विद्यातत्त्वम् पद्धति- संसार की समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान। ***शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर यथार्थता: ये चार है। चारों को दिखलाने और मुक्ति-अमरता देने हेतु भगवान् लेते अवतार है।***
उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व को एक चेतावनी सर्वोत्तम उप्लब्धि कैसे प्राप्त करें?
महापुरुषत्त्व एवं सत्पुरुषत्त्व हेतु युवकों का आहवान अन्य महत्वपूर्ण लिंक निःशुल्क पुस्तक प्राप्त करें



सम्पूर्ण विश्व को एक चेतावनी-

     हे धरती वासियो ! आज संपूर्ण धरती पर सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था इतनी दूषित हो चुकी है कि परमप्रभु परमेश्वर या खुदा-गॉड-भगवान को सज्जनों कि रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए अब केवल प्रलयकारी या कयामती (Destroyer) रूप दिखाना ही शेष रह गया है। क्योंकि इस समय चारों तरफ जो अन्याय, अत्याचार, अव्यवस्था व आतंक फैला है, इस स्थिति में सामाजिक व राजनैतिक व्यवस्था में सुधार अब असंभव सा हो गया है। अब संहार एवं विनाश के माध्यम से ही विश्व का मानव समाज ‘ठीक’ होगा। इस समय तेजी से समीप आ रहे विनाश से बचने का सिर्फ एक ही उपाय है कि तुम विद्यातत्वम पद्वति को अपनाकर ‘सत्य-धर्म-न्याय-नीति’ को अपने जीवन में उतार लो । विद्यातत्वम पद्वति एक ऐसा सिस्टम है जिसमें परमाणु से लेकर परमेश्वर तक समस्त जानकारी और शरीर तथा ब्रह्मांड के संचालन का विधान आता है। विश्व की समस्त सरकारों के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि वे समाज में विद्यातत्वम पद्वति को लागू करें अन्यथा दुनिया की कोई ताकत दुनिया को विनाश से नहीं बचा सकेगी।

     यह इस दुनिया में फैले अधर्म की चरम सीमा ही है कि जिस भगवान ने दुनिया बनाई, जिस भगवान ने इंसान के लिए सारी प्राकृतिक संपदायें प्रदान कीं जिससे कि मानव की हर जरूरत पूरी हो सके, जिस भगवान ने मानव को चेतनता के साथ साथ बौद्धिकता दी है, जो भगवान अपनी शक्ति के माध्यम से जीवों की देखभाल करता है, उसी भगवान को जानने, प्राप्त करने तथा उसके प्रति अनन्य भाव से समर्पित शरणागत होने और उसकी भक्ति सेवा करने के बजाय ये दुनिया वाले उसी की उपेक्षा करने लगे। नास्तिकता फैलाकर उसका नाम मिटाने में लगे हुये हैं। चारों तरफ असत्य,अधर्म,अन्याय और अनीति का ही बोलबाला है। धन्य है वह परम प्रभु कि ऐसी अनर्थकारी व्यवस्था के बावजूद भी वह इस दुनिया को स्थित रखे हुये है।

     सत्य-धर्म-न्याय-नीति इन चारों कि श्रेष्ठता को समाज में आन्तरिक रूप में तो सभी स्वीकार करते हैं, परन्तु जैसे ही उन्हे अपनाने तथा इसी के आधार पर रहने चलने को कहा जाता है तो बाहरी विकृत परिस्थितियाँ उनके अंदर हिलोरें मारकर ऐसी तरंग उत्पन्न करती हैं कि उनकी हिम्मत या साहस ही टूट जाता है। आजकल समाज में डोंगी, पाखंडियों और अन्यायियों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि किसी में भी यह साहस नहीं रह गया है कि वह अपने आपको धार्मिक कह सके। आज का शासन और समाज तो हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यप, रावण, कंस, फिऔन, हेरोदेश, कुरैश धर्म विरोधी आदि के शासन और समाज से भी बदतर हालत में पहुँच चुका है।

     बात अब यहीं तक नहीं रह गयी है कि यह कितना विकृत हो गया है, बल्कि बात अब यहाँ तक पहुँच चुकी है कि आखिरकार विनाश या प्रलय में अब देरी क्यों हो रही है? विश्व विनाश के लिए सज्जनों और भागवत भक्तों पर अब कौन सा ज़ोर ज़ुल्म और अत्याचार होना बाकी रह गया है जिससे कि शीघ्र अतिशीघ्र अधर्मियों, मिथ्यावादियों, अत्याचारियों और दुष्टो का विनाश नहीं हो रहा है ? इस समय सोचने की बात यही है कि अब देरी क्यों ? विश्व विनाश की तमाम भविष्य वाणियां भी निष्फल हो चुकी हैं आखिर क्यों? इसका कारण सिर्फ यही है कि वर्तमान समाज पर अभी भी खुदा-गॉड-भगवान कि विशेष कृपा है जिससे कि वे प्रलय के बजाय सुधरने का मौका दे रहें हैं। सत्य-धर्म-न्याय-नीति प्रधान समाज ही शिष्ट-संयमी-अनुशासित और अमन चैन समृद्धि का समाज हो सकता है। इसलिए हे धरती वासियों ! अभी भी समय है संभल जाओ और सत्य-धर्म-न्याय-नीति को जीवन में उतार लो वरना विनाश से बच नहीं पाओगे। यह सब रुपया, पैसा, धन, दौलत, सुख, साधन आदि जुटाकर क्या करोगे जब तुम ही नहीं रहोगे?

----------------सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस