विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व को एक चेतावनी सर्वोत्तम उप्लब्धि कैसे प्राप्त करें?
महापुरुषत्त्व एवं सत्पुरुषत्त्व हेतु युवकों का आहवान अन्य महत्वपूर्ण लिंक निःशुल्क पुस्तक प्राप्त करें

विद्यातत्त्वम् का तीसरा अंग 10.3 योग-साधना अथवा अध्यात्म (Spiritualization)

सद्भावी सत्यान्वेषी बन्धुओं ! अध्यात्म जीव का आत्मा-र्इश्वर-शिव से दरश-परश और मेल-मिलाप करते हुए आत्मामय र्इश्वरमय-ज्योतिर्मय शिवमय रूप में स्थित-स्थापित करने-कराने का एक क्रियात्मक आध्यात्मिक साधना पद्धति है। जिस प्रकार शिक्षा से संसार और शरीर के मध्य की जानकारी प्राप्त होती है तथा स्वाध्याय शरीर और जीव के बीच की ‘स्व’ का एक अध्ययन विधान है, ठीक उसी प्रकार योग-अध्यात्म जीव और आत्मा-र्इश्वर-शिव के मध्य तथा आत्मा से सम्बन्धित क्रियात्मक या साधनात्मक जानकारी और दर्शन उपलब्धि वाला विधान होता है । दूसरे शब्दों में आत्मा-र्इश्वर-शिव से सम्बन्धित क्रियात्मक अध्ययन पद्धति ही योग-अध्यात्म है ।

अध्यात्म सामान्य मानव से महामानव या महापुरुष या दिव्य पुरुष बनाने वाला एक योग या साधना से सम्बन्धित विस्तृत क्रियात्मक एवं अनुभूतिपरक आध्यात्मिक जानकारी है, जिसके अन्तर्गत शरीर में मूलाधार स्थित अहम् नाम सूक्ष्म शरीर रूप जीव का आत्म ज्योति या दिव्य ज्योति रूप र्इश्वरीय सत्ता-शक्ति या ब्रह्रा ज्योति रूप ब्रह्रा शक्ति या आलिमे नूर या आसमानी रोशनी या नूरे इलाही Divine Light जीवन ज्योति या सहज प्रकाश या परम प्रकाश या स्वयं ज्योतिरूप शिव का साक्षात् दर्शन करना एवं हँसो जप का निरन्तर अभ्यास पूर्वक आत्मामय या र्इश्वरमय या ब्रह्रामय या शिवमय होने-रहने का एक क्रियात्मक अध्ययन पद्धति या विधान होता है ।

स्वाध्याय तो मनुष्य को पशुवत एवं असुरता और शैतानियत के जीवन से ऊपर उठाकर मानवता प्रदान करता-कराता है परन्तु यह आध्यात्मिक क्रियात्मक अध्ययन विधान मनुष्य को सांसारिकता रूप जड़ता से मोड़कर जीव को नीचे गिरने से बचाते हुए ऊपर श्रेष्ठतर आत्मा-र्इश्वर-ब्रह्रा- नूर-सोल-स्पिरिट दिव्य ज्योति रूप चेतन-शिव से जोड़कर चेतनता रूप दिव्यता प्रदान करता-कराता है । पुन: ‘शान्ति’ और आनन्द रूप चिदानन्द की अनुभूति कराने वाला चेतन विज्ञान ही योग या अध्यात्म है, जिसका एकमात्र लक्ष्य शरीरस्थ जीव को शरीरिकता- पारिवारिकता एवं सांसारिकता रूप जड़ जगत से लगा-बझा ममता- मोहासक्ति से सम्बन्ध मोड़कर चेतन आत्मा से सम्बन्ध जोड़-जोड़ कर जीवों को आत्मामय या ब्रह्रामय या चिदानन्दमय या दिव्यानन्दमय या चेतनानन्दमय बनाना ही है । मुक्ति-अमरता तो इसमें नहीं मिलता है; मगर शान्ति-आनन्द तो मिलता ही है ।

Go to Top »

