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8. ‘त्वम्’ या ‘तुम’

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! पिछले प्रकरणों में --अहम् और ज्योतिर्मय स: के सम्बन्ध में टूटे-फूटे शब्दों में थोड़ा-बहुत जानकारी आप लोगों ने प्राप्त किया और अब यहाँ पर थोड़ा-बहुत जानकारी 'त्वम के सम्बन्ध में किया-कराया जायेगा । ‘त्वम्’ एक ऐसा बहुचर्चित शब्द है कि जिसको प्राय: शुद्ध-अशुद्ध सभी ही संस्कृत एवं हिन्दी भाषी जानते होंगे, क्योंकि आये घड़ी या आये दिन आपस में भी ‘तुम-तड़ाम’ होता ही रहता है। प्राय: हर व्यक्ति ही अपने समक्ष उपस्थित व्यक्ति को ‘तुम’ के संकेत से ही उच्चारण या सम्बोधन करते हुए वार्ता करते हैं। हर व्यक्ति ही वार्ता करते समय अपने लिए ‘मैं’ या हम या ‘अहम्’ तथा जिससे वार्ता करता है उसे तू; तुम या त्वम् कहता है। इस प्रकार अपने लिए ‘मैं’ और समक्ष दूसरे के लिए ‘तुम’ यानी मैं तेरे लिए तुम; तुम मेरे लिए तुम; पुन: तुम अपने लिए मैं और मैं अपने लिए मैं; दोनों दोनों के लिए तुम ।

अब यहाँ पर मुख्य बात ‘मैं’ और ‘तुम’ तथा 'तुम और ‘मैं’ में असलियत कौन का है ? गौर करके देखा जाता है तो मात्र यही दिखलायी देता है कि सभी शरीरों में एक 'मैं ही दिखलायी देता है और दे भी रहा है, ‘तुम’ नाम की एक भी शरीर नहीं दिखलायी देती है क्योंकि अपने को कोर्इ ‘तुम’ कह कर नहीं बोलता है यानी अपने लिए कोर्इ भी तुम का प्रयोग नहीं करता है। इससे स्पष्टत: जाहिर हो रहा है ‘तुम’ नाम की कोर्इ शरीर धरती पर नहीं है । तब पुन: यह प्रश्न खड़ा होता है कि ‘तुम’ क्या है ? 'तुम या ‘त्वम्’ की यथार्थता क्या है ? यह साधारण बात नहीं अपितु अतिगहन तथ्य ‘तुम’ है ।

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! विशेष विचारणीय बात एक यह भी है कि वार्ता या बात-चीत के दरम्यान जो व्यक्ति प्रत्यक्ष नहीं होता है या बात-चीत के दरम्यान अनुपस्थित रहता है, तो उसके लिए 'स: या ‘वह’ शब्द प्रयुक्त होता है, अनुपस्थित वाले को ‘वह’ या ‘उस’ शब्द के उच्चारण या सम्बोधन करके बात-चीत किया जाता है लेकिन भगवान या परमेश्वर या परमात्मा या यहोवा या गॉड या खुदा या अल्लाहताला को विशेषत: ‘तुम’ या ‘त्वम्’ का ही सम्बोधन या उच्चारण करके प्रार्थना, प्रेयर या नमाज, बन्दगी, पूजा, आराधना आदि किया जाता है ।

