद्यातत्त्वम् पद्धति के वगैर सही मायने में सुख शान्ति मिल सकती है ? मानव जीवन का मंजिल रूप मुक्ति-अमरता की प्राप्ति हो सकती है ? मानव जीवन सार्थक-सफल हो सकता है ? नहीं ! नहीं !! कदापि नहीं हो सकता है । तो इस बात पर दस-पाँच मिनट मौन होकर मनन-चिन्तन करके तब निर्णय लिया जाय तो भगवत कृपा एवं भगवत प्रेरणा से अवश्य ही आपके दिल व दिमाग में यह बात नाचने लगेगी कि मूढ़ता और अज्ञानता सुख-समृद्धि तथा शान्ति एवं आनन्द और मुक्ति-अमरता का रूप या स्थान कदापि नहीं ले सकती है । जब भी किसी विषय-वस्तु अथवा शक्ति-सत्ता से हमें शान्ति और आनन्द की उपलबिध करनी है तो इसके लिये सर्वप्रथम यह जरूरी बात होगी कि उस विषय-वस्तु अथवा शक्ति-सत्ता की यथार्थत: जानकारी प्राप्त की जाय क्योंकि शांन्ति और आनन्द की अनुभूति भी तो जानकारी और समझ के अनुसार ही तो होगी। तब तो पुन: यहाँ विद्या की आवश्यकता हो ही गयी यानी किसी भी विषय-वस्तु एवं शक्ति-सत्ता की यथार्थत: जानकारी और समझने और मुक्ति-अमरता के बोध की प्रक्रिया ही तो विद्या (विद्यातत्त्वम् अथवा तत्त्वज्ञान) है। आखिरकार विद्या और है क्या ? यहाँ पर अन्तत: यह पाया गया कि मूढ़ता एवं अज्ञानता सुख-समृद्धि और शान्ति-आनन्द को ही नहीं जान-समझ सकता, मुक्ति-अमरता को तो बिल्कुल ही नहीं जान-समझ सकता है ।

विद्या ग्रहण के काल में यानि विद्या अर्जन के समय सुख की चाहत और प्राप्ति में जो सुख प्राप्त होता है, वास्तव में वह सुख-शांति तो है नहीं, वह तो सुखाभास मात्र होता है । उसे मन की अस्थायी उमंग या उददण्डता अथवा मन मत यानी मन की उच्छृंखलता ही मानी जा सकती है । जिसमें अपना भविष्य न दिखार्इ दे, जो स्थायित्त्व न प्रदान करे, जिससे दूरदर्शिता की प्राप्ति न हो, जो भूत के पौराणिक और ऐतिहासिक गाथाओं को न जान-समझ सकता हो, जो भविष्य के लिए अपने पीछे कोर्इ उत्कृष्टतर गाथा न छोड़ता हो, जो वर्तमान में अपने जीवन को न सुधारता-सवाँरता हो, क्या वह भी सुख-शान्ति-आनन्द ही है ? वह सुख-समृद्धि- शान्ति-आनन्द नहीं अपितु मात्र सुखाभास ही है जैसे कि मूढ़-नासमझ शराबी शराब के नशे को ही अपना सुख-शान्ति-आनन्द मान बैठता है, यह भी ठीक वैसा ही होता है। इससे आगे और क्रमश: ऊपर का चिदानन्द, ब्रह्रानन्द और सचिचदानन्द, परमशान्ति, परम आनन्द तथा मुक्ति और अमरता की तो बात ही कहाँ ?

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2.4 विद्याविहीन जीवन पशुवत स्थिति

विद्याविहीन जीवन तो निरा ही एक पशुवत से भी बदतर जीवन है क्योंकि दिनभर जुटाना शाम-सुबह खाना, सुबह-शाम पखाना पुन: दिनभर जुटाना, शाम-सुबह खाना, सुबह शाम पखाना; यही जुटाना-खाना-पखाना, पुन: जुटाना-खाना-पखाना, पुन: जुटाना-खाना-पखाना, इसी में सारा जीवन व्यर्थ ही गवाँना तथा मूढ़ता या अज्ञानता को सुख और नींद को शान्ति मान लेना ही तो पशुवत जीवन से भी बदतर जीवन होगा, क्योंकि पशुओं को जुटाने (संग्रह करने) की चिन्ता कदापि नहीं होती है। यह चिन्ता तो मानव अपने सिर पर ही ले चुका है। इस प्रकार तो पशु ही मनुष्य से भी श्रेष्ठतर हो गया। परन्तु यह किसके लिए ? उन मूर्खों के लिए जो मूढ़ एवं अज्ञानी यानी जो विद्यातत्त्वम् पद्धति अथवा तत्त्वज्ञान रहित हैं, जो रात-दिन जुटाने-खाने-सोने-पखाने, पुन: जुटाने-खाने-सोने-पखाने मात्र में अपने जीवन को व्यर्थ ही गवाँ रहे हैं । अपने और अपने आश्रितों सहित बालकों को भी विद्या हेतु प्रेरित नहीं कर रहे हैं । आसक्ति और ममता के बंधन में बंध-बाँध करके अज्ञान रूप अन्धेरे कुएँ में पड़-डाल रहे हैं । ऐसे माता-पिता, संरक्षक और सरकार उन बालकों के और अपने आप हम (जीव) के भी घोर शत्रु हैं। जो बालक विद्या से बंचित रह जा रहे हैं, वे भी अनजान अन्धकारमय नारकीय जीवन जीने के लिये मजबूर होंगे । सर्वोत्तम् बात तो यह होती कि विद्या के चारों (1 .शिक्षा-Education, 2 .स्वाध्याय-Self Realization, 3 .योग-साधना या अध्यात्म-Spiritualization और 4. विद्यातत्त्वम् या तत्त्वज्ञान-True Supreme and Perfect KNOWLEDGE) अंगों की सरकार द्वारा उचित व्यवस्था होती जिसमें क्रमश: चार श्रेणियों के बालकों को उनकी योग्यता-क्षमतानुसार चारों (शिक्षा, स्वाध्याय, अध्यात्म और तत्त्वज्ञान) से अन्यथा तीन (शिक्षा, स्वाध्याय और अध्यात्म) से, अन्यथा दो (शिक्षा और स्वाध्याय ) से, अन्यथा कम से कम एक अंग (शिक्षा) से तो परिचित होना प्राय: प्रत्येक बालक के लिए अनिवार्य ही कर दिया जाता।