10.3.1 योग या अध्यात्म की महत्ता

योग या अध्यात्म अपने से निष्कपटता पूर्वक श्रद्धा एवं विश्वास के साथ चिपके हुये, लगे हुये लीन साधक को शक्ति-साधना-सिद्धि प्रदान करता हुआ सिद्ध, योगी, ऋषि, महर्षि, ब्रह्रार्षि, तथा अध्यात्मवेत्ता, योगी-महात्मा रूप महापुरुष बना देने या दिव्य पुरुष बना देने वाला एक दिव्य क्रियात्मक विज्ञान है, जो शारीरिकता-पारिवारिकता एवं सांसारिकता रूप माया-मोह ममता-वासना आदि माया जाल से जीव का सम्बन्ध मोड़ता हुआ दिव्य ज्योति से सम्बन्ध जोड़कर दिव्यता प्रदान करते हुये जीवत्त्व भाव को शिवत्त्व या ब्रह्रात्त्व भाव में करता-बनाता हुआ कल्याणकारी यानी कल्याण करने वाला मानव बनाता है, जो समाज कल्याण करे यानी शारीरिकता-पारिवारिकता एवं सांसारिकता में फँसे-जकड़े ‘जीव’ को छुड़ावे तथा आत्मा या र्इश्वर या ब्रह्रा से मिलावे और आत्मामय या र्इश्वरमय या ब्रह्रामय बनावे ।

Go to Top »

10.3.2 कर्म एवं स्वाध्याय और योग-अध्यात्म की जानकारी और उपलब्धि की तुलनात्मक स्थिति

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक एवं श्रोता बन्धुओं ! स्वाध्याय तो कर्म का विरोधी नहीं बल्कि कर्म को गुणों से गुणान्वित कर, अच्छे कर्मों को करने तथा दूषित भाव-विचार व्यवहार-कर्म से दूर रहने को जनाता-सिखाता तथा नैतिकता से युक्त करता हुआ उसे परिष्कृत एवं परिमार्जित रूप में ग्रहण करने को सिखाता है जबकि अध्यात्म कर्म का घोर विरोधी एवं जबर्दस्त शत्रु होता है। कर्म और योग या अध्यात्म दोनों ही एक दूसरे का विरोधी, शत्रु तथा विपरीत मार्ग गामी होते हैं । कर्म, मन्त्र और प्रार्थना के माध्यम से इन्द्रियों को मजबूत बनाने का प्रयत्न करता है, तो योग-साधना या अध्यात्म नियम-आसन और प्रत्याहार के माध्यम से इन्द्रियों को कमजोर बनाने तथा विषय वृत्तियों से मोड़-खींच कर उनको अपने-अपने गोलकों में बन्द करने-कराने की क्रिया-प्रक्रिया का साधनाभ्यास या योगाभ्यास करने-कराने की विधि बताता एवं कर्म से मोड़ कर योग-साधना में लगाता है ।

कर्म का लक्ष्य कार्य है जीवमय आत्मा (सोsहँ) में से जीव का सम्बन्ध काट-कटवा कर चेतन से मोड़ कर शरीर-संसार में माया-मोह, ममता-वासना आदि के माध्यम से प्रलोभन देते हुये भ्रमित करते-कराते हुये माया-जाल में फँसाता-जकड़ता व चेतन आत्मा में से बिछुड़ा-भुला-भटका कर शरीरमय बनाता हुआ पारिवारिकता के बन्धन में बाँधता हुआ, जड़-जगतमय बना देना ताकि आत्मा और परमात्मा तो आत्मा और परमात्मा है; इसे अपने ‘स्व’ रूप का भी भान यानी आभाष न रह जाय । यह शरीरमय से भी नीचे उतर कर जड़वत रूप सम्पत्तिमय या सम्पत्ति प्रधान, जो कि मात्र जड़ ही होता है, बनाने वाला ही कर्म विधान होता है, जिसका ठीक उल्टा अध्यात्म विधान होता है अर्थात चेतन जीवात्मा (हँसो) जड़-जगत को मात्र अपना साधन मान-जान-समझ कर अपने सहयोगार्थ चालित परिचालित करता या कराता है। कर्म चेतन जीवमय आत्मा (सोsहँ) को ही जड़वत बनाकर अपने सेवार्थ या सहयोगार्थ अपने अधीन करना चाहता है, चेतन मयजीव को सदा ही जड़ में बदलने की कोशिश या प्रयत्न करता रहता है तथा योग-साधना अध्यात्म जड़-जगत में जकड़े हुये, फँसे हुये अपने अंश रूप जीव को छुड़ा कर, फँसाहट से निकाल कर, चेतन (हँस) बनाता हुआ कि फँसा हुआ था, छुड़ाता है ।

