विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
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विद्यातत्त्वम् के दूसरा अंग 10.2 स्वाध्याय (Self Realization)

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! संसार में आनन्दमय मानव जीवन जीने के लिये स्वाध्याय एक अनिवार्य विधान है जो मानव के अन्त:करण में मानवता का भाव एवं मानवीय गुणों को विकसित करता हुआ, शैतानियत-असुरता एवं पशुवत जीवन से ऊपर उठाते हुए, मानवीय जीवन जीने की राह दिखाता है । सही मानव बनाता है। स्वाध्याय विधान से रहित मानव, मानव कहलाने के योग्य नहीं होता। वह या तो बालक या तो पशु या असुर या तो पागल कहलाने योग्य होता है । स्वाध्याय का विधान आध्यात्मिक महापुरुषों एवं तात्तिवक सत्पुरुष के लिये अनिवार्य नहीं होता परन्तु आध्यात्मिक महापुरुषों को भी चाहिये कि स्वाध्याय के उन विधानों को अपने जीवन में अवश्य अपनावें जो आध्यात्मिक विधान में बाधक न हो।

स्वाध्याय मानव जीवन को मानवता से युक्त बनाने हेतु एक अनिवार्य विधान है, जिसके पालन में यदि थोड़ी-बहुत कठिनार्इ एवं परेशानी भी हो, तो भी अनिवार्यत: इसे प्राय: सभी मानव को ही अपनाना चाहिये क्योंकि जो थोड़ी-बहुत कठिनार्इ एवं परेशानी भी हो, तो घवड़ाना नहीं चाहिए क्योंकि वह कठिनार्इ एवं परेशानी मात्र कुछ दिनों तक ही रहेगी, क्योंकि यह सामान्यत: देखा जाता है कि कोर्इ कार्य चाहे वह कितना ही अच्छा से अच्छा क्यों न हो, प्रारम्भ में थोड़ी-बहुत कठिनार्इ एवं परेशानी तो होती ही है । जब उसे अपने जीवन में अथवा अपने जीवन को उस के अनुसार ले चला जाता है

वास्तव में सही मानव कहलाने के योग्य वही मानव होता भी है जो कठिनाइयों एवं परेशानियों के बावजूद भी अपने मानवीय अच्छे गुणों से विचलित नहीं होता बल्कि अपने में और ही दृढ़ता लाता है । मानवीय जीवन का सही मूल्याँकन कठिनाइयों एवं परेशानियों के अन्तर्गत ही होता है, ठीक-ठाक स्थिति-परिस्थिति में नहीं । ठीक-ठाक परिस्थिति में तो अधिकतर सभी मनुष्य चल ही लेंगे तो फिर मानवता कि महत्ता कैसे जानी-समझी जा सकती है ? अर्थात् नहीं समझी जा सकती है ! कदापि नहीं जानी जा सकती है ! कठिनाइयों एवं परेशानियों को सही मानव कभी भी जीवन को आगे बढ़ाने में बाधक नहीं मानता बल्कि यह मानव के मानवता को विकसित एवं प्रदर्शित करने-कराने तथा सही मानव के लिये समाज में अनिवार्यत: उत्थान कारक ही होता है ।

अच्छे कार्यों के करने में जिस किसी भी मनुष्य पर कठिनाइयाँ एवं परेशानियाँ आवें तो यह अवश्य ही जान व मान लेना चाहिये कि यह उसके मानवता की परीक्षा यानी मानवता का परिक्षण हो रहा है। यदि वह साहस पूर्वक सहिष्णुता के विधान से दृढ़ता पूर्वक अपने अच्छे पथ या विधान पर स्थिर रहता है तो निश्चित ही उस परीक्षण में पास होता हुआ वह मानवता के अगली श्रेष्ठतर श्रेणी की तरफ नि:संदेह उठ रहा है । इसमें सन्देह तो कदापि न करें ।

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10.2.1 स्वाध्याय एक अदभुत कारखाना

