विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व को एक चेतावनी सर्वोत्तम उप्लब्धि कैसे प्राप्त करें?
महापुरुषत्त्व एवं सत्पुरुषत्त्व हेतु युवकों का आहवान अन्य महत्वपूर्ण लिंक निःशुल्क पुस्तक प्राप्त करें

3. शारीरिक परिचय 'यन्त्र' या गाड़ी से

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! विद्यार्थियों को अध्ययन कराते समय अथवा पढ़ाते समय यह शैली अपनानी चाहिए कि प्यारे विद्यार्थी बन्धुओं! जो आप को शरीर मिली है या जो हमें शरीर मिली है या जो किसी भी अन्य को यह मानव शरीर मिली है । यह मानव शरीर है । आप और हम शरीर नहीं हैं बल्कि शरीर आपकी और हमारी है । इस पर भी हमारा आपका मलिकाना नहीं है । हम आप इस मानव शरीर रूपी गाड़ी के चालक मात्र हैं, संचालक (मालिक) नहीं । इस शरीर का वास्तविक मालिक (संचालक) कोर्इ और ही है जिसको आगे जाना-समझा जायगा । यहाँ पहले शरीर को जाना जाय कि यह क्या है ? हमको-आप को यह क्यों मिली है तथा हमको-आपको इसके साथ किस प्रकार का वर्ताव-व्यवहार करना-कराना चाहिए ?

यह मानव शरीर है, जो आकाश, वायु, अग्नि, जल और थल रूप पाँच जड़ पदार्थों के संयोग से बनी है । इन पांच जड़ पदार्थ तत्त्वों को जानने, देखने, समझने, ग्रहण करने हेतु इनके अपने-अपने विषय या सूक्ष्म तनमात्राएं हैं जैसे -- शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध । इन पाँच जड़ पदार्थ तत्त्वों के पाँचों विषयों के तथा इन पाँचों विषयों से सम्बन्धित जानकारी करने-कराने हेतु अपनी-अपनी पृथक-पृथक पाँच ज्ञानेनिद्रयाँ कर्ण, त्वचा, नेत्र, जिहवा और नाक है जो अपने-अपने पदार्थ तथा पदार्थ से सम्बन्धित विषयों की जानकारी से सम्बन्धित एक-एक विभाग है । जानकारी के अनुसार कार्य हेतु इन पाँचों ज्ञानेनिद्रयों के सहायक रूप में अपने-अपने कर्मेनिद्रयाँ भी कुल पांच हैं जो वाक, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा नाम से जानी जाती है । साथ ही इस मानव शरीर में इन्द्रियों के चालन एवं नियन्त्रण हेतु मस्तिष्क भी है जो सिर में है। प्रत्येक इन्द्रियों से कार्य करने-कराने तथा इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखने हेतु मस्तिष्क तथा इन्द्रियों के मध्य सम्पर्क बनाये रखने हेतु नस-नाडि़याँ भी हैं। शारीरिक ढांचा को सुदृढ़ एवं सुडोल बनाने हेतु हाड़, मांस, मज्जा आदि भी शरीर में हैं । इस प्रकार इन सभी अंग-प्रत्यंगों से बना इस पूरे सृषिट का यह (मानव शरीर) एक सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वोत्तम आकृति है जिसके समान धरती पर, यहाँ तक कि पूरे सृष्टि में भी कोर्इ भी अन्य आकृति नहीं है । इतना ही नहीं, इसे ऐसे भी जान लेवें कि यह वह आकृति है जिसमें सृष्टि के संचालक रूप सृष्टि के सर्वोच्च शक्ति-सत्ता सामर्थ्य रूप भगवान को भी जब-जब भू-मण्डल पर अवतरित होना होता है तो प्राय: इसी मानव शरीर से ही होता है, जो भगवदावतार या पूर्णावतार नाम से जाना जाता है। इससे इसकी वास्तविक महत्ता अच्छी प्रकार से अवश्य ही जान-समझ लेना चाहिए ।

प्यारे बन्धुओं ! इससे इस मानव शरीर के यथार्थत: महत्व को जानना-समझना, देखना, परखना-पहचानना चाहिए कि हमको आपको सर्वोच्च शक्ति-सत्ता-सामर्थ्य रूप भगवान ने कितनी उत्कृष्टतम् शरीर (मानव शरीर) दिया है। हमारा और आपका यह फर्ज होना चाहिए अथवा यह कर्तव्य होना चाहिए कि आखिरकार यह इतनी उत्कृष्टतम शरीर हमें या आपको क्यों मिली ? साथ ही यह बराबर ही ध्यान रखना होगा कि जिस लक्ष्य को लेकर यह मानव शरीर मिली है क्या हमारा कदम उस मार्ग या लक्ष्य से भ्रमित या विचलित तो नहीं है ? और यदि भ्रमित और विचलित हो तो तत्काल ही अपने को सम्भालने का अनिवार्यत: प्रयत्न करना-होना चाहिए और सही मार्ग यानी लक्ष्य से जुड़ने और जुड़े रहने का प्रयत्न करना चाहिये। हर हालत में करना-रहना ही चाहिये जिससे कि जीवन सफल-सार्थक हो जाय ।

Go to Top »

4. जैविकीय-परिचय (गाड़ी चालक से)

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! जैविकीय-परिचय के अन्तर्गत जीव तथा जीव से सम्बन्धित जानकारियाँ आती हैं । जैसा कि पिछले प्रकरण में बतलाया गया है कि हम-आप मानव शरीर नहीं हैं बल्कि यह मानव शरीर हमको और आप लोगों को मिली है कि मुक्त रहते हुए तथा लक्ष्य के अनुकूल कार्य करते हुए आनन्दोपभोग करें। जिसके कृपा से यह शरीर जिस कार्य के लिए मिली है, उसी के लिए उसी के कार्य में इसे अन्त तक लगाये रखें। जैसा कि कहा गया है और कहा जा भी रहा है कि हम-आप शरीर नहीं हैं, बल्कि शरीर हमारी और आप की है, तो तत्काल ही यह प्रश्न बनता है कि तब हम और आप क्या हैं ? तो इसके जवाब में यह जानना-समझना चाहिए कि ‘हम’ और ‘आप’ इस शरीर के अन्दर रहने वाले एक ‘जीव-रूह-सेल्फ-स्व-अहं’ हैं, जो मिली हुर्इ शरीर के द्वारा कार्य करते तथा उसके अनुसार भोग-भोगते रहते क्रम में बार-बार अनेकानेक बार अनेकानेक योनियों (आकृतियों) में भ्रमण करते रहते हैं । उसी परिभ्रमण के क्रम में भगवत कृपा-पात्र विशेष योनि रूप उत्कृष्टतम् मानव शरीर में आये हैं । जिसका सर्व प्रथम और अन्तत: लक्ष्य किसी भी प्रकार के बन्धन से मुक्त होना रहना है या सभी बन्धनों से मुक्त होते हुए अमरता से युक्त होना-रहना ही इस मानव शरीर के प्राप्ति का एकमात्र लक्ष्य है। जीव को यदि मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध प्राप्त नही हुआ तो सारा मानव जीवन व्यर्थ ही समझें । क्योंकि मानव योनिका एकमात्र उददेश्य या लक्ष्य या मंजिल मुक्ति-अमरता रूप ‘मोक्ष’ की प्राप्ति यानी साक्षात् अद्वैत्तत्त्व बोध प्राप्त करना ही होता है ।

आइये अब यह जाना-समझा जाय कि वास्तव में ‘जीव’ या ‘लार्इफ’ या ‘रूह’ या ‘स्व’ या अहम क्या है ? ‘सूक्ष्म’ रूप में कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय एवं मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से युक्त ‘सूक्ष्म’ शरीर ही ‘जीव’ है । दूसरे शब्दों में ‘मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से युक्त सूक्ष्म शरीर’ ही ‘जीव’ या ‘लार्इफ’ या ‘रुह’ या ‘हम’ है । इस प्रकार स्पष्ट हुआ कि हम, आप शरीर कदापि नहीं हैं बल्कि शरीर में रहने वाले ‘हम’ एक ‘जीव’ या ‘रूह’ या ‘सेल्फ’ है। यह जो मनुष्य शरीर हम-आपको मिली है यह इसी ‘हम’ ‘जीव’ के द्वारा चालित है या एक प्रकार से यह कहा जाय कि ‘समस्त क्रियाशील आकृतियाँ’ ही ‘जीव’ के द्वारा ही क्रियाशील हैं । हम-आप एक ‘जीव’ हैं, ‘लार्इफ’ हैं, ‘रूह’ हैं तथा हमारा-आपका ठिकाना ‘स्वाधिष्ठान चक्र’ है ।

हमारा-आप का अध:पतन रूप ही प्रजनन या सन्तानोत्पत्ति है तथा हमारा-आप का उत्थान ही आध्यात्मिक ह ँसो व ज्योति रूप जीवात्मा और हमारा-आप सभी का ही एकत्वबोध रूप मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध रूप मोक्ष ही मंजिल है जो भगवत प्रापित के वगैर सम्भव ही नहीं और तत्त्वज्ञान के वगैर भगवत प्राप्ति भी सम्भव नहीं होती। इसकी व्याख्या अगले प्रकरण ‘आत्मिक-परिचय’ में क्रमश: जाना-समझा जायेगा ।

यहाँ यह बात यथार्थत: जना-समझा देना चाहता हूँ कि किसी भी विद्यार्थी को अथवा व्यक्ति को पतनोन्मुख नहीं होना-रहना चाहिए। प्रत्येक को ही चाहिए कि उत्थान के प्रति ही सदा उन्मुख रहे । इतनी महत्वपूर्ण, सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वोत्तम् मानव शरीर को पाकर भी यदि अपना उत्थान का रास्ता अपनाते हुए परमकल्याण रूप उद्धार अथवा मुक्ति और अमरता को हासिल नहीं कर लिया तो आखिरकार इस मानव शरीर से और विशेष लाभ क्या प्राप्त कर सकता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं । उससे बढ़कर अभागा और कौन जीव होगा जो मनुष्य जैसी सर्वोत्कृष्ट योनि (आकृति) पाकर भी अपने परम लक्ष्य रूप परमसत्य को या परमात्मा-परमेश्वर को नहीं पाया हो । अपने को बन्धन से मुक्त, परमात्मा से युक्त होते-रहते हुये अमरत्त्व न प्राप्त कर लिया हो । मोक्ष प्राप्त न कर लिया हो । अन्तत: उसका सारा मानव जीवन ही व्यर्थ ही हो जायगा ।

