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7. ‘आत्म’ और ज्योतिर्मय स:

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! सर्व नाम-रूप समाहित एकमात्र परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप शब्दब्रह्रा रूप परमब्रह्रा रूप अद्वैत्तत्त्वम् से ही संकल्प के आधार पर प्रथम कड़ी या पहली इकार्इ रूप ‘आत्म’ शब्द जो ज्योति से युक्त था । अपने मूल रूप परमतत्त्वम् रूप परमप्रभु से प्रकट होकर सृष्टि रचना हेतु पृथक हुआ। साथ ही साथ ज्योति रूपा शक्ति भी प्रकट हुर्इ । पुन: ‘आत्म’ और ज्योति पृथक-पृथक हुए यानी ‘आत्म’ से ज्योति पृथक हो गर्इ, जिससे कि ज्योति परिवर्तनशीलता एवं पृथक्कीकरण रूप अपने सिद्धान्त के अनुसार विभिन्न नाम-रूपों वाली आकाश-वायु-अगिन-जल और थल तथा उनसे बनी या उत्पन्न वस्तुओं के रूप में जड़-जगत बना-बनाया जो सब तरफ दिखायी दे रहा है तथा ‘आत्म’ शब्द अपने चेतनता विशेषता के रूप में अपने रहने योग्य बने समस्त आकृतियों से ही ‘एकोsहं बहुस्याँ बभूव’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन व संस्थापन करते हुए समस्त चेतन योग्य आकृतियों से एकरूपता एवं स्थरीकरण रूप सिद्धान्त को प्रतिपादित एवं संस्थापित करते हुए संयुक्त हुआ । यही कारण है कि सम्पूर्ण जीवधारी मानव शरीर आदि ‘एक’ ही मैं से सम्बोधित होता है यानी अपने को प्राय: सभी मैं या हम या अहम् ही संकेत करके बोलते-कहते हैं परन्तु वे हैं अंशवत मात्र ही । सम्पूर्ण जीवधारी शरीर इस मैं द्वारा चालित होता है और वह ‘मैं’ ही जीव-रूह-सेल्फ कहलाता है ।

सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! उपर्युक्त पैरा में ‘आत्म’ के सम्बन्ध में कि जीवधारी शरीरों(शरीऱ अहम्) से किस प्रकार का लगाव तथा बात-व्यवहार होता-रहता है । अब आप बन्धुगण इस पैरा में दूसरे इकार्इ के सम्बन्ध में कि जीवधारी शरीरों से किस प्रकार का लगाव तथा बात-व्यवहार होता है । यह जानना-देखना-समझना है । परमप्रभु ने एक इकार्इ शक्ति-सत्ता से तो चेतन वर्ग और जड़ वर्ग रूप विश्व-सृष्टि को उत्पन्न किया-कराया तथा दूसरी इकार्इ शक्ति-सत्ता के माध्यम से अपने तथा जीव वर्ग के मध्य सम्पर्क बनाए रखने हेतु ‘तत्’ (ज्योर्तिमय स:) नामक दूसरी इकार्इ को अपने से ही प्रकट करते हुए प्रयुक्त किया जो शरीऱ सोsहँ यानी आत्मा जीव की ओर होता हुआ शरीरमय होता रहता है। यह दूसरी इकार्इ शक्ति-सत्ता रूप ज्योतिर्मय स: का एकमात्र कार्य जीव वर्ग से सम्पर्क बनाये रखते हुए परमप्रभु से प्राप्त चेतनता रूप जीवनी-शक्ति जीव को प्रदान करते हुए क्रियाशील बनाए रखते हुए उनसे सम्बन्धित हो रहे सम्पूर्ण क्रिया-कलापों का सन्देश परम प्रभु तक पहुँचाते रहना होता है ।

इस प्रकार ज्योर्तिमय स: नामक दूसरी इकार्इ शक्ति-सत्ता को जो व्यक्ति योग-साधना अथवा आध्यात्मिक क्रिया-प्रक्रियाओं के अभ्यास से जान-देख कर मेल-मिलाप करते हुए योगाभ्यास या आध्यात्मिक साधनाभ्यास से जारी रखता है यानी शरीर हँसो यानी शरीर जीव की ओर होता हुआ आत्मामय होते रहते है । वही सिद्ध योगी, पहुँचा हुआ ऋषि-महर्षिगण, ब्रह्रार्षि, आत्मवेत्ता आदि कहलाते हैं । ज्योर्तिमय स: के साधनाभ्यासी ही अध्यात्मवेत्ता महापुरुष आदि बनते होते हैं । यहाँ पर हो सकता है कि ‘तत्’ कह देने मात्र से बन्धुओं में भ्रम उत्पन्न हो जाया करे। इसलिए भ्रम निवारण हेतु यहाँ पर यह बतला देना भी उचित ही लग रहा है कि इसके सही-वास्तविक जानकारी हेतु तत्त्वज्ञान के प्रायौगिक कक्षा से गुजरना अनिवार्य है ।