आइये बन्धुओं गहरार्इ में प्रवेश किया जाय, तब यथार्थत: समझदारी होगी या समझ में आयेगा । पिछले अध्ययन से नहीं । इसे बार-बार कहने का भाव-तथ्य की गहनता से है । एक तरफ संसार में रहता है ‘अहम्’। ‘अहम्’ और ‘त्वम्’ के बीच मध्यस्थता करते हुए दोनों का सम्बन्ध बनाये रखने के लिए सदा ही क्रियाशील रहता है ‘स:’ । ‘अहम्’ हो गया सांसारिक जीव तथा ‘त्वम्’ है परमब्रह्रा या परमेश्वर या खुदा या गॉड या भगवान और दोनों के बीच मध्यस्थता रूप में रहता है ‘स:’ । ‘त्वम्’ ही आदि देव तथा ‘त्वम्’ ही पुरुष-पुराण भी कहलाता है । तेरे ही कृपा रूप ज्योतिर्मय स: के लगाव से सारे प्राणी स्थित और क्रियाशील रहते हैं । जिस समय ‘त्वम्’ सम्पर्क काट दे तो जीव को मजबूरन शरीर व संसार छोड़ना पड़ता है यानी शरीर में श्वाँस के माध्यम से स: का प्रवेश रुक जाय, तो शरीरस्थ जीव को शरीर व संसार को हर दशा में ही छोड़ना ही पड़ता है । उस समय कोर्इ शरीर जीव को रोक नहीं सकता है। शरीर का संसार में क्रियाशील रूप में सिथत रहने हेतु ‘त्वम्’ के तरफ से प्रेषित ‘तत्’ पुन: स: श्वांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश होना एक सर्व प्रथम अनिवार्यता है जिसके बिना शरीर मुर्दा या मृतक है। ‘आत्म’ को ‘अहम्’ रूप भी होना पड़ता है और माना भी जाता है तथा ‘तत्’ को स: रूप में भी ग्रहण किया जाता है परन्तु ‘त्वम्’ एक ऐसा अपरिवर्तित होने वाला शब्द है कि जिसमें किसी भी प्रकार से जाने या अनजाने में भी परिवर्तित न करके सदा ‘त्वम्’ तुम रूप में ही उच्चारित किया गया यानी ‘त्वम्’ वैदिक संस्कृत व लौकिक संस्कृत दोनों में ही त्वम् ही है, जबकि वैदिक ‘आत्म’ और ‘तत्’ तथा लौकिक में ‘अहम्’ और स: परिवर्तित रूप है। इस प्रकार ‘त्वम्’ की अपरिवर्तनशीलता परिलक्षित हो रही है, जो एकमात्र परमप्रभु के अतिरिक्त सृष्टि में कोर्इ ऐसी सत्ता-शक्ति तथा व्यक्ति-वस्तु नहीं है जो अपरिवर्तनशील हो ।

सत्यता, शाश्वतता, सम्पूर्णता, सर्वोत्कृष्टता एवं अपरिवर्तनशीलता एकमात्र परमप्रभु में ही सदा स्थित रहते है । इस प्रकार सर्वसत्ता-शक्ति समाहित रूप ‘त्वम्’ मात्र ही जो परम आकाशरूप परमधाम में परमब्रह्रा या परमेश्वर या परमात्मा या यहोवा या गॉड या अल्लाहताला या खुदा या सर्वोच्च सत्ता-शक्ति रूप परम-सत्य रूप परमप्रभु सदा रहने वाला है । इसके सिवाय अन्य कोर्इ ही परमात्मा-खुदा-गॉड कहलाने योग्य नहीं है । यह परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप गॉड-अलम् ही सर्वशक्तिसत्ता-सामर्थ्य रूप परमात्मा-परमेश्वर परमब्रह्रा-खुदा-गॉड-भगवान था - है और रहेगा भी । अहम-¬-सोsहँ और हँसो न कभी भगवान था न है और न हो सकता है। भगवत प्राप्त होकर भगवन्मय हो सकता है मगर साक्षात खुदा-गॉड-भगवान कदापि नहीं हो सकता ।

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8.1. ‘मैं’ और ‘तुम’ का प्रभाव

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! मैं-मैं और तू-तू के व्यावहारिक रूप में क्या प्रभाव हैं ? एक उदाहरण के माध्यम से आप बन्धुओं के समक्ष रखा जा रहा है जिसे मनन-चिन्तन के साथ अध्ययन करना विशेष लाभदायक होगा । यह उदाहरण बकरी और कुत्ता का है । यह उदाहरण मैं-मैं-मैं और तू-तू-तू के प्रभाव का है ।