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! वास्तव में स्वाध्याय वह कारखना है जिसमें अगणित दूषित विचार-भाव-व्यवहार-कर्म वाला मनुष्य आये दिन निर्मल एवं स्वच्छ भाव-व्यवहार-विचार कर्म वाला सही मानव बनता और निकलता रहता है । परन्तु अफसोस ! अफसोस पर अफसोस ! कि मनुष्य मानवता स्थापित करने वाले इस स्वाध्याय रूप अदभुत कारखाने को भी बन्द कर करवा दिये हैं तथा यह निकम्मी एवं भ्रष्ट सरकारें भी (विश्व की ही) इस स्वाध्याय रूप अदभुत कारखाने को प्राय: हर पाठशाला एवं विद्यालयों तक में भी खोल-खुलवा कर सबके लिये अनिवार्य नहीं कर करवा रही हैं। क्या ही अफसोस की बात है कि देश व दुनियां वाले दूषित मनुष्य से निर्मल एवं स्वच्छ तथा परिष्कृत मानव बनाने व निकालने वाली मानवता के इस अदभुत एवं इतने बड़े उपयोगी स्वाध्याय वाले कारखाने को खोलने-खोलवाने तथा चलने-चलाने की आवश्यकता ही महशूस नहीं करते; और दूषित भाव-विचार-व्यवहार-कर्म वाले मनुष्य से युक्त दूषित मानव समाज बन-बन कर दम घूँट-घूँट कर किसी-किसी तरह एक-एक दिन व्यतीत कर रहे है और मनुष्य समाज को अराजक बना-बनाकर चारों तरफ अत्याचार-भ्रष्टाचार एवं आतंक का राज स्थापित किये-कराये हुये हैं ।

समय रहते देश-दुनियां की सरकारों द्वारा यदि इस स्वाध्याय रूप मानवता के अदभुत कारखाने को छोटे से छोटे और बड़े से बडे़ पाठशालाओं और विश्व विद्यालयों तक में सभी शिक्षार्थियों के लिये अनिवार्य: विषय के रूप में नहीं खोला गया तथा प्रभावी रूप से इस स्वाध्याय रूपी मानवता के कारखाने से प्राय: सभी को गुजरने हेतु प्रभावी विधान बनाकर प्रभावी तरीके से लागू किया-कराया नहीं गया, तो इसमें सन्देह नहीं कि भगवान स्वयं विश्व विनाशक प्रलयंकारी रूप प्रकट कर कुछ स्वाध्यायी एवं आध्यात्मिक और तात्तिवक क्रमश: पुरुषों, महापुरुषों एवं सत्पुरुषों तथा ऐसे ही बालिकाओं, स्त्रियों आदि का रख-रखाव करते-करवाते हुये विश्व का विनाश ही न कर-करवा दे !

यह भी एक आश्चर्यमय ही नहीं, अपितु महानतम आश्चर्य की बात है कि पौराणिक गाथाओं तथा वेद-उपनिषद-रामायण-गीता-पुराण- बाइबिल-कुर्आन आदि सदग्रन्थों में ऐसे हजारों हजार सत्य प्रमाणित बातों के बावजूद भी धन-जन-पद के अभिमान में चूर, दुष्ट-असुर एवं भ्रष्ट राजनेता गण, जब तक मधुकैटभ-हिरण्याक्ष-हिरण्यकश्यप-रावण-कंस-कौरव- फिर्औन व कुरैश आदि की ही तरह मटियामेट या विनाश के मुख में नहीं जाते; तब तक उन्हें अकाटय सत्य एवं प्रमाणित बातों पर विश्वास ही नहीं हो पाता है। यदि विश्वास एवं भरोसा हो जाता और ये बातें मान लेते तो प्रह्लाद, ध्रुव, सुग्रीव, विभीषण, उग्रसेन, पाण्डव, इजरायली (मूसा के अनुयायी) या यहूदी तथा मुसलमानों की तरह शान्ति एवं आनन्द से अमन-चैन से अवश्य ही हो-रह जाते ।

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! खान-पान के पौष्टिक आहर जिस प्रकार से शारीरिक अभाव की पूर्ति एवं पुष्टि करते बनाते हैं, ठीक उसी प्रकार स्वाध्याय जीव के अभाव की पूर्ति एवं तुष्टि प्रदान करता है, जिससे जीव सदा ही अपने स्वरूप को सूक्ष्म दृष्टि से निदिध्यासन में साक्षात् देखता हुआ समाज में निर्मल एवं स्वच्छ मानव के रूप में अमन-चैन के साथ आनन्दमय जीवन व्यतीत करता है। परन्तु बार-बार यह कहना पड़ता है कि अफसोस, महानतम अफसोस की बात है कि मनुष्यों को सच्चे मानवता से युक्त करने तथा सर्वत्र आनन्दमय रखने वाला स्वाध्याय विधान की ही आवश्यकता मनुष्य नहीं महशूस कर रहा है तथा अभाव एवं अव्यवस्था से बेचैन एवं आनन्द शून्य हुआ, तड़फड़ा-तड़फड़ा कर चैन एवं आनन्द हेतु नाना प्रकार के दूषित विचार एवं कर्मों को अपना-अपना कर नित्य प्रति ही बेचैनी एवं अभाव के घेरे में पड़-पड़ कर तड़फता हुआ, दम घूँट-घूँट कर मानव समाज में नाना प्रकार के दूषित एवं विषाक्त वातावरण स्थापित करता-कराता जा रहा है । थोड़ा सा भी अपने दुर्भावों, दुर्विचारों, दुव्र्यवहारों एवं दुष्कर्मो की तरफ गौर नहीं कर पाता है कि वह इस दूषित भाव-विचार-व्यवहार-कर्म से नित्य प्रति ही और ही दूषित होता हुआ पतनोन्मुख होता हुआ अधोपतन की तरफ बडे़ ही तेजी के साथ गिर रहा है, जो कुछ ही दिन-माह-बरष में विनाश के मुख तक में अपने को पहुँचाये बगैर नहीं रूक पाता-गिरता ही चला जाता है।

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10.2.2 विनाश से बचने का उपाय

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! आज की सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था इतनी दूषित हो चुकी है कि परमप्रभु रूप परमब्रह्रा या परमेश्वर या परमात्मा या खुदा-गॉड-भगवान को स्वाध्यायी मानव, आध्यात्मिक देव-मानव या महामानव तथा तात्तिवक सत्पुरुषों के रक्षार्थ एवं दुष्ट-दुर्जनता के विनाशार्थ प्रलंयकारी या कियामती या डिस्ट्रायर वाले रूप को प्राकटय करना मात्र ही अवशेष भी रह गया है, अन्यथा आज का अभावग्रस्त, अव्यवस्था एवं अत्याचारिक व अन्यायी आतंक से युक्त सामाजिक एवं राजनैतिक कुव्यवस्था का सुधार अब असम्भव सा हो गया है। अब संहार एवं विनाश के माध्यम से ही विश्व का मानव समाज ‘ठीक’ होगा। फिर भी परमपुरुष रूप परमात्मा अभी भी सुधार करने में लगा हुआ है ।

स्वाध्यायी मानवों, आध्यात्मिक महामानवों तथा तात्तिवक परम वाले मानवों से मुझ ‘सदानन्द’ (सन्त ज्ञानेश्वर) का साग्रह अनुरोध है कि आप मानवों, महामानवों एवं परम वाले मानवों, अपने-अपने स्वाध्याय- आध्यात्मिक क्रियाओं एवं तात्तिवक विधानों को अपना एक मात्र सहारा बनाओ क्योंकि अब विनाश या प्रलय का समय अति समीप अतिवेग से आ रहा है। आप अपने-अपने विधानों से ही बच पाओगे, अन्यथा अब बचाव का कोर्इ उपाय नहीं है । क्या ही अच्छा होता कि सभी के सभी ही दोष-रहित सत्य प्रधान मुक्ति और अमरता से युक्त सर्वोत्तम् जीवन विधान वाले तत्त्वज्ञान विधान को र्इमान से स्वीकार कर लेते--जीवन ही सफल-सार्थक हो जाया करता।

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10.2.3 स्वाध्याय की महत्ता

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! स्वाध्याय की आवश्यकता एवं महत्ता को देखते हुए ही योग या अध्यात्म के आठ प्रमुख अंगों में से दूसरे अंग रूप नियम में चौथे उपाँग के रूप में या स्थान पर इस मानवता को स्थापित करने-कराने वाले विधान रूप स्वाध्याय को पद स्थापित किया गया है, जिसके पश्चात् ही पाँचवें उपाँग के रूप में या पद पर ‘र्इश्वर-प्रणिधान’ नामक पद को स्थापित किया गया है जो अभी-अभी अगले अध्यात्म वाले शीर्षक में देखा जायेगा। इस विधान यानी स्वाध्याय-विधान से सांसारिक मानव को अपने ‘स्व’ की जानकारी तथा उसके मनन-चिन्तन व निदिध्यासन के माध्यम से सूक्ष्म-दृष्टि से सूक्ष्म शरीर रूप जीव-रूह-सेल्फ-स्व-अहम् स्पष्ट दिखलायी देते या मिलते ही ‘स्व’ की जानकारी एवं स्पष्टत: साक्षात् दर्शन ही मानव का शारीरिक एवं सांसारिक जड़ता एवं मूढ़ता रूप शरीरमय भाव से बचाये रखता है। जिसका परिणाम है कि जीव या ‘स्व’ से प्राप्त होने वाले आनन्द से आनन्दित रहता हुआ शरीर को अपने लक्ष्य-कार्य सम्पादन हेतु सर्व साधन-साधनाओं एवं विधानों से युक्त एक ‘सहायक साधन’ के रूप में जानता एवं मानता हुआ व्यवहरित होता है ।