Go to Top »

5. आध्यात्मिक ‘आत्म-परिचय’

सद्भावी-सत्यान्वेषी बन्धुओं ! आध्यात्मिक ‘आत्म परिचय’ से तात्पर्य योग-साधना अथवा अध्यात्म के माध्यम से ‘आत्म’ यानी आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा- ज्योतिर्मय शिव की जानकारी एवं दर्शन करते हुए अपना (आत्मिक) परिचय प्राप्त करना है । पिछले प्रकरणों में आप बन्धुगण जानते-देखते आये हैं कि हम-आप ‘शरीर’ कदापि नहीं हैं, परन्तु अब बात रही कि हम-आप ‘जीव’ हैं जैसा कि कहा जा चुका है अथवा आत्मा हैं, जो अब कहा जा रहा है । कहने का तात्पर्य यह है कि पिछले प्रकरण में बार-बार कहा गया है कि हम-आप ‘जीव’ या ‘लार्इफ’ या ‘रूह’ या ‘सेल्फ’ या ‘स्व’ या ‘अहम’ हैं । अब यहाँ हैं ‘आत्म-परिचय’ कि ‘आत्म’ क्या है ? इसी की जानकारी करनी है, जो ‘आत्म’ परिचय होगा यही ही अपना असली परिचय-पहचान होगा। ‘आत्म’ शब्द की जानकारी विशद रूप में इसी सदग्रन्थ माला के ‘आत्म-ज्योति के रहस्य’ नामक पुष्पिका में है । वहीं एक बार पुन: देखा जाय तो अच्छा होगा । हालांकि संक्षिप्तत: यहाँ पर भी कुछ दिया ही जा रहा है जिसको बहुत गौर करके जाना-देखा जायगा तो समझ में आयेगा, चंचलता में तो इसे हजारों बार पढ़कर भी नहीं समझा जा सकता है ।

5.1 पतनोन्मुखी सोsहँ

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! ज्योतिर्मय ‘आत्म’ वह चेतन सत्ता है, जो सर्वोच्च शक्ति-सत्ता-सामर्थ्य रूप परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्द रूप गॉड-अलम् से सीधे प्रकट और पृथक होकर शून्य में स्वछन्द विचरण करने लगा जिससे कि ज्योति छिटककर पृथक रूप में गतिशील होने लगी । इसी प्रकार सर्वोच्च-शक्ति-सत्ता-सामर्थ्य रूप परमतत्त्वं रूप आत्मतत्त्वम् शब्द रूप अद्वैत्तत्त्वम् से ‘आत्म’ शब्द प्रकट और पृथक होकर ‘द्वैत’ शब्द को सार्थक किया तत्पश्चात् पुन: द्वैत से द्वैत-द्वैत से द्वैत के क्रमश: विधान से ब्रह्रा ज्योति रूप ब्रह्रा-शक्ति या दिव्य ज्योति रूप र्इश्वर-शक्ति या स्वयं-ज्योति रूप शिव-शक्ति या आत्म-शक्ति शब्द-रूप (ज्योति) दोनों के आपसी मेल और टकराव से ‘आत्म’ शब्द से चेतन जीवधारी सत्ता तथा ज्योति रूपा शक्ति से जड़-पदार्थ जड़ जगत (ब्रह्राण्ड) की रचना या उत्पत्ति या निर्माण हुआ । तत्पश्चात् शाक्तिक ब्रह्राण्डीय रचना शरीर और ‘आत्म’ --दोनों की आपसी मेल से ‘आत्म’ चेतन सत्ता ही शरीर धारी मायाकृत ‘अहम्’ हुआ । यह ‘अहम्’ ही जीव-रूह-सेल्फ-स्व भी कहलाया । इस प्रकार ज्योर्तिमय स: जीवधारी शरीरों के जीवों तथा परमतत्त्वम् रूप खुदा-गॉड-भगवान या परमसत्य के बीच सम्बन्ध स्थापित रखते हुए परमेश्वर से चेतना शक्ति जो प्राप्त होता है, उसे लाकर श्वाँस के माध्यम से शरीरान्तर्गत जीव को जीवनी शक्ति प्रदान करता रहता है। यह ही आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा-नूर-सोल-स्पिरिट-ज्योर्तिमय शिव भी कहलाता है ।

जीवन पर्यन्त ऐसा सहज ही होता रहता है। यह ही श्वास-नि:श्वास के माध्यम से पतनोन्मुखी सोsहँ की सहज स्थिति है । पुन: योग साधना करते समय सुषुम्ना के माध्यम से साधक, आध्यात्मिक महानुभावों को चेतना-शक्ति मिलती है जिससे कि वे सिद्ध और दैवी कृपा-पात्र होते हैं तथा इंगला और पिंगला के माध्यम से गृहस्थ वर्ग चेतना शक्ति को जीवनी शक्ति के रूप में जीव-रूह-सेल्फ-स्व प्राप्त करता-रहता है जिससे जीव रूप अहं जीवनी शक्ति प्राप्त करता हुआ शरीर में जीवित रहता है । परमात्मा यदि ज्योतिर्मय स: को श्वाँस के माध्यम से चेतनता रूप जीवनी शक्ति जीव-रूह-सेल्फ को प्रदान न करे या प्रदान करना बन्द कर दे तो शरीरान्तर्गत जीव तत्काल ही इस ही शरीर को छोड़कर अन्य निर्देशित गन्तव्य स्थान तक पहुँच जाता अथवा स्वयं नहीं निकलने पर निकालकर पहुँचा दिया जाता है जिससे शरीर मृतक घोषित हो-हवा कर बर्वाद या विनाश को प्राप्त हो जाता है । ज्योतिर्मय स: के वगैर जीव का और जीव के वगैर शरीर का स्वत: कोर्इ अस्तित्व-महत्व या स्थान नहीं है। शरीर को बर्बाद होना ही पड़ता है ।

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! यह तो सही है कि हम-आप शरीर नहीं, अपितु शरीर के अन्दर रहने वाले ‘जीव’ हैं । साथ ही साथ यह भी सत्य है कि ‘स:’ से पृथक ‘जीव’ में जीवत्व भाव ही या चेतना शक्ति ही नहीं रह जायगी अर्थात ‘जीव’ के वगैर जो दशा शरीर का होता है वही दशा ज्योतिर्मय स: से रहित जीव का भी होता है क्योंकि अहं रूप ‘जीव’ जिस प्रकार शरीर में प्रवेश किये रहता है तो सभी लोग नाजानकारी वश शरीर ही को मैं-मैं, तू-तू करके जानने-मानने लगते हैं, ठीक उसी प्रकार ‘सूक्ष्म’ शरीर रूप ‘जीव’ में जब तक ‘आत्मा’ का प्रवेश रहता है तब तक ही यह भान होता है कि हम-आप ‘जीव’ हैं । परन्तु यथार्थत: देखा जाय तो आत्म-ज्योति रूपा आत्म-शक्ति रूप आत्मा ही जब श्वाँस के माध्यम से शरीर में प्रवेश करती है तो मूलाधार में वह आत्मा ही गुण-दोषमय सूक्ष्म आकृति से युक्त होकर ‘जीव’ (अहं-) सूक्ष्म शरीर रूप में परिवर्तित हो जाता है। यहाँ पर यह जान लेना चाहिए कि ज्योतिर्मय आत्म हो या ज्योतिर्मय स: दोनों चेतन ज्योति रूप में एक ही समान होते हैं। इस प्रकार आत्मा से जीव रूप में अथवा स: से अहं या मैं या हम शब्द जीव मात्र का ही संकेत है । इसमें थोड़ा भी सन्देह नहीं है परन्तु उसके साथ ही साथ यह भी जान-समझ लेना जरूरी ही है कि अहं या मैं हम जीव का ही संकेत होने-रहने के बावजूद भी अहं या मैं या हम का अस्तित्त्व मात्र उतना देर ही है जितना देर या समय दो स्वाँसों के बीच होता है अथवा अगला श्वाँस लेकर या पुन: श्वाँस लिए बगैर जितने देर या समय तक शरीर में ‘जीव’ स्थित रह सके; मात्र इतना ही देर के लिए ‘जीव’ या अहं या मैं या हम का अस्तित्त्व होता है। इससे थोड़ा भी अधिक की गुंजार्इश नहीं । साथ ही ‘जीव’ या अहं या मैं या हम की क्षमता या शक्ति-सामर्थ्य भी उतना ही समझना चाहिए जितना कि पुन: श्वाँस का सहारा लिये वगैर रहा जा सकता है। इससे अधिक तो सोचना-समझना भी नाजानकारी एवं नासमझदारी का परिचय देना ही होगा । जीव को जीवनी शक्ति प्रदान करते रहने की सहज स्थिति ही पतनोन्मुखी सोsहँ है जिससे सभी शरीर ही जीवित रहता है । अर्थात् जीवित शरीर सोsहँ की ही होती है । यह आत्मा की जीवमय और जीव की शरीर-मय सहज होते रहने वाली स्थिति है ।

Go to Top »

5.2 उर्ध्वमुखी हँसो

यही कारण है कि योग-साधना अथवा आध्यात्मिक क्रियाओं-प्रक्रियाओं के द्वारा अपने अहं नाम जीव को स:ज्योति नाम-रूप आत्मा से जोड़-जुड़ा कर आत्मामय बनना चाहते तथा उसी को लक्ष्य बनाकर सतत् प्रयत्नशील भी रहते हैं । यह स्थिति उध्र्वमुखी हँसो की होती है । यहाँ पर इन योगी-साधक या आध्यात्मिक क्रियाओं-प्रक्रियाओं से युक्त बन्धुओं को बतला देना चाहता हूँ कि शरीर क्रियाशील या ‘जीव’ ही कहिए क्रियाशील रहते ‘आत्मा’ या आत्म-शक्ति या ब्रह्रा-शक्ति या र्इश्वरीय-शक्ति या शिव-शक्ति को यह क्षमता या शक्ति-सामर्थ्य नहीं प्राप्त है कि ये अहं या जीव या मैं या हम को अपने में विलय कराते हुए शरीर और जीव को संसार में क्रियाशील रूप में स्थित रख लें । यह क्षमता या शक्ति सामर्थ्य एकमात्र परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्द रूप भगवत्तत्त्वम् रूप गॉड अल्लाहताला में ही है कि वह जब जिसे चाहें, अपने में विलय कर-करा या साथ ही जिसको जैसा चाहें वैसा बनावें । ब्रह्रा-शक्ति या शिव-शक्ति या आत्म-शक्ति या र्इश्वरीय शक्ति यहाँ तक कि आदि शक्ति भी इसी के इशारे पर कार्य करती हैं । हाँ, स: ज्योति ही साधना सिद्धि वाले साधकों को और कुछ अपनी विशेष शक्ति अहँ को प्रदान करती रहती है । वह भी उसी को जो पतनोन्मुखी सोsहँ से ऊर्ध्वमुखी हँसो साधना में सतत् प्रयत्नशील रहता है।

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! असलियत यह है कि यह शरीर मात्र ‘जीव’ के द्वारा ही चालित या क्रियाशील नहीं होती, अपितु शरीर ‘जीव’ और ‘आत्मा’ दोनों के संयुक्त विधि-विधान से ही क्रियाशील होती रहती है । अकेला न तो जीव ही शरीर को क्रियाशील कर सकता और न आत्मा ही शरीर का सीधे चालन या क्रियाशील कर सकती है क्योंकि शरीर में प्रवेश के पश्चात् गुण-दोष से युक्त होते ही आत्मा को जीव रूप में परिणत होना ही पड़ेगा क्योंकि ऐसा ही श्रैष्टिक विधान है । आत्मा को सदा ही परमात्मा के सम्पर्क और निर्देशन में ही कार्य करना होता है। परमात्मा से सम्पर्क टूटते ही आत्मा को अस्तित्त्वहीन होना ही पड़ेगा । इसलिए शरीर का संचालन परमात्मा आत्मा के माध्यम से जीव करता है तथा शरीर का चालन या क्रियाशील जीव आत्मा के सहारे यानी सहयोग से करता है । इस प्रकार शरीर क्रियाशील जीव से होती है, जीव क्रियाशील आत्मा से होता है तथा आत्मा रूपीं चेतना-शक्ति सदा ही परमात्मा से निकलती और स: नाम से जीव को मिलती रहती है । यह ही सोsहँ की सहज स्थिति है ।

आत्मा जब सांसारिक जीवधारी के सम्पर्क में रहती है तो आदि शक्ति रूपा महामाया अपने सम्पर्क में आते ही आत्मा को ही सृष्टि चलाने हेतु गुण-दोष से युक्त करके जीव रूप में परिणत कर-करा लेती है तत्पश्चात् सामान्य श्रैष्टिक विधि-विधान के अनुसार जन्म कर्म तथा उसका भोग और मरण पुन: जन्म कर्म तथा उसका भोग और मरण यही क्रम तब तक चलाती रहती है जब तक कि खुद परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्द रूप भगवत्तत्त्वम् रूप शब्द ब्रह्रा या गॉड या अलम् का ही पूर्णावतार होकर तत्त्वज्ञान से अपने में विलय कराते हुए पूर्णत: अपने पास रहने हेतु निर्देश नहीं दे देता है, तब तक जीव को जन्म और मरण कर्म और भोग और मरण के मध्य ममता-मोह-तृष्णा के बन्धन में बँधकर भवसागर में आवागमन (जन्म-मृत्यु) का चक्कर काटते रहना पड़ता है ।

Go to Top »

5.3 भाग्यशाली होने पर भी अभागापन

मानव शरीर एक परीक्षा रूप में जीव को मिलता है कि जीव ‘मुक्ति और अमरता’ रूप मोक्ष के सर्वोत्कृष्ट साधन रूप मानव शरीर पाकर अपना उद्धार कर-करा लेता है या नहीं। एक तो मानव शरीर का जीव को मिलना ही भगवत कृपा की बात है, उसमें भी भगवदावतार को अपने शारीरिक काल में ही होना और मिलना तो यह जानना-मानना चाहिए कि भगवत कृपा विशेष इतनी है कि कोटिश: कोटिश: जन्म-जन्मान्तर के बाद भी जल्दी जीवों को नहीं मिलता है, वही मिल गया है । अगर इस पर भी जीव सर्वतोभावेन भगवद समर्पण और शरणागत कर-होकर तत्त्वज्ञान को प्राप्त करता हुआ भक्ति-सेवा द्वारा मुक्त-अमर नहीं हो लेता, तो इससे बढ़कर और अभागापन क्या होगा ?

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं से अन्तत: बता देना चाहता हूँ कि जिस प्रकार जीव के बगैर शरीर का कोर्इ अस्तित्व और महत्त्व नहीं रहता है । ठीक उसी प्रकार आत्मा के बगैर जीव का भी अस्तित्व और महत्त्व समाप्त हो जाता है तथा आत्मा का तो अस्तित्व और महत्त्व एकमात्र परमात्मा के सम्पर्क शरण में अपने को बनाये रखने तक ही रहता है अर्थात परमात्मा से सम्पर्क कटते या छूटते या टूटते ही आत्मा नाम का भी अस्तित्व ही समाप्त हो कर मायाकृत जीव रूप में परिवर्तित हो जाता है । फिर भी शरीर पर्यन्त हम-आप जो शरीरधारी के रूप में है । वह एक तरह से गृहस्थ रूप में आत्मा-जीव शरीरमय (सोsहँ) और योगी-आध्यात्मिक रूप में जीवात्मा (हँसो) मय शरीर ही होते हैं जो परमात्मा के इशारे पर ही उत्पन्न और क्रियाशील होते रहते हैं । ये जीवात्मा (हँसो) भी परमात्मा (परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान) के कृपा पात्र होकर ही मुक्त अमर हो सकता है । इसका अर्थ-- भाव यह हुआ कि सोsहँ (आत्मा-जीव शरीरमय) और हँसो (जीवात्मा) मय शरीर भी स्वयं भी मुक्त नहीं हैं तो दूसरे को मुक्ति कैसे दे सकते हैं ? अर्थात नहीं दे सकते है ।

Go to Top »

6. तात्तिवक परिचय ‘तत्त्वज्ञान’ से

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! आदि से भी पूर्व जब कि एक ‘शब्द’ (बचन) के सिवाय और कुछ भी नहीं था । उस समय एक मात्र परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्द रूप भगवत्तत्त्वम् रूप ‘शब्द’ (बचन) मात्र ही था जो परमेश्वर या परमब्रह्रा या परमात्मा या अल्लाहताला या यहोवा या परमसत्य या सर्वोच्च शक्ति-सत्ता-सामर्थ्य रूप भगवान से युक्त था और वह ‘शब्द’ (बचन) ही परमेश्वर था । परम आकाश रूप परमधाम में वास करने या रहने वाला अविनाशी एवं अमर परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्द रूप भगवत्तत्त्वम् रूप परमसत्य रूप शब्द ब्रह्रा रूप परमब्रह्रा या परमेश्वर या परमात्मा या गॉड या अल्लाहतआला या सर्वोच्च शक्ति सत्ता सामर्थ्य रूप भगवान या परम प्रभु ही एकमात्र थे जिनमें चेतन रूप समस्त देवगण तथा जड जगत़ रूप समस्त विश्व ही समाहित था । उसी जड़-चेतन से युक्त परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् या गॉड या अलम् शब्दरूप खुदा-गॉड-भगवान को ही स्पष्टत: एवं परिपूर्णतम् रूप से जानने-समझने तथा साक्षात् देखने-पहचानने हेतु ही वेद की ऋचायें बनीं। वेद की ऋचाओं में परमतत्त्वम् रूप शब्द ब्रह्रा की जानकारियाँ गोपनीयता की शर्तों को बनाये रखते हुए सांकेतिक रूप में स्पष्टत: दी गर्इ है। साथ ही साथ श्रैष्टिक विधान भी उसमें (वेद में) दिया गया है परन्तु जढ़ी एवं मूढ़ मानव जान-समझ, देख-पहचान बोध न कर सके तो इसमें परमेश्वर का क्या दोष ? जिसने अनन्य श्रद्धा-भक्ति के साथ खोजा, वह पाया परन्तु पाने वालों के समकालीन पढ़े-लिखे शिक्षित, विद्वान एवं शासन-प्रशासन करने वालों ने उस समय उसे माना ही नहीं और नहीं तो भगवत प्राप्त लोगों से टकराते हुए समाज में उनकी काफी निन्दा की गर्इ, आलोचना किया गया, विरोध और संर्घष किया गया। समाज में उनके प्रति घृणा का वातावरण उत्पन्न कर-कराकर उसको चारों तरफ फैलाया गया । उसे दुष्प्रचारित किया गया, नाना तरह की यातनाएँ एवं प्रताड़नाएँ दी गर्इ । फिर भी भगवत प्राप्त सत्पुरुषों ने सब सहन किया तथा समाज को यह स्पष्टत: दिखला दिया कि सत्य सत्य ही है और सत्य का नाश नहीं होता। अन्तिम विजय सत्य की ही होती है तो फिर परम प्रभु जो कि परमसत्य है, उनकी बात ही क्या ? और इन सारे यातना-विधानों के पश्चात् प्रत्येक देश-काल के सत्पुरुषों के सम्बन्ध में ही प्राय: यह देखा गया है कि कुछ लोग तो उसके जीवन काल में ही परन्तु अधिकतर लोग उसके शरीर छूटने के पश्चात् उसी भगवत प्राप्त सत्पुरुष के नाम-रूप को ले-लेकर समाज में जप-तप, कीर्तन, भजन, यशोगान, नमाज, बन्दगी, अराधना, पूजा-विधान आदि गा-गा कर के शान्ति की अनुभूति प्राप्त करते हैं ।

इतना ही नहीं, जहाँ पर उस सत्पुरुष की शरीर पैदा हुर्इ रहती है । जहाँ पर वह भगवत प्राप्ति किये रहता है । जहाँ पर उसे यातनाएँ दी गर्इ रहती हैं । जहाँ-जहाँ वह उपदेश दिया रहता है । जहाँ-जहाँ पर उनके चरण पधारे होते हैं तथा जहाँ पर वह अन्त में शरीर छोड़ता है । उन-उन सभी स्थानों को पवित्र तीर्थ स्थल मानते-कहते हुए वहाँ-वहाँ जाते हैं। तपस्या करते हैं । नाना विधानों से कष्ट झेलते हैं तथा कष्ट झेलते हुए भी अपना भाग्य मानते हैं । यह क्रम प्राय: सदा से चला आ रहा है ।