इसलिये जीव अपने शारीरिक इन्द्रियों को उनके विषयों से मोड़कर, इन्द्रियों को उनके अपने-अपने गोलकों में बन्द करके तब श्वाँस-नि:श्वाँस के क्रिया को करने-पकड़ने हेतु मन को बाँध कर स्वयं ‘अहं’ नाम सूक्ष्म शरीर रूप जीव आत्म-ज्योति रूप आत्मा या दिव्य ज्योति रूप र्इश्वर या ब्रह्रा-ज्योति रूप ब्रह्रा या स्वयं ज्योति रूप शिव का साक्षात्कार कर, आत्मामय या ब्रह्रामय बनता या होता हुआ अहँ सूक्ष्म शरीर रूप (जीव) हँस रूप शिव-शक्ति बन जाता या हो जाता है । यहाँ पर शिव-शक्ति का अर्थ शंकर-पार्वती से नहीं समझकर, स्वयं ज्योति रूप शिव या आत्म ज्योति आत्मा या ब्रह्रा ज्योति रूप ब्रह्रा शक्ति से समझना चाहिये ।

Go to Top »

10.3.3 सृष्टि की उत्पत्ति और लय-विलय-प्रलय

‘शिव’ का अर्थ कल्याण होता है । हँस रूप ब्रह्रा-शक्ति या शिव-शक्ति की उत्पत्ति ‘परमतत्त्वम्’ रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप शब्द-ब्रह्रा गॉड या अलम या परमब्रह्रा से ही होती है तथा सृष्टि के अन्त में सामान्यत: ब्रह्राण्डीय विधि-विधान से तथा मध्य में भी भगवदावतार के माध्यम से तत्त्वज्ञान के यथार्थत: विधि-विधान से परमतत्त्वम् से सोsहँ से ॐ की उत्पत्ति की प्रक्रिया या रहस्य जना-बता दिखा सुझा-बुझा कर ‘अद्वैत्तत्त्वबोध’ कराते हुये जिज्ञासु को खुदा-गॉड-भगवान से बात-चीत करते-कराते हुए जब अहँ एवं सोsहँ-हँसो के समस्त मैं-मैं, तू-तू को अपने मुख से निकालते हुये, पुन: अपने ही मुख में समस्त मैं-मैं तू-तू को चाहे वह मैं-मैं तू-तू अहँरूप जीव का हो या हँस रूप जीवात्मा का या केवल स: या आत्म शब्द आत्मा का ही क्यों न हो, सभी को ही अपने मुख में ही प्रवेश कराते हुये ज्ञान-दृष्टि से या तत्त्व-दृष्टि से दिखाते हुये, बात-चीत करते-कराते हुये जीव (अहं), जीवात्मा (हँसो) व आत्मा (स: या आत्म शब्द) और सृष्टि के सम्पूर्ण को ही ‘एक’ एकमेव एकमात्र ‘एक’ अपने तत्त्वम् रूप से अनेकानेक सम्पूर्ण सृष्टि में अपने अंश-उपाँश रूप में बिखेर देते हैं । ऐसा ही अपने निष्कपट उत्कट परम श्रद्धालु एवं सर्वतोभावेन समर्पित शरणागत जिज्ञासुओं को अज्ञान रूप माया का पर्दा हटाकर अपना कृपा पात्र बनाकर अपना यथार्थ यानी ‘वास्तविक’ तत्त्व रूप परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप अद्वैत्तत्त्वम् को दिखला देते हैं तथा अपने अनन्य समर्पित-शरणागत भक्तों-सेवकों को अपने में भक्ति-सेवा प्रदान करते हुये अपना प्रेम-पात्र बना लेते हैं, तब मध्य में भी लक्ष्य रूप रहस्य को समझा-बुझा कर मुक्ति और अमरता का भी साक्षात् बोध कर-करा देते हैं, तो मध्य में भी अन्यथा सामान्य सृष्टि लय विधान से अन्त में अपने में लय-विलय हो जाया करती है। यही सृष्टि उत्पत्ति और लय है । तत्त्वज्ञान के माध्यम से विलय तथा महाविनाश के माध्यम से महाप्रलय होता है ।

Go to Top »

10.3.4 धार्मिक सन्तुलन बिगड़ने से पतन और विनाश भी

अध्यात्म इतना सिद्धि, शक्ति प्रदान करने वाला विधान होता है; जिससे प्राय: सिद्ध-योगी, सिद्ध-साधक या आध्यात्मिक सन्त-महात्मा को विस्तृत धन-जन-समूह को अपने अनुयायी रूप में अपने पीछे देखकर एक बलवती अंहकार रूप उल्टी मति-गति हो जाती है; जिससे योग-साधना या आध्यात्मिक क्रिया की उल्टी गति रूप सोsहँ ही उन्हें सीधी लगने लगती है और उसी उल्टी साधना सोsहँ में अपने अनुयायिओं को भी जोड़ते जाते हैं, जबकि उन्हें यह आभाष एवं भगवत प्रेरणा भी मिलती रहती है कि यह उल्टी है। फिर भी वे नहीं समझते । उल्टी सोsहँ साधना का ही प्रचार करने-कराने लगते है । अहँ नाम सूक्ष्म शरीर रूप जीव को आत्मा में मिलाने के बजाय स: ज्योति रूप आत्मा को ही लाकर अपने अहँ में जोड़ कर सोsहँ ‘वही’ मैं हूँ का भाव भरने लगते हैं जिससे कि उल्टी मति के दुष्प्रभाव से भगवान और अवतार ही बनने लगते हैं, जो इनका बिल्कुल ही मिथ्या ज्ञानाभिमानवश मिथ्याहंकार ही होता है। ये अज्ञानी तो होते ही हैं मिथ्याहंकारवश जबरदस्त भ्रम एवं भूल के शिकार भी हो जाते हैं । आये थे भगवद भक्ति करने, खुद ही बन गये भगवान । यह उनका बनना उन्हें भगवान से विमुख कर सदा-सर्वदा के लिये पतनोन्मुखी बना देता हैं। विनाश के मुख में पहुँचा देता है। विनाश के मुख में पहुँचा ही देता है ।

Go to Top »

10.3.5 आध्यात्मिक धर्मोपदेशकों का मिथ्याज्ञानाभिमान

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! योग-अध्यात्म विधान स्वाध्याय से ऊपर यानी श्रेष्ठतर तथा तत्त्वज्ञान से नीचे होता है, परन्तु आध्यात्मिक सन्त-महात्मा मिथ्याज्ञानाभिमान के कारण जीव को ही आत्मा और आत्मा को ही परमात्मा, जीव को ही ब्रह्रा और ब्रह्रा को ही परमब्रह्रा, जीव को ही र्इश्वर और र्इश्वर को ही परमेश्वर; सेल्फ को ही सोल और सोल Divine Light या Life Light को ही GOD; रूह को ही नूर और नूर को ही अल्लाहतआला या खुदा; जीव या रूह या सेल्फ रूप सूक्ष्म शरीर को ही दिव्य ज्योति और आत्म-ज्योति या दिव्य ज्योति या ब्रह्रा ज्योति या नूर या डिवाइन लाइट या डिवाइन लाइट या जीवन ज्योति या स्वयं ज्योति या सहज प्रकाश या परम प्रकाश तथा हँसो के उल्टे सोsहँ के अजपा जप प्रक्रिया को ही ‘परमतत्त्वम्’ रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप शब्द-ब्रह्रा या परमब्रह्रा तथा उनका तत्त्वज्ञान पद्धति; आनन्दानुभूति को ही चिदानन्द रूप ‘शान्ति’ और आनन्द और सूक्ष्म दृष्टि को ही दिव्य दृष्टि और चिदानन्द को ही सचिचदानन्द, स्वरूपानन्द को ही आत्मानन्द या ब्रह्रानन्द और आत्मानन्द को ही परमानन्द या सदानन्द; चेतन को ही परमतत्त्वम्; ब्रह्रापद या आत्मपद को ही परमपद या भगवतपद; शिवलोक या ब्रह्रालोक को ही अमरलोक या परम आकाश रूप परमधाम; अनुभूति को ही बोध; आध्यात्मिक सन्त-महात्मा या महापुरुष को ही तात्तिवक सत्पुरुष-परमात्मा या परमपुरुष या भगवदवतार रूप परमेश्वर या खुदा-गॉड-भगवान; दिव्य दृष्टि को ही ज्ञान-दृष्टि; दिव्य चक्षु को ही ज्ञान चक्षु; सेप्टल आर्इ को ही डिवाइन आर्इ और डिवाइन आर्इ को ही GODly Eye; अपने पिण्ड को ही ब्रह्राण्ड; अपने शरीरान्तर्गत अहम् जीव को ही हँसो जीवात्मा और जीवात्मा हँस को ही ब्रह्राण्डीय परमब्रह्रा और सर्वसत्ता सामर्थ्य रूप ‘परमतत्त्वम्’ रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप शब्द-ब्रह्रा या परमब्रह्रा; शान्ति और आनन्द को ही परमशान्ति और परम आनन्द कहते-कहलाते हुये तथा स्वयं गुरु के स्थान पर सदगुरु बनकर अपने को भगवदावतार घोषित कर-करवा कर अपने साधना-विधान या आध्यात्मिक क्रिया-विधान से हटकर, पूजा-उपासना विधान आदि से युक्त होकर अपने जबर्दस्त भ्रम एवं भूल का शिकार अपने अनुयायियों को भी बनाते जाते हैं।

हँसो के स्थान पर उल्टी साधना सोsहँ करने-कराने में मति-गति ही इन आध्यात्मिक सन्त-महात्माओं की उल्टी हो गर्इ होती है या हो जाती है और वे इस बात पर थोड़ा भी ध्यान नहीं दे पाते हैं कि उनका लक्ष्यगामी सिद्धान्त अध्यात्म या योग है जिसकी अन्तिम पहुँच आत्मा तक ही होती है, परमात्मा या परमेश्वर या परमब्रह्रा या खुदा-गॉड-भगवान तक इनकी पहुँच ही नहीं है । आदि में शंकर, सनकादि, सप्त ऋषि, व्यासादि, मूसा यीशु, मोहम्मद साहब, आधशंकराचार्य, महावीर जैन, कबीर, नानक, दरिया, तुलसी, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, योगानन्द, आनन्दमयी, मुक्तानन्द, शिवानन्द आदि-आदि वर्तमान के भी प्राय: सभी तथाकथित अध्यात्मवेत्तागण जीव को आत्मा और आत्मा को ही परमात्मा या जीव को र्इश्वर और र्इश्वर को ही परमेश्वर आदि घोषित करते-कराते रहे हैं जिसमें शंकर, वशिष्ठ, व्यास, मोहम्मद, तुलसी आदि तो अपने से पृथक परमात्मा या परमेश्वर या अल्लाहतआला के अस्तित्त्व को स्वीकार किये अथवा श्रीराम या श्रीकृष्ण की लीलाओं के बाद समयानुसार सुधर गये। बाल्मीकि भी इसी में हैं तथा जीव-आत्मा से परमात्मा या परमब्रह्रा या परमेश्वर या अल्लाहतआला या खुदा-गॉड-भगवान का ही, एकमात्र भगवान का ही, भक्ति प्रचार करने-कराने लगे। प्राय: अधिकतर आध्यात्मिक सन्त-महात्मा प्राफेट-पैगम्बर मिथ्याज्ञानाभिमान के भ्रम एवं भूल वश शिकार हो जाया करते हैं जिससे जीव को ही आत्मा-र्इश्वर तथा आत्मा-र्इश्वर आदि को ही परमात्मा-परमेश्वर आदि कहने-कहलवाने, घोषित करने-कराने लगते हैं ।

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक एवं श्रोता बन्धुओं ! वर्तमान समस्त के योगी, महर्षि, साधक, सिद्ध तथा आध्यात्मिक सन्त-महात्मनों से सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस का अनुरोध है कि योग-साधना या अध्यात्म भी कोर्इ विशेष छोटा या महत्त्वहीन विधान या पद नहीं है । इसकी भी अपनी महत्ता है । इसलिये स्वाध्याय को ही योग-साधना-अध्यात्म और अध्यात्म या योग को ही तत्त्वज्ञान पद्धति या सत्यज्ञान पद्धति घोषित तथा जीव को ही आत्मा और आत्मा को ही परमात्मा या जीव को ही र्इश्वर और र्इश्वर को ही परमेश्वर या जीव को ही ब्रह्रा और ब्रह्रा को ही परमब्रह्रा तथा ¬-सोsहँ-हँसो एवं आत्म-ज्योति को ही ‘परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप शब्द-ब्रह्रा या परमब्रह्रा घोषित न करें और मिथ्या ज्ञानाभिमानवश अध्यात्म को ही तत्त्वज्ञान कथन रूप झूठी बात कह कर अध्यात्म के महत्त्व को न घटायें ।