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2.5 सांसारिक अध्यापकों द्वारा सांसारिक शिक्षा

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! शारीरिक माता-पिता अथवा संरक्षक द्वारा प्रेरित तथा डाँट-फटकार और मार के डर-भय के कारण विद्यालय प्रतिदिन गाँव-पड़ोस के अन्य बालकों के साथ हम (बालक शरीर) भी विद्यालय जाने लगे। विद्यालय में अध्यापक जी भी एक शरीर ही थे तथा उनका नाम-पता भी शारीरिक मात्र ही था। शरीर से भिन्न एवं पृथक वे भी कुछ नहीं थे। यानी विद्यालय में भी चारो तरफ सभी प्राचार्य जी अध्यापकवृन्द, और सभी साथी-संघाती विद्यार्थी गण भी मात्र शारीरिक नाम-रूप-परिचय वाले ही थे। शरीर से भिन्न और पृथक नाम-रूप-परिचय वाला कहीं भी कोर्इ भी न तो मिलता था और न मिलता है। इस प्रकार हम बालकगण भी शरीर तो बन ही गये थे । इसलिये हमारा भी नाम-रूप-पता-परिचय आदि शारीरिक मात्र ही विद्यालय के पंजीयन-पत्र में लिखा गया तथा सबके समान ही हमारा भी मेल व्यवहार शारीरिक मात्र ही रहा। हम शरीर मात्र ही है, इसी में फँसते जकड़ते गये ।

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2.6 आत्मिक जीव को शारीरिक बनाना

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! माता-पिता या पारिवारिक संरक्षक के निर्देशन में उत्पन्न शिशु का जब नार-पुरर्इन (ब्रह्रानाल) काट-कटवा दिया जाता है तब ब्रह्रा या र्इश्वर या आत्मा या जीवनी-शक्ति या नूरे-इलाही या शिव शक्ति वाला प्राय: सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। यह विच्छेद पूर्णत: तो नहीं होता परन्तु विच्छेद का प्रभाव इतना अवश्य पड़ता है कि उससे प्राप्त होने वाली उपलब्धियाँ प्राय: बन्द ही हो जाया करती है जिससे बहिर्मुखी शिशु के जीव हेतु शान्ति और आनन्द तथा शरीर हेतु पुष्टिकारक खाद्य एवं पेय पदार्थ की अनिवार्य आवश्यकता हो जाती है । यही कारण है कि उत्पन्न शिशु के सांस्कारिक लाभ एवं पुष्टि हेतु प्रसूति-गृह में आत्म-ज्योति रूप ब्रह्रा-ज्योति रूप दिव्य ज्योति के स्थान पर दीप-ज्योति; अमृत-पान के स्थान पर तत्काल मधु-पान तत्पश्चात् दुग्ध-पान तत्पश्चात् जल-पान; अनहद नाद के स्थान पर फूल (धातु) की थाली बजाकर तथा सो•हँ- ह ँसो के स्थान पर सोहर (गीत) आदि उपलब्ध कराकर शिशु को यह जनाया-दिखाया-समझाया-बुझाया जाता है कि आप (शिशु) वही (गर्भस्थ) हो तथा यह दीप-ज्योति वही दिव्य-ज्योति ही है, यह मधु-पान वही अमृत-पान ही है, यह फूल की थाली की आवाज वही अनहद-नाद ही है तथा यह सोहर गीत वही सो•हँ-ह ँसो-जप ही है । इस प्रकार प्रसूति-गृह से ही शिशु को माता-पिता अथवा संरक्षक द्वारा नकल या पाखण्ड और झूठ के शिक्षा से प्रसव-गृह के शिशु को ही सराबोर कर या भर दिया जाता है; इतना ही नहीं ‘आत्म’ शब्द रूप आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा रूप शिव पिता के स्थान पर हाड़-मांस- खून-नस-नाड़ी-चमड़ी से युक्त शरीर मात्र को ही पिता तथा ज्योति रूपा शक्ति रूपा माता के स्थान पर पुन: हाड़-मांस-खून-चमड़ी युक्त शरीर मात्र ही माता बन जाती है ।

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! गर्भस्थ-शिशु जब गर्भ से बाहर आता है तो माता-पिता आदि द्वारा बाहयाडम्बर में फंसाकर अन्तर्मुखी से बहिर्मुखी बना दिया जाता है जिससे शिशु का शरीरस्थ जीव अपने दिव्य सम्बन्धों एवं उपलब्धियों से बिछुड़ जाता है और हाड़-मांस आदि से बनी शरीर रूप माता-पिता, भार्इ-बहन, हित-नात, दोस्त आदि सम्बन्ध रूप बाहयाडम्बर में फंस जाता है जिसका दुष्परिणाम यह होता है कि शरीरस्थ जीव स्थायी दिव्य सम्बन्धों एवं स्थायी उपलब्धियों से बंचित हो जाता है और शान्ति-आनन्द के स्थान पर सुख तथा शारीरिक पुष्टि हेतु माता-पिता एवं संसार के अधीन होकर इधर-उधर चारों तरफ दर-दर की ठोकरें खाने लगता है फिर भी संसार में शान्ति और आनन्द तो ही मिलता ही नहीं स्वानुभूति रूप आनन्द भी नहीं मिल पाता है । इसलिए मात्र शारीरिक पुष्टि में ही फंस जाया करता है तथा माता-पिता अथवा संरक्षक खान-पान-वस्त्र आदि की व्यवस्था करने लगते हैं क्योंकि ब्रह्रा-शक्ति या आत्म-शक्ति से जीव का सम्बन्ध यही कटवाये रहते हैं। आइये अब आप सभी लोग मिलकर बीच में यह भी जान-देख-समझ लिया जाय कि आखिरकार यह प्रथा ही क्यों और कैसे लागू हुर्इ ? जिससे कि प्रारम्भ से लेकर आज तक ही यह प्रथा रूप लेकर कायम रहा, इसका कारण क्या है?

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! मानव सृष्टि के आदि में सृष्टि कर्ता ब्रह्रा ने स्वरसती के सहयोग से सर्वप्रथम सनक-सनन्दन-सनातन-सनत्कुमार नामक चार शिशुओं को उत्पन्न किया परन्तु उनका नार-पुरर्इन या ब्रह्रानाल नहीं काटा, जिसका परिणाम यह हुआ कि ये चारों बालक बाहय यानी शारीरिक माता-पिता रूप बाहयाडम्बर में नहीं फंस पाये, जिससे ब्रह्रा को अपना सृष्टि-विधान रुका सा दिखलायी दिया, जिस पर सोच-विचार कर पुन: नारद को उत्पन्न किया । नारद भी सनत्कुमार के सम्पर्क से फंसने से बच गये, तत्पश्चात ब्रह्रा ने काफी सोच-विचार कर नौ योगीश्वरों को उत्पन्न किया परन्तु वे भी वैसा (नारद जैसा) ही किए पुन: तत्पश्चात् ब्रह्रा जी ने इन मनु आदि प्रजापतियों को उत्पन्न किया तथा उन्हें सांसारिक बनाने हेतु उनका नार-पुरर्इन यानी ब्रह्रानाल काटने की पद्धति प्रारम्भ की, जिससे कि मानव का ब्रह्रा-शक्ति से सीधा सम्बन्ध विच्छेद हो जाय और सांसारिकता के तरफ उन्मुख होकर मानव सृष्टि उत्पत्ति में ब्रह्रा का सहयोग करें। बाद में ऋषियों ने अत्यधिक शोध करके पुन: ब्रह्रा-शक्ति को प्राप्त किया, परन्तु ब्रह्रा-शक्ति की यथार्थता तक कोर्इ नहीं पहुँच पाया और ब्रह्रा जी की पद्धति (ब्रह्रानाल काटने वाली) एक प्रथा का रूप लेकर समाज में अब तक छायी हुर्इ है। हालांकि ब्रह्राशक्ति से सम्बन्ध विच्छेद कराने वाली इस पद्धति को घोर घृणित कार्य मानते हुए स्वयं काटने की पद्धति को संशोधित कर समाज में निम्नतम स्थान पर स्थित ‘चमर्इन’ (प्रसव सेविका) से नार-पुरर्इन या ब्रह्रानाल कटवाने की पद्धति को ऋषि-महर्षियों आदि ने लागू किया-कराया जो अब तक है ।

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2.7 अनभिज्ञता एवं स्वार्थपरता-मूलकारण

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! ‘नार-पुरर्इन’ या ब्रह्रा नाल काटने से ब्रह्रा-शक्ति या र्इश्वर-शक्ति या शिव-शक्ति या आत्म-शक्ति का सीधा जो लगाव है कट जाया करता है । यह जानकारी प्राय: किसी को भी मानवीय स्तर पर न तो था और न है ही। कुछ ऋषि-महर्षियों ने जो गहन शोध किया था मात्र उन्हें ही ब्रह्रा जी के सहारे कुछ आभास हुआ था जिसके आधार पर काटने के स्थान पर कटवाने की पद्धति (संशोधित पद्धति) लागू किया-कराया गया था । वास्तव में इसकी यथार्थत: जानकारी आज भी प्राय: किसी को नहीं है जबकि सभी मनुष्य मात्र ही इस पद्धति से गुजरते हैं फिर भी इसके रहस्य को नहीं जान पाते हैं । जानने का प्रयास भी नहीं करते हैं। यही इनका दोष अपराध, भूल-चूक है ।

वास्तविकता तो यह है कि आज का जनमानस पुत्रोत्पत्ति ही अपने अन्तर्गत निहित तुच्छ स्वार्थों को लेकर कर रहा है जबकि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। चाहिए तो यह कि लोक-कल्याण एवं परम प्रभु के सृष्टि विधान को मददे नजर रखते हुए ही पुत्रोत्पत्ति की-करायी जाय । पुत्रोत्पत्ति के पूर्व ही जन-मानस में नाना तरह के सुख-सुविधा प्राप्त करने रूपी निहित संकीर्ण एवं तुच्छ स्वार्थी भावनाओं से युक्त मिश्रित भाव (इच्छा) को लेकर ही गर्भाधान की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है जिससे प्रारम्भिक अवस्था वाले शुक्राणु ही उस संकीर्ण एवं तुच्छ भावों वाला हो जाया करते हैं । भाव का पुत्रोत्पत्ति पर इतना प्रभावी असर (प्रभाव) पड़ता है कि जिसको यथार्थत: बताना व लिखना एक अतिशयोक्ति जैसी बात लगेगी, फिर भी बताना उचित एवं कल्याण प्रद जान कर अनिवार्य लग रहा है । वह यह है कि – माता-पिता के भाव एवं व्यवहार का पुत्र-पुत्री पर उत्पत्ति के पूर्व से लगायत बाल्यकाल तक लगभग साठ प्रतिशत पड़ता है जिसकी यथार्थत: भरपूर जानकारी तो माता-पिता को रहती ही नहीं और जो रहती भी है उसे अपने आदत से मजबूर होकर सुधारने की कोशिश ही नहीं करते, जिसका दुष्परिणाम आज चारों तरफ ही दिखलायी दे रहा है । भ्रष्टाचार उग्रतम रूप लिये हुए है । स्वार्थ के वशीभूत मानव, सम्पूर्ण समाज को विनाश के कगार पर पहुँचा दिया है । धनी धनी होता जा रहा है और गरीब गरीब बनता जा रहा है । नीच और ऊँच गरीब और धनी, शोषित और शोषक, जोर-जुल्म और दलित-प्रताडि़त के बीच खार्इ पाटने के बजाय और ही गहरी तथा खतरनाक रूप ले लिया है, स्वार्थपरता तो आज बाप-बेटा, माता-बेटी, पति-पतिन, सास-पतोह और दोस्त-मित्र, हित-नात आदि सम्पूर्ण सम्बन्धों को ही गर्त में मिला दिया है, जो विनाश का चरम रूप है ।

