विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
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10. विद्यातत्त्वम् में क्रमश: चार श्रेणियाँ

विद्यातत्त्वम् के चारों अंग क्रमश: हैं--

10.1 शिक्षा (Education); 10.2 स्वाध्याय (Self Realization);10.3 योग-साधना या आध्यात्मिक प्रक्रिया (Spiritualization) और
10.4 तत्त्वज्ञान या भगवद ज्ञान अथवा सत्य ज्ञान पद्धति (True Supreme and Perfect KNOWLEDGE)

सदभावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! ‘विद्यातत्त्वम्’ पद्धति के प्रति आप पाठक एवं श्रोता बन्धुओं के समक्ष भगवत कृपा विशेष से प्राप्त यह सदानन्द भी एक ‘मत’ रख रहा है, वास्तविक सत्य हेतु इसकी उपयोगिता भी आप स्वयं अनुभव करें और बोधित होते हुए ‘सत्य’ को जानें-देखें-परखें-पहचानें।

विद्यातत्त्वम् पद्धति इतना आसान नहीं होता कि जो चाहे वही जना दे और जैसे चाहा जाय वैसे जान लिया जाय । भगवत कृपा से सदानन्द तो इस बात पर जितना जोर दिया जा सकता है, उससे भी अधिक जोर देते हुये यह अकाटय निश्चयात्मक ‘मत’ प्रस्तुत कर रहा है कि --
सृष्टि में यदि कोर्इ गूढ़तर बात है तो उसमें सबसे गूढ़तम इस ‘वास्तविक सत्य’ को जानना और देखना-परखना ही है ।

दो बातें

सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जब भी इस ‘वास्तविक सत्य पद्धति’ यानी विद्यातत्त्वम् पद्धति की चर्चा भगवत कृपा विशेष से करना चाहते हैं, तो प्रमुखतया दो बातें सामने खड़ी हो जाती हैं---

पहली बात यह कि विद्यातत्त्वम् पद्धति की वास्तविक जानकारी देने पर पाठक बन्धुगण को सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द एक अंहकारी लगने लगता है और दूसरी बात यह है कि भगवद धर्म या सत्य धर्म रूप सनातन धर्म का संस्थापक एवं संरक्षक होने के कारण यह सत्य से हटकर कुछ लिख ही नहीं सकता है । कारण कि यह ‘सदानन्द’ शरीर तो भगवान के ही कार्य सम्पादन के लिये भगवान द्वारा ही प्रयुक्त एक यन्त्रवत मानव आकृति मात्र है, जो ‘सत्य धर्म’ हेतु ही संकलिपत एवं समर्पित है । यह आधोपान्त सत्य बात है कि सदानन्द नाम रूप वाला यन्त्रवत मानव आकृति सत्य ही कहने बोलने व लिखने हेतु मजबूर है। इसलिये भगवत कृपा विशेष के सहारे यह सदानन्द यन्त्रवत मानव आकृति सत्य ही, ‘एकमात्र सत्य’ ही लिख रहा है । इसे जानना-समझना-देखना-परखना-पहचानना और आपके स्वभाव के अनुकूल या प्रतिकूल जैसा लगे वैसा ही व्यवहार लेना-देना आप पाठक एवं श्रोता बन्धुओं पर आधारित है ।

यह भी एक विद्यातत्त्वम् पद्धति का ही अंश होने के कारण सत्य का ही है कि आपके मानने या नहीं मानने से वास्तव में विद्यातत्त्वम् पद्धति पर कोर्इ दु:असर या दुष्प्रभाव पड़ने को नहीं है । यदि दु:असर पड़ने वाला है तो वह मात्र आपके जीवन पर ही पड़ने वाला है । इसलिए भगवान के तरफ से ही, भगवत कृपा विशेष के सहारे ही ‘सदानन्द’ नाम-रूप वाला यन्त्रवत मानव आकृति जो कुछ विद्यातत्त्वम् पद्धति को जाना और देखा है तथा भगवत कृपा विशेष से ही जहाँ तक समझ सका हैं, आप पाठक एवं श्रोता-बन्धुओं के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है। इसे जानना-समझना तथा अपने जीवन को विद्यातत्त्वम् पद्धति हेतु समर्पित-शरणागत होता हुआ र्इमान-संयम-सच्चार्इ से स्थित रहना या न रहना, आपकी बात है । जैसा करेंगे वैसा पायेंगे । यह ही सत्य है ।

सदभावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! इस सम्पूर्ण ब्रह्राण्ड में यदि गोपनीय से भी गोपनीय कोर्इ बात या चीज है तो उसमें सबसे अधिक गोपनीय यह विद्यातत्त्वम् पद्धति ही है । इसमें यदि कोर्इ सूक्ष्म से भी सूक्ष्म कोर्इ बात है तो उसमें यह विद्यातत्त्वम् पद्धति उससे भी सूक्ष्म है । इसमें (इस ब्रह्राण्ड में) यदि विशालकाय से भी विशालकाय कोर्इ बात या वस्तु है तो उसमें यह विद्यातत्त्वम् पद्धति उससे भी परम विशालकाय है। इसमें यदि कोर्इ शकितमान से भी शकितमान है तो उससे भी यह विद्यातत्त्वम् सर्वाधिक यानी सर्वथा परम शक्तिमान है। इसमें यदि कोर्इ उत्तम से भी उत्तम है तो यह उससे भी उत्तम अर्थात सर्वोत्तम है । यदि इस ब्रह्राण्ड में कोर्इ श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठतर है तो यह विद्यातत्त्वम् पद्धति उससे भी अत्यधिक श्रेष्ठ अर्थात सर्वश्रेष्ठ है । इसमें यदि कठिन से भी कठिन कोर्इ कुछ है तो यह विद्यातत्त्वम् पद्धति उससे भी अत्यधिक कठिन है । इसमें यदि कोर्इ कुछ आसान (सहज) से भी आसान है तो यह उससे भी अत्यधिक आसान (सहज) है । इसमें यदि कोर्इ सुगम कुछ से भी सुगम है तो यह उससे भी अत्यधिक सुगम है। इसमें यदि कोर्इ दयालु से भी दयालु है तो यह उससे भी अत्यधिक दयालु है। इसमें यदि किसी भी विषय-वस्तु-बात-शक्ति-सत्ता वाला है तो यह विद्यातत्त्वम् पद्धति उससे भी अधिक विषय-वस्तु बात-शक्ति-सत्ता अर्थात् परमसत्ता ही है। यदि सम्पूर्ण ब्रह्राण्ड मंप ही कोर्इ सत्य-धर्म न्याय-नीति वाला से भी अधिक सत्य-धर्म-न्याय-नीति वाला भी है तो यह विद्यातत्त्वम् पद्धति उससे भी अधिक (सर्वाधिक) सत्य-धर्म-न्याय-नीति वाला है । यदि कहीं शिक्षा-स्वाध्याय-अध्यात्म ज्ञान आदि में चाहे जितनी भी अधिक जानकारी क्यों न हो परन्तु इस विद्यातत्त्वम् पद्धति में उससे भी अत्यधिक अर्थात सर्वाधिक शिक्षा-स्वाध्याय-अध्यात्म ज्ञान है, क्योंकि विद्यातत्त्वम् पद्धति ही वास्तव में ‘तत्त्वज्ञान’ पद्धति है और ‘तत्त्वज्ञान’ ही सम्पूर्ण ज्ञान है ।