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10.2.4 मायामुक्त-आनन्दयुक्त कल्याणपरक

जीवन का प्रारम्भ यही से

स्वाध्याय अपने में लीन स्वाध्यायी को शारीरिक, पारिवारिक एवं सांसारिक शरीर-सम्पत्ति या व्यक्ति-वस्तु या कामिनी-कांचन में भटकने-फँसने-जकड़ने से बचाता हुआ माया-मोह ममता-वासना आदि रूप माया जाल से अपने ‘स्व’ रूप जीव को सदा सावधान रखता व सचेत करता हुआ, शरीरमय व सम्पत्तिमय बनने से अपने ‘स्व’ रूप जीव की हमेशा रक्षा करता-रहता है तथा साथ ही साथ इतना आनन्द प्रदान करता रहता है कि अपने में लीन स्वाध्यायी को आनन्द का थोड़ा भी अभाव होने ही नहीं पाता कि इधर-उधर भटके या दूषित भाव-विचार व्यवहार-कर्म में फँसे । आनन्दानुभूति के कारण ही स्वाध्यायी को न तो कभी आनन्द का अभाव महशूस या आभाष होता है और न उसे बेचैनी होती है यानी स्वाध्यायी चैन का जीवन आनन्दमय रहता हुआ व्यतीत करता है।

आप पाठक और श्रोता बन्धुओं से मुझ सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द का साग्रह अनुरोध है कि आप यदि सर्वप्रथम सर्वोत्तम् उपलब्धि-मुक्ति-अमरता वाला तात्तिवक न बन सकें और मध्यम कोटि शान्ति-आनन्द वाला हँसो ज्योति वाला आध्यात्मिक भी यदि बन सकने की स्थिति में नहीं हैं, तो कम से कम स्वाध्यायी तो अनिवार्यत: हो ही जाइये। हालाँकि अपने आत्मिक उत्थान हेतु आध्यात्मिक तथा मुक्ति और अमरता हेतु तात्तिवक बनने या होने का सदैव प्रयत्न करना चाहिए; करना ही चाहिये क्योंकि यही जीवन का मूल उददेश्य है । मोक्ष नहीं मिला तो सारा जीवन व्यर्थ ही समझना चाहिये । क्यों कि जीवन मंजिल-उददेश्य-अन्तिम लक्ष्य ‘मोक्ष’ ही तो है योग-अध्यात्म व शान्ति-आनन्द मात्र भी नहीं ।

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक एवं श्रोता बन्धुओं ! शिक्षा जिस प्रकार शरीर एवं संसार के मध्य का एक अध्ययन प्रणाली है, ठीक उसी प्रकार स्वाध्याय ‘स्व’ रूप जीव(रूह-सेल्फ) एवं शरीर(जिस्म-बाडी) के मध्य का श्रवण एवं मनन-चिन्तन औरं निदिध्यासन रूप अध्ययन विधान है। शरीर एवं संसार के मध्य अध्ययन एवं लक्ष्य कार्य सम्पादन हेतु इंद्रियाँ होती हैं, ठीक उसी प्रकार शरीर और ‘स्व’ रूप जीव के मध्य अध्ययन एवं लक्ष्य कार्य सम्पादन हेतु श्रवण एक मनन-चिन्तन और निदिध्यासन होता है। पुन: शरीर के पुष्टि हेतु पौष्टिक आहार के लिए शरीर संसार में अनेकानेक कठिनाइयों एवं परेशानियों को झेलता हुआ अथक परिश्रम करता हुआ, सुख-साधन हेतु शिक्षा ग्रहण करता है, ठीक उसी प्रकार ‘स्व’ रूप जीव शरीर के अन्दर अपने ‘स्वत्त्व’ को स्थित एवं तुष्टि हेतु अनेकानेक आन्तरिक एवं बाह्य, मानसिक एवं शारीरिक कठिनाइयों एवं परेशानियों को झेलता हुआ, अनवरत आनन्दित रहता हुआ नियमित रूप से आनन्दानुभूति हेतु स्वाध्याय का विधान नित्यश: करता रहता है। स्वाध्याय विधान शिक्षा से उच्च और श्रेष्ठतर विधि-विधान है क्योंकि शिक्षा मायावी सुख-साधन का हेतु होता है तो स्वाध्याय मायारहित आनन्दमय जीवन का हेतु होता है । शिक्षा से स्वाध्याय की क्षमता-शक्ति हजारों गुणा अधिक होती है।