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! माता-पिता के अनभिज्ञता के कारण ही कुछ बालक नार-पुरर्इन या ब्रह्रानाल कटने-कटवाने से बच गये, जो आज तक भी नाम-रूपों से जगजाहिर हैं, जिनमें कुछ प्रमुख हैं -- सनक-सनन्दन- सनातन-सनत्कुमार, नारद, शुकदेव, कबीर, तुलसीदास आदि । ये महापुरूष फंसाये जाने पर भी सांसारिक मायाजाल में नहीं फंस सके थे, जिसका सुपरिणाम है कि आज भी ये नाम-रूप से समाप्त होने के बजाय समाज में प्रचलित होते जा रहे हैं । सारे के सारे सदग्रन्थ उन महापुरुषों के जीवन-वृतान्तों या जीवन-कहानियों से भरे पड़े हैं । जिन्होंने माता-पिता या परिवार के संकीर्ण एवं तुच्छ स्वार्थ रूपी दिवारों को तोड़कर निरपेक्ष भाव से लोक-कल्याण रूप सत्य-धर्म के संस्थापन एवं प्रचार-प्रसार हेतु अपने जीवन को लगा दिया था । आज तक उनका नाम-रूप कोर्इ मिटा नहीं पाया बल्कि फैलता ही जा रहा है। उन जढ़ी-मूढ़ एवं आसक्त लोगों की तो अपने ही बाल-बच्चों, नाती-पोतों आदि द्वारा नाम-रूप दोनों ही समाप्त एवं मिट्टी में मिला दिया जाता है जिससे उनके नाम-रूपों को उन्हीं की पांचवी-छठवीं पीढ़ी तक को याद नहीं रह पाता और की बात कौन करे। सदग्रन्थ, शास्त्र, पुराण तो दूर रहा अपने परिवार के लेखा-जोखा में ही उनका नाम-रूप यदि ढूँढा जाय तो शायद ही मिले। छठवीं-सातवीं पीढी़ तक जाते-जाते समाप्त हो ही जाता है, यही तो विनाश कहलाता है ।

मानव कितना अभागा, जढ़ी, मूढ़ एवं विषयासक्त हो गया है कि अपने ही कल्याण उद्धार एवं शाश्वतता-अमरता आदि की बात उसे नहीं सूझता; तो उसके कल्याण, उद्धार, मुक्ति-अमरता आदि की बात और किसको सूझेगा ? किसी को भी नहीं । अधिकतर मानव अनभिज्ञता, स्वार्थपरता एवं अहंकारिता रूप संकीर्णता को अपने अन्दर कायम रखते हुए अपने कल्याण एवं उद्धार रूप मुक्ति और अमरता से बंचित तो हो ही रहा है, शान्ति और आनन्द, अमन और चैन को भी नहीं जान-समझ पा रहा है । कुछ प्रत्यक्ष एवं क्षणिक सुख-सुविधाओं के वशीभूत होकर मानव इतना अन्धा हो गया है कि उसी सुखों के अन्दर निहित अपने अपूरणीय क्षति को ही नहीं देख-जान पा रहा है। क्षणिक तुच्छ सुख-सुविधाओं में ही फंस कर इतना भूल-भटक गया है कि शाश्वत शान्ति और शाश्वत आनन्द रूप मुक्ति और अमरता, सचिचदानन्द और परमानन्द, सत्यानन्द और सदानन्द को न तो जान-देख ही पा रहा है, न समझते-बूझते हुए उपलब्ध ही कर पा रहा है ।

इस समय तो चारों तरफ यह स्थिति-परिस्थिति हो गयी है कि परम सत्य-भगवान-यहोवा-गॉड-परमेश्वर-अल्लाहतआला, परमात्मा आदि का नाम लेना तथा उनपर यकीन और र्इमान तथा विश्वास और भरोसा के साथ उनके बताये मार्गों पर चलने में ही लोगों को लज्जा लग रहा है, भय लग रहा है, क्योंकि मिथ्याचारियों, मिथ्याभाषियों एवं भ्रष्टाचारियों का ही राज्य हो गया है। उन्हीं का चारों तरफ बोल-बाला एवं जोर-जुल्म है जिसके भय से आज सारी जनता ही अन्त करण से त्राहिमाम ! त्राहिमाम !! त्राहिमाम !!! की रट लगा रही है । स्थिति-परिस्थिति तो ऐसी हो गर्इ है कि भगवान के विनाशलीला में दुष्ट जन कब समाप्त हो रहे हैं। यही सभी देख रहे हैं । एक-एक दिन एक एक बरस के समान बीत रहा है । मगर भगवान अभी विनाश के बजाय सवांरने में लगे हैं ।

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2.8 माता-पिता की जिम्मेदारियाँ

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! माता-पिता के निर्देशन में प्रसव-सेविका (चमर्इन) द्वारा नार-पुरर्इन या ब्रह्रानाल काट दिया जाता है जिससे कि शिशु का ब्रह्रा-शक्ति या र्इश्वर-शक्ति या शिव शक्ति या आत्म शक्ति से सीधा सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है जिसके साथ ही जिहवा को तालू (कण्ठ-कूप) से खींच कर मुख में कर दिया जाता है जिससे कि शिशु का अमृत-पान से भी सीधा सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है । आँख उर्ध्वमुखी रूप में आज्ञा चक्र में दिव्य-ज्योति या ब्रह्रा-ज्योति या नूरे-इलाही या जीवन-ज्योति या चाँदना या सहज प्रकाश या स्वयं-ज्योति या डिवाइन लाइट या आत्म-ज्योति के दर्शन से शान्ति तथा अनहद नाद से आनन्द को कान (श्रवणेनिद्रय) के अन्तर्भाव से जो प्राप्त हो रहा था उससे भी, दीप-ज्योति तथा फूल के थाली की आवाज से आँख को अधोमुखी तथा कान (श्रवणेनिद्रय) को अन्तर्मुखी से बहिर्मुखी कर-कराकर इन्हीं बाहय वृत्तियों में शिशु को फंसा दिया जाता है जिससे इन शान्ति और आनन्द तथा शारीरिक पुष्टि की सारी जिम्मेदारियाँ ही माता-पिता अथवा संरक्षक पर आ जाती है, भले ही माता-पिता या संरक्षक द्वारा अनभिज्ञता के कारण ही उपरोक्त विधान किया-कराया गया हो ।

जिस प्रकार हाथ या पैर अग्नि में जानबूझ कर पड़े या अनजान में, उसे जलना ही है, शरीर जानकर या अनजान में भी गहरे पानी में पड़ने पर डूबना ही है, विधुत जानकारी अथवा अनजान में भी छू जाने पर झटका लगना या खिंचाव होना ही है, जहर जानकर या अनजान में खाया जाय तो मरना ही है, ठीक इसी प्रकार शिशु का ब्रह्रा-शक्ति या शिव-शक्ति या आत्म-शक्ति से सीधा सम्बन्ध विच्छेद जानकर किया-कराया जाय या अनजान में, उससे उत्पन्न शान्ति-आनन्द तथा शारीरिक-पुष्टि की जिम्मेदारियों का दायित्व माता-पिता या संरक्षक को वहन करना ही है साथ ही जो-जो उपलब्धियाँ जीव व शरीर को ब्रह्रा-शक्ति या शिव-शक्ति या आत्म-शक्ति से उपलब्ध होती रही है, उसे नकल या असल, पाखण्ड या यथार्थ रूप में शरीर को उपलब्ध कराने सम्बन्धी सारी की सारी जिम्मेदारियाँ ही माता-पिता या संरक्षक की होती हैं। इसलिए उसे पूर्त करने हेतु वे जिम्मेदार हैं । यदि माता-पिता या परिवार की सिथति-परिसिथति शिशु के उचित लालन-पालन या रक्षा-व्यवस्था का प्रबन्ध नहीं हो सकने की बात हो, तो तत्काल उनकी यह भरपूर जिम्मेदारी हो जाती है कि उस शिशु को किसी विशेष अपेक्षित (इच्छित) व्यक्ति को जो लालन-पालन या रक्षा-व्यवस्था हेतु सक्षम है, उसे बिना किसी शर्त एवं सोच-फिकर के सुपुर्द कर देवें; यदि ऐसा कोर्इ व्यक्ति उसे नहीं मिल पा रहा है तो किसी भी कल्याणकारी धार्मिक संस्था या किसी समाज कल्याणकारी संस्था को सुपुर्द कर देवें ताकि शिशु का उचित विधि-विधान से लालन-पालन होता रहे जिससे शिशु के उत्थान एवं विकास में किसी प्रकार की बाधा या समस्या न बन सके ।

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2.8.1 माता-पिता या संरक्षक दायित्व से बरी नहीं

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! कोर्इ माता-पिता या संरक्षक यह कह कर अपने दायित्व से बरी नहीं हो सकता है कि मेरी स्थिति-परिस्थिति विशेष खराब है। मैं एक निर्धन व गरीब व्यक्ति हूँ । इसलिए मेरे पास साधन नहीं है कि मैं शिशु का उचित विधि-विधान से लालन-पालन या रक्षा-व्यवस्था आदि कर सकूँ । शिशु का माता-पिता या संरक्षक बनकर तथा शिशु को अपना पुत्र-पुत्री या संरक्षित आदि मात्र कह-कहवा कर शिशु के भविष्य को बर्वाद या विनाश करने या अन्धकारमय बनाने का अधिकार किसी भी माता-पिता या संरक्षक को नहीं है । इसके बावजूद भी वह ऐसा करता है तो शिशु के भविष्य को बिगाड़ने या बर्बाद करने या अन्धकारमय बनाने का अपराध करता है और वह दण्ड का भागीदार है क्योंकि थोथे (झूठे) प्यार से शिशु का भविष्य अधिकाधिक महत्वपूर्ण है । लापरवाही बरतने वाला व्यक्ति क्षमा के योग्य नहीं क्योंकि यह एक दण्डनीय अपराध है।

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! कोर्इ शिशु माता-पिता या संरक्षक की सम्पत्ति मात्र नहीं होता, अपितु भावी समाज का एक भावी कर्णधार होता है। शिशुओं के उत्पत्ति के साथ ही समाज का भावी कर्णधार मानते, समझते तथा वैसा ही उसे लालन-पालन या रक्षा-व्यवस्था का उचित प्रबन्ध होना चाहिए तथा शिशुओं को पारिवारिक संकीर्णता एवं स्वार्थपरता से सदा ही बाहर निकल कर स्वच्छन्दतापूर्वक समाज में उठने का सुअवसर मिलना चाहिए तथा किसी भी प्रकार के भेद-भाव चाहे वह नीच -ऊँच का हो या गरीब-धनी का; चाहे वह लिंग-जाति का हो या काला-गोरा का भी क्यों न हो, हर वर्ग के शिशुओ को एक ही स्थान पर एक ही व्यवस्था में रहने और उठने देना अनिवार्यत: विधान होना चाहिए । किसी भी शिशु को अपना-पराया नामक शिक्षा-दीक्षा कदापि नहीं देनी चाहिए । सम्पूर्ण मानव एक ही परिवार के सदस्य हैं तथा मानवता का उत्थान ही एकमात्र सम्पूर्ण सदस्यों का दायित्व होना चाहिए । मानवता विरोधी किसी भी क्रिया-कलाप या व्यवहार को समाज में उत्पन्न ही नहीं होने देना चाहिए, यदि कहीं जानने-देखने में आता हो तो तत्काल निष्पक्षता पूर्वक जाँच कर-कराकर तुरन्त उसे समाप्त कर-करा देनी चाहिए ।

शिशुओं में ही एकता, सदभाव, सदविचार, सदव्यवहार एवं सतकार्य की जानकारी, समझदारी भरने की कोशिश करनी चाहिए । किसी भी शिशु को किसी भी माता-पिता या परिवार की व्यक्तिगत सम्पत्ति कदापि नहीं बनने देना चाहिए। शिशुओं को सदा ही एकमात्र यही शिक्षा-दीक्षा दिया जाय कि तू एक इकार्इ है तथा सम्पूर्ण मानव समाज ही तेरा एक परिवार है। मानव समाज सुधार एवं जीवों का उद्धार ही तेरा एकमात्र भाव, विचार व्यवहार एवं कार्य होना चाहिए क्योंकि यहाँ पर (पृथ्वी पर) न तो तेरा अपना कोर्इ है और न तू ही किसी का अपना है। सब कुछ परमसत्य रूप परमात्मा-परमेश्वर की एक श्रैष्टिक व्यवस्था है, जिसका तू एक र्इकार्इ है । व्यवस्था की गरिमा कायम रखना तेरा सर्वप्रथम एवं सर्व श्रेष्ठ दायित्व है । दायित्व से विचलित होना नि:संदेह दण्ड का भागी होना है। अनुशासन एवं र्इमान तेरा एकमात्र आधार है। दूरदर्शिता एवं दृढ़ निष्ठा के साथ कर्तव्य कर्मों का दायित्वपूर्ण निर्वाह तेरा लक्ष्य है ।

इस संसार में कोर्इ भी शरीर मात्र तेरा माता-पिता, भार्इ-बहन, हित-नात की नहीं; तू सदा-सर्वदा एक मुक्त पुरुष है, एक मुक्त नारी है; कोर्इ तेरा नहीं और तू किसी का नहीं; सब तेरे हैं, तू एकमात्र परम प्रभु का एक सच्चा और र्इमानदार अनुशासित एवं कर्मठ प्रतिनिधि है । तुझे जब तक भू-मण्डल पर रहने का सुअवसर मिला है । अपने कर्तव्यों को दायित्वपूर्ण तरीके से पालन करता हुआ परम प्रभु के दृष्टि में सतपात्र बना रहता है । अपने कर्तव्यों से कभी भी किसी भी प्रकार की समस्या आने पर या घटना घटने पर विचलित नही होना है अन्यथा अपने कर्तव्य से च्युत हो जाओगे तत्पश्चात् दुनियां में कोर्इ सहारा नहीं दे सकता । एकमात्र परम प्रभु ही तुम्हारा हितेच्छु हैं । हर उन माता-पिता एवं पारिवारिक संरक्षकों को अतीव प्रसन्नता होनी चाहिए जिनके पास शिशुओं के लालन-पालन एवं विकास करने-कराने के अथवा उचित साधन उपलब्ध करने-कराने की क्षमता न हो यानी निर्धन हों, गरीब हों, पारिवारिक कलह (आपसी वैमनस्व) में चल रहे हों कि शिशु किसी सक्षम व्यक्ति अथवा कल्याणकारी संस्था के माध्यम से उचित लालन-पालन भी पा रहा है तथा समाज में विकास कर रहा है, समाज में काफी प्रगति पर है। अपने उत्थान-कल्याण के मार्ग में लगा है।

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2 .8 .2 शिशुओं के प्रति सरकार का दायित्व

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! शिशुओं के भविष्य की सारी जिम्मेदारी सरकार की होनी चाहिए । शिशु एक सच्चा, र्इमानदार, त्यागी, सन्तोषी, सरकार के प्रति वफादार, सत्यभाषी एवं सदाचारी धार्मिक एवं वीर सत्पुरुष बने तथा शिशुओं का भविष्य अन्धकारमय कदापि न होने पावे, सदा ही उज्जवल बने-बना रहे। यह पूरी जिम्मेदारी सरकार की ही होनी चाहिए। सरकारी आय का कम से कम दस प्रतिशत शिशुओं के लालन-पालन, रक्षा-व्यवस्था एवं शिक्षा-दीक्षा आदि भविष्य उज्वल बनाने तथा बनाए रखने में खर्च करना चाहिए क्योंकि शिशु समाज का भावी कर्णधार होता है तथा सच्चा, र्इमानदार, धार्मिक, वीर, सत्पुरुष पाकर जिसमें वफादारी कूट-कूट कर भरी हो अच्छा नागरिक सरकार की सच्ची पूँजी होता है, सरकार का एकमात्र आधार होता है। सच्चा, धार्मिक, वीर, र्इमानदार एवं वफादार नागरिक बनाना एवं बनाए रखने की पूरी जिम्मेदारी, पूरा-पूरा दायित्व एकमात्र सरकार पर होना चाहिए ।

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2.8.3 भेद-भाव रहित ‘एकल’ स्थिति हो

सभी नागरिकों का एक ही धर्म, एक ही समाज, एक ही परिवार, एक ही दल, एक ही रीति-रिवाज, एक ही भाषा, एक समान ही उत्तम खान-पान एवं रहन-सहन तथा एक ही शिक्षा-दीक्षा अनिवार्यत: लागू होना चाहिए । भेद-दृष्टि को ही बदलने की तथा अभेददृष्टि स्थापित करने की व्यवस्था करना सरकार की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए । किसी भी प्रकार की सम्पत्ति पर किसी भी व्यक्ति विशेष का स्वत्वाधिकार नहीं होना-रहना चाहिए । सभी किसी भी प्रकार सम्पत्ति का मालिकान सरकार का ही होना-रहना चाहिये फिर तो चोरी-लूट-डकैती अधिकतर मार-काट-बेइमानी-घुसखोरी आदि भ्रष्टाचार सहज ही समाप्त हो जायेगा । निष्काम कर्म की पद्धति को प्रभावी तरीके से लागू करना-कराना चाहिए । सच्चे सम्पन्न-विकसित नागरिकता हेतु निष्कामी कर्मचारी अधिकारी-व्यापारी और नेता होना अनिवार्य होना चाहिए ।

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2.9 शिशु ही सुदृढ़ सामाजिक संरचना का आधार

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! शिशु ही किसी परिवार सरकार अथवा धर्म- समाज का एकमात्र आधार बिन्दु होता है । इसलिए किसी भी परिवार, सरकार या समाज को सम्पन्न, सुदृढ़ एवं उत्कृष्टतम् बनाने हेतु शिशुओं के लालन-पालन के समुचित व्यवस्था के साथ ही शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान देने की अनिवार्यत: आवश्यकता है । शिशु एक कोरा-कागज (सादा कागज) होता है । जैसे कोरे-कागज पर जैसा रेखा खींचा जायेगा या जैसा चित्र बनाया जायेगा या उस पर जो कुछ लिखा जायेगा वही खींच या बन जायेगा। कागज का विशेष महत्ता उस अंकित या चित्रित या लिखित विषय-वस्तु पर ही आधारित है । ठीक उसी तरह शिशुओं का मसितष्क होता है कि उसको जैसा रहन-सहन, लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा आदि होगा वैसा ही उसका विकास होगा । शिशु का विकास एवं कार्य ही समाज का विकास एवं कार्य है। जिस प्रकार शुद्ध एवं पुष्ट शरीर के लिए शुद्ध एवं पौषिटक आहार की आवश्यकता पड़ती है ठीक उसी प्रकार सुदृढ़ एवं सम्पन्न, शुद्ध एवं पुष्ट समाज के लिए शुद्ध एवं पुष्ट तथा उत्तम व्यक्तित्त्व वाले व्यक्तियों की आवश्यकता है जिसका आधार बिन्दु शिशु ही है । शिशुओं के समुचित रहन-सहन, लालन-पालन एवं शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था हुए बगैर सदृढ़ एवं सम्पन्न तथा उत्तम व्यक्तित्व वाला सुदृढ़ एवं सम्पन्न समाज की सम्भावना एक कोरी कल्पना मात्र ही रह जायगी ।

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2.10 शिशुओं की शिक्षा-दीक्षा संस्कृति परक

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! यदि अनुशासित एवं कर्मठ तथा सुदृढ़ एवं सम्पन्न समाज स्थित-स्थापित करना है तो उसके लिए यह आवश्यकता है कि शिशुओं के लालन-पालन के साथ ही संस्कृति परक शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था हो, सभ्यता परक नहीं । बालकों का आन्तरिक उत्थान (विकास) हुए बगैर बाहय चाहे जितना भी विकास हो जाय, शान्ति और आनन्द अथवा अमन-चैन का वातावरण कदापि नहीं बन सकता। जिस प्रकार वृक्ष का आन्तरिक जड़ों का विकास ऊपरी विकास को भी फैलाता और मजबूत करता जाता है, ठीक उसी प्रकार शिशुओं का विकास या उत्थान हेतु बाहय विकास की अपेक्षा आन्तरिक विकास की अनिवार्यत: आवश्यकता है । जिस प्रकार जड़ें मजबूत हुए वगैर वृक्ष उपरी विकास कर जाय तो वह गिरे बगैर टिक नहीं सकता, उसे गिरना ही पड़ता है । ठीक उसी प्रकार शिशुओं का आन्तरिक विकास हुए वगैर यदि बाहय विकास हुआ भी तो वह मानवता के स्तर पर टिक नहीं सकता। उसे गिरना या भ्रष्ट होना ही है । दैवी तो दैवी है, मानवीय गुणों पर भी वह टिका नहीं रह सकता ।

मानवीय गुणों पर सिथत रहने हेतु नैतिकता आवश्यक है और नैतिकता संस्कृति परक शिक्षा-दीक्षा के वगैर कदापि अन्दर आ नहीं सकती । सभ्यता परक शिक्षा विकास भ्रष्टता एवं विनाश के तरफ तथा संस्कृति परक शिक्षा-दीक्षा विकास-उत्थान एवं आबाद-कल्याण के तरफ ले जाता है । इसमें थोड़ा भी सन्देह करने की गुंजाइश नहीं है । सभ्यता परक जीवन की शुरुआत सरल और रूचिकर मध्य भ्रष्टतायुक्त तथा अन्त विनाश में होता है जबकि संस्कृति परक जीवन की शुरुआत में कष्टकारक मध्य थोड़ा कठोर एवं अन्त आनन्द दायक, प्रतिष्ठा मर्यादा संस्थापक एवं कल्याण कारक होता है । संस्कृति सभ्यता से हर प्रकार से श्रेष्ठतर उत्थान परक और कल्याणकर होती है ।

अन्तत: बतला देना चाहता हूँ कि कोर्इ परिवार, सरकार तथा समाज शिशुओं का आन्तरिक विकास किए वगैर सुदृढ़ एवं सम्पन्न, अनुशासित एवं कर्मठ समाज की संरचना कर ही नहीं सकता । यह आन्तरिक संस्कृति परक शिक्षा-दीक्षा से ही सम्भव है; सभ्यतापरक शिक्षा तो एक दिखावा मात्र है । संस्कृति परक शिक्षा-दीक्षा सैद्धान्तिक, प्रायौगिक एवं व्यावहारिक स्तर पर भी हो । सांस्कृतिक समाज का अर्थ नैतिक समाज से होता है जो मानवता से सराबोर होता है ।

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2.11 शिशुओं में माँ-बहनों का भाव जरूरी

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! उत्तम एवं सदाचारी व्यक्तित्त्व निर्माण हेतु शिशुओं में स्त्रियों-लड़कियों के प्रति माँ-बहनों का भाव भरना अनिवार्यत: पहलू है । जितनी औरतें माँ के योग्य (15 वर्ष से अधिक उम्र की) हों उन सभी के प्रति माँ का तथा शेष समस्त लड़कियों में बहन देखने का ही भाव भरना चाहिए । शिशुओं में औरतों और लड़कियों के प्रति सदा ही माँ-बहनों का भाव भरने का सुपरिणाम यह होगा कि गन्दे एवं बुरे विचार-भाव बनने ही नहीं पायेंगे, जिससे अच्छे विचार-भाव निर्विघ्न रूप से विकसित होते जायेंगे।

शिशुओं को सर्वप्रथम यह शिक्षा दिया जाय कि किसी भी बात अथवा कार्य को लेकर सम्पर्क में आने वाली औरत को ‘माँ’ का सम्बोधन करके कि ‘कहिए माँजी क्या बात है’ अथवा ‘कहिये माँ जी क्या सेवा है’, पुन: किसी बात या कार्य को लेकर सम्पर्क में आने वाली किसी भी लड़की को ‘बहन’ का सम्बोधन करके कि- ‘कहिये बहन जी क्या बात है ?’ अथवा कहिये बहन जी क्या कार्य है ? इस प्रकार के माँ-बहन का सम्बोधन करना प्रत्येक शिशुओं के लिए प्रभावी तरीके से अनिवार्यत: लागू करना चाहिए । माँ और बहनों को भी यानी औरतों और लड़कियों को भी ठीक उपरोक्त पद्धति से ही पुत्र और भइया सम्बोधन करने के पश्चात् ही अगली वार्ता या कार्य की बात करनी चाहिए । बालिकाओं को भी चाहिए कि- पुरुष या लड़कों को देख कर किसी भी बात या कार्य को आरम्भ करने से पहले या सर्वप्रथम ‘पिता जी या चाचा जी’ और ‘भइया’ जी सम्बोधन करने या उच्चारण करने के पश्चात् ही अपनी वार्ता या कार्य की बात आरम्भ करें । पुन: पुरुषों को भी चाहिये कि औरतों को बहन जी और लड़कियों को ‘कहो बेटी’ या ‘कहो पुत्री’ सम्बोधन के बाद ही अपनी वार्ता या कार्य की बात आरम्भ करें । यह पद्धति समाज पर प्रभावी तरीके से लागू होवे ताकि धार्मिक एवं ब्रह्राचारी, शिष्ट एवं सदाचारी, सुदृढ़ एवं समृद्ध-सम्पन्न समाज की संरचना होवे । मात्र पति-पत्नी के आपसी व्यवहार पर यह पद्धति लागू नहीं होगी मगर शेष सकल समाज पर तो लागू होना ही चाहिए ।

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2.12 शिशुओं की शिक्षा-दीक्षा पारिवारिक सम्पर्क से दूर