‘तत्त्वज्ञान’ वास्तव में वह जानकारी-विधान है जिसमें सम्पूर्ण (संसार, शरीर, जीव, आत्मा या र्इश्वर या शिव और परमात्मा या परमेश्वर) की सम्पूर्णतया (शिक्षा, स्वाध्याय, योग-साधना अथवा अध्यात्म और तत्त्वज्ञान रूप सत्यज्ञान) पृथक-पृथक बात-चीत और साक्षात्-दर्शन सहित समाहित होता-रहता है जो भगवद समर्पित-शरणागत जिज्ञासु भक्तजनों को भकित-सेवार्थ और मुकित-अमरता रूप मोक्षार्थ प्राप्त होता रहता है । वर्तमान में भी सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस ‘सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद’ वाले द्वारा प्राप्त हो भी रहा है । भगवद समर्पित-शरणागत जिज्ञासु भक्त ही पाता है यहाँ पर शंका-समाधान और जाँच-परख के लिए हर वर्ग सम्प्रदाय के जिज्ञासुओं हेतु खुली छूट है मगर शान्तिमय ढंग से सदग्रन्थों (वेद-उपनिषद-रामायण-गीता-पुराण-बाइबिल-कुर्आन आदि) के आधार पर ही, मनमाना नहीं । सब भगवत कृपा ।

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7.1 चेतन सत्ता की जढ़ता

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! ज्योतिर्मय आत्म और ज्योर्तिमय स: नामक पहली और दूसरी इकार्इ शक्ति-सत्ता के आपसी मेल-मिलाप और प्रभाव से मनुष्य अपने को किस प्रकार के व्यवहार में रखता है । यही इस पैरा में जाना-देखा-समझा-बूझा जायेगा । ज्योतिर्मय आत्म नामक पहली इकार्इ सत्ता-शक्ति से तो चेतन वर्ग तथा जड़ वर्ग दोनों के संयुक्त रूप से उत्पन्न सृष्टि (ब्रह्राड) की उत्पत्ति तथा आपसी सहयोग से कामिनी-कांचन या व्यक्ति-वस्तु या शरीर-सम्पत्ति के बीच व्यवहार तो होता या चलता ही रहता है । चूँकि पहली इकार्इ सत्ता-शक्ति सृष्टि रूप बड़े पैमाने पर फैलने अथवा अनेकानेक नामों रूपों में विभाजित हो जाने से सामान्य क्रिया-कलाप वाला हो जाता है। ‘आत्म’ नामक जो चेतन सत्ता-शक्ति है वह अपने आगे-पीछे-दायें-बायें, ऊपर-नीचे या सब तरफ से जड़वर्ग से घिरा हुआ रहने के कारण अपने से पृथक दूसरी इकार्इ जो पृथक चेतन रूप ज्योर्तिमय स: सत्ता-शक्ति है को भी भूलकर और शरीर में अपने आप ‘हम’ (अहम्) जीव को भी भूलकर शरीर या आकृतियों को ही अपना नाम रूप मानकर उसी शरीर प्रधान जढ़ी (जड़ता मूलक) व्यवहार से व्यवहृत होने लगता है जिसका दुष्परिणाम यह होता है कि चेतना-सत्ता-शक्ति वाला जीवधारी मनुष्य जढ़तामूलक कामिनी-कांचन, व्यक्ति-वस्तु अथवा शरीर-सम्पत्ति को ही अपना एकमात्र लक्ष्य बनाकर उसी में संग्रह रक्षा आदि में लगा रहता हुआ हर प्रकार का कुकर्म जैसे झूठ, चोरी, डकैती, लूट, राहजनी, अपहरण, व्यभिचार, बलात्कार तथा समस्त भ्रष्टाचारों का मूल रूप घूसखोरी आदि पर भी उतारू होकर करने-कराने लगते हैं । जिससे सारी विधि-व्यवस्था ही तहस-नहस हो जाया करती है और चारों तरफ हाहाकार की स्थिति उत्पन्न हो जाया करती है जिससे आर्थिक सन्तुलन भी समाप्त हो जाया करता है । शान्ति और आनन्द तो शान्ति और आनन्द है, सुख और सन्तोष भी कहीं नजर नहीं आता। परिवार और शरीर भी पैसे के समक्ष महत्वहीन हो जाया करता है।

इसके साथ ही साथ आर्थिक असन्तुलन के कारण चारों तरफ ही लूट-खसौट हिंसा की प्रवृत्ति भी जोर पकड़ लिया करती है जैसा कि आज भी चारों तरफ ही दिखलायी दे रहा है । ऐसी स्थिति-परिस्थिति से ऊबकर कुछ लोग शान्ति और आनन्द के तलाश में परमप्रभु से प्रार्थना नमाज-बन्दगी, पूजा-आराधना आदि करने-कराने लगते हैं तो कुछ लोग योगी-यति, ऋषि-महर्षी, प्राफेट-पैगम्बर तथा आध्यात्मिक महात्माओं आदि महापुरुषों की तलाश तथा उनसे योग-साधना अथवा आध्यात्मिक क्रियाओं-प्रक्रियाओं का अभ्यास करने-कराने लगते हैं । जो शान्ति और आनन्द के प्राप्ति कराने वाला होता है तथा अभ्यासानुसार प्राप्ति होता भी है । मगर यहाँ पर जान-समझ लेना जरूरी है कि ‘मुक्ति’ और अमरता इसमें (योग-साधना-अध्यात्म में) होता ही नहीं; फिर इससे मिलेगा कैसे ? अर्थात् नहीं मिल सकता । यह (मुक्ति और अमरता) तो एकमात्र ‘तत्त्वज्ञान’ में होता-रहता है और ‘तत्त्वज्ञान’ से ही मिलता है और तत्त्वज्ञान भू-मण्डल पर रहता ही नहीं तो कोर्इ उसे दे कैसे सकता है ? अर्थात् नहीं दे सकता । तत्त्वज्ञान तो भगवान का परिचय-पहचान होता है जो सदा-सर्वदा भगवान के साथ ही रहता है । जब-जब भू-मण्डल पर भगवान का अवतार होता है तब तब ही तत्त्वज्ञान भी उन्हीं से प्राप्त होता है ।

अब पुन: यहाँ पर यह देखना है कि आखिर योग-साधना या अध्यात्म क्या है कि जिससे शान्ति और आनन्द की अनुभूति होने लगता है। आखिरकार वह शान्ति और आनन्द आता कहाँ से है जो योगाभ्यासी को अनुभूति में मिलता है। योग का सामान्य अर्थ जुड़ना या मिलना होता है । अब पुन: प्रश्न बनता है कि किससे किसको मिलना है ? मिलने में या जुड़ने में सर्व प्रथम बात यह है, दो का होना, जिन दोनों को आपस में मिलना या जुड़ना होगा । यह तो स्प्ष्ट ही हो गया कि दो हैं जिन्हें आपस में मिलना है। वह दो कौन-कौन हैं ? आइये बन्धुओं अब ठीक तरह से देखा जाय ।

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7.2 तथाकथित अपनों द्वारा शोषित ‘अहम्’

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! दोनों का शोध करता हुआ जब आगे बढ़ा जायेगा तो जानने-देखने में यह मिलेगा कि एक तो वह है जो शरीर के अन्दर अहम् या मैं या आर्इ शब्द से शरीर में रहता हुआ शरीर को क्रियाशील करता या बनाये रहता है तथा दूसरा वह है जो श्वाँस के माध्यम से सदा ही प्रवेश करने वाला ज्योतिर्मय ‘स:’ है। जैसा कि योगाभ्यास या साधनाभ्यास या आध्यात्मिक क्रियाओं को करने से जानकारी प्राप्त होती है अथवा अन्तर्मुखी होकर सुनने पर पकड़ में आता है अब जो अन्तर्मुखी होकर योग-साधना के अभ्यास के द्वारा इसे जान-समझ कर दोनों ‘सो-अहँ’ तथा अहँ-सो को बराबर मेल-मिलाप रखते हुए अहम्-मैं-जीव को स: (सो) के विधि-विधान के अनुसार मेल-मिलाप करते-कराते हुए एकीकृत रूप में होने-रहने का अपने अभ्यास को काफी समय तक स्थिर (समाधि) रूप में रखता रहता है, तब यह अहम्, स: सत्ता-शक्ति जो शान्ति और आनन्द के अनुभूति के साथ-साथ ज्योतिर्मय ब्रह्रा शक्ति-शिव शक्ति के रूप में भी प्राप्त करता रहता है तत्पश्चात् अहं जीव ज्योतिर्मय (आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा-शिव) ही होता हुआ एकीभाव में हो जाया करता है। इस प्रकार इस प्रकरण से स्पष्ट हो जा रहा है कि अहम् की क्षमता, स: से बहुत कम यानी स: के अपेक्षा अहम् के पास नगण्य सी क्षमता रहती है । इसका एक प्रमुख कारण यह है कि अहम् शरीरान्तर्गत इनिद्रयों के माध्यम से अपनी सारी क्षमता तो जानकारी-नाजानकारीवश शरीर और सम्पत्ति अथवा व्यक्ति और वस्तु अथवा कामिनी और कांचन के पीछे नाना प्रकार से उड़ाता यानी खर्च करता रहता है जिससे कि वह बिल्कुल क्षमता (सत्ता-शक्ति) हीन होकर क्षमता (सत्ता-शक्ति) सम्पन्न ज्योतिर्मय स: से मिलता है तथा उससे जीवनी शक्ति सहित शान्ति और आनन्द की अनुभूति भी यानी पुन: क्षमता (सत्ता-शक्ति) प्राप्त करता रहता है ।