बकरी :- सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! बकरी के उदाहरण से मैं-मैं का प्रभाव जाना-समझा-देखा-बूझा जाय । बकरी एक सामान्यत: छोटा आकार का पशु है । जो सही रूप में बहुत ही उपयोगी पशु है । जिससे प्राय: कोर्इ क्षति नहीं होती है । घास-फूस, अन्न आदि खाने वाली अहिंसक पशु है । इसका दूध माँ के दूध के बाद गाय-भैंस आदि किसी भी दुधारू पशु के दूध से अधिक स्वास्थ्यकर होता है, जो सदा ही एक तरह से औषधि के उपयोग में आता है। प्राय: सबसे सीधा जानवर यही पशु होता है । बकरी की आवाज (बोली) सदा ही मैं-मैं-मैं करके ही निकलती है या होती है । अब इस मैं-मैं-मैं का रहस्यात्मक प्रभाव जो प्राकृतिक रूप से मानव में जानकारी या नाजानकारीवश सामान्यत: व्यवहारवाद में जो होता है, वह यह है कि- ‘बकरी’ जैसे लाभदायक स्वास्थ्यकर, निर्दोष, सीधा-सपाट जानवर (पशु) को मांसाहारी लोग गला रेत कर या सिर काट कर मांस तो खाते ही हैं, हडडी भी अपने दांतों से तोड़-तोड चबा-चबा कर कुत्ते की तरह चूस-चाट लेते हैं । इतना ही नहीं, उसके चमड़ी तक को ढोलक आदि बना (छा) कर पीट-पीट कर बाजे-गाजे खुशीयाल के रूप में बर्बाद कर-करा देते हैं । यह है, सब प्रकार से लाभदायक एवं हानि रहित सीधा-सपाट जानवर का मात्र मैं-मैं-मैं के आवाज का प्रभाव । यानी मैं-मैं के जीवन वाले की यह ही दुर्गति यमराज के यहाँ होती रहती है जिससे दु:सह दु:ख-यातनामय जन्म-मृत्यु बार-बार होता रहता है । चौरासी लाख बार तो एक चक्र में जन्म-मृत्यु के दु:सह यातनाओं से गुजरते हुए मोक्ष पर्यन्त गुजरते ही रहना पड़ता है- पड़ेगा ही । किसी के नहीं मानने सृष्टि की यह व्यवस्था थोड़े ही बदल जायेगी ? हाँ वे इसके लाभ से बंचित अवश्य ही रह जायेंगे । जो इस व्यवस्था को जान-समझ देख-परख करके ऐसे जनम-मृत्यु रूप दु:सह यातनाओं से ‘तत्त्वज्ञान’ प्राप्त रूप विधान से अपने को जोड़कर बच-बचा नहीं लेते उनको इस दुर्गति से कोर्इ भी अन्य बचा ही नहीं सकता।

कुत्ता :- सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! कुत्ता एक हिंस्र (हिंसक) पशु है । यह हिंसक जानवर होता है जिसके काटने से मनुष्य प्राय: पागल हो जाया करता है, मर भी जाया करता है । जहर के विशेष कष्टकारक इन्जेक्शन लेना पड़ता है आदि आदि। प्राय: कुत्ता हर प्रकार से मनुष्य के लिए हानिकारक हिंसक जानवर होता है। कुत्ता की आवाज (बोली) भो:, भो:, भो: करके होती है जिसका अर्थ आप-आप-आप होता है। पुन: तू-तू की आवाज करने पर कुत्ता तुरन्त ही पास आ जाया करता है। इसकी कोर्इ गारन्टी नहीं है कि कब किस व्यक्ति या बच्चे को कुत्ता काट ले, काटने पर कब कौन पागल हो जाय या कब कौन मर जाय फिर भी मात्र भो: (आप) भो: (आप) भो: (आप) एवं तू-तू बोलने पर आने वाले होने के कारण ऐसा देखा जाता है कि यदि कोर्इ एक डण्डा हल्का भी मार देता है और वह कांयें-कांयें- यानी क्यों-क्यों कहता हुआ भागता है, तो देखने एवं सुनने वाला मारने वाले को बार-बार कोशने लगता है कि ओह ! कौन इस बेचारे कुत्ते को मार दिया ? आखिर यह उसका क्या बिगाड़ा था ? वह तो बड़ा कसार्इ है भार्इ, आदि आदि नाना शब्दों से शापित करने लगता है । कोर्इ भी कुत्ते को काटता-खाता नहीं और न ही उसके चमड़े को कोर्इ ढोल-नगारा बजाता-पीटता है।

