विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व को एक चेतावनी सर्वोत्तम उप्लब्धि कैसे प्राप्त करें?
महापुरुषत्त्व एवं सत्पुरुषत्त्व हेतु युवकों का आहवान अन्य महत्वपूर्ण लिंक निःशुल्क पुस्तक प्राप्त करें

विद्यातत्त्वम् के चौथा अंग 10.4 तत्त्वज्ञान (True Supreme and Perfect KNOWLEDGE) की वास्तविक स्थिति

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक एवं श्रोता बन्धुओं ! ‘तत्त्वज्ञान’ ही वह ‘अशेष’ ज्ञान विधान है जिसे यथार्थत: जान लेने के पश्चात् कुछ भी जानना और पाना शेष नहीं रह जाता। ‘तत्त्वज्ञान’ एकमात्र परमप्रभु हेतु आरक्षित एवं सुरक्षित विधान है जिसका एकमात्र प्रयोगकर्ता परमात्मा-खुदा-गॉड-भगवान ही जब परम आकाश रूप परमधाम से भू-मण्डल पर अवतरित होते हैं, हुए भी हैं, वह ही होते हैं । भगवदावतार के सिवाय किसी को भी ‘तत्त्वज्ञान’ के वास्तविक रहस्य का पता ही नहीं होता । यही कारण है कि भगवदावतार के पहचान का एकमात्र आधार तत्त्वज्ञान ही बना ।

वास्तव में तत्त्वज्ञान वह ज्ञान है जिसके अन्तर्गत पूरे ब्रह्राण्ड के जड़-चेतन तथा दोष-गुण के साथ ही साथ ‘सम्पूर्ण’ कर्म विधान तथा परिपूर्णत: योग-साधना या अध्यात्म विधान के अलावा परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् या खुदा-गॉड-भगवान की यथार्थत: जानकारी, साक्षात् दर्शन एवं स्पष्टत: बात-चीत करते-कराते हुये परिचय-पहचान साक्षात् प्राप्त होता है; साथ ही साथ इसमें अद्वैत्तत्त्वबोध रूप मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध भी समाहित होता है । सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड में जड़-चेतन तथा परमतत्त्वम् आदि जो कुछ भी है, सब की ही रहस्यात्मक जानकारी कराने की क्षमता एकमात्र इसी तत्त्वज्ञान विधान में ही समाहित रहता है ।

दूसरे शब्दों में बड़े ही सहजता के साथ कहा जा सकता है कि खुदा-गॉड-भगवान के द्वारा ही भू-मण्डल पर सदा-सर्वदा के लिये प्रमाणित एवं सत्यापित भगवत परिचय एवं पहचान तथा उनके कार्य करने का विधान वास्तव में ‘तत्त्वज्ञान’ ही एकमात्र एक है । भगवान ने इसीलिये ‘तत्त्वज्ञान’ विधान एकमात्र अपने लिये ही आरक्षित एवं सुरक्षित कर लिया । अन्तत: यह ‘तत्त्वज्ञान’ ही ‘अशेष’ ज्ञान विधान भी है। तत्त्वज्ञान ही परमसत्य और सम्पूर्ण ज्ञान वाला विधान भी है।

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक एवं श्रोता बन्धुओं ! सम्पूर्ण ब्रह्राण्ड पाँच भागों में स्पष्टत: हर स्तर से जानने में आ रहा है तथा बना भी है। ये क्रमश: संसार, शरीर, जीव, आत्मा और परमात्मा हैं । प्रथम चारों का ही आदि-अन्त (उत्पत्ति-लय) परमात्मा से ही परमात्मा में ही सुनिश्चित है। परमात्मा से ही चेतन आत्मा तथा जड़-जगत की उत्पत्ति होती है परमात्मा द्वारा ही संचालित एवं नियंत्रित होता है और अन्तत: परमात्मा में ही जड़-जगत तथा चेतन आत्मा भी लय-विलय भी कर जाता है। यह आदि-अन्त सहित सम्पूर्ण रहस्य विधान एकमात्र ‘तत्त्वज्ञान’ में ही सदा-सर्वदा समाहित रहता है । जिस प्रकार परिचय-पत्र तथा परिचय-पत्र धारक दोनों के एक साथ रहने पर ही परिचय-पत्र की सार्थकता जाहिर या स्पष्ट होती है, अलग-अलग यानी दोनों के पृथक-पृथक रहने पर उपयोगिता नहीं महसूस होती, ठीक उसी प्रकार भू-मण्डल पर परमधाम से भगवदवतार के वगैर तत्त्वज्ञान भी अनुपयोगी रूप में सदग्रन्थों में छिपा पड़ा रहता है जिसका परिणाम यह होता है कि तत्त्वज्ञान लोगों के बीच जब भी प्रकट होता है तो जनमानस परम आश्चर्य में पड़ जाता है क्योंकि तत्त्वज्ञान की वार्ता वर्तमान युग में वर्तमान अवतार के पूर्व में कभी कोर्इ सुना तो होता नहीं । अवतार के साथ ही तत्त्वज्ञान का विधान सुनने-जानने-देखने को भी मिलता है फिर भी उसका महत्त्व स्थापित होने लगता है और स्थापित हो ही जाता है । क्योंकि तत्त्वज्ञान साक्षात् परमेश्वर वाली ही परमसत्य वाला ही विधान जो है ।