यहाँ पर दो बातों पर विशेषत: गौर करने या ध्यान देने की बात है कि ‘आत्म’ जो अहम् शब्द रूप जो क्षमताहीन हो चुका है, वह कैसे क्षमताहीन (शान्ति और आनन्द से हीन) हो गया ? तो यह स्पष्टत: चारों तरफ दिखलायी दे रहा है कि संसार में जो कोर्इ भी शरीर के माध्यम से अपना-अपना बना हुआ है, वह मात्र हमारे क्षमता को या इससे होते रहने वाले लाभ उपार्जन को ये अपने कहलाने वाले तथाकथित शोषित करने मात्र के लिए ही ये सब अपना बने हुए हैं । यदि इन अपनों को पता चल जाय कि हम से इनको अब कोर्इ लाभ या कुछ प्राप्ति होने को नहीं है, तो उसी दिन, उसी क्षण हमको ये लोग ठुकराये या छोड़े बगैर नहीं रह सकेंगे, तत्काल त्याग या हटाकर ही चैन लेंगे ।

इस प्रकार बन्धुओं ! इन बातों पर एकान्त में बैठकर थोड़ा गौर करते हुए विचार-मन्थन किया जाय तो स्पष्टत: यही बात दिखलायी देगी। इस प्रकार अहँ तो तथाकथित अपनों द्वारा बिल्कुल ही शोषित होता रहता है । यही कारण है कि अहँ के पास शान्ति और आनन्द तथा सिद्धि नाम की चीज बिल्कुल ही समाप्त हो गयी रहती है । इतना ही नहीं यह अहँ तो इतना क्षमताहीन हो गया होता है कि उनमें फँस-बँध-जकड़ कर असहाय की तरह उन्हीं शोषकों रूप अपनों के बीच पड़ा रहता है, चाहते हुए भी उसमें से निकल नहीं पाता। जब खुदा-गॉड-भगवान की विशेष कृपा पाता है, तब ही निकल पाता है । बहुत तो निकल कर भी फिर उसी में गिर जाते है और करोड़ों बार के लिये जनम-मृत्यु की दु:सह पीड़ा दायक यातनाओं से तड़पते गुजरते रहते हैं सम्भल ही नहीं पाते है । क्योंकि वे इतना क्षमता हीन हो गये होते हैं कि उनमें सम्भलने की क्षमता ही नहीं रह पाती, वे सम्भलें तो सम्भले कैसे ?

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7.3 परमप्रभु द्वारा स:

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! एक तरफ तो शोषकों के बीच पड़कर ‘अहं’ (जीव-रूह-सेल्फ) इतना काफी शोषित कर लिया जाता है कि क्षमता (शान्ति और आनन्द तथा सिद्धि) के मामले में तो अहँ बिल्कुल ही शुष्क या मृत प्राय: यानी शून्य की स्थिति में पहुँच गया होता है तथा दूसरे तरफ ज्योतिर्मय सर्वोच्च सत्ता-शक्ति-सामर्थ्य रूप शब्दब्रह्रा के पास से आता है । जहाँ शोषण शब्द का तो कल्पना ही नहीं किया जा सकता है । केवल जहाँ प्राप्ति ही प्राप्ति है । जहाँ परम शान्ति और परम आनन्द ही है । वहाँ शान्ति और आनन्द की क्या कमी ? जहाँ आदि शक्ति या महामाया ही अर्धांगिनी और सेविका है, वहाँ सिद्धियों की क्या कमी ? हाँ कमी तो वहाँ प्राप्त करने वाली अपनी पात्रता की होती या रहती है । वहाँ प्राप्ति तो भरपूर है परन्तु लेना-पाना अपनी पात्रता रूपी क्षमता पर आधारित है । जिसकी जितनी जैसी पात्रता होती या रहती है, वह वहाँ उतना ही पाता है । वहाँ पाने और लेने पर किसी को भी किसी भी प्रकार का रोक नहीं होता। समुद्र में से जल लेने वालों को कौन टोक या रोक सकता है कि इतना जल मत लीजिए, जल कम हो जायगा या समाप्त हो जायगा । तो जब एक इतने छोटे स्तर वाले समुद्र की यह हाल है, तो उस शान्ति और आनन्द तथा शक्ति के परम-परम-परम----सागर में कौन रोकने टोकने वाला है अर्थात् कोर्इ नहीं। उसमें से असली शान्ति और आनन्द तथा सिद्धि तो एकमात्र अनन्य भगवत प्रेमीगणों को ही सुलभ हो पाता है जिसको समझना भी अनन्य प्रेमियों के अलावा अन्य के लिये असम्भव है, क्योंकि भगवत प्रेमी के आनन्द को भगवत प्रेमी ही जान सकता है, अन्य उस रहस्य को कदापि नहीं जान सकते हैं।