स्वाध्याय को ही अध्यात्म और अध्यात्म को ही तत्त्वज्ञान का चोला न पहनावें अन्यथा स्वाध्याय और अध्यात्म दोनों ही पाखण्डी या आडम्बरी शब्दों से युक्त होकर अपमानित हो जायेगा । आत्मा को परमात्मा का या ब्रह्रा को परमब्रह्रा का या र्इश्वर को परमेश्वर का चोला न पहनावें क्योंकि इससे आत्मा कभी परमात्मा नहीं बन सकता; र्इश्वर कभी भी परमेश्वर नहीं बन सकता; ब्रह्रा कभी भी परमब्रह्रा नहीं बन सकता । इसलिये परमात्मा या परमेश्वर या परमब्रह्रा का चोला आत्मा-र्इश्वर या ब्रह्रा को पहनाने से पर्दाफास होने पर आप महात्मन महानुभावों को अपना मुख छिपाने हेतु जगह या स्थान भी नहीं मिलेगा ।

इसलिये एक बार फिर से ही सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द अनुरोध कर रहा है कि अपना-अपना नकली चोला उतार कर शीघ्रातिशीघ्र अपने शुद्ध अध्यात्मवेत्ता, आत्मा वाला असल चोला धारण कर लीजिये तथा परमात्मा या परमेश्वर या परमब्रह्रा का चोला एकमात्र उन्हीं के लिये छोड़ दें, क्योंकि उस पर एकमात्र उन्हीं का एकाधिकार रहता है । इसलियें अब तक पहने सो पहने, अब झट-पट अपने अपने नकली रूपों को असली में बदल लीजिये । अन्यथा सभी का पर्दाफास अब होना ही चाहता है ! तब आप सभी लोग बेनकाब हो ही जायेंगे । नतीजा या परिणाम होगा कि कहीं मुँह छिपाने का जगह नहीं मिलेगा । इसलिय़े समय रहते ही चेत जाइये ! चेत जाइये !!!

अब परमप्रभु को खुल्लम खुल्ला अपना प्रभाव एवं ऐश्वर्य दिखाने में देर नहीं है। उस समय आप लोग भी कहीं चपेट में नहीं आ जायें । इसलिये बार-बार कहा जा रहा है कि चेत जायें ! चेत जायें !! चेत जायें !!! अब नकल, पाखण्ड, आडम्बर, जोर-जुल्म, असत्य-अधर्म, अन्याय-अनीति बिल्कुल ही समाप्त होने वाला है । अब देर नहीं, समीप ही है ! इसे समाप्त कर भगवान अब अतिशीघ्र सत्य-धर्म न्याय-नीति का राज्य संस्थापित करेगा, करेगा ही करेगा, देर नहीं है। ‘सत्य’ को स्वीकारने-अपनाने में भय-संकोच से ऊपर उठकर यथाशीघ्र स्वीकार कर या अपना ही लेना चाहिये । क्योंकि देर करना पछतावा-प्रायश्चित का ही कारण बनेगा । चेतें।

सदभावी सत्यान्वेषी पाठक बन्धुओं ! सृष्टि की रचना या उत्पत्ति दो पदार्थों से हुर्इ है जो जड़ और चेतन नाम से जाने जाते हैं । इस जड़ से सम्बन्धित सम्पूर्ण जानकारी तो भौतिक शिक्षा के अन्तर्गत आती है और चेतन तथा चेतन से सम्बन्धित या चेतन प्रधान जीव-आत्मा आदि के सम्बन्ध के बारे में क्रियात्मक जानकारी मात्र ही योग या अध्यात्म है। अध्यात्म, स्वाध्याय और तत्त्वज्ञान के मध्य स्थित जीव का परमात्मा से तथा परमात्मा का जीव से सम्पर्क बनाने में आत्मा ही दोनों के मध्य के सम्बन्धों को श्वाँस-नि:श्वाँस के एक छोर (बाहरी) पर परमात्मा तथा दूसरे छोर (भीतरी) पर जीव का वास होता है । आत्मा नित्य प्रति हर क्षण ही निर्मल एवं स्वच्छ शक्ति-सामर्थ्य (ज्योतिर्मय स:) रूप में शरीर में प्रवेश कर जीव को उस शक्ति-सामर्थ्य को प्रदान करती-रहती है और शरीरान्तर्गत गुण-दोष से युक्त सांस्कारिक होकर जीव रूप से बाहर हो जाया करती है ।