शिक्षा, स्वाध्याय और अध्यात्म ज्ञान रूप तीनों ही ‘तत्त्वज्ञान’ के क्रमश: अंश मात्र है और वास्तव में यह विद्यातत्त्वम् पद्धति ही ज्ञान (तत्त्वज्ञान) है अर्थात् किसी भी मामले में कोर्इ बड़ा से बड़ा,ऊँचा से ऊँचा, उत्तम से उत्तम, सूक्ष्म से सूक्ष्म, विशालकाय से विशालकाय यानी किसी भी मामले में कोर्इ कितना ही क्यों न हो यह विद्यातत्त्वम् पद्धति उससे भी अत्यधिक अर्थात् उसी-उसी मामले में सर्वाधिक-सर्वोच्च-सर्वोत्तम् है ।

उपसंहार

अन्तत: ‘वास्त्विक सत्य’ और विद्यातत्त्वम् पद्धति अतुलनीय है। इसी विद्यातत्त्वम् पद्धति में वास्तव में खुदा-गॉड-भगवान भी है और एकमात्र यही ज्ञेय भी है। इसको प्राप्त होते ही करोड़ो-करोड़ो जन्मों के पाप कुकर्मों से मुक्ति बार-बार करोड़ो बार के जन्म-मृत्यु रूप नारकीय दु:सह दु:ख यातनाओं से मुक्ति, काल-कर्म के चक्कर से मुक्ति और मुक्ति और अमरता भी स्पष्टत: बोध सहित् साक्षात् दिखायी देने लगता है।

बन्धुओें ! वास्तव में जो कोर्इ भी इस विद्यातत्त्वम् पद्धति को जान लेता है-- जिज्ञासा-श्रद्धा एवं अनन्य भगवद भक्ति सेवा भाव से निष्कपटता पूर्वक इसे जान लेता है-- प्राप्त कर लेता है-- बोधित हो जाता है, वास्तव में उसे कुछ भी जानना-देखना और पाना शेष नहीं रह जाता । यह विद्यातत्त्वम् पद्धति सदा से यानी आदि सृष्टि के आदि से भी पूर्व से सदा एक रूप, सदा एक ही नाम, सदा से एक ही धाम तथा सदा से एक ही ज्ञान वाला हुआ चला आ रहा है और अन्तिम सृष्टि के अन्त के पश्चात् भी यह विद्यातत्त्वम् पद्धति उसी एक ही नाम वाला, उसी एक ही रूप वाला, उसी एक ही धाम वाला तथा उसी एक ही ज्ञान वाला भी रहेगा । इसीलिए यह अमर, मुक्त और परमानन्द रूप सदानन्द ‘अद्वैत तत्त्व’ ज्ञान वाला है । एक मात्र यही ही मुक्ति और अमरता वाला है । यह विद्यातत्त्वम् पद्धति सदा-सर्वदा ही परम भाव-प्रभाव युक्त परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप खुदा-गॉड-भगवान परमधाम में ही रहते हैं जो अवतरण बेला में धराधाम पर अवतरित होकर ‘सत्य-धर्म’ संस्थापित करते-करवाते हुए धर्म-धर्मात्मा-धरती की रक्षा करते-कराते है। ये भगवदावतार रूप पूर्णावतार ही सच्चा सदगुरू भी होते हैं । एकमेव एकमात्र ये ही तत्त्वज्ञानदाता होते हैं ।

व्यक्ति के क्षेत्र-स्थिति और उपलब्धि की यथार्थ पहचान

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! ‘वास्तविक सत्य’ को जाननें समझनें, देखनें-परखनें-पहचाननें-अपनानें के लिये इन (1. शिक्षा 2. स्वाध्याय 3 .योग-साधना अध्यात्म और 4 .तत्त्वज्ञान) चारों की यथार्थत: जानकारी होना अनिवार्य है । इसमें शरीरधारी जीव किस कार्य-क्षेत्र में कार्य कर रहा है, उससे बात करने मात्र से ही कुछ ही सेकेण्डों-मिनटों में ही जान-समझ लिया जा सकता है कि यह शरीरधारी जीव किस क्षेत्र में स्थित हो-रह कर कार्य कर रहा है । जैसे यदि--

1 . सांसारिक होने पर उसके वाणी से शिक्षा और शरीर-परिवार-सम्बन्ध के विकास-उत्थान का ही गुणगान या महत्ता सुनने-देखने जानने-समझने तथा रहने की चर्चा मिलेगी यानी कर्म और भोग मात्र की प्रधानतया चर्चा-बातें होंगी;
2 . स्वाध्यायी होने पर उसके वाणी से स्वाध्याय और ‘अहम् ब्रह्रास्मि’ सहित आनन्दानुभूति सम्बन्धी ही गुणगान या महत्ता सुनने-देखने, जानने-समझने तथा बार-बार ही स्वाध्याय करते रहने की चर्चा मिलेगी;
3 . योगी आध्यात्मिक होने पर उनके वाणी से योग-साधना अथवा अध्यात्म और आत्मा या र्इश्वर या ब्रह्रा या दिव्य या चेतन या नूर या डिवाइन लाइट या सोल, आत्म-ज्योति या ब्रह्रा ज्योति या दिव्य ज्योति या ज्योति रूप शिव सम्बन्धी महत्ता ही सुनने-देखने-समझने तथा योग-साधना अभ्यास या आध्यात्मिक क्रियाओं का अभ्यास करने और चिदानन्दमय ब्रह्रानन्दमय-आनन्द मय रहने की चर्चा ही मिलेगी तथा अन्तत:
4. तात्तिवक होने पर उनके वाणी से भगवदज्ञान या तत्त्वज्ञान या सत्यज्ञान और परमात्मा या परमेश्वर या परमब्रह्रा या अल्लाहतआला या खुदा या गॉड या भगवान सम्बन्धी गुणगान या महत्ता ही सुननें-देखनें, जाननें-समझनें तथा अनन्य श्रद्धा भक्ति से निष्कपटता पूर्वक सर्वतोभावेन भगवद शरणागत होने, परम शान्ति और परमानन्द के साथ ही साथ मुक्ति और अमरता का साक्षात् बोध प्राप्त करने, भगवद भक्ति, भगवद सेवा, प्रेम, भगवद गुणगान एवं सत्संग की महिमा आदि की चर्चा ही बराबर सुनने-देखने को मिलेगी। इसमें कर्म-भोग और योग-साधना-अध्यात्म ज्योति आदि का कोर्इ गुणगान-महत्ता आदि नहीं होता ।