फिर भी मनुष्य कितना जढ़ी ? कितना मूढ़ ? कितना अन्धा ? कितना दिल का कठोर होता है ? कि सब कुछ पढ़ते हुए, सुनते हुए, जानते हुए, देखते हुए, सामने पड़ने पर समझते और मानते हुए भी अनपढ़ों जैसे, अनसुनी जैसे, अनदेखे जैसे, नासमझ जैसे, जाहिल-जपाट जैसे, हिंसक-पशुओं जैसे बात करता है, व्यवहार करता है तथा उन्हीं परम्पराओं को पुन: दुहराते हुए वैसा-वैसा ही व्यवहार से वर्तमान में भी पेश हो रहा है । क्या ही तरस आता है इन जढ़ी एवं मूढ मानव बन्धुओं पर कि संसार में ये इतने जकड़ गये होते हैं कि इनको अपना ही कल्याण और उद्धार नहीं सूझ रहा है । अपने वदकारी व हितकारी को नहीं समझ पा रहा है जबकि गुजरे हुए सत्पुरुषों के नाम-रूप-स्थान के पीछे-पीछे कल्याण के भाव में दौड़ रहा है परन्तु एकमात्र समाज सुधार और समाजोद्धार रूप कल्याण में लगे सत्पुरुषों को जानने-पहचानने, अपना कल्याण करने-कराने की कोशिश या प्रयत्न नहीं कर-करा लेता है ।

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! एक तरफ तो संसार को परम प्रभु ने एक लीला क्षेत्र या लीला भूमि या रंगमंच बनाया जहाँ पर जीव को शरीर देकर निष्काम कर्म करते हुए शान्ति के साथ आनन्दोपभोग करता हुआ ‘दोष रहित मुक्ति-अमरता’ से युक्त भरा-पूरा सर्वोत्तम् जीवन पद्धति अथवा ‘निर्दोष मुक्त-अमर’ और भरा-पूरा सर्वोत्तम् जीवन पद्धति अथवा ‘दोष रहित मुक्ति-अमरता’ से युक्त भरा-पूरा सर्वोत्तम् जीवन-पद्धति पर शरीर पर्यन्त स्थित रहता हुआ भगवद् लीला का पात्र बने तथा शरीर छोड़कर अन्त में भगवन्मय होता हुआ भगवद्धाम को पहुँचे । परन्तु महामाया ने संसार में कामिनी-कांचन या व्यक्ति-वस्तु या शरीर-सम्पत्ति के प्रति ममता-आसक्ति रूप मोह का इतना जबर्दस्त जाल फैला रखा है कि जीव शरीर के माध्यम से इसमें ऐसा जकड़ जाता है कि अपने असल मालिक रूप परम प्रभु को तो भूल ही जाया करता आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा-शिव ज्योति को भी भूल गये इतना ही नहीं आप ‘हम’ जीव हैं उसे भी याद नहीं रख सके भूल गये है । सांसारिक मायाजाल में फंस कर कर्म और भोग के माध्यम से यहीं जकड़ कर आवागमन रूप भवसागर में डूबता-उतराता रहता है । फिर भी उसी में भटकता, ठोकरें खाता रहता है । आश्चर्य की बात तो यह है कि फिर भी समझ नहीं, कि जो हुआ सो हुआ अब से भी तो अपना कल्याण एवं उद्धार कर-करा लेवें । भगवदावतार के शरणागत होकर अपने आप ‘हम’ जीव को मोक्ष यानि मुक्ति-अमरता दिला लेवे ।

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! परम आश्चर्य की बात तो यह है कि भगवान के ही सृष्टि में, भगवान के ही धरती पर, भगवान के ही अनन्य प्रेमियों, अनन्य सेवकों, अनन्य भक्तों एवं भगवान के ही सेवा-प्रचार-कार्य में लगे हुए सत्पुरुषों को अपारकष्ट, असहनीय यातनाएँ, घोर निन्दा एवं घोर विरोधों के साथ ही साथ अति संघर्षों के दौर से गुजरने या चलने हेतु दुष्ट-समाज मजबूर करता रहता है । परम प्रभु के आश्चर्यमय लीला विधान को क्या कहा जाय कि भगवान के ही लीला धरती पर भगवान के ही अवतरण व शरीर धारण करने पर भगवद अवतार वाली शरीर तक की निन्दा, आलोचना, विरोध तथा घृणा का भाव फैलाते हुए उन्हें भी अपार कष्ट एवं असहनीय यातनाएँ दिये बगैर यह समाज नहीं माना और न मान रहा है । आदि में श्रीविष्णु जी तथा समस्त उनके समर्थकों देववर्ग को जालन्धर ने काराबन्द किया; श्रीराम जी तथा उनके सभी समर्थकों को मेघनाथ ने नाग-पाश में बांधा तथा राम-लक्ष्मण को अहिरावण कारा बन्द कर बलि देना चाहा। श्री कृष्णजी के माता-पिता को कंस ने कारा बन्द किया तथा वर्तमान में भी वही हाल हो रहा है; ऐसा करने वाले सभी का विनाश हुआ और वर्तमान में भी होता जा रहा है, होता रहेगा भी ।।

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! परमतत्त्वम् रूप शब्दब्रह्रा की सम्पूर्ण कार्यकारी क्षमता अथवा सर्व शक्ति सत्ता सामर्थ्यवान की सम्पूर्ण क्षमता-शक्ति तीन यूनिट(र्इकार्इ) यानी तीन भागों में कार्य करने वाली सम्पूर्ण क्षमता-शक्ति एकमात्र परमप्रभु में ही निहित या समाहित रहती है । जिसमें एक यूनिट(इकार्इ) में सम्पूर्ण देव समाज (चेतन वर्ग) आदि शक्ति सहित सम्पूर्ण सृष्टि (जड़ वर्ग) उत्पन्न होता है तथा उत्पन्न हुए चेतन-जड़ मय सृष्टि को स्थित क्रियाशील होने-रहने हेतु दूसरी युनिट(इकार्इ) आती है जिससे पहली र्इकार्इ से उत्पन्न हुए चेतन देववर्ग और जड़ रूप सारा विश्व को क्रियाशील बनाए रखती है और जड़ में गति एवं चेतन वर्ग द्वारा क्रियाशीलता होती रहती है जबकि यथार्थत: मूल रूप में जड़ वर्ग तथा चेतनवर्ग दोनों के संचालन एवं नियन्त्रण रूपी बागडोर तीसरी इकार्इ के हाथ में होता है । पहली-दूसरी और तीसरी यानी तीनों यूनिट(इकार्इ) वाली क्षमता वाले एकमात्र परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप शब्द ब्रह्रा रूप परमप्रभु में ही सदा से रहता चला आ रहा है और रहेगा भी। वही एकमात्र सदा सत्य, शाश्वत, अमर, परमानन्द व सचिचदानन्द रूप परमपद वाला है । शब्दब्रह्रा रूप परमप्रभु जो संकल्प शक्ति से युक्त था जिसके अन्दर कुछ हो ! ऐसा होने का संकल्प हुआ-जिससे उनके अन्तर्गत निहित संकल्प शक्ति उन्हीं से प्रकट होकर उन्हीं की अंगभूता अर्धांगिनी रूपा आदि शक्ति हैं, जो महामाया या मूल प्रकृति भी है । उसी ने ‘आत्म-ज्योति’ से चेतन वर्ग और जड़ वर्ग (आत्म से चेतन वर्ग तथा ज्योति से जड़ वर्ग) को उत्पन्न या रचना किया ।

आदिशक्ति अथवा मूल प्रकृति अथवा महामाया ने ही अपने एकमात्र स्वामी रूप परमब्रह्रा परमेश्वर के सकाश से ही सर्वप्रथम ब्रह्रा-विष्णु-महेश को उत्पन्न कर अपनी माया से ब्रह्राणी-रमा-उमा रूप में उत्पन्न कर सृष्टि-उत्पत्ति करने हेतु नियुक्त ब्रह्रा के सहयोगार्थ ब्रह्राणी (स्वरसती) को दिया और सृष्टि-पालन हेतु नियुक्त श्रीविष्णु जी के सहयोगार्थ रमा (लक्ष्मी) को दिया तथा सृष्टि-संहार हेतु नियुक्त शंकर (महेश) के सहयोगार्थ ‘उमा’ को दिया तथा इन देवों-देवियों को इच्छा शक्ति प्रदान करते हुए सृष्टि उत्पत्ति-पालन तथा संहार का कार्य-भार सौंपा और ये लोग अपना-अपना विभाग स्थापित करके इच्छा शक्ति के माध्यम से कार्य आरम्भ किया तथा आदिशक्ति ने स्वयं अपने स्वामी रूप भगवान के सेवार्थ परमधाम में ही स्थित रहीं, जो समय-समय पर इन उपरोक्त देवों-देवियों को निर्देशित करती रहती है ।

धरती पर जब कभी कहीं-कहीं या किसी-किसी स्थानों पर कोर्इ जबर्दस्त असुर उत्पन्न होता था-होता है, जो सृष्टि के सामान्य प्रक्रिया के अनुसार न चलकर मानव के साथ-साथ देवों-देवियों की मर्यादा को समाप्त करने लगता था, तो ये स्वयं प्रकट होकर उसका संहार भी करतीं रहीं-रहती हैं। परन्तु धरती की पूरी की पूरी विधि-व्यवस्था ही छिन्न-भिन्न हो जाने पर सर्वोच्च शक्ति-सत्ता-सामर्थ्यवान रूप परमतत्त्वम् रूप परमप्रभु खुद अपने परमधाम से अवतरित होकर भू-मण्डल के किसी शरीर को धारण कर महामाया रूप आदिशक्ति को भी सह लीला भागीदार बनाते हुए दुष्टों का दलन गुप्त या प्रकट रूप से करते-कराते हुए ‘सत्य-धर्म’ की स्थापना तथा सत्पुरुष का राज्य स्थापित करते-कराते हुए पुन: ‘दोष रहित सत्य प्रधान’ एवं मुक्ति-अमरता से युक्त भरा-पूरा सर्वोत्तम् जीवन विधान, लागू करते-कराते हैं । पृथ्वी पर ‘सत्य-धर्म’ स्थापित करते-कराते है। तत्पश्चात् परमधाम को वापस हो लेते हैं ।

Go to Top »


« Previous Chapter   Next Chapter »