बन्धुओं ! मात्र मैं-मैं और भो:-भो: का ही रहस्यात्मक प्रभाव बकरी और कुत्ते को मिलता है । इस बात को प्रयोग करके भी देखा जा सकता है। यह अक्षरश: सत्य है । इस मैं-मैं और तू-तू का वास्तव में रहस्य जानने की जिज्ञासा हो तो थोड़ा सा ही तो गौर करने या ध्यान देने की बात है । वह यह कि आप धनवान, पहलवान, विद्वान, बुद्धिमान, साधक, सिद्ध, महात्मा अथवा ज्ञानी ही क्यों न हों, परन्तु स्वयं अपने मुख से कहीं आप ही अपना वर्णन करके देख लेवें कि आपके आस-पास के लोगों में आपके अपने गुणगान को कितने लोग अच्छा तथा कितने लोग खराब मानते हैं । जाँच से पता चलेगा कि शायद कोर्इ भी व्यकित आपके कथन को मानने को तैयार नहीं होगा, भले ही आप सत्य ही क्यों न कह रहे हों । ठीक इसके विपरीत आप अपने आस-पास के बन्धुओं का गुणगान करें, भले ही वह अतिशयोक्तिपूर्ण ही क्यों न हो और अपनी न्यूनता, तुक्षता, अकर्मण्यता आदि को प्रदर्शित करें, तो प्राय: अधिकतर लोग ही उल्टे आप का ही गुणगान और अपने प्रति न्यूनता-तुक्षता की बातें करने लगेंगे । यह है मैं-मैं के वर्णन तथा तू-तू के वर्णन का प्रभाव ।

निष्कर्ष:- सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! वास्तविकता तो यह है कि मैं-मेरा अथवा हम-हमार से झूठ, नीच, तुक्ष, बुरा तथा घृणित सारी सृष्टि में भी कुछ भी नहीं है और मैं-मेरा अथवा हम-हमार कुछ नहीं, जो कुछ भी है सब कुछ ही, यहाँ तक कि मैं-मेरा अथवा हम-हमार भी एकमात्र जगत नियन्ता सृष्टि-संचालक रूप अल्लाहताला-गॉड-परमेश्वर या भगवान रूप परमप्रभु का ही है । इसलिए हम-आप-सभी उस एकमात्र परमप्रभु के प्रति समर्पित-शरणागत भाव में ही बने रहकर उसे प्राप्त करें तत्पश्चात् शरणागत रहते हुये भक्ति-सेवा करते हुये मानव जीवन को मोक्ष रूप मंज़िल दिलाते हुये सार्थक-सफल बनावें --- यही मानव जीवन का चरम और परम उपलब्धि है । आप भी खुदा-गॉड-भगवान के प्रति सब कुछ तेरा, केवल एकमात्र तू ही मेरा वाला हो जायें, तो यमराज भी आप का कुछ बिगाड़ नहीं सकता या कोर्इ भी किसी भी प्रकार का पीड़ा यातना नहीं दे सकता नि:सन्देह आप नरक-स्वर्ग से ऊपर ब्रह्रा लोक-शिव लोक से भी ऊपर अमरलोक परमधाम के निवासी हो जायेगें । सदा-सर्वदा के लिए शाश्वत शान्ति और शाश्वत आनन्द वाला ही हो जायेंगे ।

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9. जीव का आवागमन और मोक्ष

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! आप जीव शरीरमय होता रहता हुआ शारीरिक रूप में संसार में कर्ता और भोगता बन बैठे हैं जिसका कुपरिणाम यह होता है कि जीव बजाय आत्मामय और परमात्मामय बनने-होने-रहने के, उल्टे शरीरमय और पुन: परिवार संसारमय बनता होता हुआ अपने असल अस्तित्त्व रूप परमात्मा एवं आत्मा और जीव को भी भूलकर जड़ शरीरमय बनता-फँसता हुआ सांसारिक माया-मोह-ममता-वासना आदि में जकड़ जाता है । भ्रमवश इसी जड़ जगत रूप व्यक्ति-वस्तु या शरीर-सम्पत्ति या कामिनी-कांचन में भटकता-फँसता-जकड़ता हुआ विनाश के मुख में प्रवेश करता हुआ जनम-करम-भोग-मरण, पुन: जनम-करम-भोग- मरण पुन: पुन: पुन: इसी जनम-करम-भोग-मरण में पड़ा रहता है। सृष्टि चक्र में आवागमन के रूप में बराबर आता और दु:ख-सुख, कष्ट-परेशानी भोगता हुआ जाता रहता है ।