इस प्रकार बन्धुओं ज्योर्तिमय स: का आगमन भी शान्ति और आनन्द तथा सिद्धियों से युक्त होता है । योगाभ्यास या साधनाभ्यास के माध्यम से जो-जितना मेल-मिलाप या सम्बन्ध स्थापित रखते हुए उससे (स: से) जितना अपने अहँ को एकीभाव कर पाता है, उतना ही शान्ति और आनन्द तथा सिद्धियों को प्राप्त कर पाता है । इसमें भी अभ्यास सदा ही जारी रखना पड़ता है । शरीर रहते अभ्यास बन्द कदापि नहीं करनी चाहिए क्योंकि अभ्यास बन्द होते ही पुन: शान्ति और आनन्द की कमी तथा सिद्धियों की मन्दी होने लगती है, जो ठीक नहीं है । स: का यही कार्य होता है कि परमप्रभु से प्राप्त शान्ति और आनन्द तथा शक्ति-सिद्धि (जीवनी शक्ति) को अहँ (जीव-रूह-सेल्फ) को प्रदान करना और जीवों के दु:खद एवं अपूर्त (कमियों) दुष्कृत्यों-पापों से युक्त सूचनाओं या समाचारों को ले जाकर परमप्रभु के समक्ष रखना या पहुँचाना। इस प्रकार बन्धुओं अब तक पहली और दूसरी इकार्इ सत्ता-शक्ति के कार्यों और प्रभावों को आप लोगों ने पढ़ा-जाना और समझा । आगे अब यह देखना है कि ज्योतिर्मय स: से प्राप्त क्षमता का दुरुपयोग कैसे-कैसे होने लगता है ।

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7.4 ज्योतिर्मय स: से प्राप्त क्षमता का दुरुपयोग

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! मनुष्य के ‘अहम्’ की क्षमता शक्ति जब तथाकथित अपनों द्वारा शोषित कर लिया जाता है जिससे कि शान्ति और आनन्द तथा सिद्धियों से शून्य अहम मूलाधार-चक्र से उठ कर परमप्रभु कृपा से गुरु के द्वारा आज्ञा-चक्र स्थित स: से जब मिलता है, तो पहले तो ज्योतिर्मय स: के साक्षात्कार मात्र से ही ‘अहम्’ को काफी शान्ति और आनन्द की अनुभूति प्राप्त होती है तत्पश्चात् सिद्ध-सक्षम गुरु के आज्ञानुसार रहते हुए योगाभ्यास करते हुए अपने अहम् को ज्योतिर्मय स: रूप के विधि-विधानों के अनुसार यानी अहम को ज्योर्तिमय स: के साथ एकीभाव से जब मेल-मिलाप रूपी योगाभ्यास में लीन हो जाता है, तो पुन: शोषित अहम् (ज्योतिर्मय स: से युक्त हो जाया करता है जिससे समाज में मानव-कल्याण रूप अपना असल कर्तव्य-कर्म की जागृति यानी स: के तरफ से प्रेरणा मिलती है और यह स: से पूरित अहम् ज्योतिर्मय स: से युक्त होकर संयुक्त रूप में एक होकर योगी-यति, ऋषि-महर्षि, आध्यात्मिक सन्त-महात्मा आदि जैसे के व्यवहारों से व्यवहृत होने लगता है मगर इसमें प्रत्याहार यानी पारिवारिक रहन-सहन का त्याग अनिवार्य है । समाज में आदर-सम्मान, मान-प्रतिष्ठा आदि की यत्र-तत्र प्राप्ति होने लगती है तथा इनके इस कल्याणकारी योजना या कार्य में आत्म-कल्याण या आत्मोत्कर्ष या आत्मोत्थान हेतु इनके अनेकानेक बहुत से शिष्य एवं अनुयायी होता हुआ इनके पीछे-पीछे चलने-रहने लगते हैं ।