इस प्रकार थोड़ी भी सावधानी के साथ किसी शिक्षित व स्वाध्यायी व आध्यात्मिक और तात्तिवक के साथ वार्ता करने पर कुछ सेकेण्ड-मिनट में ही यह स्पष्ट हो जाया करेगा कि यह व्यक्ति किस क्षेत्र का रहने वाला और कौन है-- शरीरमय है कि ‘स्व’ रूप ‘हम’ (जीव) मय; आत्मामय है कि परमात्मामय । इन चारों में से कौन किस क्षेत्र का रहने वाला है । जिस क्षेत्र का रहने वाला होगा, उसी क्षेत्र के हानि-लाभ-क्षमता- शक्ति-उपलब्धि वाला होगा-उसी वाला ही होगा । दूसरे क्षेत्र वाले को दूसरे-दूसरे क्षेत्र वाला लाभ उपलब्धि नहीं मिल सकता; कदापि नहीं मिल सकता-- मिल ही नहीं सकता। सब भगवत कृपा ।

1. शिक्षा (Education)
2. स्वाध्याय (Self Realization)
3. अध्यात्म (Spiritualization)
4.तत्त्वज्ञान (True Supreme and Perfect KNOWLEDGE) अथवा विद्यातत्त्वम् पद्धति । इन चारों पद्धतियों का विस्तृत विवरण आगे दिया जा रहा है ।

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विद्यातत्त्वम् का पहला अंग

10.1 शिक्षा (Education)

शिक्षा पद्धति
सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! शिक्षा प्रणाली आज की इतनी गिरी हुर्इ एवं ऊल-जलूल है कि आज शिक्षा क्या दी जानी चाहिए ? और शिक्षा क्या दी जा रही है यह तो ऐसा लग रहा है कि शिक्षार्थी तो शिक्षार्थी ही है, यदि शिक्षक महानुभावों से भी पूछा जाय, तो वे महानुभाव भी पूरब के बजाय पश्चिम और उत्तर के वजाय दक्षिण की बात बताने-जनाने लगेंगे। इसमें उनका भी दोष कैसे दिया जाय, क्योंकि जो जैसे पढ़ेगे-जानेंगे, वे वैसे ही तो पढ़ायेंगे-जनायेंगे भी । इसमें उनका दोष देना भी व्यर्थ की बात दिखलार्इ देती है । दोष तो इस शिक्षा पद्धति के लागू करने-कराने वाली व्यवस्था रूप सरकार को ही देना चाहिए । परन्तु वह भी तो इसी शिक्षा से गुजरे हुये व यही शिक्षा पाये हुये लोगों से बनी एक व्यवस्था है । यह बात भी सही ही है कि शिक्षा प्रणाली ही दोषपूर्ण है । यह आभाष तो प्राय: सभी को ही हो रहा है । प्राय: सभी अपने-अपने क्षमता भर आवाज भी उठा रहे है। सभी यह कहते हुये सुनार्इ दे रहे हैं कि शिक्षा का आमूल परिवर्तन होना चाहिए परन्तु वर्तमान शिक्षा को समाप्त कर दिया जाय क्योंकि वर्तमान शिक्षा पद्धति वही (आसुरी) कामिनी-कांचन प्रधान है जिसे हिरण्य कश्यप (पिता) के सभी प्रयासों के बावजूद भी प्रह्लाद ने नहीं पढ़ा था तो उसके स्थान पर नर्इ कौन सी अथवा कैसी शिक्षा पद्धति हो या होना चाहिए, यह बात या सिद्धान्त या फार्मूला कोर्इ नहीं दे रहा है कि शिक्षा में यह बात या यह विधि-विधान या ऐसी प्रणाली लागू किया जाय । इसी समस्या के समाधान में निम्नलिखित ‘शिक्षा पद्धति’ प्रस्तुत किया जा रहा है ।

शिक्षा पूर्णत: ब्रह्राण्डीय विधि-विधान पर ही आधारित हो

भगवत कृपा विशेष से प्राप्त सदानन्द का मत तो यह है कि--शिक्षा पिण्ड और ब्रह्राण्ड में आपसी ताल-मेल बनाये रखने वाली होनी चाहिए!
वास्तव में जब तक पिण्ड और ब्रह्राण्ड के तुलनात्मक अध्ययन के साथ उसमें आपस में तालमेल बनाये रखने हेतु पृथक-पृथक पिण्ड और ब्रह्राण्ड की यथार्थत: प्रायौगिक और व्यावहारिक जानकारी तथा ब्रह्राण्डीय विधान मात्र ही पिण्ड का भी विधि-विधिन यानी स्थायी एवं निश्चयात्मक विधि-विधान ही नहीं होगा तथा एक मात्र ब्रह्राण्डीय विधि-विधान को अध्ययन पद्धति या शिक्षा प्रणाली के रूप में लागू नहीं किया जायेगा, तब तक अभाव एवं अव्यवस्था दूर नहीं किया जा सकता है, कदापि दूर हो ही नहीं सकता ।

यह भगवद वाणी ही है !