दु:ख-कष्ट भोगने हेतु तब तक यह जीव आवागमन चक्र में पड़ा रहता है, जब तक कि भगवदावतार से होता हुआ इस भू-मण्डल पर यह जीव मानव शरीर के माध्यम से निष्कपटता पूर्वक अनन्य जिज्ञासा-श्रद्धा के साथ सर्वतोभावेन अपना तन-मन-धन भगवद-धर्म या सत्य-धर्म सेवार्थ (धर्म-धर्मात्मा-धरती रक्षार्थ) पूर्णत: समर्पित करता हुआ भगवदावतार के चरणों में अनन्य भक्ति-सेवा-प्रेम भाव से ही एक मात्र भगवद शरणागत भाव में होता-रहता हुआ, आजीवन यानी शरीर पर्यन्त स्थित रहता हुआ भगवदज्ञान या सत्य ज्ञान या तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं कर लेता; मुक्ति और अमरता प्राप्त नहीं कर लेता। अद्वैत्तत्त्वम् बोध प्राप्त नहीं कर लेता। शाश्वत शान्ति एवं शाश्वत आनन्द रूप सचिचदानन्द रूप सदा-सदा के लिए सदा आनन्दमय अपने (जीव) को बनाता हुआ यह समझ नहीं जाता कि क्रमश: सालोक्य मुक्ति, सामीप्य मुक्ति, सारूप्य मुक्ति की तरफ जीव अपने को आगे बढ़ते कदम में कदम मिलाकर एकमात्र भगवत प्रेम-पात्र जब तक बन या हो नहीं जाता, तब तक वह आवागमन का चक्कर बन्द या समाप्त हो नहीं सकता । जीव को जब भी हो, यही करना होगा। जीव की अन्तिम और सर्वोच्च उपलब्धि भोग नहीं अपितु मोक्ष ही होता है।

9.1 जीव का कार्यक्षेत्र

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! जीव का कार्यक्षेत्र मुख्यत: चार भागों में-- चार श्रेणियों में अथवा चार स्तरो पर बंटा होता है । जो क्रमश : इस प्रकार है--

9.1.1 संसार एवं शरीर के बीच शरीरमय और शरीर प्रधान रहता हुआ;
9 9.1.2 शरीर और जीव के बीच जीवमय और जीव प्रधान रहता हुआ;
9 9.1.3 जीव और आत्मा के बीच आत्मामय या ब्रह्रामय या र्इश्वरमय-शिवमय और आत्मा-र्इश्वर-शिव ज्योतिर्मय हँस प्रधान रहता हुआ सोsहं प्रधान नहीं क्योंकि यह (सोsहँ) वेद-पुराण विरुद्ध है, और
9 9.1.4 आत्मा और परमात्मा या परमेश्वर या परमब्रह्रा या खुदा-गॉड भगवान के बीच परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप शब्दब्रह्रा रूप परमात्मामय या परमेश्वरमय या परमब्रह्रामय या भगवनमय खुदा-गॉड-भगवान प्रधान रहता हुआ।

क्रियाशील रूप में इन चारों श्रेणियों में जिस श्रेणी में रहता हुआ जिस क्षेत्र में क्रिया-कलाप करता है, उसी क्षेत्र के प्रभाव से वह प्रभावित रहता है। जीव के लिये इन चारों क्षेत्रों में सफलता हेतु चार प्रकार की जानकारी की विधि भी परमप्रभु ने निर्धारित कर रखा है जो इस प्रकार है --