आप बन्धुओं से यहाँ पर उपरोक्त मूलभूत शब्दों को योग के क्षेत्र के अतिरिक्त तत्त्वज्ञान के प्रभाव या सहयोग से कुछ यथार्थत: अर्थ रखे जा रहे हैं, जिसे यदि आप गौर करके पढ़ेंगे तब, समझ-बूझ के अनुसार आनन्द की उपलब्धि होने लगेगी और यदि इसे सूझ-बूझ के साथ जीव के अन्दर बैठाया गया तथा अपने जीवन को सर्वतोभावेन भगवद समर्पित और शरणागत भाव से अपना कदम आगे बढ़ाया गया, तो नि:सन्देह ज्योतिर्मय स: क्या ज्योतिर्मय स: के भी पिता रूप परमसत्य या परमतत्त्वम् खुदा-गॉड-भगवान के विशेष कृपा का पात्र होता हुआ परमशान्ति और परम आनन्द से युक्त होता और रहता हुआ सीधे आदि शक्ति और परमप्रभु का ही शरण और संरक्षण प्राप्त करने लगता है। जो मुक्ति-अमरता रूपी मोक्ष रूपी मंज़िल होता है ।

आइये बन्धुओं अब उन मूलभूत कुछ प्रमुख शब्दों के यथार्थता को जाना-देखा जाय जो जीवन को मुक्ति और अमरता तथा शाश्वत शान्ति और शाश्वत आनन्द को उपलब्ध कराने वाला है, बशर्तें कि उसे अपने उद्धार हेतु अनिवार्यत: आवश्यक जान-मान कर नि:शंक अपने जीवन को भगवद समर्पित-शरणागत कर दिया जाय। मूलाधार-चक्र से ऊर्ध्वमुखी रूप में आज्ञा-चक्र में योग-साधना या अध्यात्म ‘स्वराट’ यानी जीवधारी शरीर का प्रायौगिक अध्ययन मात्र है, तो तत्त्वज्ञान या भगवदज्ञान या सत्यज्ञान ‘विराट’ का सैद्धान्तिक प्रायौगिक तथा व्यावहारिक अध्ययन पद्धति है। इस तथ्य को अब इससे अधिक विस्तार में यहाँ रखना ठीक नहीं लग रहा है क्योंकि व्याख्या सहित यह विस्तृत हो जायेगा, जिससे इस चल रहे वर्तमान प्रकरण से आप-सभी दूर हट जायेंगे । इसलिए इस तत्त्वज्ञान सम्बन्धी तथ्य को अगले प्रकरण में देखा जाय तथा यहाँ पर ज्योतिर्मय स: वाले प्रकरण को ही ले चलना विशेषकर उपयोगी लग रहा है ।

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! जो यहाँ अहम् और स: के रूप में बतलाया जाता है। वह कोर्इ बनावटी व काल्पनिक बातें नहीं हैं, बल्कि गहन जानकारी समझदारी के साथ यथार्थत: ग्रहणीय एवं उपयोगी बातें हैं। तत जिस समय परमप्रभु रूप परमतत्त्वम् रूप परमब्रह्रा से युक्त रहते हैं, तब तक तो शाश्वत शान्ति और शाश्वत आनन्द तथा मुक्ति-अमरता से युक्त रहते हैं, परन्तु ‘आत्म’ सृष्टि रचनाक्रम में मायाकृत दोष-गुण से युक्त होकर सांसारिक ‘अहम्’ हुआ जो तुक्ष क्षमता वाला एक क्षमताहीन के रूप में क्रियाशील रहता है जो एक असहाय के रूप में रहता हुआ ऐसा सहारा ढूढ़ने लगता है जिससे शान्ति और आनन्द के साथ सिद्धि-शक्ति सद बुद्धि भी प्राप्त हो, तब सक्षम गुरु के मिल जाने पर ‘अहम्’ का ज्योतिर्मय स: की जानकारी एवं दरश-परश तत्पश्चात् योगाभ्यास रूप मेल-मिलाप से तथा ‘अहम्’ को ज्योतिर्मय स: के अनुसार हो जाने से तुक्ष अहम (जीव-रूह-सेल्फ) शान्ति और आनन्द तथा सिद्धि-शक्ति रूप क्षमता शक्ति-युक्त होने लगता है जिससे पुन: पूर्ववत् ज्योतिर्मय स: की स्थिति में पहुँच जाता है। इसके पश्चात् जो भी स: के साथ दरश-परश एवं योगाभ्यास रूप मेल-मिलाप तथा स: के प्रति एकीभाव जारी रखता हो, तो इसकी क्षमता में और ही वृद्धि होने लगती है, जो मात्र आत्म कल्याण तथा परिवार कल्याण से ऊपर उठकर जन-कल्याण, समाज-कल्याण, लोक-कल्याण हेतु मजबूर हो जाता है, जो शरीर और परिवार के सीमा को तोड़कर या उससे ऊपर उठकर लोक क्षेत्र में क्रियाशील होने लगता है । इसी प्रकार शान्ति और आनन्द से शून्य मानव इनके माध्यम से ज्योतिर्मय स: से सम्बन्धित हो-होकर शान्ति और आनन्द की अनुभूति करने लगते हैं जिससे वे सभी इनके शिष्य एवं अनुयायी होते जाते हैं । इस प्रकार इनके पीछे एक बहुत बड़ा जनसमूह एवं काफी धन-सम्पत्तियाँ आ जाती हैं, जो इन्हें पुन: अपने तरफ आकर्षित करने लगती हैं और ये बन्धुजन अपने पीछे बहुत बड़े जन-समूह, बड़ी-बड़ी अटटालिकाओं से युक्त काफी संख्या में आश्रम, बहुतायत मात्रा में धन-सम्पत्तियों को देख-देखकर आकर्षित होने लगते हैं, जिससे स: अभिमुखी अहँ (हँसो) पुन: जड़तामूलक अहँ अभिमुखी स: (सोsहँ) होता हुआ शरीर प्रधान होता-रहता हुआ जागतिक शरीर-सम्पत्तियों के तरफ मुड़ने यानी अभिमुख होने रहने-चलने लगता है जिसका दुष्परिणाम ही पारिवारिकता मति-गति वाला रुझान है ।