जब अहँ रूप जीव भगवत कृपा से स: रूप आत्म-शक्ति का साक्षात्कार करता है तथा स: से युक्त हो शाक्ति और आनन्द की अनुभूति पाता है, तब यह जीव आत्मविभोर हो उठता है । इस जीव को आत्मामय या ब्रह्रामय या चिदानन्दमय ही, पूर्व की अनुभूति, जिससे कि यह जीव आत्मा से बिछुड़ा-भटका कर तथा सांसारिकता में फँसा दिया गया था, अपना पूर्व का सम्बन्ध याद हो जाता है कि शारीरिक-पारिवारिक-सांसारिक होने के पूर्व ‘मैं’ जीव इसी आत्मा या ब्रह्रा के साथ संलग्न था; जिससे सांसारिक-पारिवारिक लोगों ने नार-पुरइन या ब्रह्रा-नाल काट-कटवा कर मुझे इस आत्मा या ब्रह्रा से बिछुड़ा दिया था, जिससे ‘मैं’ जीव शान्ति और आनन्द रूप चिदानन्द के खोज में इधर-उधर चारों तरफ भटकता और फँसता तथा जकड़ता चला गया था । यह तो परमप्रभु की कृपा विशेष से मनुष्य शरीर पाया। तत्पश्चात् परमप्रभु की मुझ पर दूसरी कृपा विशेष हुर्इ कि मुझे सदगुरु जी का सानिध्य प्राप्त हुआ तथा परमप्रभु की यह तीसरी कृपा हुर्इ कि मेरे अन्दर ऐसी प्रेरणा जागी, जिससे सदगुरुजी की आवश्यकता महसूस हुर्इ और गुरु जी के सम्पर्क में आया। तत्पश्चात् परमप्रभु जी के ही कृपा विशेष, जो सदगुरु कृपा के रूप में हमें ‘आत्म’ रूप स: से पुन: साक्षात्कार तथा मेल-मिलाप कराकर पुन: मुझ शरीर एवं संसारमय जीव को संसार एवं शरीर से उठाकर आत्मामय जीव (हँस) रूप में स्थापित कर-करा दिया।

सद्गुरु कृपा से अब पुन: हँस हो गया। ध्यान दें कि हँस ही जीवात्मा है, जो अध्यात्म की अन्तिम उपलब्धि है। अध्यात्म हँस ही बना सकता है, तत्त्वज्ञानी नहीं ! तत्त्वज्ञान आत्मा के वश की बात नहीं होता और अध्यात्म की अन्तिम बात आत्मा तक ही होती है। आत्मा मात्र ही योग या अध्यात्म की अन्तिम मंज़िल होता है, परमात्मा नहीं ।

आध्यात्मिक सन्त-महात्मन बन्धुओं को मिथ्या ज्ञानाभिमान रूप भ्रम एवं भूल से अपने को बचाये रहते हुये सदा सावधान रहना-रखना चाहिये ताकि जीव को ही आत्मा और आत्मा को ही परमात्मा, जीव को ही र्इश्वर और र्इश्वर को ही परमेश्वर, जीव को ही ब्रह्रा और ब्रह्रा को ही परमब्रह्रा आदि तथा आध्यात्मिक सोsहँ-हँसो-ज्योति को ही ‘परमतत्त्वम्’ रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् और योग-साधना या अध्यात्म को ही तत्त्वज्ञान कह-कहवा कर अध्यात्म के महत्त्व को मिथ्यात्त्व से जोड़कर घटाना या गिराना नहीं चाहिये । सन्त महात्मा ही झूठ या असत्य कहें या बोलना शुरू करें तो बहुत शर्म की बात है और तब और समाज की गति क्या होगी?

अत: हर किसी को ही झूठ या असत्य से हर हालत में ही बचना चाहिए। सन्त-महात्मन बन्धुओं को तो बचना ही बचना चाहिए । क्योंकि धर्म का आधार और मंज़िल दोनों ही ‘सत्य’ ही तो है । सत्य नहीं तो धर्म नहीं ।

Go to Top »

----------------सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस


« Previous Chapter   Next Chapter »