विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व को एक चेतावनी सर्वोत्तम उप्लब्धि कैसे प्राप्त करें?
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सर्वोत्तम उप्लब्धि कैसे प्राप्त करें?-

     इस संसार में ऐसा कौन है जो सर्वोत्तम जीवन जीना नहीं चाहता ? जीवन में सर्वोत्तम उपलब्धि पाने की इच्छा किसे नहीं है ? अर्थात हर कोई सर्वोत्तम उपलब्धि पाना चाहता है। लेकिन पहले यह तो जाने कि सर्वोत्तम उपलब्धि क्या है ? समस्त सृष्टि में जो भी ‘सर्वोत्तम’ है, उसको प्राप्त कर लेना ही तो सर्वोत्तम उपलब्धि है। सर्वोत्तम क्या है ? सर्वोत्तम तो एकमात्र परमेश्वर है, अन्य कोई नहीं, और परमेश्वर को प्राप्त कर लेना ही जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि है। फिर जीवन में किसी अन्य उपलब्धि की इच्छा शेष नहीं रह जाती। इसके अलावा आप इस दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर लीजिए, सब बेकार है। ये धन-दौलत, मान-सम्मान आदि कितने दिन रहेगा ? ये संसार तथा संसार से संबंधित कोई भी वस्तु आपकी नहीं है, फिर क्यों उसे अपना बनाने के चक्कर में लगे हो ? दूसरी वस्तुओं की तो बात ही छोड़िए, ये शरीर भी आपका नहीं है। ये भी आपको एक दिन छोड़ना पड़ेगा। इस संसार की कोई भी वस्तु हमेशा आपके साथ नहीं रह सकती फिर क्यों उसके पीछे भाग रहे हो ? अगर भागना है तो उसके पीछे भागो कि फिर बाद में किसी और के पीछे भागने की जरूरत ही न पड़े। उसको प्राप्त करने की कोशिश करो जो मिलने के बाद कभी आपसे अलग ही न हो। कुल मिलाकर चाहे जिस किसी भी प्रकार से हो, किसी माध्यम से हो, इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी करने से परमेश्वर मिले और हमारा अस्तित्व परमेश्वरमय बना रहे, हम परमेश्वर के प्रति समर्पित बने रहें, यही सर्वोच्च स्थिति कहलाती है।

     परमेश्वर मिलने पर क्या होगा ? जरा सोचिए, एक महल की बहू, राणा सांगा की बहू, घर में रहने वाली बहू। पद घुंघरू बांध मीरा नाची रे, लोग कहे मीरा हो गई बावली सासु कहे कुल नासी रे। मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई, जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई। वही पगली मीरा, वही बावली मीरा, आज अगर रेडियो पर कोई भजन कार्यक्रम आ रहा होगा तो उसमें दो चार भजन मीरा के जरूर होंगे। उसी मीरा की आज मेवाड़-चित्तौड़ में राजा की जगह श्री कृष्ण के बगल में मूर्ति बनाई जा रही है। और आज उसी कुलनाशिनी मीरा का टाइटल है “प्रेम दीवानी मीरा” ! आज मीरा को कोई गाली नहीं दे रहा है। आज कोई मीरा को कुलनाशिनी नहीं कह रहा है। यह होता है परमेश्वर मिलने पर ।

     रविदास तो मीरा के गुरु थे, तो क्यों नहीं उनको ही भगवान मान लिया ? अरे गुरु कहीं भगवान होता है ? इसी में फँसकर तो सब लोग पतन विनाश की तरफ जा रहे हैं । गुरुजी कहीं भगवान होते हैं ? इसी भ्रम को समाज में फैलाकर आज तमाम गुरुजी जनता की भावनाओं का शोषण कर रहे हैं। आज तमाम गुरु अपने आप को भगवान कहकर, अपनी पूजा करवाने में लगे हुये हैं। वो कान में फूँक रहे हैं -- गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देव महेश्वर। यह कहकर ऐसे गुरुजी अपने आपको ब्रह्मा, विष्णु, महेश बनाने में लगे हैं जिन्हे खुद अपने जीव का अता पता नहीं है। यह पतन नहीं तो और क्या है ? ये सब दुकाने खोलकर जनता के धन-धर्म के दोहन के लिए बैठे हैं।

     कल तक जो लोग कथा वाचक थे, आज वे भी अपने आपको भगवान कहलवा रहे हैं। उनके जन्म दिन को आज अवतरण महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। अवतरण महोत्सव भगवान का होता है, गुरुजी का नहीं। ये सभी गुरु जी अगर भगवान हैं तो जरा सोचिए कि आज इस धरती पर कितने भगवान मौजूद हैं ? वास्तविकता तो यह है कि भगवान जिसे ज्ञान देते हैं उसके गुरु हो जाते हैं, सदगुरु हो जाते हैं। इसका अर्थ ये नहीं कि सभी गुरुजी भगवान हो गए। आज गुरुजी अपने शिष्यों को बताते हैं कि जा ग्रहस्थ बनकर रह, माता पिता की सेवा कर, बीबी बच्चों में फंसा रह, मिलजुल कर रहना, चोरी बेईमानी मत करना, परिवार में प्रेम से रहना आदि आदि । अरे ये बातें किसे नहीं पता ? ये सब बातें बता कर ये गुरुजी अपने शिष्यों को बापस उसी सांसारिक दलदल में भेज देते हैं जिससे निकालने की जिम्मेदारी इन्ही गुरुओं की थी। वापस नहीं भेजेंगे तो इन गुरुजी के लिए चारा कौन लाकर देगा ? घर जाएगा तभी तो चारा लाकर देगा ।

     वास्तव में जो सच्चा गुरु होगा वह शिष्य के कल्याण में जुटा होगा। चाहे कितनी भी तकलीफ हो, वह कभी भी अपने शिष्य को उस ममता-मोह-आसक्ति में, पतन विनाश में, भोग-व्यसन में नहीं जाने देगा। वह अपने शिष्य से कहेगा कि तेरे पर आश्रित बहुत लोग हैं, उनको भीख माँगने के लिए मत छोड़, उनको भ्रष्टाचार के लिए मत छोड़, तेरे पीछे जितने भी लोग हैं, उन सभी को लेकर चल भगवान के पीछे क्योंकि वो भी जीव हैं और उन्हे भी भगवान चाहिए। यह चिंता छोड़ दे कि तू अगर भगवान की खोज में निकल पड़ेगा तो तेरे परिवार का क्या होगा ? याद रख परिवार में जो भी तेरा होगा वो तेरे साथ जरूर जाएगा और जो नहीं जाएगा वो तेरा हितैषी नहीं है बल्कि पारिवारिक सदस्य के रूप में छिपा हुआ एक शत्रु है। भगवान कभी भी यह नहीं कहता कि तुम घर से इस तरह भागो कि माता पिता को भीख माँगने के लिए छोड़ दो। अपने बच्चों को भीख माँगने के लिए छोड़ दो। ऐसा भगवान कभी नहीं कहता। भगवान कहता है कि जो जो तेरे आश्रित हैं, जो जो तेरे सहारे हैं, जब तू भगवान से जुड़ने जा रहा है तो उन सब को भी साथ ले ले। क्योंकि वे भी तो जीव हैं, उन्हे भी भगवान चाहिए।

     नौकरी करने के लिए, चार पैसे कमाने के लिए बाहर जाते हैं तो उसमें कोई बेइज़्ज़ती-अपमान नहीं है। लेकिन सच्चाई के रास्ते पर, भगवान की राह में अगर परिवार जाता है तो लोग उसे बेइज़्ज़ती-अपमान समझते हैं। परिवार की महिलाएँ नौकरी करने जाती हैं, राजनीति में जाती हैं, क्या क्या नहीं करना पड़ता है उन्हे ? वो सब अच्छा है ! लेकिन अगर वो धर्म और भगवान की राह में चली जाएँ तो बेइज़्ज़ती-अपमान है। चार पैसे मिल रहे हैं , नौकरी है सहारा है। बेचारी को भर दिया गया है कि तुम अबला हो, तुम असहाय हो। माँ बैठी है, बहन बैठी है, भाई बैठा है, आप बैठे हैं, उसी बीच टी वी पर ये सरकार चार पैसे पाने के लिए विज्ञापन में, सीरियल में, नंगा नाच करा रही है। क्या इज्ज़त मर्यादा रह गई बहू बेटियों की ?

     क्या यह सरकार चार पैसे पाने के लिए जनता का शोषण नहीं कर रही है ? एक तरफ तो अरबों रुपया खर्च करती है नशा-उन्मूलन पर और दूसरे तरफ शराब की फैक्ट्री और भट्टी कहाँ से आ जाती है ? लाइसेन्स कहाँ से आ जाते है ? एक तरफ ये सरकारें चारों तरफ विज्ञापन देती है कि शराब पीकर गाड़ी मत चलाओ। दूसरी तरफ चाय की दुकानों से भी अधिक शराब की दुकानों का लाइसेन्स दिये जा रहे हैं। किसके पीने के लिए ? इन दरिद्र सरकारों ने टैक्स के लालच में इंसान को शराबी बना दिया है। जनता को विनाश के मुख में डाल दिया है । जब तुम कहते हो कि सार्वजनिक स्थान पर बीड़ी, सिगरेट और शराब पीना मना है तो किसी नुकसान के नाम पर ही तो कहते हो। तो फिर तुम घर में क्यों पीने दे रहे हो ? जब घर में पीने की आदत बनी होगी तो फिर चोरी छिपे सार्वजनिक जगहों पर भी पिएगा।

     भगवान की यह सृष्टि जितनी सिस्टेमेटिक है उतनी ही इसकी संरचना जटिल है। अनजाने में यह जितना बड़ा तिलिस्म है, जानने समझने के बाद इतनी ही सहज और सरल भी है। अज्ञानता में यह शरीर और संसार इतनी जटिल संरचना पर आधारित है कि दुनिया के सारे तिलिस्म इसके सामने फेल हैं। लेकिन जान लेने के बाद यदि हम अपने जीवन को इससे जोड़कर चलने लगें तो यह उतना ही सहज और सरल हो जाता है।

     देखिए दो सिस्टम हैं- करना और होना। अज्ञान में जितने भी लोग होते हैं, वे कर्म- क्रिया प्रधान होते हैं यानि करना प्रधान होते हैं, क्रिया प्रधान होते हैं। लेकिन जो ज्ञानी पुरुष होते हैं, जो ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं उनका सिस्टम ‘करना प्रधान’ नहीं होता। उनका सिस्टम ‘होना प्रधान’ होता है। अर्थात उनका सिस्टम टू डू वाला नहीं होता बल्कि टू बी वाला होता है। चूंकि हम अज्ञानतावश, माया, मोह, आशक्ति के चलते, भोग और व्यसन के चलते परमेश्वर से बिछुड़ गए इसलिए क्या प्रधान हो गया ? कर्म। जैसी करनी वैसी भरनी यानि जैसा करोगे वैसा पाओगे। जब करोगे तभी पाओगे, नहीं करोगे तो नहीं पाओगे। लेकिन जैसे ही भगवान मिलेगा तो पता चलेगा कि हम सब लोग तो सिर्फ कठपुतली की तरह नाच रहे हैं और नचाने वाला कोई और नहीं वो परमेश्वर ही है। यानि हम लोग कुछ भी नहीं कर रहे हैं, भगवान ही सब कुछ करा रहा है। लेकिन यह बात भगवान मिलने के बाद ही लागू होती है। उससे पहले तो कर्म वाला विधान लागू रहता है। कुछ लोग अपने बचाव के लिए इस बात को इस तरह प्रयोग करते हैं कि सब कुछ भगवान ही कर रहा है तो फिर हम पाप, कुकर्म आदि कुछ भी करें, तो उसमें हमारा क्या दोष ? दोष है क्योंकि ‘सब कुछ भगवान ही कराता है’ यह बात तब लागू होगी जब आप ज्ञान से युक्त होगे। अज्ञान में यह बात लागू नहीं होगी और आप जो भी करेंगे उसके दोषी आप ही होगे।

     भगवान मिलने के बाद, भगवान के अनुसार ही समर्पित, शरणागत होकर चलना जरूरी है, अन्यथा कोई लाभ नहीं मिलेगा । अगर आप भगवान मिलने के बाद मनमाना तरीके से रहने लगेंगे तो कोई लाभ नहीं होगा। इसीलिए निरंतर परमेश्वरमय होकर रहना जरूरी है। ईमान सच्चाई से भगवान के विधान में रहने पर भगवान वाला लाभ जो कि मुक्ति अमरता है, वह तो मिलता ही है और उसके पीछे पीछे यश कीर्ति भी मिलती है। यश कीर्ति के साथ ही व्यक्ति जिस महत्वाकांक्षा को पाले हुये है वो भी पूरी होती है। लेकिन अगर जरा सा भी धोखा या खोंट आपके अंदर है तो सब किया कराया व्यर्थ हो जाता है। क्योंकि भगवान को पा लेना ही पर्याप्त नहीं है, ज्ञान प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। उसको निभाना भी आवश्यक है। किसी भी पद को पा लेना ही पर्याप्त नहीं है। उसका निर्वाह करना भी आवश्यक है। जितना बड़ा पद होता है उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी होती है। खुदा-गॉड-भगवान की राह में परीक्षाओं से भी गुजरना पड़ता है लेकिन हिम्मत नहीं हारनी चाहिए क्योंकि जितनी बड़ी परीक्षा होती है, उसे पास करने के बाद उतना ही बड़ा पद प्राप्त होता है। इसलिए हमेशा परमेश्वरमय होकर चलने पर ही संसार की वह सर्वोत्तम उपलब्धि प्राप्त होती है जिसको ‘परम पद’ कहा जाता है।

----------------सब भगवत् कृपा