एक तरफ एक इकार्इ-सत्ता-शक्ति रूप जो अनेकानेक रूप में जगत रूप में फैलकर क्षमता हीन अहम् हो गया होता है, से भी ऊपर दूसरी इकार्इ रूप सत्ता-शक्ति रूप ज्योर्तिमय स: से सम्बन्धित होने-रहने से क्षमतावान की अनुभूति तथा दूसरे तरफ विशालकाय जन समूह एवं बहुतायत धन-सम्पत्तियों को देखकर पुन: जबर्दस्त अहंकारिक रूप में अपने को स्थित करते हुए, स: को अहँ के तरफ करते-मानते हुए दोनों का संयुक्त रूप में पतनोन्मुखी सोsहँ मानना, कहना व घोषित करते-कराते हुए ‘अहम्’ को ज्योतिर्मय स: में मिलाने के बजाय स: को ही अहँ से जोड़कर सोsहँ- ‘वही’ ‘मैं’ हूँ बनने-घोषित करने लगते हैं जबकि अहँ को स: से युक्त करते हुए हँसो ‘मैं’ वह था और अब पुन: होना भी चाहिए । जिससे ये उल्टी मति-गति में हो जाया करते हैं अर्थात् हँसो की स्थिति योगाभ्यास से प्राप्त करने के बजाय पतनोन्मुखी सोsहँ(स: का पतनोन्मुखी अहँ) जो सहज ही होता रह-रहा को मात्र जान-मान कर सोsहँ पतनोन्मुखी ही बने रह रहे हैं जिसकी मंजिल पतन नाश-विनाश ही होता है । जबकि योगाभ्यास किया जाता है उत्थान-कल्याण के लिए ।

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7.5 मिथ्याहंकारवश अवतारी

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! यह प्रकरण भी पिछले प्रकरण ज्योतिर्मय स: से प्राप्त क्षमता शक्ति का दुरुपयोग नामक शीर्षक का ही एक अंश है परन्तु महत्वपूर्ण समझ वाला होने के कारण इसे एक पृथक शीर्षक करके वर्णित किया जा रहा है। ज्योतिर्मय स: से प्राप्त क्षमता वाले बन्धुगण जब अपने को सोsहँ रूप स: तथा अहँ का संयुक्त रूप घोषित करने-कराने लगते हैं, तब यहीं से इनके मिथ्यात्व एवं अहंकारिक भावना का रूप होने लगता है क्योंकि ज्योतिर्मय स: के सम्पर्क से अहम चाहे जितना भी क्षमतावान बने वह अहँ तत्पश्चात् जीवधारी शरीर ही रह सकता है। हँसो यानी ज्योतिर्मय स: रूप एकीभाव कदापि नहीं हो सकता है। ज्योर्तिमय स: परमप्रभु और शरीरधारी जीव के बीच माध्यम मात्र वाला ही परम प्रभु का कार्यकर्ता नियुक्त होता है । इसलिए कोर्इ शरीरधारी अहम् के साथ-साथ सोsहँ हो और सोsहँ ही हँसो भी है । यह कदापि हो ही नहीं सकता है; हाँ यह बात हो सकता है कि स: से दरश-परश एवं मेल-मिलाप के कारण अहम् स: के सहयोग मात्र से कुछ सिद्धियाँ व शक्ति आदि को हासिल कर अपने अहंकार की बलवती बना लेवे, जिससे विशिष्ट क्षमता वाला दिखलार्इ दे सके, परन्तु यह तो कदापि सम्भव ही नहीं कि कोर्इ शरीरधारी अहम तथा स: मात्र दो के संयुक्त रूप हंसो मात्र ही अवतारी हो इतना ही नहीं स: अहम-सोsहं ही हंसो जीवात्मा भी नहीं तो आत्मा और परमात्मा कैसा ?

पूर्णावतार रूप अवतारी ही एकमात्र ऐसा शरीरधारी होता है जिसमें परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् में ही तीनों इकार्इ सत्ता-शक्ति के प्रयोग करने-कराने की सक्षमता होती है । उसके सिवाय अन्य किसी भी शरीरधारी में तीनों तो तीनों है, दो इकार्इ सत्ता-शक्ति भी पूर्णतया प्रयोग करने की क्षमता नहीं हो पाती है। एक इकार्इ सत्ता-शक्ति भी पूर्णतया प्रयोग करने की क्षमता नहीं हो पाती है। एक इकार्इ सत्ता-शक्ति से सारी सृष्टि तथा डेढ़ (32) इकार्इ में देवता वर्ग तथा दो इकार्इ के साथ ही आदिशक्ति रूपा महामाया भी क्रियाशील होती रहती है । केवल परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप शब्दब्रह्रा रूप खुदा-गॉड-भगवान रूप परमप्रभु ही एकमात्र ऐसे हैं, जिसके पास तीनों इकार्इ सत्ता-शक्ति रूप क्षमता सदा क्रियाशील रूप में पड़ी रहती हैं । चाहें जब जितना वह प्रयोग करें, उन पर कोर्इ अंकुश नहीं होता है ।

इतना ही नहीं; ये योग-साधना-अध्यात्म वाले लोग सोsहँ तो मिथ्याभिमानवश अपने आप बन ही जाते हैं, साथ ही साथ पतनोन्मुखी सोsहँ और ऊर्ध्वमुखी हँसो व ज्योति के साधना को ही तत्त्वज्ञान घोषित करते-कराते हुए स्वयं को योगी-यति, पीर-पैगम्बर प्राफेट, ऋषि-महर्षि, ब्रह्रार्षि के स्थान पर भगवदावतार रूप पूर्णावतारी बन बैठते हैं, जो इन लोगों के मिथ्याहंकारिता का घोर घृणित रूप है। इस प्रकार एक साथ ही अनेकानेक लोग ही अवतारी बनते हुए अपना-अपना पूजा-आराधना कराने लगते हैं, जो नहीं कराना चाहिए । असलियत तो यह है कि आत्मा-परमात्मा का अन्तर तो दूर है, जीव और आत्मा तक का भी अन्तर इन्हें (तथाकथित सदगुरुजन-गुरुजन को) मालुम नहीं है । जीव एवं आत्मा और परमात्मा--- ये तीन हैं या दो अथवा एक का ही तीन नाम हैं, इन्हें (तथाकथित सदगुरुजन-गुरुजन को) तो यह भी मालूम नहीं होता । पतनोन्मुखी सोsहँ और ऊध्र्वमुखी हँसो-- दोनों एक ही का दो नाम है अथवा दोनों ही अलग-अलग हैं, यह भी पता नहीं है; इन्हें तो यह भी पता नहीं कि यह जीव का नाम है या आत्मा का या परमात्मा का ? इन्हें यह भी पता नहीं होता । फिर भी बनने लगते हैं भगवदावतारी और सोsहँ को ही जो हँसो भी नहीं है को ही भगवान घोषित करने लगते हैं जो बिल्कुल ही गलत है ।

सोsहँ तो आत्मा भी नहीं होता फिर परमात्मा कैसे हो सकता है ? परमात्मा तो सोsहँ और हँसो ज्योतिर्बिन्दु रूप शिव-शक्ति का भी पिता परमतत्त्वम् रूप ‘आत्मतत्त्वम्’ शब्दरूप अद्वैत्तत्त्वम् ही होता है । सोsहँ तो वास्तव में कोर्इ योग-अध्यात्म की क्रिया भी नहीं होता तो फिर तत्त्वज्ञान कैसे हो सकता है ? हो ही नहीं सकता, कदापि नहीं !

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