1. शरीरमय रहता हुआ जीव की सांसारिक जीवन में कर्म और भोग की जानकारी हेतु जो जानकारी सुनिश्चित हुर्इ है, वह है शिक्षा (Education) यानी सांसारिक जीवन में सफल करम और भोग हेतु ‘शिक्षा’ एक अनिवार्यत: विधान है जिसके वगैर करम या भोग की कोर्इ जानकारी कर्तव्य और लाभ वास्तविक रूप में नहीं प्राप्त हो सकता। शरीर प्रधान अर्थात् कर्म और भोग प्रधान जीवन मात्र तो पशुवत उपाधि वाला होता है । नहीं मानना और मानना तो अलग बात है मगर होता है पशुवत ही ।

2. जीव भाव में रहते हुए जीव को शरीर और जीव के बीच कार्य करते हुए स्थित रहने वाले जीव (स्व) के लिए जो जानकारी तय या निश्चित की गर्इ है या निश्चित की हुर्इ है, वह है स्वाध्याय (Self Realization)। जीव भाव रूप (अपने शरीर से पृथक सूक्ष्म रूप में जीव के अस्तित्त्व को जो इसका अपना ‘स्व’ रूप है ) में कायम या स्थित रहते हुए सांसारिकता में जीवन सफल बनाने हेतु ‘स्व’ अध्याय (‘स्व’ से सम्बन्धित अध्ययन विधान) अर्थात स्वाध्याय । रूह-सेल्फ-जीव जीवत्त्व या स्वत्त्व भाव के अनुभूति-आनन्दानुभूति हेतु स्वाध्यय एक अनिवार्य विधान है। स्वाध्याय रहित सांसारिकता में जीवन यापन करने वाला शरीरमय जीव, शरीर से पृथक अपने ‘स्व’ रूप में स्थित नहीं रह सकता है । इसलिए जीव के दर्शन और इस यादगार के लिए कि ‘हम’ शरीर नहीं है बल्कि ‘जीव’ है, के लिए सांसारिकता से गुजरते हुए स्वाध्याय नित्यश: सुबह-शाम अवश्य करना चाहिए, अतिरिक्त योगी और तत्त्वज्ञानी के । स्वाध्याय से कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए । उसके लिए (जीव भाव के लिये) स्वाध्याय ही है । शरीर प्रधान अर्थात कर्म और भोग प्रधान जीवन पशुवत उपाधि वाला होता है तो स्वाध्यायी जीवन मनुष्यत्व या पुरुषत्व उपाधि वाला । ऐसा ही है। नहीं मानना और मानना तो अलग बात है । मगर सही यह ही है ।

3. जीव का आत्मामय या ब्रह्रामय या शिवमय रहता हुआ शान्ति और आनन्द रूप चिदानन्द या ब्रह्रानन्द या चेतनानन्द की अनुभूतिपरक जानकारी प्राप्ति हेतु जो विधान या जानकारी निश्चित की गर्इ या हुर्इ है, वह है योग या साधना या अध्यात्म (Spiritualization) यानी जीव को सांसारिक माया से अपने को बचाकर आत्मा-ब्रह्रा या र्इश्वर या नूर या सोल ज्योतिर्मय हँस शिव को जानने-साक्षात्कार करने तथा उससे मेल-मिलाप कायम करते हुये उसीमय रहने के लिए यह अनिवार्यत: विधि-विधान है । योग-साधना या अध्यात्म के क्रियात्मक अभ्यास के बगैर कोर्इ जीव शरीर और सांसारिकता से विलग नहीं हो सकता, तत्त्वज्ञानी या भगवद ज्ञानी या सत्यज्ञानी के अतिरिक्त। इसलिए मोह-माया-ममता-वासना आदि के फंसान से अपने को हटा-छुड़ा या निकाल कर जीव शरीरपर्यन्त आत्मामय या र्इश्वरमय या ब्रह्रामय रहता हुआ शरीर छोड़ेगा, तब वह उस आत्मानन्द या दिव्यानन्द या ब्रह्रानन्द या चिदानन्दमय रहता हुआ शिवलोक या ब्रह्रालोक को प्राप्त कर पाता है । यह शिव-शक्ति या आत्म-शक्ति या ब्रह्रा-शक्ति का विधान है । इसलिए शरीर छोड़ने पर शिव लोक या ब्रह्रा लोक ही प्राप्त होता है, अमर लोक या परमधाम नहीं। अमरलोक अथवा परमधाम तो तत्त्वज्ञानी के लिए है । योग-साधना या अध्यात्म और आत्मा-र्इश्वर-नूर-सोल-शिव प्रधान जीवन महापुरुषत्व उपलब्धि वाला होता है ।