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! शिशुओं को शारीरिक विकास एवं शिक्षा-दीक्षा हेतु 3 से 4 वर्ष की आयु पूरा होते ही सक्षम एवं प्रभावी आश्रमों को सुपुर्द कर देना चाहिए तथा अपनी क्षमतानुसार निष्कपटतापूर्वक आश्रम के सेवार्थ या सहयोगार्थ साधनों को उपलब्ध करते-कराते रहना चाहिए । शैशव काल में माता-पिता अथवा पारिवारिक सदस्यों का सम्पर्क शिशु के उचित विकास में हमेशा ही बाधक होते हैं। इसलिए शिशुओं के उचित विकास हेतु अनिवार्य रूप से माता-पिता अथवा पारिवारिक सदस्यों का सम्पर्क बन्द होना चाहिए क्योंकि माता-पिता अथवा पारिवारिक सदस्यों के ममता-मोह रूपी थोथे (खोखले) प्यार की अपेक्षा शिशु का उत्थान महत्वपूर्ण एवं श्रेष्ठ मानना-जानना चाहिए। वास्तव में वह माता-पिता नहीं, जो शिशु के उचित विकास में ममता-मोह रूपी खोखले प्यार वश किसी भी प्रकार से बाधक बनता हो । वास्तव में सच्चा माता-पिता वही हैं जो ममता-मोह की अपेक्षा शिशुओं के उत्थान-विकास कल्याण को अधिकाधिक महत्व देतें हैं ।

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2.13 शिशुओं को 'आत्म-परिचय बहुत ही सावधानी से

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! शिशुओं को शिक्षा-दीक्षा देने के आरम्भ में सर्व प्रथम जो ‘आत्म-परिचय’ कराया जाता है उसे शारीरिक न होकर विद्यातत्त्वम् के माध्यम से कराया जाना चाहिए, ताकि शिशुओं की जानकारी सम्बन्धी दृष्टिकोण जढ़ता और असत्यता मूलक न होकर सत्यता मूलक हो। शिशुओं को ‘आत्म’ परिचय कराते समय तेजी या जल्दबाजी सम्बन्धी थोड़ा भी असावधानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि ‘विद्यातत्त्वं’ की यह पहली कड़ी या पहला सोपान है जिसको बहुत ही काफी सूझ-बूझ से कदम रखना-रखवाना चाहिये। अन्यथा परिचय सम्बन्धी गड़बड़ी या कदम-फिसलाव होने पर अगले सोपान या अगले कदम का उचित प्रारम्भ होना कठिन हो जायेगा । अर्थात् शिशु या विद्यार्थी का भविष्य अन्धकारमय यानी अन्धेरे में टटोलने वाला हो जायेगा, जो समाज मे आगे चलकर घातक परिणाम वाला हो जायेगा । इसलिए ‘आत्म’ परिचय को काफी गम्भीरतापूर्वक सावधानी के साथ प्रायौगिकता से युक्त परिचय देना-कराना चाहिए तत्पश्चात् शिशुओं या विद्यार्थियों से अनेकानेक बार पूछ-ताछ एवं परीक्षण लेते-देते हुए ही अगला कदम बढ़ाना चाहिए । शिशुओं या विद्यार्थियों को यह स्पष्टत: बताना-जनाना चाहिए कि ‘हम’ या ‘मैं’ शरीर नहीं है; अपितु शरीर से पृथक और श्रेष्ठ ‘जीव-रूह-सेल्फ-स्व-अहम्’ है जिसको संसार में यह शरीर नाना प्रकार से क्रियाशील होने और उपभोग करते हुए मुक्त भाव से भक्ति-सेवा सहित भगवन्मय या सत्यमय स्थिति-अवस्था में बनने बने रहने के लिए मिला है जिससे कि मानव जीवन का मंजिल ‘मोक्ष’ यानि मुक्ति और अमरता सुनिश्चित-सुरक्षित होवे-रहे और सांसारिक जीवन भी दोष रहित सत्य प्रधान होंवे-रहे।

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! विद्यातत्त्वम् की यथार्थत: जानकारी देने हेतु उसके अंगो-प्रत्यंगो को काफी सरल बनाते हुए यानी सरल, रोचक एवं आकर्षक तरीके को अपनाते हुए उस अंग-प्रत्यंग के गुण से सिद्ध या पहुँचे हुए महापुरुषों के कथानक को प्रस्तुत करते हुए विद्यार्थियों के समक्ष तथ्यों को रखा जाना चाहिए ताकि विद्यार्थियों में थोड़ा भी अरुचि न होने पाये । जैसे ‘सत्य’ से सम्बन्धित जानकारी देने में हरिश्चन्द्र और युधिष्ठर का कथानक, अहिंसा की जानकारी कराने में जैन-महावीर, वशिष्ठ, गौतम बुद्ध और गांधी जी आदि-आदि जैसे कथानकों को सरल, रुचिकर, आकर्षक एवं औपदेशिक भाषा-शैली में प्रस्तुत करते रहना चाहिए । त्यागी, सिद्ध, पहुँचे हुए आध्यात्मिक महापुरुषों और तात्तिवक सत्पुरुषों (भगवदवतारियों--श्रीविष्णु जी, श्रीराम जी, श्रीकृष्ण जी) के जीवन वृतान्त को शिशुओं या विद्यार्थियों के बीच कह-कहवाकर सुनाना एवं तत्पश्चात् उनसे समय-समय पर सुनते भी रहना चाहिए ताकि विद्यार्थियों का बहुमुखी विकास सरल तरीके से हो सके । ‘सत्यं बद, धर्मं चर’ विद्या का आधार होना चाहिए । विद्यातत्त्वम्-पद्धति ही शिक्षा-दीक्षा का एकमात्र आधार हो ।

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! शिशुओं या विद्यार्थियों को ‘आत्म’ परिचय मात्र शारीरिक ही नहीं, अपितु शारीरिकता से ऊपर जैविकीय (जीव-सम्बन्धी) तत्पश्चात् आध्यात्मिक या आत्मिक (आत्मा सम्बन्धी) भी कराया जाना चाहिए । इन तीनों स्तरों (शरीर, जीव और आत्मा अथवा शरीर, जीव, र्इश्वर अथवा शरीर, जीव, ब्रह्रा अथवा शरीर, जीव, शिव अथवा जिस्म, रूह, नूर अथवा बाडी, सेल्फ, सोल अथवा शरीर, अहम-¬, सो•हँ- ह ँसो) को पृथक-पृथक साफ-साफ स्पष्टत: कौन, क्या, कैसे, क्यों के सहित जनाया, समझाया, दिखाया एवं उससे सम्बन्धित अनुभूति कराया जाना चाहिए। इसी क्रम के अन्तर्गत चौथा स्तर-श्रेणी वाला तात्तिवक (तत्त्वज्ञान) यानी परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्रा-खुदा-गॉड-भगवान परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप विराट पुरुष को भी बात-चीत सहित साक्षात् दर्शन सहित जानकारी भी देना चाहिए ।

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