शिक्षा शरीर का शरीर के सुख-साधन हेतु एक जानकारी है जो शरीरों को उच्च पदों पर पदासीन करती-कराती है, उसी प्रकार स्वाध्याय जीव का, जीव के आनन्द अनुभूति हेतु एक आनुभूतिक जानकारी और उपलब्धि है, जो जीव को स्वाध्यायी एवं दार्शनिक जैसे मानव समाज में अत्युच्च मर्यादा एवं प्रतिष्ठा देता-दिलाता है तथा शिक्षा के माध्यम से पहुंचे हुए उच्च पदासीन पदाधिकारी लोगों को स्वाध्यायी के चरणों पर गिरवाता तथा निर्देशन या मार्ग दर्शन हेतु स्वाध्यायी के अधीन करता-करवाता है। इससे यह स्पष्टत: समाज में भी दिखायी दे रहा है कि उच्च से उच्च पदों पर पदासीन पदाधिकारीगण आये दिन ही स्वाध्यायियों एवं दार्शनिकों के यहाँ नतमस्तक होकर मार्ग दर्शन एवं निर्देशन हेतु उपस्थित होते रहते हैं ।

इतना ही नहीं, शारीरिक विकास चाहे जितना भी हो जाय एवं शैक्षणिक विकास जितना भी हो जाय फिर भी उससे स्वाध्याय और नैतिकता वाली उपलबिध नहीं हो सकती है । विचार एवं नैतिकता की उपलब्धि जब भी होगी, स्वाध्याय से ही हो सकती है और विचार एवं नैतिकता के बगैर कोर्इ मनुष्य मानवीय सुखों की प्राप्ति तथा मानवीय गुणों का विकास कभी भी कर ही नहीं सकता है । शिक्षा चाहे जितनी भी क्यों न हासिल या प्राप्त कर लिया जाय। शिक्षा शिक्षित बना सकती है परन्तु मानव के आन्तरिक अभाव एवं बेचैनी को दूर नहीं कर सकती है जबकि स्वाध्याय सहजतापूर्वक स्वाभाविक रूप से आन्तरिक अभाव को समाप्त कर आनन्दमय बनाता है, जिससे मनुष्य को आनन्दानुभूति मिलती है और मनुष्य में नैतिकता भरना तथा पशुवत् एवं असुरता जैसे दुर्जनता को भी समाप्त करता हुआ आनन्दित करता-कराता हुआ, विनम्रता प्रदान करता हुआ मानव को मानवता तक पहुँचाने वाला यदि कोर्इ प्रणाली या विधान है तो वह ‘स्वाध्याय’ ही है तथा ‘स्व’ को मायावी शरीरमय बन्धन-फांस में होने रहने से बचाये रखकर ‘स्व’ रूप मय तथा आनन्दमय बनाए रखता है । जिसमें अन्तत: शरीर छूटने पर देव लोक या स्वर्ग में स्वाध्यायी को मर्यादित एवं प्रतिष्ठित पद एवं मर्यादा मिलती है।

इसलिये सदानन्द तो आप से बार-बार यही कहेगा कि किसी अयोग्यता या अक्षमता के कारण यदि आप तात्तिवक परम मानव या सत्पुरुष तथा आध्यात्मिक महामानव या महापुरुष नहीं बन सके, या ऐसा सुअवसर आपको नही मिल सका, तो कम से कम स्वाध्यायी होते हुये मानवीय उपलब्धि को तो अवश्य ही प्राप्त कर लीजिये अन्यथा सारा जीवन ही व्यर्थ हो जायेगा। इस बात का आपके मानने-नहीं मानने का दुष्प्रभाव प्राकृतिक विधानों पर कुछ भी पड़ने वाला नहीं है । सृष्टि का यह विधान था, है और सृष्टि रहने तक रहेगा भी । हाँ, दुष्प्रभाव आप पर अवश्य ही पड़ेगा, चेते-सम्भलें, नहीं तो दुष्प्रभाव से बच नहीं पायेंगे । पुन: कह रहा हूँ कि समय रहते ही चेतें-सम्भलें।

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----------------सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस


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