4. जीव को भगवत प्राप्ति और मुक्ति और अमरता की प्राप्ति-- भगवन्मय हुये-रहे वगैर नहीं हो सकती है । परम शान्ति, परम आनन्द, परम गति, परमपद, परम धाम, मुक्ति व अमरता रूप अमर लोक में निवास आदि की साक्षात् बोध प्राप्ति खुदा-गॉड-भगवान के सिवाय अन्य कोर्इ भी, ब्रह्रा-इन्द्र-शंकर और आदि-शक्ति भी, नहीं प्रदान कर सकता है । यह सब परमप्रभु रूप खुदा-गॉड-भगवान से ही सम्भव है; वह भी तत्त्वज्ञान से ही। अन्य किसी से भी और किसी भी अन्य विधान से भी सम्भव ही नहीं । खुदा-गॉड-भगवान भू-मण्डल पर रहता ही नहीं, फिर उसे कोर्इ अपने प्रयत्न मात्र से कैसे खोज या प्राप्त कर सकता है ? अर्थात् नहीं पा सकता। खुदा-गॉड-भगवान सदा-सर्वदा परम आकाश रूप परमधाम रूप अमरलोक या बिहिस्त या पैराडाइज में परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम्-गॉड-अलम् शब्दरूप में ‘सदानन्दमय’ रहता है । उसके पास अपने प्रयत्न से कोर्इ भी नहीं जा सकता, कोर्इ भी नहीं पहुँच सकता । जाना-पहुँचना तो दूर की बात है, उसकी यथार्थत: जानकारी भी उसके तथा पार्षदोंके अलावा उसे या उसके परमधाम रूप अमर लोक को कोर्इ जानता तक नहीं । ब्रह्रा और शंकर जी तक को भी उस परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम्-गॉड-अलम् शब्दरूप शब्दब्रह्रा रूप परमब्रह्रा तथा उसके परम आकाश रूप परम धाम रूप अमर लोक तक की जानकारी भी नहीं होती तो और की बात ही क्या की जा सकती है !

यही कारण है कि आदि-शक्ति भी मुक्ति-अमरता प्रदान नहीं कर सकतीं क्योंकि यह एकमात्र परमप्रभु रूप खुदा-गॉड-भगवान हेतु ही सदा-सर्वदा-सर्वथा आरक्षित एवं सुरक्षित होता या रहता है, जिसे एकमात्र भगवदावतार के अनन्य भक्त, अनन्य सेवक एवं अनन्य प्रेमी गण ही उसी के प्रति सर्वतोभावेन शरणागत होते रहते हुये, उसी का कृपा पात्र होकर, उसी के द्वारा देय ज्ञान, भगवदज्ञान या सत्यज्ञान या तत्त्वज्ञान द्वारा प्राप्त कर सकते हैं ।

संसार, शरीर, जीव, र्इश्वर और परमेश्वर तक का सम्पूर्ण ज्ञान (अशेष ज्ञान) हेतु जो विधान तय या निश्चित हुआ है, एकमात्र तत्त्वज्ञान रूप भगवदज्ञान रूप सत्यज्ञान ही वह विधान है जिसके अन्तर्गत शिक्षा, स्वाध्याय और अध्यात्म ज्ञान रूप तीनों ही स्थित रहते हैं । एकमात्र तत्त्वज्ञान ही, सत्यज्ञान ही, वास्तव में वास्तविक सत्य विधान है ।

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! यहाँ पर जीव को शरीर के माध्यम से कार्य करने के चारों कार्यक्षेत्रों का विभागीय बँटवारा करके वैसी ही शिक्षा-दीक्षा की भी, व्यवस्था भगवत कृपा विशेष से हो चुकी है; जिसका विस्तृत में नहीं मगर साराँश में यहाँ पर भी उल्लेख हो रहा है। अगले शीर्षक में देखें--

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