Go to Top »

10.4.1 तत्त्वज्ञान पूर्णत: आश्चर्यमयता वाला विधान

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक एवं श्रोता बन्धुओं ! तत्त्वज्ञान के प्रति आश्चर्य व्यक्त करना कोर्इ आश्चर्य नहीं क्योंकि यह तो आश्चर्यों में का परम आश्चर्यमय विधान है । भगवान तो जहाँ कहीं भी रहेगा, उसमें सम्पूर्ण ब्रह्राण्ड सूक्ष्मतम् रूप में समाहित रहेगा ही। जिस प्रकार भगवान में सम्पूर्ण ब्रह्राण्ड सदा-सर्वदा ही समाहित रहता है, ठीक उसी प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्राण्ड की आश्चर्य से भी आश्चर्यमयी रहस्यात्मक जानकारी भी सदा-सर्वदा तत्त्वज्ञान में समाहित होती या रहती है । जिसमें से जब, जैसी, जितनी आवश्यकता पड़ती है, प्रकट होती या हो जाया करता है । अर्थात् जब, जैसा, जितना और जिसकी आवश्यकता पड़ी कि तब, तैसा और उतना ही विषय-वस्तु, व्यक्ति-वस्तु, शरीर-सम्पत्ति, सिद्धि-शक्ति-सत्ता भगवान से सदा-सर्वदा प्रकट या उपलब्ध होता रहता है । इसकी वैसी और उतनी ही जानकारी भी तत्त्वज्ञान से सदा-सर्वदा प्रकट होता रहता और जानने-देखने को मिलता है ।

भगवदज्ञान या सत्यज्ञान या तत्त्वज्ञान एक ही बात है । परिस्थितियों के अनुसार पृथक-पृथक शब्दों में उच्चारित या व्यवहरित होता है मगर आत्मज्ञान या ब्रह्राज्ञान या अध्यात्मज्ञान ही तत्त्वज्ञान नहीं होता है। आत्मज्ञान तो तत्त्वज्ञान का अंशमात्र होता है। इसमें कोर्इ किसी भी प्रकार का अन्तर या भेद नहीं है। यदि सम्पूर्ण ब्रह्राण्ड में कोर्इ आश्चर्य है, तो उसमें सबसे बड़ा या परम आश्चर्य ‘परमतत्त्वम्’ रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप शब्द-ब्रह्रा रूप परमब्रह्रा या परमेश्वर या परमात्मा या खुदा-गॉड-भगवान तथा उससे सम्बन्धित परिचय-पहचान रूप तत्त्वज्ञान या भगवदज्ञान या सत्यज्ञान ही एकमात्र होता है।

शारीरिक-पारिवारिक एवं सांसारिकों में आश्चर्यमयी बात तो जीव का दर्शन तथा जीव से सम्बन्धित जानकारी ही होती है । उससे बढ़कर आश्चर्य की बात आत्मा या र्इश्वर या शिव के दर्शन तथा आत्मा या र्इश्वर या शिव से सम्बन्धित जानकारी होती है और इन सबसे भी बढ़कर यानी परम आश्चर्य की बात परमात्मा का बात-चीत सहित-विराट पुरुष का भी साक्षात् दर्शन तथा परमात्मा से सम्बन्धित जानकारी होती है ।

यदि कोर्इ बात आश्चर्यमय है तो आश्चर्यमय होने का मतलब झूठ नहीं होता, अपितु आश्चर्य का मतलब कल्पनातीत प्राकट्य विश्वास से परे के स्थिति से है। अर्थात् जब कोर्इ आश्चर्य की बात सामने प्रत्यक्ष या प्रकट होती है जिसकी सम्भावना ही न हो और जो सत्य लग रही हो परन्तु उसकी असम्भाव्यता ही उसके सत्यता एवं विश्वसनीयता में संदेह उत्पन्न कर रही हो, तब उसी स्थान एवं समय व परिस्थिति में एक तरफ प्रत्यक्षत: सत्य का लगना तथा दूसरी तरफ उसकी असम्भाव्यता तथा उससे उत्पन्न संदेह यानी दोनों में जब एक दूसरे के प्रतिकूल खींचतान होती है, तब वहीं आश्चर्य प्रकट होता है । इससे तो स्पष्ट हो जाता है कि ‘आश्चर्य’ का मतलब ‘झूठ’ नहीं। असम्भाव्यता के बावजूद सत्य का प्राकट्य होना ही आश्चर्य है।

सद्भावी सत्यान्वेषी पाठक एवं श्रोता बन्धुओं ! वास्तव में तत्त्वज्ञान जड़ जगत से सम्बन्धित समस्त कर्म-विधान तथा चेतन आत्मा से सम्बनिधत योग-साधना या अध्यात्म भी, परिपूर्ण रूप में ही दोनों का ही आदि-अन्त से युक्त होते-रहते यानी दोनों की ही उत्पत्ति तथा दोनों का ही अन्त इसी तत्त्वज्ञान के अन्तर्गत परमात्मा से ही तथा तत्त्वज्ञान अन्तर्गत परमात्मा में ही होता है ।