सियार की तरह से हुआँ-हुआँ-हुआँ तथा कुत्तों की तरह से भौं-भौं-भौं से काम धाम नहीं चलने को है। अभाव एवं अव्यवस्था तब तक दूर नहीं हो सकती। जब तक कि ब्रह्राण्डीय विधि-विधान को ही पिण्डीय विधि-विधान रूप में शिक्षा विधान को स्वीकार नहीं कर लिया जायेगा । शिक्षा को ब्रह्राण्डीय विधि-विधान अपनाना ही होगा, चाहे जैसे भी हो । सब भगवत कृपा पर आधारित ।
सदभावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! यहाँ पर चारों क्षेत्रों में अपने-अपने क्षेत्र में सफल जीवन हेतु अपनी-अपनी जानकारी से सम्बन्धित तय या निश्चित किये हुये विधान के अनुसार ही रहना-चलना चाहिए । शारीरिक और सांसारिक विषय-वस्तुओं को सही-सही समझने हेतु सही जानकारी आवश्यक होता है और सही जानकारी के लिए, सांसारिक जानकारी व पहचान के लिए, शिक्षित होना पड़ेगा। यहाँ ‘शिक्षित’ शब्द से मतलब है शैक्षिक दृष्टि से युक्त होना । अपनी स्थूल दृष्टि के बावजूद भी शिक्षा भी एक दृष्टि ही होती है, जो एक प्रकार से शारीरिक आँख के साथ ही साथ शिक्षा दृष्टि भी कायम हो जाती है, जिससे पत्र-पत्रिकाओं, ग्रन्थ-सदग्रन्थ आदि के माध्यम से एक जानकारी मिलती है, जो भविष्य-जीवन हेतु उत्प्रेरण एवं पथ प्रदर्शन का कार्य करती है ।

नाम और रूप

अब यहाँ पर यह जाना-देखा जायेगा कि हर क्षेत्र में ही लक्ष्य कार्य हेतु जानकारी मुख्यत: दो माध्यमों से होता है । वे हैं—‘नाम और रूप’। नाम को शब्द के माध्यम से कह-सुनकर तथा रूप को देखकर ही जान-पहचान की प्रक्रिया पूरी होती है । संसार में चाहे जितने भी विषय-वस्तु है, सभी ‘नाम-रूप’ दोनों से ही अवश्य ही युक्त होते हैं । हालांकि स्पर्श, स्वाद और गन्ध भी जानने-पहचानने में सहयोगी होता हैं, परन्तु मुख्यत: ‘नाम-रूप’ ही होता है । मगर एक बात याद रहे कि कोर्इ भी भौतिक विधान खुदा-गॉड-भगवान और भगवद विधान पर लागू नहीं हो सकता ।

सांसारिकता के समान ही शारीरिक जानकारी व परिचय-पहचान भी ‘नाम-रूप’ से ही होता है । कोर्इ ऐसा सांसारिक प्राणी नहीं होगा, जो ‘नाम-रूप’ से रहित हो। यही कारण है कि जान-पहचान ‘नाम-रूप’ मुख्यत: दो के माध्यम से ही होता है । जिस प्रकार शरीर का ‘नाम-रूप’ होता है । वास्तव में उसी प्रकार जीव का भी इससे पृथक अपना ‘नाम-रूप’ होता है । नाम से जानकारी मिलता है तथा रूप से पहचान प्राप्त होता है। जीव को जानने और पहचानने, दोनों से ही युक्त जो विधि-विधान है, वही ‘स्वाध्याय’ (Self Realization) है । ‘स्वाध्याय’ से तात्पर्य ‘स्व’ के अध्ययन यानी जानकारी व पहचान से है। इसमें श्रवण, मनन-चिन्तन और निदिध्यासन की क्रिया प्रमुखतया आती या होती है । निदिध्यासन के अन्तर्गत जीव शरीर से बाहर निकल कर क्रियाशील रूप में स्पष्टत: दिखलार्इ देता है। निदिध्यासन के बगैर अन्य किसी भी पद्धति से जीव का स्पष्टत: दर्शन सम्भव नहीं है । हालाँकि सूक्ष्म दृष्टि के माध्यम से स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर रूप जीव दोनों को अर्थात् दोनों की जानकारी को पकड़ा जाता है। जब भी हमको शरीर से पृथक सूक्ष्म शरीर रूप जीव का दर्शन होगा, तो अपने को दिखलार्इ देगा कि हम निदिध्यासन के अन्तर्गत ही हैं और स्वाध्याय से ही हम जीव भाव या ‘स्व’ रूपमय स्थित भी रह सकते हैं। इसमें इंद्रियाँ सहायक नहीं होती हैं। इंद्रियाँ तो पाँच ज्ञान यानी जानकारी करने-कराने वाली तथा पाँच कर्म यानी जानकारी के अनुसार कार्य करने वाली प्राय: प्रत्येक मानव को ही प्राप्त होती हैं ।

सारी सृष्टि ही पाँच पदार्थ-तत्वों से बनी है जो क्रमश: आकाश, वायु, अगिन, जल और थल नाम से जानी जाती हैं । चूँकि सृष्टि की प्राय: सभी जड़वत वस्तुएँ इन्हीं पाँच पदार्थ तत्वों से बनी हुर्इ हैं तो जिसमें जिस पदार्थ तत्व की प्रधानता होती है, उसे उसी विभाग के माध्यम से अच्छी जानकारी और पहचान मिलती है । किसी दूसरे पदार्थ तत्त्व प्रधान को दूसरे विभाग से अच्छी या ठोस व सही-सही जानकारी व पहचान नहीं मिल सकती है । वे पाँच विभाग पाँचों पदार्थ तत्वों के आधार पर ही बने हैं, जो अपने विधान के अनुसार समान रूप से आदि सृष्टि से ही गतिशील होते आ रहे हैं।

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10.1.1 आकाश तत्व विभाग (Origine and Position of the Sky)

यह आकाशतत्व स्थूल सृष्ट रचनाक्रम में पहले स्थान पर आता है । इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अन्य पदार्थों की तरह सामान्यत: यह उत्पन्न और नष्ट नहीं होता-रहता है, बल्कि जैसे इसका ‘महत्तत्व’ शक्ति से उत्पत्ति होता है वैसे महाप्रलय के समय ही ‘महत्तत्व’ शक्ति में ही विलीन भी हो जाया करता है। आकाश तत्व विभाग के अन्तर्गत आकाश तथा आकाश से सम्बन्धित वे सारी वस्तुएँ, उनकी जानकारी व पहचान तथा उनके आवश्यकतानुसार प्रयोग-उपयोग सम्बन्धी बातें होती-रहती हैं । आकाश का सूक्ष्म विषय ‘शब्द’ है, यानी ‘शब्द’ के माध्यम से ही आकाश तथा आकाश तत्व प्रधान वस्तुओं की जानकारी प्राप्त होती है। आकाश पदार्थ तत्व प्रथम व एक इकार्इ वाला होने के कारण, वह अन्य किसी भी विभाग से जाना-समझा-पहचाना नहीं जा सकता है । इसकी सही-सही जानकारी एक मात्र ‘शब्द’ से ही हो सकती है, अन्यथा नहीं । इसमें स्पर्श, रूप, रस या स्वाद तथा गन्ध नाम की कोर्इ बात नहीं होती या रहती है । इसलिए कि उनकी इसमें पहुँच नहीं है । यह उन सभी से अति सूक्ष्म होता है । कान और वाणी ही आकाश तत्व की क्रमश: ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेंन्द्रिय हैं । इसकी सारी जानकारियाँ और क्रियाकलाप आदि सब कुछ ही ‘शब्द’ एकमात्र ‘शब्द’ के द्वारा ही होता हैं क्योंकि आकाश तत्त्व की तनमात्रा शब्द ही है । कान जानकारियों को ग्रहण (प्राप्त) करता-रहता है और वाणी जानकारियाँ प्रकट और प्रेषित करती रहती है ।

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10.1.2 वायु तत्व विभाग (Origine and Position of the Air)

यह स्थूल सृष्टि रचनाक्रम में दूसरे स्थान पर आता है । अर्थात् सृष्टि रचनाक्रम में पहला आकाश तत्पश्चात् आकाश के अन्तर्गत ही वायु तत्व की रचना या उत्पत्ति की गयी या हुर्इ । वायु तत्व विभाग आकाश तत्व विभाग के अन्तर्गत व अधीन ही रहता हुआ अपने सूक्ष्म विषय ‘स्पर्श’ के माध्यम से ही वायु प्रधान विषय-वस्तुओं की जानकारी व पहचान तथा उसके आवश्यकतानुसार प्रयोग-उपयोग सम्बन्धी बातें होती-रहती हैं । वायु तत्व दो इकाइयों से बना होता है, जिसमें एक इकार्इ आकाश भी उसमें समाहित रहता है। इसलिए वायु तत्व तथा वायु प्रधान विषय वस्तुओं पर गौण रूप से आकाश तत्व विभाग की दृष्टि भी रहती है । यहाँ गौण कहने से तात्पर्य यह है कि वायु तत्व विभाग का अपने लक्ष्य कार्य सम्पादन में यह विरोध व बाधा न उत्पन्न करके बल्कि उसे बढ़ोत्तरी और सहयोग करने हेतु ही होता है । वायु तत्व विभाग से सम्बन्धित विषय-वस्तुओं की जानकारी के लिए शरीर में त्वचा नामक ज्ञानेन्द्रिय तथा हस्त (हाथ) नामक कर्मेन्द्रिय की रचना या उत्पत्ति हुर्इ । यानी वायु तत्व प्रधान जानकारी ‘स्पर्श’ के माध्यम से ‘त्वचा’ करेगी तथा उसके पश्चात् आवश्यकतानुसार उसके सहयोगी रूप कर्मेन्द्रिय उसका कार्य करेगी । ज्ञानेन्द्रिय प्रधान और कर्मेन्द्रिय सहायक के रूप में पद स्थापित होते हैं जिसके अनुसार अपना लक्ष्य कार्य सम्पादन करते हैं। वायु तथा वायु तत्व विभाग के विषय-वस्तु को जानने-समझने में शब्द भी सहयोग कर सकता है परन्तु स्पष्टत: पहचान इसका स्पर्श से ही होता है क्योंकि वायुतत्त्व की तनमात्रा स्पर्श ही होता है। रूप, रस या स्वाद एवं गन्ध की पहुँच स्पर्श में नहीं होती है क्योंकि स्पर्श इन तीनों से ही अति सूक्ष्म होता है यानी सूक्ष्मताक्रम में ‘स्पर्श’ के पहले ‘शब्द’ ही आता है । रूप-रस-गन्ध तो पश्चात् के पदार्थ तत्वों में होता है ।

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10.1.3 अग्नि तत्व विभाग (Origine and Position of the Fire)

अग्नि तत्त्व विभाग के अन्तर्गत अग्नि तथा अग्नि से सम्बन्धित वे सारी विषय-वस्तुयें, उनकी जानकारी व पहचान तथा उसके आवश्यकतानुसार प्रयोग-उपयोग सम्बन्धी समस्त बातें ही होती-रहती हैं । अग्नि तत्व का सूक्ष्म विषय ‘रूप’ है, यानी रूप के माध्यम से ही अग्नि तत्व तथा उससे सम्बन्धित विषय-वस्तुओं की जानकारी व पहचान होता है । हालाँकि अग्नि तत्व तीन इकाइयों से बना होता है- शक्ति, आकाश और वायु ही तीन मिलकर अग्नि तत्व की रचना या उत्पत्ति करते या होते हैं-- जैसे कि वायु दो इकाइयों शक्ति-आकाश तथा आकाश केवल एक इकार्इ शक्ति द्वारा ही रचित या उत्पन्न हुआ, जबकि अग्नि में शक्ति-आकाश-वायु तीनों ही समाहित होते हैं । इसलिए इन तीनों की अधीनता क्रमश: शक्ति के अधीन आकाश तत्व विभाग, शक्ति और आकाश तत्व विभाग के अधीन वायु तत्व विभाग तथा शक्ति-आकाश व वायु तत्व विभाग के अधीन अग्नि तत्व विभाग गतिशील होता-रहता है । इसका तात्पर्य यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि वे सब शक्ति-आकाश-वायु अग्नि तत्व विभाग के लक्ष्य कार्य सम्पादन में बाधा डालेंगे। बाधा नहीं अपितु सहयोग ही करते रहते हैं । अग्नि तत्व विभाग अपना लक्ष्य कार्य-सम्पादन ‘रूप’ के माध्यम से ही करता है । परमेश्वर-प्रकृति की व्यवस्था में विरोध-संघर्ष का नहीं अपितु सहयोग का महत्त्व होता है ।

शक्ति जब स्वच्छन्द थी, तो उसका प्रभाव गोपनीय था परन्तु क्रमश: रूप बदलते क्रम में प्रभाव का आभाष आसान होता गया, जो शब्द के माध्यम से उत्प्रेरण, स्पर्श के माध्यम से बल तथा रूप के माध्यम से अग्नि का प्रभाव भी दिखार्इ देने के रूप में होने लगा यानी यह हुआ प्रभाव जो क्रमश: होता है । अग्नि तत्व विभाग रूप और तेज के माघ्यम से ही अपने कार्य का सम्पादन करता है, हालाँकि इसका प्रधान कार्य तो ‘रूप’ ही के माध्यम से होता है । परन्तु जहाँ यह होता है, क्षमतानुसार उसका प्रभाव तेज रहता ही है क्योंकि तेज के बगैर रूप हो ही नहीं सकता ।

आजकल के जढ़ी, मूढ़ एवं अज्ञान रूपी पर्दा से ज्ञान नेत्र बन्द होने के कारण अन्धे वैज्ञानिक जन यह घोषित कर करा रहे हैं कि शक्ति-विधुत या उर्जा को देखा ही नहीं जा सकता । तो इन जढ़ी-मूढ़ों तथा अन्धों को कौन समझाये कि एकमात्र शक्ति-विधुत-ऊर्जा ही तो देखा जाता है। अग्नि का रूप प्रकाश या ज्योति ही है । अग्नि ‘रूप’ में आते-आते वह शक्ति मानव के सीधे जानकारी रूप (प्रकाश रूप) दिखायी देने रूप में प्रकाशित या प्रकट हो जाया करती है ।

अग्नि तथा अग्नि तत्व से सम्बन्धित जानकारी में रस एवं गन्ध का प्रवेश नहीं हो पाता क्योंकि रस एवं गन्ध से ‘रूप’ सूक्ष्म होता है । हाँ, शब्द और स्पर्श अवश्य उसमें समाहित है। ये सहयोगी हैं अग्नि तत्व विभाग के, जिसके लक्ष्य कार्य-सम्पादन हेतु शरीर में ज्ञानेन्द्रिय रूप में चक्षु-आँख और सहायक रूप में पैर नाम-रूप वाला कर्मेन्द्रिय मिला है, जो अपने आवश्यकतानुसार गतिशील होता रहता है।

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10.1.4 जल तत्त्व विभाग (Origine and Position of the Water)

जल तत्व विभाग के अन्तर्गत वे सारी विषय-वस्तुयें, उसकी जानकारी व पहचान तथा उसके आवश्यकतानुसार प्रयोग-उपयोग सम्बन्धी समस्त बातें ही आती हैं जो जल तथा जल से सम्बन्धित होता रहता हैं । जल तत्व का सूक्ष्म विषय ‘रस’ है यानी रस के माध्यम से ही जल तथा जल तत्व प्रधान विषय-वस्तुओं की जानकारी व पहचान होती है । हालाँकि जल तत्व की रचना या उत्पत्ति चार इकाइयों शक्ति-आकाश-वायु-अग्नि द्वारा होती है । इसीलिए चारों का भी प्रभाव-शब्द-स्पर्श-रूप आदि अपने मूल सूक्ष्म विषय के माध्यम से ‘रस’ यानी जल तत्व में समाहित होते हैं अर्थात् शक्ति के अधीन आकाश, शक्ति और आकाश के अधीन वायु, शक्ति-आकाश और वायु के अधीन अगिन, शक्ति-आकाश-वायु और अगिन के अधीन व अन्तर्गत जल तत्व विभाग गतिशील होता है । इसीलिए जल में क्रमश: प्रभाव-शब्द-स्पर्श-रूप भी समाहित रहता है यानी जल के पहचान में क्रमश: ये चारों ही ‘रस’ का सहयोग करते हैं । जल तत्व ‘रस’ के माध्यम से ही अपना लक्ष्य कार्य का सम्पादन करता है।

जल तत्व का प्रभाव होता है द्रव, मुलायम या विनम्रता और इसके उत्पत्ति का कारण है-- सृष्टि के आदि में परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्द रूप परमसत्ता-शक्ति था। वह परमसत्ता रूप परमात्मा अपने प्रभाव को अपने अन्तर्गत ही समाहित करके परम आकाश रूप परमधाम रूप अमरलोक में मुक्त और अमर रूप में सर्वशक्ति-सत्ता सामर्थ्य युक्त सच्चिदानन्द (सत्-चित्-आनन्द) रूप शाश्वत शान्ति और शाश्वत आनन्द रूप ‘सदानन्दमय’ रूप में था, है और रहने वाला भी है। जब सृष्टि रचना की बात उनके अन्दर उठी तब वे ही अपने संकल्प से आदि-शक्ति रूपा अपने ‘प्रभा’ को प्रकट किया तथा वे इस आदिशक्ति को ऐश्वर्य के रूप में चेतन-जड़ दो रूपों तथा गुण-दोष दो प्रवृत्तियों से युक्त करते हुए सृष्टि रचना का आदेश दिया । तब उस आदि-शक्ति ने सृष्टि रचना रूप अपने लक्ष्य कार्य के सम्पादन हेतु उत्पत्ति या रचना आरम्भ की, जिसे क्रमश: आप देखते आ रहे हैं-- शक्ति-आकाश-वायु-अग्नि-जल तत्व रूप में ।

आदि में जब मात्र परमसत्ता-शक्ति (परमात्मा) ही थे, तब तो प्रभाव ही प्रभाव था । तत्पश्चात् परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप शब्द-ब्रह्रा रूप परमब्रह्रा परमेश्वर या परमात्मा ने अपने में से ही ‘आत्म’ शब्द को ज्योति रूपा शक्ति तथा उसको ‘प्रभा’ से युक्त करते हुए प्रकट करते हुए पृथक कर दिये, जिससे ज्योतिरूपा शक्ति भी पृथक हो अपने सूक्ष्म विषय ‘प्रभा’ के माध्यम से आकाश की उत्पत्ति की। परमप्रभु से प्रकट ‘आत्म’ शब्द का ही अंश रूप ‘हूँ’ प्रकट हुआ, जिससे ‘ह्-ॐ’ हुआ। आदि-शक्ति ‘प्रभा’ परमप्रभु से उत्पन्न तथा उन्हीं से प्रभावित रही। इस आदि-शक्ति ‘प्रभा’ से अपने सहज ‘भाव’ से ‘हूँ’ कार उत्पन्न होने से नाम प्रभाव पड़ा। यह इतना ज्यादा या अत्यधिक मात्रा में उत्पन्न हुआ कि उसे आसानी से काबू यानी वश में नहीं किया जा सकता था। तब तुरन्त आदि-शक्ति ‘प्रभा’ ने ‘हूँ’ को विभाजित करके दो भाग कर दिया जिससे ‘ह्-ॐ’ दो रूपों में पृथक-पृथक हो गये । 'ह्’ प्रभा से तेज प्राप्त करते ही और ॐ के अलग होते हुये ‘ह्’ सूक्ष्म रूप से स्थूल रूप में आकाश का रूप लिया। जिसमें ‘ह्’ प्रेरित होकर व्यापक रूप आकाशवत् हो गया और उससे शक्ति के प्रभाव से सृष्टि उत्पन्न हुर्इ तथा ॐ प्रेरित होकर देवत्व को उत्पन्न किया और शक्ति की प्रेरणा व सहयोग से ही सृष्टि रचना क्रम से वायु-अगिन-जल रूपों को अपने आधीन उत्पन्न करता-होता हुआ आगे बढ़ता रहा । शब्द सूक्ष्म विषय रूप आकाश में तो अभी शक्ति का ‘प्रभाव’ प्रकट हुआ, परन्तु वह ‘बल’ रूप में महसूस हुआ था-- प्रभाव का खुल्लम खुल्ला प्राकटय नहीं हुआ था। अग्नि तत्व के माध्यम से उसका रूप भी भौतिक रूप में प्रकट हो गया जिसमें इतना अधिक तेज था कि उस तेज को प्रयोग-उपयोग में लाने के लिये जल तत्व की उत्पत्ति की गर्इ या हुर्इ ताकि तेज को ठण्डा, मुलायम या द्रवित करता हुआ आवश्यकतानुसार उपयोगी बनाया जा सके। जल के वगैर उसका तेज कम हो ही नहीं रहा था। सर्वथा ही ऊपर बढ़ते ही रहने की प्रवृति या गतिविधि रहती, तो सर्वथा नीचे की ओर चलने वाले जल ने अग्नि के प्रभाव को कुछ सीमित किया अर्थात् रूप से व्यापक और बड़ा ‘अंहकार’ तब उसके अधीन बल और बल के अधीन तेज तथा तेज के अधीन जल हुआ, जो अपने द्रवित गुण रस से प्रभावित कर उपयोग के योग्य बनाया । इस कारण जल तत्व की उत्पत्ति इस प्रकार हुर्इ । जल तथा जल से सम्बन्धित विषयों की जानकारी हेतु ‘रस’ के लिये ज्ञानेन्द्रिय रूप में जिह्वा नाम से शरीर में स्थान पार्इ तथा इसके सहयोग में सहायक का कार्य करती-रहती है उपस्थेन्द्रिय पेशाबद्वार ।

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10.1.5 थल तत्व विभाग (Origine and Position of the Earth)

थल तत्व विभाग के अन्तर्गत वे सारी वस्तुयें आती हैं तथा उनसे सम्बन्धित सारे विषय उसकी जानकारी एवं पहचान तथा उसके प्रयोग-उपयोग सम्बन्धी सारी बातें आती है, जो थल तथा थल से सम्बन्धित होती रहती हैं। थल तत्व का सूक्ष्म विषय गन्ध है यानी थल तथा थल तत्व प्रधान विषय वस्तुओं की मुख्यत: जानकारी व पहचान गन्ध के माध्यम से ही होता है, हालाँकि शक्ति-आकाश-वायु-अग्नि-जल आदि पाँचों इकाइयाँ मिलकर ही आपसी मेल मिलाप से थल तत्व की रचना या उत्त्पत्ति करती हैं या होती हैं, जिससे कि इन पाँचों के अपने सूक्ष्म विषय रूप प्रभाव-शब्द-स्पर्श-रूप-रस भी इस थल तत्व तथा इसके सूक्ष्म विषय रूप गन्ध में समाहित रहते हैं । इसलिये थल तथा थल तत्व सम्बन्धी विषय-वस्तुओं की सही जानकारी एवं पहचान तथा प्रयोग-उपयोग में काफी सहायक होते हैं परन्तु प्रधानतया कार्य जान-पहचान का यह गन्ध ही करता-कराता या गन्ध ही के माध्यम से होता है । थल तत्व विभाग गन्ध के माध्यम से ही अपना लक्ष्य कार्य सम्पादन करता-कराता है तथा शेष अन्य प्रभाव शब्द-स्पर्श-रूप-रस आदि भी अपने-अपने अंश तक इसका सहयोग करते हैं ।

शरीर के अन्तर्गत थल-तत्व सम्बन्धी विषय-वस्तुओं की यथार्थत: जानकारी व पहचान तथा प्रयोग एवं उपयोग हेतु और थल तत्व विभाग से सम्पर्क बनाये रखने हेतु नाक (घ्राणेन्द्रिय) या नासिका नाम ज्ञानेन्द्रिय तथा इसके सहयोग या सहायक रूप में गुदा (मल द्वार) नाम कर्मेन्द्रिय अपना स्थान स्थापित किये । अत: नासिका गन्ध लेने तथा गुदा दुर्गन्ध विशेष या दुर्गन्ध (मल) त्याग का कार्य करता रहता है ।

जल तत्व के द्रवीभूत गुण के कारण कि बिना किसी कड़ार्इ के या ठोस पदार्थ के जल कहीं ठहर ही नहीं सकता, सदा नीचे की ओर बहता चला जा रहा है । इसलिए शक्ति ने आकाश-वायु- अग्नि-जल चारों से ही मेल-मिलाप कर-कराकर अपने प्रभाव से ही, इस पाँचवें पदार्थ तत्व रूप थल को उत्पन्न किया । ब्रह्राण्ड में जितनी ठोस वस्तुयें दिखार्इ दे रही हैं, सभी की सभी ही इस थल तत्व विभाग के अन्तर्गत ही आती हैं ।
क्या ही विचित्र रचना या विधि-विधान है परम प्रभु का कि जल के चारों तरफ थल और थल के चारों तरफ जल दिखार्इ दे रहा है, जिससे यह कहना भी एक कठिन बात ही है कि जल से थल घिरा है या थल से जल घिरा है । यह तो स्पष्टत: दिखार्इ दे रहा है । देखें-जानें कि प्राय: जहाँ पर जल दिखार्इ दे रहा है, उसके नीचे थल तथा जहाँ पर थल दिखार्इ दे रहा है, उसके नीचे जल स्थित किये हुये है ।

धन्य है, परमप्रभु तेरी महिमा को धन्य ! तेरी विधि व विधान तथा धरती व आसमान धन्य हैं और तुझे तो चाहे जितना भी धन्यवाद दिया जाये, तेरे लिये कम है क्योंकि धन्यवाद भी तो तुम्हीं से आकर, इसको निमित्त मात्र बनाता हुआ तेरे पास ही चला जा रहा है। धन्य है तेरी महिमा प्रभो! कि सृष्टिकाल में तेरे से ही क्रमश: आत्म-शक्ति-आकाश-वायु-अग्नि-जल-थल तथा इससे उत्पन्न विषय वस्तुयें अन्त में तेरे में ही क्रमश: उल्टी गति से तत्त्वज्ञान महाप्रलय काल में लय कर जाती हैं ।

सदभावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! यहाँ जिस क्रमश: पाँच पदार्थ तत्वों की चर्चा की गर्इ है, अति संक्षिप्तत: चर्चा, सारांश रूप में ही की गर्इ है । चूंकि सम्पूर्ण सृष्टि की रचना या उत्पत्ति परम प्रभु के निर्देशन में आत्म-शक्ति रूप ‘प्रभा’ ने अपने ‘हूँ’ कार से ‘हूँ’ से ‘ह्-ॐ’ के साथ आपस में मेल-मिलाप करते हुये जड़ जगत तथा ॐ से देव तथा देव लोक की रचना या उत्पत्ति की या हुर्इ । आत्म-शक्ति अथवा ब्रह्रा-ज्योति ‘प्रभा शक्ति’ के आपसी मेल-मिलाप से ही ‘ह्’ अक्षर, शब्दादि सूक्ष्म विषय तथा आकाश आदि पदार्थ तत्व भी क्रमश: उत्पन्न हुये तथा उन्हीं आत्म-ज्योति से ही उत्पन्न ॐ, देव तथा देव लोकों की रचना में माध्यम बना । पूरी सृष्टि इन्हीं पाँच पदार्थ तत्वों से ही युक्त होने के कारण और सम्पूर्ण सृष्टि या ब्रह्राण्ड का ही समग्र रूपों के अंशत: मेल-मिलाप रूप यह पिण्ड (शरीर) ब्रह्राण्ड का ही एक इकार्इ है ।

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10.1. 6 पिण्ड और ब्रह्राण्ड का तुलनात्मक रूप

जो कुछ भी ब्रह्राण्ड में है, उसका अंशवत रूप कुछ न कुछ इस पिण्ड (मानव शरीर) में निश्चित ही है । यही कारण है कि इस शरीर में पाँच ही ज्ञानेनिद्रयाँ तथा ज्ञानेनिद्रयों के सहायक रूप में पाँच ही कर्मेनिद्रयाँ भी हैं। पाँच तत्त्वों से सम्बन्धित अपने-अपने सम्बन्ध स्थापित रखने तथा सृष्टि और शरीर अथवा ब्रह्राण्ड और पिण्ड में आपसी ताल-मेल बनाये रखने हेतु ही रचित एवं निर्धारित की गर्इ या हुर्इ। ब्रह्राण्ड में जो ‘गुण प्रधान’ दैव वर्ग है, उसका प्रतिनिधित्व पिण्ड में ‘बुद्धि’ करती है तथा ब्रह्राण्ड में जो दोष प्रधान शैतान (असुर) वर्ग है, उसका प्रतिनिधित्व ‘मन’ करता है। अहंकार जो है वह--जिस प्रकार ब्रह्राण्ड में सर्वेसर्वा ‘परमतत्त्वम्’ रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप शब्द ब्रह्रा या परमब्रह्रा या परमेश्वर रूप ‘परम’ ही अधिकार चलाता है, ठीक उसी प्रकार पिण्ड में यह ‘अहं’ शब्द रूप ‘अहंकार’ अधिकार चलाता है। पुन: जिस प्रकार ब्रह्राण्ड पर परमप्रभु का स्वत्त्वाधिकार स्थापित रहता है, ठीक उसी प्रकार पिण्ड पर ‘अहं’ शब्द सहित सूक्ष्मरूप जीव का स्वत्त्वाधिकार रहता है । जिस प्रकार ब्रह्राण्ड में देव या सुर और दनुज-दानव या असुर अथवा सज्जन और दुर्जन होते-रहते हैं, ठीक उसी प्रकार पिण्ड में बुद्धि और मन होता-रहता है। जिस प्रकार ब्रह्राण्ड में सूर्य-चन्द्रमा हैं और वे ब्रह्राण्ड के ऊपरी हिस्से में आकाश में दिखार्इ देते है, ठीक उसी प्रकार पिण्ड में भी सूर्य-चन्द्रमा रूप दो आँख पिण्डीय सिर में ऊपरी सामने हिस्से में स्पष्टतया दिखार्इ देते हैं। जिस प्रकार ब्रह्राण्ड में रात्रि के अन्धेरे में अगणित तारे दिखार्इ देते है, ठीक उसी प्रकार पिण्ड में भी ध्यान के समय अन्धकार के बेला में अगणित तारे दिखार्इ देते हैं । इसे योगी-साधक एवं आध्यात्मिक जन ही क्रियात्मक साधना से देखते हैं । जिस प्रकार पृथ्वी पर नदियाँ हैं, उसी प्रकार पिण्ड में नाडि़याँ हैं । जिस प्रकार ब्रह्राण्ड ब्रह्रा-शक्ति का एक क्रीड़ा स्थल है, उसी प्रकार पिण्ड भी सोsहँ-आत्मा से जीव से शरीरमय का क्रीड़ा स्थल है ।

ब्रह्राण्ड परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्रा की शरीर है तो पिण्ड सोsहँ-हँसो की शरीर है। अत: दोनों समान होने पर भी ब्रह्राण्ड अंशी और पिण्ड उसका अंश मात्र है। परमतत्त्वम् खुदा या गॉड या लार्ड या यहोवा या भगवान ही ब्रह्राण्ड तथा पिण्ड दोनों का प्रधान संचालक हैं, जो परमधाम या बिहिश्त या पैराडाइज में ‘सदानन्द’ रूप सचिचदानन्द मय रहता हुआ सभी का संचालन करता-कराता रहता है । वही परमप्रभु युग-युग में पृथ्वी की संचालन व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाने पर, परमधाम से इस भू-मण्डल पर अवतरित होकर, कोर्इ शरीर धारण कर उसी के माध्यम से चाहे जिस तरह भी विधि-व्यवस्था सत्य-धर्म-न्याय-नीति प्रधान हो, संस्थापित कर, शासन कर दिखाकर, पुन: वापस चला जाता है। वही परम प्रभु ब्रह्राण्ड और पिण्ड दोनों का ही अंशी है तथा दोनों का ही लय-प्रलय रूप भी है।
वही परमब्रह्रा परमेश्वर वर्तमान में भी भू-मण्डल पर अवतरित होकर अपना सत्य-धर्म संस्थापन कार्य प्रारम्भ कर चुका है - कर रहा है। आवश्यकता है उन्हें खोज-जान-देख-परख पहचान कर उनके प्रति समर्पित-शरणागत हो कर धर्म-धर्मात्मा-धरती रक्षार्थ उनके परम पुनीत कार्य में सेवा-सहयोग रूप में जुड़ कर अपने जीवन को सफल-सार्थक बनाते हुए मोक्ष रूप मंज़िल को प्राप्त करने की ।

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----------------सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस


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