Go to Top »

10.4.2 तत्त्वज्ञान सम्पूर्णता वाला विधान

इस प्रकार तत्त्वज्ञान अन्तर्गत परमात्मा के अन्दर दोनों ही परिपूर्ण रूप में समाहित रहते हैं, जो उसके लिये उचित या ठीक ही है । परन्तु व्यवहारत: मुख्य परेशानी की बात तो यह होती है कि तत्त्वज्ञानदाता के पास कोर्इ यदि कर्म-काण्डी कुछ जानने-समझने आता है, तो वह यह तो पाता ही है कि उसकी जितनी भी बातें या शंकायें थी, सभी सटीक एवं पुष्ट व्यावहारिक प्रमाणों के साथ समाधान हो जाता है, जिससे वह यह तो कबूल या स्वीकार करता है कि इनके (ज्ञानदाता के) पास अथाह जानकारी है या प्राय: ये सब, सब कुछ ही जानते हैं । परन्तु वह कर्मकाण्डी उस समय भ्रम का शिकार हो जाता है, जब वह किसी अन्य योगी-साधक या आध्यात्मिक के साथ वार्ता को सुनता है, क्योंकि कर्मकाण्डी योग या आध्यात्मिक साधना का विरोधी तथा आध्यात्मिक कर्मकाण्ड के घोर विरोधी होने के कारण, दोनों ही अपने विरोधी बातों से युक्त उन्हें जब देखते हैं तो अपने-अपने विरोधी बातों के कारण भ्रमित हो जाया करते हैं । वे यह नहीं देखते कि जिन शंकाओं को लेकर वे आये थे, उनका समाधान उन्हें बोधगम्य तरीके से मिला है। उनकी कोर्इ ऐसी शंका नहीं रही है जो सहजता पूर्वक एवं बोधगम्यता रूप में समाधान उन्हें न प्राप्त हुआ हो, चाहे वे कर्मकाण्डी हों या योगी-साधक अथवा आध्यात्मिक । उन कर्मकाण्डी और आध्यात्मिक बन्धुओं को तो यह सोचना चाहिये कि यह कौन है, जो, जो कोर्इ भी जिस किसी प्रकार की भी शंका लेकर आता है, उसे सटीक सहजता पूर्वक एवं बोधगम्य तरीके से सप्रमाणित समाधान देता है, चाहे कर्मकाण्डी की शंका रही हो या योगी-साधक- आध्यात्मिक की । यह तो उनके पल्ले ही नहीं पड़ती । पल्ले पड़ती है विरोधी बात-व्यवहार और जानकारी जो उन्हें भ्रमित किये वगैर नहीं छोड़ती !

किसी भी व्यक्ति को अपनी शंका समाधान से मतलब रखना चाहिये। यदि दूसरे के शंका-समाधान से भी मतलब रखना है तो रहस्य भाव में ही सुनना जानना, उचित मनन-चिन्तन द्वारा उसके सत्यता को जानना-समझना चाहिये । ऐसा प्राय: देखा जाता है कि अपने शंका-समाधान से किसी को भी असन्तुष्टि नहीं होती । सभी के सभी ही सन्तुष्ट हो जाते हैं । परन्तु अपने विधान के प्रतिकूल आचरण-क्रिया कलाप एवं व्यवहार कर्मकाण्डी, योगी-साधक-आध्यात्मिक जैसा ज्ञानदाता को करते-कराते हुये देख-देखकर सदा ही भ्रमित होते रहते हैं । यदि यह भी देखने की कोशिश करते कि इसकी यथार्थता क्या है, तो अवश्य ही पाते कि ज्ञानदाता सब कुछ करता हुआ भी अकर्ता तथा कुछ नहीं करने के बावजूद भी सब कुछ का कर्ता है। अर्थात् ज्ञानदाता आध्यात्मिकों के लिये श्रेष्ठतम् आध्यात्मिक तथा कर्मकाण्डियों के लिये श्रेष्ठतम् कर्मकाण्डी जैसा बोलते-चलते-करते हुये भी अध्यात्म् तथा कर्मकाण्ड दोनों से ही सर्वथा परे भगवद लीलामय भी रहता हुआ अपना लक्ष्य कार्य सम्पादन करता रहता है जो अति रहस्यात्मक एवं परम गोपनीय विधान से करता रहता है । अपने भगवद लीला का रहस्य वह सदा ही गोपनीय रखता है । कभी कभी अपने अनन्य प्रेमियों, अनन्य सेवकों तथा अनन्य भक्तों से ही कुछ रहस्यात्मक भेद बताता है । अन्यथा भगवद लीला का रहस्य किसी को भी बताना उसका एकमात्र अपना निजी विधान है जिसकेा चाहे बताये या जिसको चाहे न बताये ! यह परम गोपनीय विधान होता है।

Go to Top »

----------------सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस


« Previous Chapter   Next Chapter »